लोकसभा चुनाव 2024: यूपी में अखिलेश यादव ने कैसे बढ़ाया अपना क़द

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    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

उस दिन आगरा के तेढ़ी बग़िया इलाक़े में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं की भीड़ लगी हुई थी.

तारीख़ थी 25 फ़रवरी. इस दिन अखिलेश यादव और राहुल गांधी को इंडिया गठबंधन की उत्तर प्रदेश में पहली साझा रैली करनी थी.

जगह-जगह अखिलेश यादव की तस्वीर के साथ पीडीए के बड़े-बड़े बैनर ये स्पष्ट कर रहे थे कि उत्तर प्रदेश में पीडीए ही इंडिया गठबंधन का नारा है.

अखिलेश यादव मंच पर राहुल गांधी से क़रीब दस मिनट पहले पहुँचे.

अखिलेश के पहुँचते ही सपा के कार्यकर्ताओं ने मंच को घेर लिया, सेल्फी खिंचाने और किसी भी तरह अखिलेश के क़रीब पहुँचने की होड़ सी मच गई.

कुछ उत्साही कार्यकर्ताओं ने मंच की रैलिंग को लांघने की कोशिश की. कई लोगों ने अखिलेश यादव को छू लिया.

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अखिलेश बार-बार मुस्काराते हुए कार्यकर्ताओं की तरफ हाथ का इशारा करके शांत होने की अपील करते और उत्साही कार्यकर्ता एक दूसरे को पछाड़ते हुए रेलिंग पर लटक जाते.

एक महिला कार्यकर्ता पुलिस के धकेलने के बावजूद तब तक रेलिंग पर डटी रही, जब तक अखिलेश यादव के साथ सेल्फ़ी नहीं खिंचा ली.

पत्रकार बाहर की गर्मी से राहत लेते हुए, पीडीए की एसी बस में बैठकर ये नज़ारा देख रहे थे.

अखिलेश की झलक पाने की जद्दोजहद कर रहीं बस में खड़ी पार्टी की एक महिला नेता को कार्यकर्ताओं के उठे हाथों की भीड़ के बीच जैसे ही अखिलेश यादव की झलक मिली, उनके मुंह से निकल पड़ा- "आज अखिलेश जी बिल्कुल नेताजी जैसे लग रहे हैं."

वो अखिलेश यादव के लुक की तुलना उनके पिता मुलायम सिंह यादव से कर रही थीं.

अब लोकसभा चुनाव 2024 में समाजवादी पार्टी के यूपी में 37 सीटें जीतने और अपने इतिहास के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन तक पहुँचने के बाद अखिलेश यादव के राजनीतिक क़द की तुलना उनके पिता मुलायम सिंह यादव से की जाने लगी है.

अखिलेश यादव की राजनीति

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हालाँकि, राजनीतिक विश्लेषक और समाजवादी विचारधारा से जुड़े लोग ये मान रहे हैं कि अभी मुलायम सिंह के बराबर पहुँचने में अखिलेश यादव को बहुत लंबा सफ़र तय करना है.

तेढ़ी बगिया की उस रैली में बड़ी तादाद में मौजूद पार्टी के दलित कार्यकर्ता ये इशारा ज़रूर कर रहे थे कि अखिलेश यादव की राजनीति अब बदल रही है, लेकिन उसे समझना इतना भी आसान नहीं था.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी को दलितों की बहुजन समाज पार्टी के विरोधी के रूप में देखा जाता रहा है, हालाँकि दोनों पार्टियाँ एक साथ गठबंधन में चुनाव भी लड़ चुकी हैं.

इस रैली में मौजूद एक दलित कार्यकर्ता ने कहा था, "समाजवादी पार्टी ने अब सही लाइन पकड़ी है, हम जैसे दलित कार्यकर्ताओं को भी सम्मान मिल रहा है, हम संविधान लेकर दलितों के बीच जा रहे हैं और ये समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि समाजवादी पार्टी में दलितों के लिए भी जगह है."

तब चुनावों में वक़्त था. पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अन्य (इसे अल्पसंख्यक भी समझा जा सकता है क्योंकि अब अधिकतर समाजवादी पार्टी नेता ए यानी अल्पसंख्यक ही बोल रहे हैं) को एक साथ लाना आसान काम नहीं दिख रहा था.

सपा-कांग्रेस गठबंधन

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22 जनवरी को अयोध्या में हुए राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम और इसकी मीडिया कवरेज से ऐसा लगा था कि इस चुनाव में कम से कम यूपी में तो ये बड़ा मुद्दा बनेगा.

लेकिन इस रैली के लगभग साढ़े तीन महीनों बाद आए चुनाव नतीजों ने ये स्पष्ट कर दिया है कि अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ उनका इंडिया गठबंधन दलित वोटरों को अपनी तरफ़ खींचने में कामयाब रहा है.

हिंदुत्व का प्रतीक बनी अयोध्या में ही दलित उम्मीदवार अवधेश प्रसाद समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीत गए हैं.

वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान इंडिया गठबंधन के लिए यूपी में आए चमत्कारिक नतीजों को 'नफ़रत की राजनीति के मुँह पर तमाचा' बताते हुए कहते हैं, "ऐसा लगता था कि गंगा-जमुनी तहज़ीब ख़त्म हो गई है, लेकिन इस नतीजे के बाद ये कहा जा सकता है कि नफ़रत की राजनीति और धार्मिक ध्रुवीकरण को लोगों ने नकार दिया है."

शरत प्रधान ये मानते हैं कि अखिलेश यादव राहुल गांधी के साथ मिलकर पिछड़ा दलित और अल्पसंख्यकों के गठजोड़ के नारे को घर-घर तक पहुँचाने में कामयाब रहे.

राहुल-अखिलेश की जोड़ी

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अखिलेश यादव और राहुल गांधी की जोड़ी को बार-बार यूपी के दो लड़के कहकर संबोधित किया जाता रहा है.

कई बार बीजेपी के नेताओं ने 'दो शहज़ादे' कहकर इस राजनीतिक जोड़ी का उपहास भी उड़ाने की कोशिश की.

शरत प्रधान कहते हैं, "अखिलेश यादव का पीडीए का नारा और राहुल गांधी का संविधान हाथ में लेकर रैलियाँ करना सबसे बड़ा गेमचेंजर इस चुनाव में साबित हुआ है. इंडिया गठबंधन इस बार बड़ी तादाद में दलित वोटर अपनी तरफ़ खींचने में कामयाब रहा."

उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी और दलित मतदाताओं के बीच ये फासला रहा है. दलितों और यादवों के बीच सामाजिक दूरी में ये फासला और बड़ा दिखता है.

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अखिलेश यादव की सबसे बड़ी कामयाबी यही है कि उन्होंने इस फासले को ख़त्म कर दिया है और वो इस बार दलित मतदाताओं को अपनी तरफ़ खींचने में कामयाब रहे हैं और यही उन्हें मिली अप्रत्याशित जीत में एक सबसे बड़ा फ़ैक्टर भी है.

लेकिन अखिलेश यादव के लिए ये करना आसान नहीं था.

साल 2022 में हुए विधानसभा चुनावों में जब उन्होंने 'परशुराम का फरसा' थामा तो समाजवादी विचारधारा से जुड़े बहुत से लोग हैरान रह गए.

नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ

नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ

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अखिलेश यादव की जीवनी लिखने वाले लेखक और पत्रकार फ्रैंक हुज़ूर कहते हैं, "अखिलेश यादव ने जब 2022 में 'ब्राह्मण ट्रैप' में फँसकर समाजवादी सिद्धांतों के ख़िलाफ़ 'फरसा' थाम लिया था तब सैद्धांतिक रूप से उनमें गिरावट आई थी. लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव नतीजों ने अखिलेश यादव को समझा दिया था कि समाजवाद ही उनका असली रास्ता है."

समाजवादी पार्टी ने लगातार दो विधानसभा चुनाव हारे हैं. 2014 और 2019 लोकसभा चुनावों में भी पार्टी पाँच सीटों पर ही सिमटी रही.

नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ के हिंदुत्व के सामने अखिलेश की राजनीति लगातार कमज़ोर हो रही थी.

अखिलेश यादव

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अखिलेश के सामने परिस्थितियाँ चुनौतीपूर्ण थीं. लेकिन उनके पास समर्पित कार्यकर्ता भी थे.

अखिलेश के आदेश पर यूपी के 40 ज़िलों में पीडीए साइकिल यात्रा निकालने वाले समाजवादी पार्टी की लोहिया वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभिषेक यादव कहते हैं, "नेताजी ने स्पष्ट कहा था कि पीडीए के नारे को घर-घर तक लेकर जाना है. हमने गाज़ीपुर से यात्रा शुरू की और 40 ज़िलों का सफ़र तय किया, यहाँ 26 सीटों पर हमारी जीत हुई है."

18 साल से समाजवादी पार्टी से जुड़े अभिषेक यादव कहते हैं, "पार्टी कार्यकर्ता अपने आप को अखिलेश यादव के क़रीब महसूस करते हैं और अखिलेश भी उनकी बात सुनते हैं."

पीडीए का नारा

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दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफ़ेसर और समाजवादी विचारधारा से जुड़े लक्ष्मण यादव मानते हैं कि पीडीए का नारा एक क्रांति की तरह है.

लक्ष्मण यादव कहते हैं, "साल 2019 में बसपा के साथ गठबंधन टूटने के बाद मायावती और अखिलेश यादव का गठबंधन तो टूट गया, लेकिन लोहिया और आंबेडकर का गठबंधन नहीं टूटा. अखिलेश यादव ने पीडीए का नारा दिया और हज़ारों साल पुरानी इस लड़ाई को और मज़बूत किया. अखिलेश यादव ये समझ गए कि जाति इस देश की सच्चाई है और सामाजिक न्याय के लिए जाति के सवाल का जवाब देना होगा."

वे बताते हैं कि अखिलेश यादव ने जब 2012 में समाजवादी पार्टी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई, तो वो एक नए विज़न के साथ आए थे, उन्होंने विकास और सबको बराबर रखने की राजनीति की.

लक्ष्मण यादव कहते हैं, "राजनीतिक परिवार में पैदा हुए अखिलेश विदेश में पढ़े हैं. जब 2012 में उन्हें सत्ता मिली तो विकास उनका मूलमंत्र था. उन्होंने सबको साथ लिया और सबके लिए काम किया. लेकिन 2017 में चुनाव हारने के बाद जब अखिलेश ने मुख्यमंत्री आवास ख़ाली किया तो उसे गोमूत्र से धोया गया. इसने अखिलेश के विचार बदले, अखिलेश बार-बार ये कहते हैं कि मैं अपने आप को अगड़ा समझता था, इन्होंने मुझे पिछड़ा साबित कर दिया."

जातिगत समीकरण

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साल 2024 में कन्नौज में नामांकन के दौरान जब अखिलेश यादव मंदिर गए, तो उनके जाने के बाद इस मंदिर को भी धोया गया.

लक्ष्मण यादव कहते हैं, "इससे संकेत गया कि देश का एक वर्ग एक पूर्व मुख्यमंत्री को भी बस पिछड़ा ही समझता है. अखिलेश यादव ने ये सवाल खड़ा किया कि 'कौन है जिसे आप शूद्र और पिछड़ा' कह रहे हैं."

समाजवादी पार्टी ने इस बार टिकट बँटवारे में भी सभी जातियों का ध्यान रखा. इस बार अखिलेश यादव ने गठबंधन में अपने हिस्से आईं 62 में से सिर्फ़ 5 सीटों पर यादव और 4 सीटों पर मुसलमान उम्मीदवार उतारे. जबकि 17 दलित प्रत्याशियों को मैदान में उतारा. उन्होंने 9 सवर्ण और कुल 30 ओबीसी उम्मीदवारों को टिकट दिया.

लक्ष्मण यादव कहते हैं, "इस बार पूरा फ़ोकस जातिगत समीकरण साधने पर था. सबको हिस्सेदारी देने पर था. सबसे बड़ी हिस्सेदारी दलितों को दी गई."

वे कहते हैं, "संविधान बचाने की जब बारी आई तब बसपा के मिशन के लोग भी समाजवादी पार्टी के साथ आए. आज अखिलेश यादव बहुजन आइकॉन बनकर उभरे हैं. वो अब सिर्फ़ पिछड़ों के नेता या पिछड़ों के आत्मसम्मान के प्रतीक नहीं हैं, उन्होंने दलितों को भी अपने साथ ले लिया है. ये एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत है. संघ की लड़ाई के सामने अखिलेश यादव की पीडीए राजनीति ने बहुत कुछ बदल दिया है और इसका असर आगे देश की राजनीति पर दिखाई देगा."

विश्लेषक मानते हैं कि 2024 चुनाव नतीजों ने अखिलेश यादव को जीवनदान दे दे दिया है.

यूपी के मुसलमान

वीडियो कैप्शन, 'सबका साथ, सबका विकास' के नारे में मुसलमान कहां हैं?

फ्रैंक हुजू़र कहते हैं, "अखिलेश की राजनीति को मिले इस जीवनदान का सबसे बड़ा क्रेडिट राहुल गांधी के हाथ में संविधान को दिया जाना चाहिए. उन्होंने हर रैली में हाथ में संविधान लिया और ये संविधान दलितों और पिछड़ों को इंडिया गठबंधन के क़रीब ले आया."

फ्रैंक कहते हैं, "पिछले दो साल में अखिलेश के राजनीतिक व्यक्तित्व में लोहिया और आंबेडकर के सिद्धांत मज़बूत हुए हैं और अगर वो इन पर टिके रहेंगे, यह स्पष्ट है कि वो टिके ही रहेंगे, तो देश की राजनीति में उनका क़द और बड़ा होगा."

उत्तर प्रदेश में मुसलमान मतदाता समाजवादी पार्टी के साथ रहे हैं. 2022 के चुनावों में यूपी के मुसलमानों ने एकतरफ़ा वोट समाजवादी पार्टी को दिया था लेकिन पार्टी जीत नहीं सकी.

साल 2024 में भी मुसलमानों ने इंडिया गठबंधन को बढ़-चढ़कर वोट दिया है. विश्लेषक मानते हैं कि इसका एक कारण राहुल गांधी भी हैं.

फ्रैंक हुजूर कहते हैं, "राहुल और अखिलेश यादव की जोड़ी ने मुसलमान मतदाताओं में भी एक विश्वास पैदा किया है. राहुल को साथ देखकर अखिलेश यादव में मुसलमान मतदाताओं का विश्वास और बढ़ा है."

हालांकि, फ्रैंक ये भी मानते हैं कि अखिलेश यादव को मुसलमानों के मुद्दों पर अब और मुखर होना होगा.

वो कहते हैं, "अखिलेश यादव को मुसलमानों के मुद्दों पर मुखर होने और उन्हें प्राथमिकता देने की ज़रूरत है. अभी तक अखिलेश यादव मुसलमानों के लिए एक झिझक के साथ बोलते रहे हैं, उन्हें ये झिझक दूर करनी होगी. अगर वो ऐसा नहीं करेंगे तो उन्हें नुक़सान हो सकता है."

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