आरएसएस के स्वयंसेवकों के घर की महिलाएँ हिंदुत्व पर क्या सोचती हैं?

- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बाँसवाड़ा और जयपुर से
आधी आबादी मतलब औरतों की आबादी. लेकिन इस टर्म का इस्तेमाल केवल तादाद में होता है. अधिकारों के मामले में आधे जैसी बात बेमानी लगती है.
राजनीति में आधी आबादी वोट तो करती है लेकिन आधा प्रतिनिधित्व यूटोपिया लगता है. कहा जाता है कि भारत की आधी आबादी दूसरी लैंगिक आधी आबादी यानी पुरुषों के पिछलग्गू है.
यह भारत के वैचारिक आंदोलनों में भी साफ़ दिखता है. भले इन आंदोलनों में महिलाओं का योगदान पर्दे के पीछे से मर्दों से कम नहीं होता लेकिन उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं मिलता. ऐसा सभी वैचारिक आंदोलनों में देखने को मिलता है.
नक्सलबाड़ी आंदोलन के जनक चारू मजूमदार की पत्नी लीला सेनागुप्ता के बारे में शायद ही कोई जानता है. चारू मजूमदार सशस्त्र आंदोलन में अंडरग्राउंड रहते थे लेकिन उनकी पत्नी एलआईसी एजेंट का काम कर घर का खर्च चलाती थीं. चारू मजूमदार पूरा वक़्त एक मक़सद को दें, इसमें लीला सेनगुप्ता की अहम भूमिका थी.
इसी तरह दक्षिणपंथी विचारधारा के साथ भी है. आरएसएस पुरुषों का संगठन है लेकिन स्वयंसेवकों की पत्नियां इस संगठन से नहीं जुड़कर भी अपने पतियों के साथ हो जाती हैं.
स्वयंसेवकों की पत्नियां न केवल पतियों के साथ हो जाती हैं बल्कि उस विचारधारा का प्रचार-प्रसार भी करती हैं. लेकिन उन्हें इसके बदले में क्या मिलता है? क्या उन्हें बराबरी का दर्जा मिलता है? क्या वे इससे सशक्त होती हैं?
इस रिपोर्ट में हमने आरएसएस के कुछ स्वयंसेवकों की पत्नियों के मन टटोलने की कोशिश की है कि उन पर पति के आरएसएस में होने का क्या असर पड़ा.

राजस्थान के बाँसवाड़ा से 35 किलोमीटर दूर दुखवाड़ा गाँव में कन्हैयालाल यादव के घर साल 1993 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक आए थे.
तब कन्हैयालाल केवल नौ साल के थे और उन्हें आरएसएस के बारे में बहुत पता नहीं था. कन्हैयालाल यादव इसी साल आरएसएस से जुड़ गए थे.
कन्हैयालाल यादव याद करते हुए बताते हैं कि यह पहली बार था जब किसी दूसरी जाति के किसी व्यक्ति ने उनके घर का पानी पिया था. कन्हैयालाल अपने नाम के साथ यादव लिखते हैं लेकिन वे दलित हैं.
कन्हैयालाल कहते हैं, ''हम जाति से चमार हैं. हमने चमार जाति में पैदा होने की चुनौतियां देखी हैं लेकिन आरएसएस ने इन चुनौतियों को आसान बना दिया. अगर मैं आरएसएस में शामिल न होता तो कहीं नशे की लत का शिकार होता. अभी जो भी मेरी हैसियत है, उसमें आरएसएस का सबसे बड़ा योगदान है.''
कन्हैयालाल यादव बाँसवाड़ा में सरकारी स्कूल में संस्कृत के शिक्षक हैं. इसके साथ ही बाँसवाड़ा में आरएसएस के ज़िला कार्यवाह हैं. कन्हैयालाल यादव की पत्नी चंद्रिका यादव भी बाँसवाड़ा के सरकारी स्कूल में विज्ञान की टीचर हैं.
संघ में दलितों का होना
चंद्रिका यादव जातीय भेदभाव का एक वाक़या याद करते हुए कहती हैं, ''स्कूल के दिनों की बात है. मैं हैंडपंप पर पानी पी रही थी. तभी कुछ लड़कियों ने कहा- "तुम तो चमार हो न? मेरा टाइटल तो यादव था. मुझे लगा कि इन लड़कियों ने मेरी जाति की जानकारी ली होगी तभी आकर पूछ रही हैं. मेरे लिए वह पल शर्मिंदगी भरा था. मैं अपने पिता के पास गई. वह नर्सिंग सुपरिटेंडेंट थे. मेरे पिता ने समझाते हुए कहा कि बेटा हमारे पूर्वज चमड़े का काम करते थे, इसलिए चमार कहा जाता है. इसमें कोई शर्मिंदगी वाली बात नहीं है.''
चंद्रिका यादव को लगता है कि जब से उनके पति आरएसएस में सक्रिय हुए हैं तब से जाति को लेकर मारा जाने वाला ताना ख़त्म हो गया है और समाज में उनकी प्रतिष्ठा भी बढ़ी है.
चंद्रिका यादव कहती हैं, ''मुझे अच्छा लगता है कि मेरे पति को संघ में चाहे जिस जाति के भी लोग हों, सभी उनको भाई साहब कहते हैं.''
राजस्थान में उदयपुर के नारायण गमेती आदिवासी समुदाय से हैं और वह आरएसएस में सह प्रांत कार्यवाह हैं. गमेती की पत्नी सुशीला उदयपुर के ज़िला अस्पताल में नर्स हैं. सुशीला से पूछा कि पति के आरएसएस में होने का असर उन पर क्या पड़ा?
सुशीला कहती हैं, ''अभी जो मैं आपके सामने खुलकर और आत्मविश्वास के साथ बात कर रही हूँ, वो नहीं कर पाती. इनके आरएसएस में होने से घर और अस्पताल के दायरे से बाहर निकल पाई. संघ का कोई कार्यक्रम होता है तो स्वयंसेवकों की पत्नियां भी आती हैं. उनसे बात करना अच्छा लगता है. यहाँ कोई किसी से जाति नहीं पूछता है. सब एक समान होते हैं.''
संघ में पति के जाने से क्या महिलाएं सशक्त हुई हैं?

आरएसएस में जो स्वयंसेवक दलित और आदिवासी समुदाय हैं, उनकी पत्नियों को लगता है कि उनके पति के आरएसएस में होने से वो सशक्त हुई हैं, समाज में पहचान और प्रतिष्ठा मिली है. सुशीला गमेती और चंद्रिका यादव जिस सशक्तीकरण की बात कर रही हैं, उसे कैसे देखा जाना चाहिए?
यह सवाल जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर रहे और दलित पहचान और उसकी राजनीति पर किताब लिख चुके घनश्याम शाह से पूछा तो उन्होंने कहा, ''पहली नज़र में तो यही लगता है कि सुशीला और चंद्रिका यादव के लिए यह सशक्तीकरण है. लेकिन इस सशक्तीकरण की एक हद है. जैसे आरएसएस में दलितों और आदिवासियों की हद है. आरएसएस एक ब्राह्मणवादी और हिन्दूवादी संगठन है. इसमें दलितों और आदिवासियों की वही जगह होगी जो हिन्दू वर्ण व्यवस्था में है.''
प्रोफ़ेसर शाह कहते हैं, ''भारत में दलितों और आदिवासियों के साथ अब भी बराबरी का व्यवहार नहीं होता है. उनके साथ किसी संगठन या पार्टी की ओर से सामान्य मानवीय व्यवहार भी होता है तो उन्हें लगता है कि यह अतिरिक्त है लेकिन यह अतिरिक्त नहीं है बल्कि उनका अधिकार है.''
संघ में सवर्णों का दबदबा

आरएसएस में राजस्थान धर्म प्रसार विंग के एक पदाधिकारी का कहना है कि संघ पिछले दस सालों में बहुत बदला है. वह कहते हैं, ''देश भर में संघ के क़रीब दो हज़ार प्रचारक होंगे और इनमें से क़रीब 20 फ़ीसदी से ज़्यादा दलित हैं. पहले ऐसा बिल्कुल नहीं था. वो दिन दूर नहीं है जब संघ का कोई दलित या आदिवासी स्वयंसेवक सरसंघचालक होगा. यह हमारे एजेंडे का हिस्सा है कि संघ की विचारधारा से बहुजनों को जोड़ना है और हम जोड़ रहे हैं.''
प्रोफ़ेसर घनश्याम शाह कहते हैं कि आरएसएस इस बात को अच्छी तरह समझ गया है कि सत्ता में बने रहना है तो बहुजनों को साथ जोड़ना होगा. प्रोफ़ेसर शाह कहते हैं, ''दलितों और आदिवासियों को हिन्दुत्व की विचारधारा अपने पीछे लामबंद करने में कामयाब होती दिख रही है लेकिन यह लामबंदी समानता, विवेकशीलता और वैज्ञानिक सोच के लिए नहीं है.''
1925 में गठन के बाद से अब तक आरएसएस के कुल छह सरसंघचालक हुए हैं और इनमें चौथे सरसंघचालक रज्जू भैया यानी राजेंद्र सिंह को छोड़ दिया जाए तो सभी ब्राह्मण हैं. रज्जू भैया भी ठाकुर थे यानी सभी आरएसएस प्रमुख सवर्ण ही हुए हैं.
सुशीला गमेती से पूछा कि क्या कोई आदिवासी समुदाय से आरएसएस का सरसंघचालक बनेगा? सुशीला अपने पति नारायण गमेती की ओर इशारा करते हुए कहती हैं- "ये शादी नहीं करते तो बन सकते थे." इतना कहकर वह हँसने लगती हैं.
घर की महिलाओं की दुविधाएँ

ग्वालियर के सुरेश उपाध्याय 1968 में आरएसएस में शामिल हुए थे. उपाध्याय राजस्थान सरकार में इंजीनियर थे और आरएसएस में 2019 तक विभाग संपर्क प्रमुख रहे. अभी विश्व हिन्दू परिषद में क्षेत्रीय मंत्री हैं. सुरेश उपाध्याय की पत्नी रेखा उपाध्याय से पूछा कि एक स्वयंसेवक की पत्नी होने का मतलब क्या है?
रेखा उपाध्याय कहती हैं, ''स्वयंसेवक की पत्नी होना आसान नहीं है. शादी के बाद से ही उपाध्याय जी लंबे प्रवास पर रहते थे. ऐसे में घर की सारी ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर ही आ गई थी. अब तो आदत-सी हो गई है. लेकिन इन्हीं विषम परिस्थितियों में मैंने अकेले लड़ना और जूझना सीख लिया. कई बार नाराज़गी भी होती है लेकिन संघ में न होकर भी उसी विचारधारा से हम स्वयंसेवकों की पत्नियां जुड़ जाती हैं.''
रेखा उपाध्याय की बेटी सुकृति उपाध्याय ने दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ में मास्टर किया है. सुकृति ने सिविल सेवा की भी तैयारी की लेकिन सफलता नहीं मिली. अब वह आरएसएस की ही संकल्प परियोजना से जुड़ गई हैं. संकल्प में ग़रीबों के मेधावी बच्चों को मुफ़्त में सिविल सेवा की तैयारी करवाई जाती है.
रेखा उपाध्याय से पूछा कि क्या वह अपनी बेटी की शादी किसी स्वयंसेवक से करेंगी? रेखा उपाध्याय जवाब में कहती हैं- "नहीं, क्योंकि समान विचारधारा के लोग साथ में नहीं रह सकते हैं. मेरा पूरा परिवार इसी विचारधारा में ढल गया है.''
रेखा उपाध्याय को लगता है कि पति के आरएसएस में होने की वजह से वह राष्ट्र और हिन्दू धर्म को लेकर ज़्यादा सजग हुई हैं. वह कहती हैं कि हिन्दुत्व के साथ होना राष्ट्र के साथ होना है.
पुरुषों की लाइन पर ही महिलाएं

जिन दलित और आदिवासी महिलाओं से हमने बात की, उन्हें लगता है कि उनके पति के आरएसएस में होने से उनका सम्मान बढ़ा है जबकि सवर्ण स्वयंसेवकों की पत्नियों को लगता है कि हिन्दुत्व के साथ होना राष्ट्र के साथ होना है.
प्रोफ़ेसर घनश्याम शाह कहते हैं, "सवर्ण स्वयंसेवकों की पत्नियां जब कहती हैं कि हिन्दुत्व के साथ होना राष्ट्र के साथ होना है तो दरअसल, उन्हें पता है कि स्वहित ही उनके लिए राष्ट्र हित है."
शाह कहते हैं, ''हिन्दुत्व की राजनीति वर्ण व्यवस्था की यथास्थिति नहीं तोड़ रही है. पुरुषों के वर्चस्व को नहीं तोड़ रही है. हिन्दुत्व की राजनीति धर्म की सत्ता को चुनौती नहीं दे रही है. लेकिन सवर्ण महिलाओं को पता है कि वर्ण व्यवस्था में वही ऊपर हैं और पुरुषों के वर्चस्व में भी वर्चस्व उन्हीं के पतियों का है. धर्म की सत्ता में सत्ता उनके ही पुरुषों के पास है. ऐसे में इस राजनीति को उनके लिए राष्ट्रहित से जोड़ना कोई जोखिम भरा काम नहीं है.''

भारतीय मुसलमान और गांधी पर इनका नज़रिया
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बाँसवाड़ा परियोजना भील आदिवासियों के लिए है. राजस्थान के बाँसवाड़ा ज़िले की 70 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है और इसमें भील आदिवासी सबसे बड़ा समूह है.
बाँसवाड़ा से 50 किलोमीटर दूर जेरलानी गाँव की भील आदिवासी महिला निरमा कुमारी आरएसएस की बाँसवाड़ा परियोजना के दफ़्तर के कैंपस में स्थित भारत माता मंदिर में बैठी हैं. निरमा कुमारी के साथ सात और भील महिलाएं हैं. इन्हें दो स्वयंसेवक कुछ बता रहे हैं.
ये महिलाएँ अपने-अपने इलाक़े में आरएसएस की 'संस्कारशालाएँ' चलाती हैं. निरमा कुमारी से पूछा कि वह संस्कारशालाओं में बच्चों को क्या सिखाती हैं?
निरमा कुमारी ने बताया, ''हम बच्चों को बताते हैं कि सुबह बिस्तर से उठते ही धरती को प्रणाम करना है. माता-पिता को चरण स्पर्श करना है. तिलक लगाना है. हम अपनी संस्कारशालाओं में ईसाई बच्चों को भी बुलाते हैं और उन्हें भी तिलक लगाते हैं. घर जाने से पहले उनका तिलक मिटा देते हैं ताकि उनके घर वाले बच्चों पर नाराज़ ना हों.''
निरमा कुमारी कहती हैं कि आरएसएस के साथ जुड़ने से उनकी पहचान बढ़ी है और लोग जानने लगे हैं. निरमा कहती हैं, ''मैं संस्कारशालाओं के लिए कम से कम 20 गाँवों में जाती हूँ और सभी 20 गाँव के लोग मुझे जानते हैं. इससे पहले मुझे कोई नहीं जानता था.''
आरएसएस के हिन्दुत्व में धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रवाद, महात्मा गांधी, नाथूराम गोडसे और भारत के मुसलमानों को लेकर सवाल उठते रहे हैं.
हिन्दुत्व के पैरोकार विनायक दामोदर सावरकर का कहना था कि भारत के मुसलमानों की पितृभूमि तो भारत है लेकिन पुण्यभूमि सुदूर अरब है. ऐसे में उनकी निष्ठा पितृभूमि और पुण्यभूमि के बीच विभाजित है. यानी जिन धर्मों की जड़ें भारत में है, उन्हें मानने वालों की पुण्यभूमि भी भारत ही है.
ऐसे में भारत के हिन्दुओं, बौद्धों, जैनों और सिखों की पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों भारत में ही हैं और और सावरकर के मुताबिक़, उनकी निष्ठा मुसलमानों की तरह बँटी हुई नहीं है.
हिन्दुत्व की विचारधारा मानने वाले लोग कई बार इसी तर्क के आधार पर भारत के मुसलमानों की देशभक्ति पर शक करते हैं.
ये महिलाएं भारत के मुसलमानों, नाथूराम गोडसे और महात्मा गांधी को लेकर क्या सोचती हैं?

गांधी और गोडसे, दोनों का सम्मान?
रेखा उपाध्याय से हमने पूछा कि वह महात्मा गांधी को कैसे देखती हैं? क्या उनके मन में महात्मा गांधी को लेकर आदर है?
रेखा उपाध्याय जवाब में कहती हैं, ''बचपन में जिस तरह से पढ़ाया गया, उस हिसाब से आदर तो है लेकिन नाथूराम गोडसे मेरे लिए आदर्श व्यक्ति हैं. मैंने उनका वो भाषण सुना है, जिसमें वो ख़ुद के बारे में बताते हैं. गोडसे को सुनकर मैं कई बार रोई भी.''
रेखा उपाध्याय के पति सुरेश उपाध्याय कहते हैं कि गोडसे ने गांधी की हत्या नहीं, वध किया था. हत्या और वध में फ़र्क़ होता है.
इस फ़र्क़ को उपाध्याय ही बताते हैं. वह कहते हैं, ''महाभारत का एक श्लोक है- अहिंसा परमो धर्मः धर्महिंसा तथैवचः यानी अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है लेकिन न्याय और सत्य के लिए हिंसा करना उससे भी श्रेष्ठ है. जो हिंसा न्याय और सत्य के लिए होती है, उसे हत्या नहीं, वध कहते हैं. जैसे राम ने रावण की हत्या नहीं, वध किया था.''
निरमा कुमारी भारत के मुसलमानों को लेकर कहती हैं, "हिन्दुस्तान हिन्दुओं का है और जो यहाँ रहना चाहता है, उन्हें हिन्दुत्व अपना लेना चाहिए, नहीं तो कोई और देश खोज लेना चाहिए."

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सुशीला गमेती से पूछा गया कि क्या उनकी नज़रों में हिन्दू ज़्यादा देशभक्त होते हैं और मुसलमान कम? इस सवाल के जवाब में वह कहती हैं, ''देखने में तो ऐसा लग रहा है. हिन्दुओं के लिए मज़हब से पहले देश है लेकिन मुसलमानों के लिए मज़हब पहले है और देश बाद में. मुसलमान अपने मज़हब के लिए कुछ भी कर सकता है जबकि हिन्दू अपने देश के लिए कुछ भी कर सकता है.''
सुरेश उपाध्याय की बेटी सुकृति उपाध्याय कहती हैं कि हिन्दुओं के लिए एकमात्र देश भारत है, इसलिए वो एकनिष्ठ हैं.
जाने-माने इतिहासकार इम्तियाज़ अहमद से पूछा कि पुण्यभूमि और पितृभूमि में बँटी हुई निष्ठा वाले तर्क को वह कैसे देखते हैं?
इम्तियाज़ अहमद कहते हैं, ''धर्म और देश को एक दूसरे के ख़िलाफ़ जानबूझकर खड़ा करने कोशिश की जाती है और फिर यह तर्क दिया जाता है. मैं नहीं मानता कि धर्म और देश के बीच कोई विरोधाभास है या दोनों एक दूसरे के प्रति वफ़ादारी से रोकते हैं. एक भारतीय होना न तो मुसलमान होने में बाधा नहीं है, और मुसलमान होना भारतीय होने में बाधा नहीं है. यह बिल्कुल ही बिना सिर पैर का तर्क है.''
पुरुष प्रधान देश में महिलाएं अपने पुरुषों का अनुसरण करती हैं, यह बात चौंकाती नहीं है. लेकिन कई लोग इस बात को मानते हैं कि जो विचारधारा धर्म की सत्ता को चुनौती ना दे, उस विचारधारा से महिलाएं सशक्त नहीं बन सकती हैं.
अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी को महिलाएं पसंद करती हैं तो कई लोग सवाल पूछते हैं कि जो पार्टी रूढ़िवादी विचारों की वकालत करती है, उसे महिलाएँ पसंद क्यों करती हैं? इसी तरह भारत में भी नरेंद्र मोदी को पीएम बनाने में महिला वोटरों का योगदान अहम रहा है.
ज़ाहिर है, भारतीय जनता पार्टी हिन्दू राष्ट्र की बात करती है और हिन्दू राष्ट्र होने का मतलब है कि धर्म की सत्ता और मज़बूत होगी. धर्म आश्रित व्यवस्थाओं में दुनिया भर में कहीं ऐसी मिसाल देखने को नहीं मिलती जहाँ महिलाएँ सही अर्थों में सशक्त हों.
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