लोकसभा चुनाव 2024: बंगाल में चला ममता का जादू पर कैसे बेअसर हुआ मोदी मैजिक?
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए

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वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव के तीन साल बाद पश्चिम बंगाल के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी का मैजिक एक बार फिर हिट रहा है.
दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बड़े पैमाने पर चुनाव प्रचार, डेढ़ दर्जन से ज्यादा रैलियों और रोड शो के बावजूद भाजपा सीटें बढ़ाना तो दूर, अपनी पिछली बार की एक तिहाई सीटें बचाने में भी नाकाम रही है.
बुआ और भतीजे यानी ममता और अभिषेक की जोड़ी ने फिर साबित कर दिया है कि घोटाले और भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बावजूद राज्य के वोटरों पर तृणमूल कांग्रेस की पकड़ ढीली होने की बजाय और मजबूत हुई है.
ममता ने भाजपा के सबसे बड़े मुद्दे संदेशखाली और नागरिकता संशोधन कानून को बदली हुई परिस्थिति में जिस तरह अपने सियासी हित में भुनाया, उसे राजनीतिक हलकों में पार्टी की कामयाबी की एक प्रमुख वजह माना जा रहा है.
ममता बनर्जी ने पार्टी की भारी जीत के बाद अपने आवास पर अभिषेक बनर्जी के साथ बैठक की.
उसके बाद पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा, "वोटरों ने भाजपा की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी है. यह मोदी के ख़िलाफ़ वोट है. मोदी ने कई राजनीतिक पार्टियों को तोड़ा है. इस बार जनता ने उनकी पार्टी को ही तोड़ दिया है. जनता ने उनको वोट के जरिए माकूल जवाब दिया है. मोदी और अमित शाह को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए."

मोदी जी आपका मैजिक ख़त्म हो गया: ममता

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ममता बनर्जी ने पत्रकारों से कहा, "मोदी जी आपका मैजिक ख़त्म हो गया है. आपको इस्तीफ़ा देना होगा."
मुख्यमंत्री ने चुनाव आयोग की आलोचना करते हुए कहा, "आयोग ने हिज मास्टर्स वॉयस के तौर पर काम किया है. एग्जिट पोल करने वालों ने मनोबल तोड़ने का प्रयास किया था. वह तमाम रिपोर्ट भाजपा के दफ्तर में तैयार की गई थी."
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख का कहना था, "यह जीत आम लोगों और विपक्षी दलों के गठबंधन 'इंडिया' की जीत है. मैं इंडिया गठबंधन के सहयोगियों के प्रति समर्थन जताती हूं. जो साथ हैं उनके प्रति भी और जो जुड़ना चाहते हैं उनके प्रति भी. भाजपा ने विधायकों को तोड़ने की कम कोशिश नहीं की थी. लेकिन आखिर तक उसे कामयाबी नहीं मिली."
संदेशखाली मुद्दे पर स्टिंग वीडियो, नागरिकता संशोधन कानून और ममता बनर्जी सरकार की कल्याण मूलक योजनाएं- ये तीन मुद्दे ही पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की भारी जीत और भाजपा को लगे करारे झटके की सबसे बड़ी वजह के तौर पर सामने आए हैं.
इस चुनाव में दो नेताओं की साख भी दांव पर लगी थी. तृणमूल के सेनापति कहे जाने वाले सांसद अभिषेक बनर्जी और भाजपा की ओर से विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी. चुनावी नतीजों ने जहां पार्टी के सेनापति के तौर पर अभिषेक की स्थिति को बेहद मजबूत बना दिया है, वहीं शुभेंदु के राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
ममता बनर्जी को कैसे मिली ये जीत

बंगाल के चुनावी नतीजों ने यहां अपनी सीटों की तादाद बढ़ाने का प्रयास कर रही भाजपा को करारा झटका दिया है. सीटें बढ़ाना तो दूर वह अपनी पिछली बार की जीती सीटें भी बरकरार रखने में नाकाम रही है. कांग्रेस की झोली में एक सीट जरूर आई है. लेकिन उसकी सबसे पक्की मानी जानी वाली मुर्शिदाबाद ज़िले की बहरमपुर सीट से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी की पराजय ने पार्टी को झटका दिया है.
उनको पहली बार राजनीति में कदम रखने वाले टीएमसी उम्मीदवार और हरफनमौला क्रिकेटर यूसुफ़ पठान ने हराया.
अधीर इससे पहले पांच बार वह सीट जीत चुके थे और लेफ्ट और ममता की आंधी में भी अपनी सीट बचाते रहे थे. वहीं कांग्रेस के साथ समझौते के तहत मैदान में उतरी सीपीएम का खाता इस बार भी नहीं खुल सका है.
ममता बनर्जी के अलावा अभिषेक ने ही अपने कंधों पर पार्टी के चुनाव अभियान की जिम्मेदारी संभाली थी. ऐसा तब जबकि वो खुद भी कोलकाता से सटी डायमंड हार्बर सीट से चुनाव लड़ रहे थे. लेकिन अपनी जीत के बारे में वो इतने आश्वस्त थे कि लगातार दूसरे उम्मीदवारों का ही प्रचार करने में जुटे रहे. इन नतीजों के बाद पार्टी में चल रहे नया बनाम पुराना विवाद भी थम जाने की उम्मीद है. साथ ही पार्टी में उत्तराधिकार पर उठने सवाल भी अब थमने की संभावना है.
संदेशखाली था बीजेपी का मुद्दा

भाजपा ने यहां संदेशखाली को ही अपना सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था.
लोकसभा चुनाव की तारीख के एलान के पहले से ही उसने इस मुद्दे पर आक्रामक तरीके से आंदोलन शुरू किया था.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी बारासात रैली में इन कथित पीड़िताओं से मुलाकात की थी. बाद में उनमें से ही एक रेखा पात्रा को बशीरहाट संसदीय सीट पर टिकट दिया गया.
शुरुआती दौर में तृणमूल कांग्रेस इस मुद्दे से सांसत में थी. उसने डैमेज कंट्रोल की कवायद जरूर शुरू की थी. लेकिन भाजपा को इस मामले में बढ़त साफ़ नजर आ रही थी.
उसके बाद अचानक आने वाले एक स्टिंग वीडियो ने पूरी तस्वीर ही बदल दी और भाजपा का यह मुद्दा उसके हाथों से निकल कर तृणमूल कांग्रेस के हाथों में चला गया.
उस वीडियो में भाजपा के एक स्थानीय नेता को यह कहते हुए सुना गया कि यह पूरा मामला ही मनगढ़ंत है और इसके पीछे शुभेंदु अधिकारी का हाथ है.

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ममता ने उसके बाद इसे बंगाल की महिलाओं की अस्मिता से जोड़ दिया. इस तरह जो मुद्दा ममता के महिला वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए भाजपा का सबसे बड़ा हथियार साबित हो सकता था, वही इस वोट बैंक को मजबूत करने का ममता का हथियार बन गया.
चुनाव से ठीक पहले लागू होने वाले नागरिकता संशोधन कानून भी यहां भाजपा को अपेक्षित कामयाबी नहीं दिला सकी. ममता इसे एनआरसी से जोड़ते हुए कहती रहीं कि इसके तहत तमाम लोगों को घुसपैठिया घोषित कर बंगाल से खदेड़ दिया जाएगा. इससे उस मतुआ समुदाय में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई जिसे ध्यान में रखते हुए भाजपा ने इसे लागू किया था.
शिक्षक भर्ती समेत तमाम घोटाले भी तृणमूल कांग्रेस की जीत की राह में बाधा नहीं बन सके. उनकी बजाय ममता सरकार की कल्याण मूलक योजनाएं बीस साबित हुईं.
शुभेंदु अधिकारी की भूमिका पर सवाल

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एक तरफ़ बंगाल की जीत के साथ तृणमूल में उत्तराधिकारी के तौर पर अभिषेक बनर्जी को लेकर चलने वाली बहस के थमने की संभावना जताई जा रही है तो दूसरी तरफ़, भाजपा में शुभेंदु अधिकारी की ज़िम्मेदारी को लेकर सवाल उठने लगे हैं.
प्रदेश भाजपा के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, "पार्टी ने बंगाल में चुनाव अभियान की कमान शुभेंदु अधिकारी को सौंप रखी थी. केंद्रीय नेतृत्व के तमाम फ़ैसले उनकी सिफ़ारिश पर ही होते रहे. वह चाहे उम्मीदवारों की सूची तय करना हो, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष की सीट बदलना हो या फिर संदेशखाली की कथित पीड़िता रेखा पात्रा को बशीरहाट संसदीय सीट से टिकट देना हो."
"नतीजों ने यह भी साफ कर दिया है कि ऐसे तमाम फ़ैसले पार्टी के ख़िलाफ़ गए. दिलीप घोष की सीट बदलने के कारण उनको तो पराजय का सामना करना ही पड़ा, पिछली बार वो जिस मेदिनीपुर सीट पर जीते थे वह भी हाथ से निकल गई."
अब बड़े-बड़े दावों के बाद आए नतीजे के बाद बंगाल के पुराने नेता केंद्रीय नेतृत्व पर सवाल उठाने लगे हैं.
पार्टी के एक नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, "पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने महज शुभेंदु अधिकारी पर भरोसा कर गलती की. इसके अलावा दलबदलुओं को टिकट देकर पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं की अनदेखी की गई."
"साथ ही पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष की सीट बदल दी गई. इसी वजह से उनको हार का सामना करना पड़ा. केंद्रीय नेतृत्व के जबरन थोपे गए फैसलों से पार्टी में असंतोष फैला. इसका असर चुनाव पर भी पड़ा."
'तमाम योजनाओं का फायदा टीएमसी को मिला'

राजनीति विश्लेषक शिखा मुखर्जी कहती हैं, "भाजपा ने यह चुनाव ममता बनर्जी सरकार की कथित नाकामियों और राज्य में महिलाओं की कथित बदहाली के मुद्दे पर लड़ा था. यह चुनाव मोदी बनाम ममता था. इसलिए इन नतीजों की जिम्मेदारी भी मोदी की है."
"राज्य के लोगों ने एक बार फिर ममता बनर्जी और उनकी पार्टी पर ही भरोसा जताया है. संदेशखाली, भर्ती घोटाला और नागरिकता संशोधन कानून जैसे भाजपा के मुद्दे पूरी तरह बेअसर साबित हुए हैं. इसके अलावा धार्मिक ध्रुवीकरण का उसका प्रयास पहले की तरह इस बार भी बेअसर रहा. दूसरी ओर, ममता सरकार की तमाम योजनाओं का फायदा पार्टी को मिला."
उनका कहना था कि वर्ष 2019 में भाजपा को भारी कामयाबी मिली थी. लेकिन उसके बाद वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में उसे मिलने वाले वोटों में कमी आई और नतीजे उसकी उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहे थे. इस बार इसमें और गिरावट आई है.


















