चुनाव में मोदी के कमज़ोर होने को पड़ोसी देश और अमेरिका कैसे देखेंगे?

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भारत के आम चुनाव के नतीजों में बीजेपी को अकेले दम पर बहुमत नहीं मिला है.
हालांकि बीजेपी के अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन को पूर्ण बहुमत हासिल हो गया है.
प्रधानमंत्री के चेहरे को आगे कर इस चुनाव में उतरने वाली बीजेपी और एनडीए गठबंधन को 272 के पूर्ण बहुमत से कुछ अधिक सीटें ही आई हैं.
विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन को पिछले दो आम चुनावों के मुकाबले अच्छी ख़ासी संख्या बढ़ी है.
इस चुनाव पर दुनिया भर के देशों की नज़र थी क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी तीसरे कार्यकाल में और बड़े बहुमत से लौटने की उम्मीद कर रहे थे.
अब बीजेपी को अपने घटक दलों पर अधिक निर्भर रहना पड़ेगा. ऐसे में सवाल है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कितने निर्णायक तरीक़े से राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय नीतियों का निर्धारण कर पाएंगे.
इन नतीजों के संदर्भ में दुनिया के देश ख़ास कर पड़ोसी मुल्क और अमेरिका इन नतीजों को किस नज़रिए से देख रहे हैं.
अंतरारष्ट्रीय रिश्तों पर इनका क्या असर होने वाला है, इस बारे में बीबीसी संवादताओं की रिपोर्ट और एक्सपर्ट्स की राय पढ़ें-
पाकिस्तान में क्या प्रतिक्रिया

शुमायला जाफ़री, बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद
भारत के आम चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीजेपी को मिली बढ़त की ख़बर पर पाकिस्तान में कोई ख़ास प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली है.
हालांकि भारत पर क़रीबी नज़र रखने वालों को ये ज़रूर हैरानी लग रही है कि बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन को मिली बढ़त बहुत कम है.
पाकिस्तानी जनता का भारत के आम चुनावों के प्रति उदासीन रहने का एक और कारण है कि वो अपने घरेलू राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संकट की चिंताओं से जूझ रही है. हालांकि बीजेपी के पूर्ण बहुमत न पाने से लोग हैरान भी हैं.
जिस तरह पीएम मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान मुसलमानों को कथित रूप से निशाने पर लिया, उससे भारतीय मुसलमानों को लेकर पाकिस्तान में एक आम चिंता है.
आम पाकिस्तानियों का मानना है कि बीजेपी का सत्ता में लौटना भारतीय मुसलमानों के लिए अच्छी ख़बर नहीं है.
लोगों को पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्ते सुधरने की उम्मीद नहीं है.
बावजूद, कुछ सोशल मीडिया यूज़र्स ने मोदी के शासन में भारत के आर्थिक विकास, ख़ासकर इनफ़्रास्ट्रक्चर और निर्माण क्षेत्रों में विकास की तारीफ़ की है.
पाकिस्तान में नीति निर्माताओं की समझादारी से जनता की सोच भी मेल खाती है कि भारत ‘अधिक आक्रामक और आत्मविश्वास’ से भरा होगा.
इस्लामाबाद में इंस्टीट्यूट ऑफ़ स्ट्रेटिजिक स्टडीज़ में इंडिया सेंटर के डायरेक्टर डॉ. खुर्रम अब्बास का कहना है कि अगर बीजेपी सत्ता में तीसरी बार लौटती है तो पाकिस्तान को पहले से कहीं अधिक आक्रामक और आत्मविश्वासी भारत का सामना करना होगा. कश्मीर, गिलगित बालटिस्तान और इंडस जल समझौते पर तनाव बढ़ सकता है.
उन्होंने कहा, “ऐसा लगता है कि भारत में एक राजनीतिक और रणनीतिक सहमति बन गई है कि इस समय पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने में आर्थिक या राजनीतिक लाभ नहीं है और भारत पाकिस्तान को लगातार अलग-थलग करने की नीति अपनाएगा.”
खुर्रम अब्बास का ये भी मानना है कि भारत बलोच विद्रोहियों और पाकिस्तान विरोधी चरमपंथी ग्रुपों को छद्म तरीक़े से समर्थन देना जारी रखेगा. पाकिस्तान के एक और चिंता का विषय रहा है कि उसकी धरती पर उसके नागरिकों की हत्याएं हुईं, जिसके लिए भारत पर उंगली उठाई जाती रही है.
पाकिस्तान ने भारत के साथ व्यापार शुरू करने का संकेत दिया था लेकिन डॉ. खुर्रम अब्बास इसे लेकर आशंकित हैं.
इस्लामाबाद के पॉलिसी थिंक टैंक इंस्टीट्यूट ऑफ़ रीजनल स्टडीज़ में इंडिया एनालिस्ट मरियम मस्तूर का कहना है कि 2019 में मोदी ने पुलवामा हमले को लेकर पाकिस्तान विरोधी भावना पर अपने समर्थकों को लामबंद किया और अपने राजनीतिक विरोधी कांग्रेस और भारतीय मुसलमानों को नुकसान पहुंचाने और अपमानित करने के लिए उन्हें पाकिस्तान परस्त होने का आरोप लगाया.
हालांकि डॉ. खुर्रम अब्बास को अब भी उम्मीद है. वो कहते हैं, “कई लोगों का मानना है कि अगर तीसरी बार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो यह उनका आख़िरी कार्यकाल होगा और वो एक विरासत छोड़ कर जाना चाहेंगे. ये निर्भर करता है कि वो कैसी विरासत देना चाहेंगे एक शांतिदूत के तौर पर साकारात्मक विरासत या बाँटो और राज करो वाली एक ऐसी नकारात्मक विरासत.”

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अमेरिका किस तरह देख रहा है?

प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान, एक्सपर्ट, डेलावेयर यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल स्टडीज़, अमेरिका
भारत को लेकर अमेरिका की नीति बिल्कुल स्पष्ट है. वो भारत को बहुत अहम मानता है, ख़ासकर चीन को संतुलित करने के लिहाज से. हालांकि अमेरिका के राजनेता मोदी को कुछ ख़ास पसंद नहीं करते सिवाय तुलसी गैबर्ड जैसे कुछ कंज़र्वेटिव नेताओं को छोड़कर.
लेकिन भारत के साथ रिश्ते को लेकर कई अमेरिकी नेताओं ने कहा है कि यह सदी का सबसे अहम रिश्ता है.
अगर भारत चीन के ख़िलाफ़ पूरी तरह अमेरिका के साथ खड़ा हो जाता है तो पश्चिम और अमेरिका का जो वैश्विक दबदबा है वो पूरी 21वीं सदी तक चलेगा.
लेकिन अगर भारत अमेरिका के ख़िलाफ़ हो जाता है और चीन-रूस के साथ मिल जाता है तो पश्चिमी प्रभुत्व इसी सदी में ख़त्म हो जाएगा. इसीलिए भारत अमेरिका के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.
अब विदेशी मुल्कों को मोदी के साथ डील करने में काफ़ी मुश्किल हो गई थी क्योंकि भारत की विदेश नीति काफ़ी आक्रामक हो गई थी, मसलन विदेशों में हत्याओं को लेकर उठा विवाद. अब वे पहले से अधिक ख़ुश होंगे क्योंकि मोदी कमज़ोर हो जाएंगे.
मोदी पिछली जुलाई में अमेरिका दौरे पर आए थे वो उनकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का चरम था. लेकिन उसके बाद अमेरिका और कनाडा में खालिस्तानियों की हत्या के बाद भारत सरकार और मोदी सरकार के कद पर असर पड़ा है और पश्चिम में उनकी काफ़ी आलोचना हो रही है.
रिश्तों में ठहराव आया है. तो अंतरारष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति एक कमज़ोर रहेगी. दूसरी तरफ़ राहुल गांधी और शशि थरूर जैसे नेताओं की विदेश नीति पर आवाज़ और बुलंद हो जाएगी.
अमेरिकी मीडिया में भी इस चुनाव की चर्चा है और उनका भी नज़रिया यही है कि मोदी जीत तो गए हैं लेकिन अब उन्हें अधिक नरम रुख़ अपनाना होगा.
अमेरिका में जो भारतीय समुदाय है वो इन नतीजों से थोड़ा निराश तो हैं लेकिन इस बात से ख़ुश भी हैं कि इस बार भी मोदी जी ही प्रधानमंत्री बनेंगे.
बांग्लादेश से संबंध पर क्या होगा असर?

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ढाका से, अकबर हुसैन, वरिष्ठ संवाददाता, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला
भारत में आम चुनाव बांग्लादेश के लिए भी बहुत अहमियत वाले होते हैं.
शेख़ हसीना के नेतृत्व में आवामी लीग की सरकार 2009 में जबसे सत्ता में आई बांग्लादेश और भारत के बीच रिश्ते काफ़ी मजबूत हुए.
उस समय भारत में कांग्रेस सत्ता में थी. लेकिन जब नरेंद्र मोदी की सरकार आई, दोनों देशों के बीच रिश्ते उतने ही गर्मजोशी वाले रहे. बल्कि इस दौरान दोनों देशों के बीच दशकों तक लंबित रहे मुद्दे भी सुलझाए गए.
मनमोहन सिंह की सरकार ने बांग्लादेश सरकार के साथ कई समझौते किए थे, जिसे बाद में नरेंद्र मोदी की सरकार ने लागू किया.
शेख़ हसीना की आवामी लीग पार्टी ने हमेशा से कहा है कि वो भारत में किसी ख़ास पार्टी की बजाय भारत सरकार के साथ संबंधों निबाहने पर अधिक ध्यान देते हैं.
हालांकि भारत में किसी भी पार्टी की सरकार बने, शेख़ हसीना सबसे भरोसेमंद पार्टनर रही हैं और ठीक वैसे ही शेख़ हसीना की सरकार भारत को सबसे भरोसेमंद सहयोगी मानती रही है.
एक बात पर जो भारत के सत्तारूढ़ दलों में सहमति रही है, वो ये कि बांग्लादेश से संबंधित नीति नहीं बदलेगी.
लेकिन जबसे नागरिकता संशोधन क़ानून लाया गया और जिस तरह नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान मुस्लिमों के साथ बर्ताव किया गया उसने बांग्लादेश में थोड़ी असहजता पैदा की. क्योंकि जो कुछ भी भारत में होता है, उसका असर बांग्लादेश में भी होता है.
बांग्लादेश एक मुस्लिम बहुल देश है. नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान मुसलमानों के प्रति बरते गए रवैये का आम बांग्लादेशी भी आलोचना करते रहे हैं.
पिछले एक दशक से बांग्लादेश में भारत विरोधी भावना अधिक रही है क्योंकि भारत जिस तरह बांग्लादेश के लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भूमिका निभाता है, उसकी तीखी आलोचना होती रही है.
बांग्लादेश में पिछले तीन आम चुनावों में भारत की मोदी सरकार ने शेख़ हसीना की आवामी लीग पार्टी को खुला समर्थन दिया है, इसकी बांग्लादेश में काफ़ी आलोचना हुई.
लेकिन आने वाले दिनों में भारत की आंतरिक नीति में क्या बदलाव आता है, इसे लेकर बांग्लादेश के लोगों की नज़र रहेगी.
लंबित मुद्दों पर नेपाल की उम्मीद

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संजय ढकाल, बीबीसी संवाददाता, काठमांडू से
नेपाल में कहा जाता है कि अगर दिल्ली में बारिश हो तो नेपाल में छतरी खुलती है. शायद यही कारण है कि भारत के आम चुनावों को लेकर नेपाल में भी लोग बड़ी उत्सुकता से देख रहे हैं.
हालांकि देखा गया है कि दिल्ली में किसी की भी सत्ता आए, दोनों देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक और सांसकृतिक संबंधों पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ता है.
और भारतीय आम चुनाव में जो नतीजे सामने आए हैं, उससे नहीं लगता है कि दोनों देशों के रिश्तों में कोई बड़ा बदलाव आएगा.
भारत में हिंदुत्व के एजेंडे से जुड़ी पार्टी के सत्ता में होने के कारण, नेपाल में भी हिंदू राज्य की पुरानी विरासत को पुनर्स्थापित करने में रुचि रखने वाले लोग उत्साहित हैं, भले ही इस बारे में बीजेपी या मोदी ने खुले तौर पर कुछ नहीं कहा हो.
हालांकि दिल्ली में बनने वाली नई सरकार के सामने अपने सबसे करीबी पड़ोसी देश के साथ संबंधों को सुधारने और सुदृढ़ करने की एक लंबी लिस्ट ज़रूर है.
पिछले कुछ समय से भारत-नेपाल संबंध घड़ी के पेंडुलम की तरह संकट के एक छोर से दूसरे छोर में जाती रही है.
जब 2014 में पहली बार सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपनी दूसरी द्विपक्षीय विदेश यात्रा नेपाल में किया था. सन 201में नेपाल में आए भूकंप में भारत की मदद से भी संबंध और सुदृढ़ हुए थे.
लेकिन उसी साल जब नेपाल ने नए संविधान को जारी किया तो भारत की ओर से सरहद पर अघोषित नाकाबंदी हुई थी. बाद में 2020 में सीमा के नक्शे को लेकर दोनों देशों के बीच शुरू हुई खटपट का अब तक समाधान नहीं हुआ है.
इनके अलावा दोनों देशों के बीच मैत्री संधि में बदलाव के मुद्दे और सेना में अग्निवीर की स्कीम के चलते भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों की अटकी भर्ती, बढ़ता व्यापार घाटा और ठप हवाई मार्ग जैसे कई मुद्दे हैं जो संबंध में खटास पैदा करते आए हैं.
नेपाल के सेंट्रल बैंक में अब भी पांच करोड़ मूल्य के वे पुरानी भारतीय नोट पड़े हैं, जिन्हें 2016 में हुई नोटबंदी के बाद भारत ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया था.
यूएई से द्विपक्षीय व्यापार और सांस्कृतिक रिश्ता

संजीप दत्ता, सीईओ, यूएई-इंडिया बिज़नेस काउंसिल (यूएई चैप्टर)
(रोनक कटेचा को दिया गया इंटरव्यू)
यूएई और भारत के बीच का रिश्ता सालों साल पुराना और बहुत मज़बूत है. सरकार कोई भी हो दोनों के बीच व्यापार बना रहेगा.
इस समय दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य 100 अरब डॉलर और 75 अरब डॉलर का फ़ॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट का टार्गेट है. दोनों लक्ष्यों को देखें तो ये हक़ीक़त के बहुत नज़दीक हैं.
दोनों देशों के बीच जो 'कांप्रिहेंसिव इकोनामिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट' तय हुआ था, वो सबसे पहले 90 दिनों के भीतर हुआ था. उनका मानना था बाकी देशों के साथ रिश्ते में इसे मॉडल के रूप में लिया जाएगा.
अगर यह एग्रीमेंट रहता है तो बहुत सारे क्षेत्रों पर काम का फोकस रहता है, मसलन, हेल्थ केयर, टेक्नोलॉजी, इन्फ्रास्ट्रक्चर और रेन्यूबल एनर्जी. इसके अलावा दोनों देशों में आदान प्रदान भी बहुत ज़्यादा है, चाहे वो स्किल और नॉलेज ट्रांसफर का मामला हो या आर्टिफ़ीशियल इंटेलिजेंस हो.
इसलिए कोई भी सरकार आए दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार और संबंध वैसे ही रहेंगे बल्कि और मज़बूत होंगे.
दोनों देशों के बीच जनता के स्तर पर आपसी रिश्ते काफ़ी गहरे हैं. यूएई में भारतीय मूल की आबादी अन्य देशों के मुक़ाबले सबसे अधिक है.
सांस्कृतिक मूल्यों में भी दोनों देशों में काफ़ी समानता है. अभी यहां मंदिर बना है. जो भी सरकार आए यूएई और भारत के बीच रिश्तों में कोई फ़र्क़ नहीं आने जा रहा.
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