कनाडा में कैसे टूट रहे हैं भारतीय छात्रों के सपने?

- Author, सरबजीत सिंह धालीवाल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कनाडा से लौटकर
''कनाडा आने का मेरा सपना छह बार टूटा, सातवीं बार जब कनाडा पहुंचा तो भी बीच में ही फंसा हुआ हूँ''
ये शब्द हैं सहजप्रीत सिंह के. वे अंतरराष्ट्रीय छात्र के तौर पर कनाडा आए थे, लेकिन एजेंट और कॉलेज की कथित धोखाधड़ी का शिकार हो गए हैं.
दरअसल, सहजप्रीत सिंह का स्टूडेंट वीजा दूतावास द्वारा छह बार खारिज किया गया था. सहजप्रीत के अनुसार, चंडीगढ़ के एजेंट ने उन्हें एक प्राइवेट कॉलेज में दाखिला दिला दिया, जिसके आधार पर उन्हें भविष्य में वर्क परमिट नहीं मिल सकता और इस बात का पता उन्हें कनाडा आने के बाद चला.
सहजप्रीत के मुताबिक, कॉलेज अब उनकी किसी भी तरह से मदद करने को तैयार नहीं है.
सहजप्रीत सिंह का कहना है कि इस मामले में ना तो एजेंट फोन उठाता है और ना ही कॉलेज कोई ठोस जवाब देता है.
वे कहते हैं कि चंडीगढ़ स्थित एजेंट ने उनका कोर्स और कॉलेज खुद तय किया था और कहा था कि वीज़ा की चिंता मत करना.
जब सहजप्रीत का वीजा आया तो संबंधित एजेंट ने अपने प्रचार के लिए उसका एक वीडियो बनाया, जिसमें उसने बताया कि छह बार वीज़ा खारिज होने के बाद कैसे उसने (एजेंट) कनाडाई दूतावास से वीज़ा ले कर दिया है. यह वीडियो अब भी संबंधित एजेंट के सोशल मीडिया पर उपलब्ध है.
सहजप्रीत सिंह का दावा है कि एजेंट ने उनसे 12 लाख रुपये लिए, जिसमें कॉलेज की फीस के 14,000 डॉलर के अलावा जीआईसी और बाकी खर्चे भी शामिल थे, जो उन्होंने खुद किए.
उनका कहना है कि एजेंट ने उनसे फीस के बारे में भी झूठ बोला, जबकि उनकी फीस 8000 डॉलर थी और बाकी पैसे एजेंट ने ही रख लिए. इस मामले में बीबीसी ने सहजप्रीत सिंह के चंडीगढ़ स्थित एजेंट से कई बार फोन पर संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने हमसे बात नहीं की.

पढ़ाई तो कनाडा आने की एक सीढ़ी है?
23 साल के सहजप्रीत सिंह पंजाब के पटियाला जिले के रहने वाले हैं. वह 19 लाख रुपये खर्च कर एक एजेंट की मदद से नवंबर 2023 में पढ़ाई के लिए कनाडा आए थे. वह यहां हॉस्पिटल एंड मैनेजमेंट में दो साल का कोर्स करने आए हैं.
माता-पिता के इकलौते बेटे सहजप्रीत सिंह का कहना है कि वह पिछले तीन महीने में एक बार भी पढ़ाई के लिए कॉलेज नहीं गए हैं.
उनका कॉलेज सरी में है और वह ब्रैम्पटन में रहते हैं. उन्होंने यह भी बताया कि एक दिन वह अपने दोस्तों के साथ कॉलेज देखने भी गए थे, लेकिन जब वह वहां पहुंचे तो उन्होंने ऐसी तस्वीर देखी जिसे देखकर वह बहुत हैरान हो गए.
कॉलेज बिल्डिंग की जगह सिर्फ दो कमरे थे. अंदर एक रिसेप्शन था, साथ ही दो कमरे थे, जो खाली थे. रिसेप्शन पर दो महिलाएं थीं और इसके अलावा वहां ना कोई क्लास रूम था और ना ही कोई स्टाफ था.
सहजप्रीत सिंह के मुताबिक, वहां सिर्फ सार्वजनिक पार्किंग थी और कॉलेज बिल्डिंग की जगह सिर्फ दो कमरे थे. अंदर एक रिसेप्शन था, साथ ही दो कमरे थे, जो खाली थे. रिसेप्शन पर दो महिलाएं थीं और इसके अलावा वहां ना कोई क्लास रूम था और ना ही कोई स्टाफ था.
कॉलेज में पढ़ाई कैसी है, इस बारे में सहजप्रीत सिंह कहते हैं कि सब कुछ ऑनलाइन है, कॉलेज जाने की जरूरत नहीं है.
यहां तक कि अटेंडेंस से लेकर पेपर भी ऑनलाइन होते हैं. मेरे सामने वह अपना लैपटॉप खोलते हैं और उस कॉलेज का पोर्टल दिखाते हैं, जिसमें उनकी 97 फीसदी उपस्थिति थी.
वह बताते हैं कि वह असाइनमेंट खुद नहीं बनाते बल्कि 500 रुपये देकर भारत से तैयार कराते हैं और फिर उसी पोर्टल पर अपलोड कर देते हैं. हर महीने उनके पेपर होते थे, जिनमें उन्होंने 80 फीसदी अंक हासिल किए, जो पोर्टल पर दिखाई दे रहे थे.

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उत्साहित हो कर सहजप्रीत सिंह बताते हैं कि उनकी कक्षा में 40 बच्चे हैं और वे सभी भारत, ज्यादातर पंजाब और हरियाणा से हैं.
उन्होंने कहा कि तीन महीने के दौरान उन्हें क्लास में अंग्रेजी बोलने की जरूरत नहीं पड़ी, बल्कि सारी बातचीत हिंदी और पंजाबी में हुई. हालांकि, सहजप्रीत सिंह का दावा है कि उनका आईईएलटीएस स्कोर 10 में से 6 था.
मेरे सामने सहजप्रीत सिंह फोन पर अपनी क्लास अटेंड करते हैं, माइक्रोफोन बंद कर देते हैं और अपना काम शुरू कर देते हैं.
सहजप्रीत सिंह फिलहाल एक कार वर्कशॉप में काम करते हैं और यहीं से ऑनलाइन पढ़ाई करते हैं.
बीबीसी की टीम ने सहजप्रीत सिंह के साथ करीब दो घंटे बिताए और इस दौरान ऑनलाइन क्लास चलती रहती है, टीचर लेक्चर देते रहते हैं और आखिर में थैंक यू कहकर चले जाते हैं.
इस बीच, सहजप्रीत सिंह को इस बारे में कुछ भी नहीं पता था कि टीचर ने उसे क्या सिखाया और ना ही उन्होंने कुछ सुना. ऑनलाइन कॉल के आधार पर ही उनकी अटेंडेंस लग जाती है.
सहजप्रीत सिंह ने कहा कि यहाँ तो पढ़ाई सिर्फ नाम की ही है , टीचर से मिलने कि बात तो दूर, उनका अब तक एक भी प्रैक्टिकल नहीं हुआ है. सहजप्रीत सिंह की सप्ताह में तीन दिन फोन पर ही क्लास लगती है.

सहजप्रीत के साथ हुए धोखे का जिम्मेदार कौन?
सहजप्रीत सिंह का कहना है कि एजेंट और कॉलेज दोनों ने उनके साथ धोखा किया है. हैरानी की बात यह है कि इसके बावजूद वह किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं करना चाहते.
इस बारे में उनका कहना है कि उनका मकसद किसी भी तरह से कनाडा आना था, जो पूरा हो गया है, अब करवाई करके कुछ भी नहीं मिलेगा.
कनाडा में उनका भविष्य क्या होगा, इसके बारे में वह फिलहाल अनिश्चित हैं. सहजप्रीत सिंह का कहना है कि वह दूसरे कॉलेज में दाखिला लेने की कोशिश कर रहे हैं, जहां से उन्हें पढ़ाई पूरी करने के बाद कनाडा में वर्क परमिट मिल सके.
पैसे और एक साल की बर्बादी के बारे में सहजप्रीत सिंह का कहना है कि कनाडा जाने का भूत उन पर इस कदर सवार था कि वह किसी भी तरह यहां पहुंचना चाहते थे.
''दोस्तों और अन्य परिचितों ने कनाडा ना आने के लिए बहुत समझाया, लेकिन मैं नहीं माना, जब मैंने यहाँ आकर देखा तो यहां की सच्चाई कुछ और ही निकली.''

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नेपाल के सुमन रॉय के संघर्ष की कहानी
सुमन रॉय सितंबर 2023 में स्टूडेंट वीज़ा पर अपनी पत्नी के साथ कनाडा आए थे. वह नेपाल के रहने वाले हैं. पिछले कुछ सालों में कनाडा में नेपाली छात्रों की संख्या तीन गुना हो गई है.
सुमन रॉय हमें अपने घर भी ले गए जहां वह नेपाली मूल के अन्य छात्रों के साथ रह रहे थे.
यह बेसमेंट की जगह एक घर था ,जहाँ जमीन पर पांच गद्दे बिछे हुए थे. पूरे घर और रसोई में बिखरा हुआ सामान उनके जीवन स्तर को बताने के लिए पर्याप्त था.
कनाडा में शिक्षा के बारे में बात करते हुए सुमन रॉय कहते हैं कि उनकी कक्षाओं में 95 प्रतिशत भारतीय छात्र हैं और यहां के निजी कॉलेजों में शिक्षा का स्तर उतना अच्छा नहीं है.
कनाडा आने से पहले यहाँ के हालात के बारे में जानकारी हासिल करना जरूरी है, एजेंटों की बातों पर आंख मूंदकर विश्वास ना करें, क्योंकि उनका काम पैसा कमाना है.
कनाडा के मौजूदा हालात पर टिप्पणी करते हुए सुमन रॉय कहते हैं, ''मैंने बहुत जल्दबाजी में यहाँ आने का फैसला किया.
भविष्य के बारे में सोचते हुए सुमन रॉय कहते हैं कि उन्हें फिलहाल इस बारे में कुछ समझ नहीं आ रहा है, क्योंकि इस देश में मौजूदा हालात अच्छे नहीं हैं.''
उन्होंने कहा कि नौकरी, आवास और बढ़ती महंगाई इस समय कनाडा में रहने की सबसे बड़ी समस्याएं हैं.
नेपाल के काठमांडू के रहने वाले सुमन रॉय कहते हैं कि वहाँ भी बड़ी संख्या में एजेंट मौजूद हैं, जिसके कारण पिछले दिनों बड़ी संख्या में नेपाली छात्र कनाडा आए हैं.
उनका कहना है कि कनाडा आने से पहले यहाँ के हालात के बारे में जानकारी हासिल करना जरूरी है, एजेंटों की बातों पर आंख मूंदकर विश्वास ना करें, क्योंकि उनका काम पैसा कमाना है.

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पहले और आज के हालात में कितना अंतर?
ब्रैम्पटन में अपना खुद का व्यवसाय चलाने वाले दीप हाजरा लगभग 12 साल पहले एक अंतरराष्ट्रीय छात्र के रूप में कनाडा आए थे.
दीप के मुताबिक पहले और अब के हालात में बड़ा अंतर है. पहले ज्यादातर छात्र ग्रेजुएशन के बाद कनाडा आते थे और अच्छे कॉलेजों में दाखिला लेते थे.
दीप हाजरा ने अपना उदाहरण देते हुए कहा कि उनके कॉलेज का कैंपस काफी बड़ा था और शिक्षक नियमित तौर पर आते थे लेकिन अब तो ऑनलाइन क्लास से ही काम चला लिया जाता है.
दीप के मुताबिक, पिछले कुछ सालों से जब से कनाडा ने बाहरी कक्षा के बाद डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के लिए कार्यक्रम शुरू किया, तो यहां अंतरराष्ट्रीय छात्रों की तुरंत भीड़ उमड़ पड़ी.
उन्होंने कहा कि छात्रों का बहुत शोषण होता है, सबसे पहले शोषण भारत में कुछ एजेंटों द्वारा किया जाता है और फिर यहां आ कर कुछ निजी कॉलेज और उसके बाद कभी-कभी होटल या फैक्ट्री मालिक में काम करने की जगह पर भी होता है.
पिछले साल कई भारतीय छात्र जो स्टूडेंट वीजा पर कनाडा आए थे, उनके साथ पंजाब के एक एजेंट ने कनाडा के कॉलेजों के फर्जी ऑफर लेटर के नाम पर धोखा किया था.
उन्होंने कहा कि पिछले साल कई भारतीय छात्र जो स्टूडेंट वीजा पर कनाडा आए थे, उनके साथ पंजाब के एक एजेंट ने कनाडा के कॉलेजों के फर्जी ऑफर लेटर के नाम पर धोखा किया था.
सैकड़ों छात्रों के कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों पर प्रवेश करने पर कनाडाई सीमा एजेंसी ने जब छात्रों को डिपोर्ट करने की तैयारी की तो छात्रों ने टोरंटो एयरपोर्ट के पास कई दिनों तक विरोध-प्रदर्शन किया.
बाद में, कनाडाई पुलिस ने वहां से एक कथित ट्रैवल एजेंट बृजेश मिश्रा को इस आरोप में गिरफ्तार किया कि उसने इन छात्रों को फर्जी दस्तावेज उपलब्ध कराए थे, जिसके बाद वे छात्र वीजा पर कनाडा पहुंचे.
उस समय कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने संसद में इस मुद्दे पर कहा था, ''हमारा मकसद धोखाधड़ी के शिकार लोगों को सजा देना नहीं, बल्कि अपराधियों की पहचान करना है.''

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क्या विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में होता है शोषण?
इस साल जनवरी में कनाडा की अल्गोमा यूनिवर्सिटी के ब्रैम्पटन कैंपस में छात्रों ने हंगामा किया था. लगभग 130 अंतरराष्ट्रीय छात्र, जिनमें अधिकतर पंजाबी और गुजराती थे, उन्हें एक विषय में फेल कर दिया गया था. इसके बाद छात्रों ने कड़ाके की ठंड में यूनिवर्सिटी के बाहर कई दिनों और रातों तक धरना दिया.
छात्रों का आरोप था कि एक शिक्षक ने जानबूझकर इतनी बड़ी संख्या में छात्रों को फेल किया है. इन प्रदर्शनकारियों में एक सिमरनजीत कौर भी शामिल थीं.
बीबीसी से बात करते हुए सिमरनजीत कौर ने कहा कि वह मई 2022 में दो साल के लिए ह्यूमन रिसोर्स और बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई करने के लिए कनाडा आई थीं.
उनके भारतीय एजेंट ने उन्हें एक निजी संस्थान, अल्गोमा विश्वविद्यालय में दाखिला लेने की सलाह दी.
सिमरनजीत कौर का कहना है कि उनके विश्वविद्यालय में अधिकांश अंतरराष्ट्रीय छात्र भारतीय मूल के हैं. कनाडा के स्थानीय छात्र विश्वविद्यालय में ना के बराबर ही हैं.
मूल रूप से उत्तराखंड के हरिद्वार की रहने वाली सिमरनजीत कौर का कहना है कि उन्हें विश्वविद्यालय में छात्रवृत्ति भी मिली थी, लेकिन इस साल जनवरी में जब उन्हें एक विषय में फेल कर दिया गया तो वे बहुत परेशान हो गईं.
उन्होंने कहा कि जब उन्होंने संबंधित विषय के प्रोफेसर से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने किसी से भी मिलने से इनकार कर दिया, इसके बाद यूनिवर्सिटी के डीन से संपर्क किया गया, लेकिन उनकी ओर से भी कोई जवाब नहीं आया, मजबूरन हमारे पास प्रदर्शन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा.
विरोध प्रदर्शन के बाद, विश्वविद्यालय ने छात्रों की मांगों को स्वीकार करते हुए, उनमें से कुछ को पास कर दिया और अन्य को दूसरा मौका दिया.
सिमरनजीत कौर के अनुसार, विश्वविद्यालय और कॉलेज अंतरराष्ट्रीय छात्रों को पैसा बनाने के तरीके के रूप में उपयोग करते हैं. कॉलेज की मनमर्जी के कारण छात्रों को संगठित होना पड़ रहा है.

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कनाडा में भारतीय छात्रों के संगठन
कनाडा में अंतरराष्ट्रीय छात्रों, खासकर भारतीयों के साथ हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के लिए अतीत में कई छात्र संगठन बनाए गए. उनमें से एक 'नौजवान सपोर्ट नेटवर्क' लगभग दो साल पहले अस्तित्व में आया है. यह भारतीय विशेषकर अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए ग्रेटर टोरंटो क्षेत्र में काम कर रहा है.
अंतरराष्ट्रीय छात्रों और श्रमिकों के शोषण को रोकने के उद्देश्य से काम कर रहे इस संगठन के साथ शुरू से ही बिक्रमजीत सिंह भी जुड़े हुए हैं.
बिक्रमजीत सिंह ने बीबीसी से कहा कि उनकी संस्था सोशल मीडिया के ज़रिए काम करती है और कनाडा में रजिस्टर्ड नहीं है.
बिक्रमजीत सिंह ने कहा कि शुरुआत में उन्हें होटल, बेकरी मालिकों और ट्रकिंग कंपनियों द्वारा अंतरराष्ट्रीय छात्रों के शोषण की शिकायतें मिलीं, जिनमें से अधिकांश का सफलतापूर्वक समाधान किया गया. वह खुद भी यहाँ छात्र के रूप में आए थे.

पंजाब के होशियारपुर जिले से ताल्लुक रखने वाले बिक्रमजीत सिंह कहते हैं कि अगर समाधान नहीं निकलता है तो उनके घर या कार्यस्थल के बाहर सार्वजनिक स्थान पर खड़े होकर विरोध-प्रदर्शन किया जाता है.
संगठन के ट्विटर हैंडल को देखा जाए तो ऐसे प्रदर्शनों की संख्या काफी बढ़ गई है. उन्होंने कहा कि हम छात्रों को एक साथ लाते हैं और उन्हें उनके अधिकारों की जानकारी देते हैं.
यह संगठन छात्रों के निर्वासन को रोकने के लिए और अल्गोमा विश्वविद्यालय प्रबंधन के खिलाफ प्रदर्शन में काफी सक्रिय रहा है.
बिक्रमजीत सिंह ने कहा कि कनाडा में अंतरराष्ट्रीय छात्रों को मानसिक शोषण के अलावा कई अन्य समस्याओं का भी सामना करना पड़ रहा है.
उनके संगठन में ऐसी शिकायतों की संख्या लगातार बढ़ रही है. अंतरराष्ट्रीय छात्र अपने साथ होने वाले दुर्व्यवहार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं करते, इस सवाल पर बिक्रमजीत सिंह कहते हैं कि यह प्रक्रिया बहुत लंबी है और कनाडा जैसे देश में इसके लिए समय नहीं है.
हाल के सालों में छात्रों के साथ धोखाधड़ी की कई घटनाओं के बाद भारत की केंद्र और राज्य सरकारें समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाती रही हैं.
2022 में कनाडा में भारतीय उच्चायोग ने भी एक एडवाइजरी जारी कर कहा था कि फीस देने से पहले शिक्षण संस्थानों का ठीक से निरीक्षण किया जाना चाहिए.

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कनाडा के शैक्षणिक संस्थानों में हेराफेरी
पिछले साल अक्टूबर में कनाडा के इमीग्रेशन मंत्री मार्क मिलर ने भी माना था कि यहाँ अंतरराष्ट्रीय छात्र धोखाधड़ी के शिकार हुए हैं.
इसके बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय छात्रों को इस तरह की धोखाधड़ी से बचाने के लिए कॉलेजों/विश्वविद्यालयों से प्राप्त होने वाले स्वीकृति पत्र के लिए आईआरसीसी से मंजूरी लेना अनिवार्य कर दिया है.
इमीग्रेशन मंत्री ने मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थानों को एक विशिष्ट ढांचा तैयार करने का भी आदेश दिया है.
कनाडा सरकार ने भी माना है कि पिछले कुछ सालों में कई शिक्षण संस्थानों ने पैसा कमाने के इरादे से जरूरत से ज्यादा विदेशी छात्रों को दाखिला दिया है.
सरकार का कहना है कि कुछ शैक्षणिक संस्थानों ने फीस वसूली के मद्देनजर अपने दाखिलों में बढ़ोतरी की है.
परिणामस्वरूप, बहुत सारे छात्र इन कॉलेज और संस्थानों में पढ़ने के लिए कनाडा आ रहे हैं. कनाडा में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के सामने आ रही समस्याओं और देश के बुनियादी ढांचे पर पड़ रहे बोझ को देखते हुए इस साल जनवरी महीने से दो साल के लिए विदेशी छात्रों की संख्या में 35 प्रतिशत की कटौती करने की घोषणा की गई है.
कनाडा सरकार ने अंतरराष्ट्रीय छात्रों की जनसंख्या को कम करने और स्थिर रखने के उद्देश्य से 2024 के लिए लगभग 3,60,000 स्टूडेंट परमिट देने का लक्ष्य रखा है.
इसके अलावा सरकार ने एक और बड़ा बदलाव किया है. पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत चलने वाले कॉलेजों से ग्रेजुएशन करने वाले छात्रों को सितंबर से वर्क परमिट नहीं दिया जाएगा.
जिस कॉलेज की बात सहजप्रीत सिंह कर रहे हैं वह कॉलेज पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत ही आता है.
कनाडा में शिक्षा प्रांतीय सरकार के अधीन आती है, संघीय सरकार के नहीं. इसके बाद कनाडा की ब्रिटिश कोलंबिया सरकार ने नए विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और अन्य संस्थानों में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के नए प्रवेश पर दो साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया है.
ब्रिटिश कोलंबिया सरकार ने शिक्षा क्षेत्र में संस्थानों द्वारा किए जा रहे घोटालों को देखते हुए यह कदम उठाया है.
सेकेंडरी शिक्षा मंत्री सेलिना रॉबिन्सन ने स्वीकार किया कि उनके विभाग ने पिछले मार्च में राज्य की प्रणाली पर गौर करना शुरू किया. इसमें पाया गया कि खराब गुणवत्ता वाली शिक्षा, शिक्षकों की कमी और यहां तक कि कुछ निजी संस्थानों की ओर से छात्रों को औपचारिक शिकायतें दर्ज करवाने से डराने-धमकाने की खबरें सामने आई थीं.
सीबीसी के अनुसार, ब्रिटिश कोलंबिया में 150 से अधिक देशों के 1,75,000 अंतरराष्ट्रीय पोस्ट-माध्यमिक छात्रों में से लगभग 54 प्रतिशत निजी संस्थानों में नामांकित हैं.
राज्य में 280 निजी स्कूल हैं. उनमें से 80 प्रतिशत लोअर मेनलैंड यानी कम आबादी वाले इलाकों में हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स
ब्रैम्पटन में लंबे समय से वकालत कर रहे हरमिंदर ढिल्लों का कहना है कि यहाँ ऐसे कॉलेज चल रहे थे जिनकी डिग्रियों का कोई मूल्य नहीं है. उनके आधार पर कोई नौकरी नहीं मिल सकती.
ढिल्लों के अनुसार, कई कॉलेज शॉपिंग मॉल में चल रहे हैं. कई कॉलेज तो एक ही कमरे में चल रहे हैं और उनके छात्रों को भी वीज़ा मिल गया है.
हरमिंदर सिंह ढिल्लों के मुताबिक, एजेंटों और कॉलेजों की धोखाधड़ी के शिकार छात्रों को कनाडा छोड़ना पड़ सकता है. यह संख्या बहुत अधिक हो सकती है.
उन्होंने कहा कि कनाडा स्टूडेंट वीजा पर आने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों को यहाँ की नागरिकता की कोई गारंटी नहीं देता है.
सरकारी नियम के मुताबिक अगर आप शर्तें पूरी करते हैं तो आप पीआर के लिए आवेदन कर सकते हैं.
उन्होंने कहा कि कनाडा को कुशल श्रमिकों की जरूरत है, लेकिन बड़ी संख्या में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के आने के बावजूद कुशल श्रमिकों की कमी पूरी नहीं हो पा रही है, क्योंकि छात्र पढ़ाई के बाद अन्य काम करना शुरू कर देते हैं.
पिछले समय दौरान यहाँ ऐसे कॉलेज चल रहे थे जिनकी डिग्रियों का कोई मूल्य नहीं है. उनके आधार पर कोई नौकरी नहीं मिल सकती.
टोरंटो में पत्रकारिता करने वाले जसवीर सिंह शमील का कहना है कि यहाँ अंतरराष्ट्रीय छात्रों का शोषण होने का मुख्य कारण यह है कि उन्हें कनाडा के कानून की जानकारी नहीं है.
उनके मुताबिक, इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय छात्र शिकायत करने से इसलिए भी डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उन्हें वापस भारत भेज दिया जाएगा.
शमील का कहना है कि भारत में बैठे माता-पिता नहीं जानते कि उनके बेटे-बेटियों को यहां कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. अगर उन्हें यहाँ की सच्चाई का पता लग जाए तो वे उन्हें कभी यहाँ नहीं भेजेंगे.
उन्होंने कहा कि छात्रों का शोषण कनाडा पहुंचते ही शुरू हो जाता है.
लेबर मार्किट प्रभाव मूल्यांकन पत्र (एलएमआईए) के लिए हजारों डॉलर व्यावसायिक छात्रों से शुल्क लेते हैं.
एलएमआईए एक दस्तावेज है, जिसे कनाडा में एक नियोक्ता को किसी विदेशी कर्मचारी को काम पर रखने से पहले प्राप्त करने की आवश्यकता हो सकती है.
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