भारत-कनाडा के बिगड़ते रिश्तों का वहाँ रहने वाले भारतीयों पर क्या होगा असर?

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- Author, प्रियंका झा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सोमवार को कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने संसद में खालिस्तानी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के पीछे भारतीय एजेंसियों के हाथ होने की आशंका जताई.
उसके बाद से ही दोनों देशों के बीच पहले से तनावपूर्ण रिश्ते अपने सबसे बुरे दौर में पहुँचते दिख रहे हैं.
दोनों देशों ने एक-दूसरे के शीर्ष राजनयिकों को निष्कासित किया और अब भी आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं.
इन सबके बीच भारत ने कनाडा में रहने वाले नागरिकों को सतर्क रहने की सलाह भी दी है.
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जानकारों की नज़र में कनाडा और भारत के बीच संबंधों के जड़ में दोनों देशों के बीच व्यापार और कनाडा में रहने वाले भारतीय प्रवासी सबसे महत्वपूर्ण पहलू हैं.
दुनियाभर की नज़र इस ताज़ा घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं.
ऐसे में कनाडा में रहने वाले भारतीयों को लेकर भी चिंता ज़ाहिर की जा रही है.
ख़ास तौर पर भारतीय छात्रों के लिए, जो कनाडा के अलग-अलग राज्यों में उच्च शिक्षा पाने के इरादे से रह रहे हैं और वो जो अब कनाडा के वर्कफोर्स का सक्रिय हिस्सा बन चुके हैं.
सवाल किया जा रहा है कि भारत और कनाडा के बिगड़ते रिश्तों से वहाँ रहने वाले इन भारतीयों पर क्या असर देखने को मिलेगा?
कनाडा में भारतीयों की भूमिका

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पिछले वर्ष कनाडा ने जनगणना के आँकड़े जारी किए थे, जिसके मुताबिक़ वहाँ पर दूसरे देशों से जाकर बसने वालों की कुल संख्या में से 18.6 फ़ीसदी भारतीय हैं.
टाइम मैगज़ीन की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के बाद सिखों की सबसे बड़ी आबादी कनाडा में बसती है. ये वहां की कुल आबादी का 2.1 फ़ीसदी हिस्सा हैं.
इतना ही नहीं वर्ष 2018 से कनाडा में सबसे ज़्यादा अंतरराष्ट्रीय छात्र भारत से ही पहुँच रहे हैं.
द इंडियन एक्सप्रेस ने कनाडा की जनगणना के परिणामों पर एक रिपोर्ट बीते साल छापी थी.
इस रिपोर्ट में बताया गया कि सबसे ज़्यादा भारतीय प्रवासी कनाडा के टोरंटो, ओटावा, वॉटरलू और ब्रैम्टन शहरों में बसे हैं.
इनमें से टोरंटो भारतीयों के लिए गढ़ की तरह है. इस शहर को कनाडा के विकास के लिहाज़ से शीर्ष माना जाता है.
इनके अलावा ब्रिटिश कोलंबिया में भी भारतीयों की अच्छी-ख़ासी संख्या है. ब्रिटिश कोलंबिया के गुरुद्वारे में ही हरदीप सिंह निज्जर को गोली मारी गई थी.
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2022 में कनाडा में पढ़ रहे विदेशी छात्रों में 40 फ़ीसदी भारतीय हैं.
कनाडा की अर्थव्यवस्था के लिहाज़ से भी भारतीय अहमियत रखते हैं.
रॉयटर्स की रिपोर्ट कहती है कि कनाडा में टीसीएस, इन्फ़ोसिस, विप्रो जैसी 30 भारतीय कंपनियों ने अरबों डॉलर का निवेश किया हुआ है, जिससे हज़ारों लोगों को रोज़गार मिलता है.

हर साल कनाडा जाने वाले भारतीयों की संख्या को देखते हुए ही वहाँ रह रहे वरिष्ठ पत्रकार गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि रिश्तों की ताज़ा गिरावट ने भारतीय समुदाय के बीच बेचैनी बढ़ा दी है.
गुरप्रीत सिंह ने हरदीप सिंह निज्जर की हत्या से ठीक एक महीने पहले ही उनका इंटरव्यू किया था.
वो कहते हैं, "इस वक़्त जो भारतीय लोग हैं कनाडा में उनमें एक चिंता दिखती है. उन्हें ये फ़िक्र है कि दोनों देशों के रिश्तों में जो खटाई पड़ी है, उसका ख़ासतौर पर इमिग्रेशन पर क्या असर होगा. जो वीज़ा लेकर यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ आना-जाना है वो कितना प्रभावित होगा. कारोबार पर कितना असर पड़ेगा. लोगों की रिश्तेदारियां बँटी हुई हैं. कोई वहाँ रहता है, कोई यहाँ रहता है.
एक बेचैनी वाला माहौल तो बन गया है. इस बयान का दोनों देशों के रिश्तों पर असर पड़ गया है, ये बात तो पक्की है."
तनाव का भारतीयों पर क्या होगा असर?

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फ़ोर्ब्स ने इस साल एक रिपोर्ट छापी, जिसमें बताया गया कि कनाडा में भारतीय प्रवासियों की संख्या साल 2013 के बाद तीन गुना से भी अधिक हो गई है.
सामरिक मामलों के जानकार ब्रह्म चेलानी ने कनाडा की एक वेबसाइट के लिए अपने लेख में कहा है कि जस्टिन ट्रूडो के बयान ने भारत के साथ कनाडा के संबंधों में तनाव भर दिया है.
कनाडा में रहने वाले भारतीयों में एक बड़ा हिस्सा छात्रों का है. ऐसे भी छात्र हैं जो आने वाले समय में वहां जाने की योजना बना रहे हैं.
लाइवमिंट ने कुछ एक्सपर्ट्स के हवाले से एक रिपोर्ट में कहा है कि फ़िलहाल कनाडा में रह रहे भारतीय या भारत के छात्रों पर बदलते हालात का कोई बड़ा असर पड़ता नहीं दिख रहा.
इसके पीछे तर्क दिया गया है कि फ़िलहाल कनाडा प्रशासन या इमिग्रेशन सर्विसेज़ की ओर से ऐसा कोई अपडेट नहीं आया, जो भारतीय प्रवासियों के लिए चिंता का कारण बने.
वहीं इंडियन एक्सप्रेस ने वीज़ा का पाने में भारतीयों की मदद करने वाली कुछ कंसलटेंसी फ़र्म से इस मामले पर बात की. इन सभी की नज़र में फ़िलहाल भारतीय छात्रों पर तनाव का कोई असर नहीं दिख रहा.
इसके पीछे तर्क दिया गया है कि कनाडा में पढ़ रहे विदेशी छात्रों में 40 फ़ीसदी भारतीय हैं. इससे फ़ायदा कनाडा को ही है और इसलिए वो किसी भी तरह के जोखिम से बचना चाहेगा.
ताज़ा घटनाक्रम से कनाडा में रहने वाले भारतीय किस तरह प्रभावित होंगे, ये पूछे जाने पर वरिष्ठ पत्रकार गुरप्रीत सिंह कहते हैं, "इस पूरे मामले पर भारतीय प्रवासियों की राय जो है वो बँटी हुई है. वो एक तरह से नहीं सोचते. कुछ के लिए ये बहुत महत्वपूर्ण है कि ट्रूडो ने हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का रिश्ता भारतीय एजेंसियों से जोड़ा."
"एक हिस्सा वो भी है जो खालिस्तानी विचार से सहमत नहीं है. उनको लगता है कि जो ये ट्रूडो का बयान था, वो देने की ज़रूरत नहीं थी."
कनाडा के हिंदुओं की क्या है राय?

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जनगणना के आँकड़ों में ये भी बताया गया है कि पंजाबी के अलावा कनाडा में तमिल, हिंदी, गुजराती, मलयालम और तेलुगू को मातृ भाषा बताने वाले भी अच्छी-ख़ासी तादाद में हैं.
कनाडा की जनगणना के अनुसार देश की आबादी में 2.3 फ़ीसदी हिस्सेदारी हिंदुओं की है, जो सिखों से थोड़ी ज़्यादा है.
हरदीप सिंह निज्जर की मौत के बाद कनाडा के कई हिंदू मंदिरों पर हमले की ख़बरें भी आईं.
ये पूछे जाने पर कि इस पूरे मामले में कनाडा के हिंदू कहाँ दिखते हैं, गुरप्रीत सिंह कहते हैं, "हिंदू समुदाय भी उसी तरह से अलग-अलग राय रखता है, जैसे सिख. सिखों का एक हिस्सा खालिस्तान के पक्ष में है लेकिन एक हिस्सा इसके विरोध में भी है. जब 2015 में नरेंद्र मोदी यहाँ आए थे, तो यहाँ के सबसे पुराने गुरुद्वारे में उनका स्वागत किया गया."
"इसी तरह हिंदुओं का भी एक हिस्सा है जिन्हें आरएसएस की विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है. वो एक सेक्युलर इंडिया चाहते हैं. लेकिन जिस तरह से ध्रुवीकरण का माहौल बढ़ता जा रहा है, वो फ़िक्र करने की बात है."

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भारत में 1980 के दशक में ख़ालिस्तान की मांग चरम पर थी. लेकिन कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों में सिख समुदाय का एक हिस्सा अभी भी इसकी मांग उठाता रहता है.
भारत इन देशों से सिख अलगाववादियों पर कार्रवाई करने को कहता रहा है.
यहाँ तक कि जी-20 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने जब जस्टिन ट्रूडो भारत आए, तब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके साथ खालिस्तान का मुद्दा उठाया.
एबीसी न्यूज़ की माने तो कनाडा के इंटरनेशनल एयर ट्रैवल मार्केट में योगदान के लिहाज से भारतीय चौथे नंबर पर हैं. हालांकि, भविष्य में ये तस्वीर बदलेगी या नहीं इस पर फ़िलहाल कोई स्पष्ट राय नहीं है.
लेकिन ब्रह्म चेलानी कहते हैं कि ट्रूडो के बयान से भारत और कनाडा के द्विपक्षीय रिश्तों को जो नुक़सान पहुंचा है उसकी भरपाई होने में समय लगेगा, शायद कनाडा में सरकार बदलने के बाद ही इसपर कोई प्रगति देखने को मिले. कनाडा में अगले साल अक्तूबर में चुनाव होने हैं.
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