नरेंद्र मोदी का रोड शो और नीतीश कुमार के हाथ में बीजेपी का चुनाव चिह्न क्या कहता है?

मोदी और नीतीश

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    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना, बिहार

पटना में रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड शो में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथ में बीजेपी का सिंबल (कमल) देखा गया.

आमतौर पर चुनाव प्रचार में किसी दल के सबसे बड़े नेता के हाथ में किसी अन्य दल का चुनाव चिह्न देखने को नहीं मिलता है.

रविवार को बिहार की राजधानी पटना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार रोड शो किया. यह इलाक़ा पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के लोकसभा क्षेत्र में आता है.

मोदी नीतीश- यह तस्वीर बदल सकते हैं- नीतीश के हाथ में कमल वाली तस्वीर से

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प्रधानमंत्री के रोड शो को देखने के लिए बीजेपी के अलावा जेडीयू के समर्थक भी बड़ी संख्या में पटना की सड़कों पर मौजूद थे.

इस दौरान पटना की सड़कों पर सुरक्षा व्यवस्था काफ़ी कड़ी कर दी गई थी और कई सड़कों को वाहनों के लिए बंद कर दिया गया था.

इससे पटना में कई रेलवे स्टेशन और अन्य जगहों पर लोगों को काफ़ी परेशानी भी हुई.

पटना में नरेंद्र मोदी के साथ नीतीश कुमार की इस तस्वीर को सोशल मीडिया पर कई लोगों ने साझा किया है. रोड शो के दौरान नीतीश कुमार की बॉडी लैंग्वेज को लेकर भी लोग कई तरह की चर्चा कर रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, “नीतीश कुमार एक हारे हुए, थके हुए नेता की मनःस्थिति में दिखते हैं. उन्हें बार-बार यह कहने की ज़रूरत पड़ती है कि अब बीजेपी का साथ छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे. यह पूरी तरह आत्मसमर्पण का भाव है. वो चाहते हैं कि अब बीजेपी के सहारे आगे की ज़िंदगी सुविधा में कट जाए.”

क्या थक चुके हैं नीतीश कुमार?

नीतीश मोदी

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नीतीश कुमार पहली बार साल 1985 में बिहार विधानसभा का चुनाव जीतकर विधायक बने थे. नीतीश ने पहली बार साल 1989 में लोकसभा चुनाव जीता था और साल 1990 में वो पहली बार केंद्र सरकार में मंत्री भी बनाए गए थे.

नीतीश ने साल 2000 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, हालाँकि बहुमत ना होने से वह सरकार एक हफ़्ते भी नहीं चल पाई थी.

इस तरह से नीतीश का राजनीतिक सफ़र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से काफ़ी पुराना नज़र आता है. नीतीश ही मूलरूप से पिछले बीस साल से बिहार की सत्ता पर बैठे हैं और बिहार की सियासत में उनकी सेहत को लेकर भी कई बार चिंता जताई गई है.

पिछले महीने 7 अप्रैल को बिहार के नवादा में चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश कुमार ने पीएम मोदी की मौजूदगी में अपने भाषण में कई बार ग़लतियाँ की थीं. नीतीश ने यहाँ तक कह दिया था कि लोग वोट देकर प्रधानमंत्री मोदी को ‘चार हज़ार लोकसभा’ सीटें देंगे.

अपने भाषण के बाद नीतीश कुमार प्रधानमंत्री मोदी के आगे झुककर उनके पाँव छूते भी नज़र आए थे. बिहार के सियासी गलियारों में यह तस्वीर चर्चा का एक विषय बन गई थी, जिसे बिहार में विपक्ष ने नीतीश के सम्मान के साथ भी जोड़ा था.

पटना में मोदी के रोड शो को देखने पहुँचे बीजेपी समर्थक
इमेज कैप्शन, पटना में मोदी के रोड शो को देखने पहुँचे बीजेपी समर्थक

नवादा के बाद बिहार में नरेंद्र मोदी की कुछ सभाओं में नीतीश कुमार मौजूद नहीं थे. उसके बाद से नीतीश के बीजेपी के साथ समीकरण पर कई तरह के सवाल सवाल किए जा रहे थे. हालाँकि बाद में नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी मुंगेर लोकसभा सीट पर प्रचार के दौरान एक साथ मौजूद थे.

वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद मानते हैं, “नीतीश कुमार ने अपने हाथ में बीजेपी का चुनाव चिह्न उस वक़्त थामा है जब पिछले 20 साल की राजनीति में मोदी अपनी सबसे कमज़ोर स्थिति में हैं. जब मोदी ताक़तवर थे तब नीतीश उनसे झगड़ रहे थे. इसका मतलब है कि नीतीश कुमार अब बहुत कमज़ोर हो चुके हैं.”

सुरूर अहमद के मुताबिक़ नीतीश कुमार की मानसिक स्थिति ऐसी दिखती है कि उनसे जो चाहे करा लो. उन पर सेहत और उम्र का असर जेडीयू के ही नेता जॉर्ज फ़र्नांडिस की याद दिलाता है, जो किसी समय एनडीए का बड़ा चेहरा थे, लेकिन साल 2009 के लोकसभा चुनावों में ख़ुद पाँचवें नंबर पर रहे थे.

बीजेपी को नीतीश की ज़रूरत क्यों

माना जाता है कि नीतीश की लोकप्रियता में गिरावट के दावों के पीछे एक वजह उनका बार-बार पाला बदलना है.

जानकारों के मुताबिक़- नीतीश के साथ आने से एनडीए को भले ही बड़ा फ़ायदा न हो, लेकिन उनके विपक्ष में होने से एनडीए को बड़ा नुक़सान हो सकता था.

पटना में वाहनों का इंतज़ार करते लोग

माना जाता है कि इसी साल जनवरी में विपक्ष का साथ छोड़कर एनडीए में शामिल होने के बाद ही नीतीश के राजनीतिक क़द को बड़ा नुक़सान हुआ है. अगर वो विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ में होते तो उनका क़द और उनकी राजनीतिक हैसियत ज़्यादा बड़ी होती.

लेकिन ऐसी स्थिति में भी बीजेपी को नीतीश कुमार की ज़रूरत क्यों पड़ती है?

पटना में एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़ के पूर्व निदेशक और राजनीतिक मामलों के जानकार डीएम दिवाकर इसके पीछे दो प्रमुख वजह मानते हैं.

उनके मुताबिक़, “इस बार मुस्लिम वोटर नीतीश के साथ नहीं दिखते हैं फिर भी बीजेपी को लगता है कि नीतीश जितने भी सेक्युलर वोटों का विभाजन करेंगे उतना ही बीजेपी को फ़ायदा होगा, क्योंकि यह वोट कभी भी बीजेपी का नहीं रहा है.”

“इसकी दूसरी वजह यह है कि बीजेपी के पास बिहार में कोई सर्वमान्य नेता नहीं है और पार्टी में कई नेता ख़ुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मानते हैं. इसलिए नीतीश को आगे कर के बीजेपी अपनी पार्टी के भीतर की कलह को दबा देती है.”

माना जाता है कि नीतीश कुमार के हाथ में बीजेपी के चुनाव चिह्न को देखकर नीतीश के साथ के सेक्युलर वोटों पर असर पड़ सकता है और वो नीतीश से दूर जा सकते हैं.

नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी

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हालाँकि तस्वीरों में नज़र आ रहा है कि नीतीश कभी कमल निशान को एक हाथ से दूसरे हाथ में लेते हैं तो कभी अपना हाथ नीचे की तरफ़ ले जाते हैं.

क्या यह बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है?

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बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने पत्रकारों से बातचीत में कहा है कि "नीतीश जी की स्थिति को देखकर बहुत से लोग दुःखी थे. उनकी बॉडी लैंग्वेज को देखकर ऐसा लग रहा था कि जबरन उनके हाथ में ‘कमल’ थमा दिया गया था."

तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया है, “मोदी जी बिहार आए लेकिन बिहार के बारे में नहीं बोल पाए. क्या बोला उन्होंने नौकरी के बारे में, कारख़ाने के बारे में, निवेश के बारे में, विशेष राज्य के दर्जे के बारे में? मोदी जी काम की बात नहीं करते, वो बेकार की बात करते हैं. नीतीश जी ने कहा था जो साल 2014 में आए थे, वो साल 2024 में चले जाएंगे. वो अंदर से यही चाहते हैं.”

हालाँकि नीतीश कुमार कई बार यह दावा कर चुके हैं कि अव वो एनडीए को छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे. माना जाता है कि नीतीश अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम दौर से गुज़र रहे हैं. इसे उनकी पार्टी जेडीयू के भविष्य के साथ भी जोड़ा जाता है.

बिहार में महागठबंधन की सरकार के दौरान नीतीश कुमार ने ख़ुद अपनी पार्टी के किसी नेता को नहीं बल्कि आरजेडी के तेजस्वी यादव को अपने गठबंधन के भविष्य का नेता बताया था.

नीतीश के महागठबंधन को छोड़ने के बाद तेजस्वी यादव ने दावा किया था कि नीतीश की पार्टी जेडीयू साल 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान टूट जाएगी.

प्रधानमंत्री के रोड शो के दौरान पटना में सुरक्षा व्यवस्था काफ़ी कड़ी कर दी गई थी.
इमेज कैप्शन, प्रधानमंत्री के रोड शो के दौरान पटना में सुरक्षा व्यवस्था काफ़ी कड़ी कर दी गई थी.

इससे पहले जेडीयू से बग़ावत करते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने भी क़रीब एक साल पहले जेडीयू को लेकर कुछ ऐसा ही दावा किया था.

हालाँकि डीएम दिवाकर कहते हैं, “नीतीश या उनकी पार्टी का बीजेपी में विलय नहीं होगा, जेडीयू का अस्तित्व विधानसभा में उनकी ताक़त पर टिका है. लेकिन ऐसा भी लगता है कि लालू प्रसाद यादव अब नीतीश को नहीं अपनाएंगे.”

नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के संबंध

दिसंबर 2003 में बतौर रेल मंत्री नीतीश कुमार गुजरात के कच्छ में एक रेल परियोजना का उद्घाटन करने पहुंचे थे. उस दौरान नीतीश ने नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करते हुए उन्हें भावी राष्ट्रीय नेता बताया था. लेकिन मोदी के साथ उनका यह रिश्ता कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है.

साल 2022 में एनडीए का साथ छोड़ने के बाद नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी और बीजेपी पर कई बार तीखे हमले किए थे. नीतीश संविधान, लोकतंत्र और सांप्रदायिकता को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर हमलावर नज़र आते थे.

इससे पहले भी नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के बीच संबंधों में कई बार उतार-चढ़ाव देखा गया है.

नीतीश और मोदी के बीच पहली तल्ख़ी साल 2010 में तब देखी गई थी, जब पटना में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भोज का आयोजन किया था. लेकिन अख़बार में एक विज्ञापन में मोदी के साथ अपनी तस्वीर से नीतीश इतने नाराज़ हुए थे कि उन्होंने भोज रद्द कर दिया था.

लालू, नीतीश और राहुल गाँधी

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कहा जाता है कि इसी वजह से नीतीश ने साल 2008 में कोसी बाढ़ राहत के तौर पर गुजरात सरकार से मिले 5 करोड़ रुपए भी लौटा दिए थे. जबकि उस वक़्त गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी एक ताक़तवर नेता थे.

साल 2014 लोकसभा चुनावों के पहले बीजेपी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया था. उसके बाद नीतीश कुमार एनडीए से बाहर हो गए थे. उस समय भी बीजेपी और एनडीए के दलों के बीच मोदी की ताक़त बहुत बड़ी थी.

साल 2022 में एनडीए छोड़ने के बाद नीतीश कुमार तो यहाँ तक दावा कर रहे थे कि अब वो मरना पसंद करेंगे लेकिन बीजेपी के साथ नहीं जाएंगे. वहीं बीजेपी के नेता भी नीतीश के लिए एनडीए का दरवाज़ा बंद बताते थे.

हालाँकि नीतीश बीजेपी के फिर से साथी बने हैं लेकिन इस गठजोड़ ने अब तक बिहार के अगले विधानसभा चुनावों के बारे में खुलकर कुछ नहीं कहा है कि चुनावों में उनका नेता कौन होगा और चुनाव किसके चेहरे पर लड़ा जाएगा.

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