नीतीश के बाद जेडीयू में नंबर दो पर कोई नेता टिक क्यों नहीं पाता

बिहार की रजानीति में नंबर दो कौन

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    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से

बिहार की राजनीति के तीन नाम - उपेंद्र कुशवाहा, प्रशांत किशोर और आरसीपी सिंह. पहली नज़र में शायद आपको इन नामों में कोई समानता नहीं नज़र आएगी. जातीय राजनीति के लिहाज से भी ये अलग-अलग हैं. लेकिन ये तीनों एक समय में बिहार के नीतीश कुमार के क़रीबी में गिने जाते रहे हैं. लेकिन दिलचस्प ये कि इन तीनों की नीतीश से नज़दीकी से लेकर दूर होने की कहानी भी कमोबेश एक ही नज़र आती है.

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर सितंबर 2018 में जनता दल यूनाइडेट में शामिल हुए थे. उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी बनाया गया था. फिर पीके के बढ़ते क़द और बयानों से विवाद इतना बढ़ा कि जनवरी 2020 में उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया.

उसके बाद बारी आई नौकरशाह से राजनेता बने आरसीपी सिंह की. नीतीश कुमार के क़रीबी माने जाने वाले आरसीपी सिंह ने साल 2010 में नौकरी छोड़ जेडीयू का दामन थामा था. नीतीश कुमार ने उन्हें राज्यसभा सांसद और जेडीयू का अध्यक्ष भी बनाया. लेकिन आज वो भी पार्टी से बाहर हो चुके हैं.

उपेंद्र कुशवाहा क़रीब दो साल पहले जेडीयू में दोबारा शामिल हुए थे. उन्हें पार्टी के संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया लेकिन अब पार्टी से उनके संबंध पूरी तरह बिगड़ चुके हैं. यहां तक कि ख़ुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कह चुके हैं कि 'उपेंद्र कुशवाहा जब चाहे पार्टी छोड़कर जा सकते हैं.'

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उपेंद्र कुशवाहा भी बीते कई हफ़्ते से लगातार नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी कर रहे हैं. वो जेडीयू और आरजेडी के बीच गुप्त समझौते का आरोप भी लगा चुके हैं.

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उपेंद्र कुशवाहा और सीएम नीतीश के बीच चल रहे विवाद के बाद पार्टी में नंबर दो बनते दिख रखे एक और नेता से जेडीयू ने किनारा कर लिया है. जेडीयू अध्यक्ष ललन सिंह भी कुशवाहा पर मनगढ़ंत बात करने का आरोप लगा चुके हैं.

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उपेंद्र कुशवाहा को लेकर हुए विवाद के बाद एक बार से यह सवाल खड़ा हो गया है कि बिहार में नीतीश कुमार के सामने पार्टी में नंबर दो की जगह पर कोई भी नेता टिक क्यों नहीं पाता है?

कुछ ऐसी ही नज़दीकी नीतीश कुमार के साथ जॉर्ज फ़र्नांडिस,शरद यादव,दिग्विजय सिंह,अली अनवर और जीतन राम मांझी की भी रही थी.

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इमेज कैप्शन, स्वर्गीय जॉर्ज फ़र्नांडिस

वजह नीतीश या कुछ और?

इस वजह से सवाल पूछा जाता है दिक़्क़त नीतीश कुमार का नंबर 2 बनने में है या फिर नीतीश कुमार में.

जनता दल यूनाइटेड में चल रहे इस संकट की असल वजह क्या है?

क्या नीतीश कुमार ख़ुद के सामने किसी और को बहुत बड़ा नहीं होने देते हैं?

पटना के एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक प्रोफ़ेसर डी.एम दिवाकर का कहना है कि जनता दल यूनाइटेड कैडर पर खड़ी पार्टी नहीं है, जो तय करेंगे कि उनका नंबर दो कौन होगा. उपेंद्र कुशवाहा तो कभी पार्टी में आते हैं, कभी चले जाते हैं. ऐसे में पार्टी के बाक़ी नेता उनको क्यों अपने उपर देखना चाहेंगे?"

वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण मानते हैं कि नंबर दो वाला संकट आज हर पार्टी में है, ख़ासकर यह छोटी पार्टियों में ज़्यादा दिखती है. समाजवादी पार्टी, बीएसपी और आप जैसी ज़्यादातर पार्टियों का एक ही नेता है. उनमें नंबर दो कोई नहीं है.

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नचिकेता नारायण कहते हैं, "जेडीयू में नंबर दो की दावेदारी करने कभी कोई नहीं आया. उपेंद्र कुशवाहा भी जेडीयू के उत्तराधिकारी बनने आये थे. नीतीश कुमार का कोई राजनीतिक उत्तराधिकारी नहीं है इसलिए जेडीयू में नंबर दो का संकट ज़्यादा दिखता है."

वहीं वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी का मानना है कि नीतीश कुमार ने आरसीपी सिंह को ख़ुद चाहा था, लेकिन आरसीपी सिंह जल्दबाज़ी कर गए, इसलिए उनका यह हाल हुआ.

पूर्व सांसद जनअधिकार पार्टी के नेता पप्पू यादव कहते हैं, "कोई किसी के साथ नहीं टिकता है. क्या लालू के साथ जॉर्ज,शरद यादव टिक सके. आज के नेता चाहते हैं कि बाक़ी लोग गणेश जी की तरह उनकी परिक्रमा करें."

पप्पू यादव के मुताबिक़ नीतीश जी के मन में ऐसे नेताओं से भविष्य में चुनौती पाने का भी डर हो सकता,जिनको ख़ुद उन्होंने ही आगे बढ़ाया. फिर आरसीपी सिंह तो नीतीश-नीतीश छोड़कर मोदी-मोदी करने लगे थे.

जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार ने बीबीसी से कहा है कि आरसीपी सिंह ने जेडीयू के 16 लोकसभा सांसदों को जो चुनकर आए थे, उन्हें दरकिनार कर दिया. वो पार्टी के अध्यक्ष थे इसलिए ख़ुद राज्यसभा सांसद होकर मंत्री बन गए. ये ग़लत था.

इलेक्शन या सेलेक्शन?

उपेंद्र कुशवाहा को नीतीश कुमार ने जेडीयू में शामिल होने के साथ ही पार्टी के संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया था. फिर उन्हें बिहार विधान परिषद का सदस्य भी बनाया गया. उनके राजनीतिक सफ़र पर नज़र डालें तो वो कई बार नीतीश के साथ आए और फिर दूर हुए हैं और फिर पास और फिर दूर हुए.

पिछली बार कुशवाहा ने अपनी पार्टी आरएलएसपी का जेडीयू में विलय उस वक़्त किया था जब साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में कुशवाहा की पार्टी बुरी तरह हारी थी.

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इमेज कैप्शन, उपेन्द्र कुशवाहा

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को बिहार में पहली बार महागठबंधन सरकार बनने के बाद साल 2016 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपना सलाहकार बनाया था. नीतीश ने उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दिया था.

वहीं आरसीपी सिंह उत्तर प्रदेश कैडर के पूर्व आईएएस अधिकारी रहे हैं. नीतीश कुमार के पहले कार्यकाल में यानि साल 2005 से 2010 के बीच आरसीपी सिंह बिहार के मुख्य सचिव भी रहे थे.

डीएम दिवाकर कहते हैं, "आरसीपी सिंह कभी जेडीयू के कैडर नहीं थे, लेकिन नीतीश कुमार ने उनको ऊंचा पद दे दिया. यही हाल प्रशांत किशोर का था, पर उन्हें सीधा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया गया."

यानि इनमें से कोई भी नेता चुनाव जीतकर आगे नहीं बढ़ा है. सब नीतीश की पसंद के आधार पर पार्टी में ऊंचे पद तक पहुंचे.

डीएम दिवाकर ऐसे नेताओं को 'थोपे गए नेता' या'आयात किए गए नेता' मानते हैं. उनका कहना है कि ऐसे नेताओं को पार्टी के अंदर की केमिस्ट्री नहीं पता होती है, इसलिए ये पार्टी में रम ही नहीं पाते हैं.

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इमेज कैप्शन, प्रशांत किशोर के साथ नीतीश कुमार

आरसीपी सिंह, पीके या उपेंद्र कुशवाहा सभी सीएम नीतीश कुमार की पसंद से पार्टी में आए थे. जबकि आरसीपी सिंह और प्रशांत किशोर तो कभी राजनीति में थे भी नहीं.

कन्हैया भेलारी कहते हैं, " आरसीपी सिंह की तरह उपेंद्र कुशवाहा भी जल्दबाज़ी का नतीजा भुगत रहे हैं. जबकि 'मंडल की राजनीति' के बाद प्रशांत किशोर को तो कभी भी नीतीश अपना नंबर दो बना ही नहीं सकते क्योंकि वो ब्राह्मण हैं."

राजनीतिक उत्तराधिकारी का अभाव

राजनीतिक उत्तराधिकार को लेकर संकट केवल बिहार की राजनीति में नहीं है. बाक़ी कुछ और राज्यों में भी ऐसा ही देखने को मिलता है.

बिहार में तेजस्वी यादव को लालू प्रसाद यादव के बाद आरजेडी का नेता मान लिया गया है. उत्तर प्रदेश में ऐसा ही अखिलेश यादव के साथ है, जो मुलायम सिंह यादव के बाद समाजवादी पार्टी के सबसे बड़े नेता बने हैं.

ऐसा ही दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु में दिखता है जहां एमके स्टालिन को करुणानिधि का राजनीतिक उत्तराधिकारी मान लिया गया है. लेकिन जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके उत्तराधिकारी के अभाव में कमज़ोर हो गई.

इसका मतलब क्या विरासत में नंबर दो का पद मिलने से ऐसे विवाद नहीं होते हैं?

नचिकेता नारायण मानते हैं कि तेजस्वी यादव 'नंबर दो' नहीं बल्कि लालू के वारिस हैं इसलिए आरजेडी में कोई विवाद नहीं हुआ. नीतीश कुमार का कोई राजनीतिक उत्तराधिकारी नहीं है और उनको लेकर अवधारणा भी बन गई है कि वो नंबर दो पर किसी को टिकने नहीं देते हैं.

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इस मुद्दे पर प्रो. डीएम दिवाकर कहते हैं, "नंबर दो के चुनाव के वक़्त कार्यकर्ताओं के दम पर खड़ी पार्टियों में संकट कम होता है. बीजेपी, लेफ़्ट या आरजेडी कैडर बेस्ड पार्टियां हैं. तेजस्वी यादव भी लालू के बेटे ज़रूर हैं लेकिन वो लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनाव जीतकर आगे बढ़े हैं इसलिए उनको चुनौती देने वाला कोई नहीं है."

डीएम दिवाकर का मानना है कि जेडीयू को कैडर नहीं चलाते हैं बल्कि नौकरशाह चलाते हैं. इसलिए यहां नंबर दो के नेता का संकट ज़्यादा बड़ा है. कई बार जेडीयू के नेता भी कहते हैं कि कोई अधिकारी हमारी सुनता ही नहीं; वो केवल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बात सुनते हैं.

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इमेज कैप्शन, नीतीश कुमार के साथ आरसीपी सिंह

नेताओं की महत्वाकांक्षा

आरसीपी सिंह केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में साल 2021 में जेडीयू के कोटे से मंत्री भी बनाए गए थे. माना जाता है कि नीतीश की आरसीपी से नाराज़गी यहीं से दिखने लगी थी. उस समय आरसीपी सिंह पार्टी अध्यक्ष थे और इसे आरसीपी सिंह की महत्वाकांक्षा के तौर पर देखा गया था.

बिहार में प्रशांत किशोर के बारे में भी माना जाता है कि उन्होंने सीधा पार्टी प्रमुख से ही विवाद कर लिया. इसलिए उन्हें पार्टी से बाहर होना पड़ा.

अब आरसीपी सिंह और प्रशांत किशोर अक्सर नीतीश के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी की वजह से सुर्खियों में होते हैं. जेडीयू के अंदर रहते हुए भी यही हाल उपेंद्र कुशवाहा का है. माना जाता है कि कुशवाहा की महत्वाकांक्षा भी नीतीश से विवाद के लिए बड़ी वजह है.

कन्हैया भेलारी के मुताबिक़ नीतीश कुमार को पार्टी में नंबर दो के लायक कोई मिला ही नहीं है, जो भी मिला वो जल्दबाज़ी में था. जबकि नीतीश के सामने पहले उनकी ख़ुद की महत्वाकांक्षा है, इसके लिए उन्होंने कुछ साल पहले से तैयारी भी शुरू कर दी है.

साल 2022 में बिहार में महागठबंधन की सरकार बनने के बाद नीतीश कुमार लगातार विपक्षी एकता की बात कर रहे हैं. माना जाता है कि वो वो केंद्र की राजननीति में सक्रिय होना चाहते हैं, इसके लिए उन्हें बिहार में भी अपनी राजनीतिक ताक़त बनाकर रखनी होगी.

कन्हैया भेलारी मानते हैं कि नीतीश कुमार बहुत पहले से केंद्र की राजनीति में जाने का मन बना चुके हैं. जेडीयू के सांसद हरिवंश का राज्यसभा का उपसभापति बनना और कभी पसमांदा मुसलमानों का चेहरा रहे अली अनवर को राज्यसभा भेजा जाना भी इसी का हिस्सा था.

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इमेज कैप्शन, 2022 में बीजेपी की पसमांदा मुसलमानों की एक सभा में भाग लेते कार्यकर्ता

दूसरी पार्टियों का हाल

पार्टी में नंबर दो का संकट क्या केवल जनता दल यूनाइटेड में है? या फिर यह राजनीति का ऐसा दौर है जहां राजनीतिक दल एक नेता के नाम और चेहरे पर चल रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण का कहना है कि आज की राजनीति में ज़्यादातर पार्टियों में एक नेता सबसे बड़ा दिखता है. बीजेपी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, एसपी,बीएसपी ज़्यादातर पार्टियां एक चेहरे के दम पर चल रही हैं.

नचिकेता नारायण कहते हैं, "पार्टियों में एक चेहरे का क़द इतना बड़ा हो गया है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कई बार पंजाब की बैठकों में दिख जाते हैं."

"आज की बीजेपी और कांग्रेस जैसी पार्टी कौन चला रहा है सभी जानते हैं. पार्टी सुप्रीमो से विवाद के बाद अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता के दौर में कल्याण सिंह और गोविंदाचार्य का क्या हाल हुआ यह सबने देखा है."

वो इस मामले में आम आदमी पार्टी में प्रशांत भूषण,कुमार विश्वास और योगेंद्र यादव का भी उदाहरण देते हैं. प्रार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल से विवाद के बाद ये सभी राजनीतिक तौर पर हाशिए पर पहुंच गए.

नचिकेता नारायण मानते हैं कि संयोग से नीतीश कुमार से हाल से समय में जो भी उलझा है उसके पास कोई जनाधार नहीं था. इसमें आरसीपी सिंह और पीके के साथ ही शरद यादव का भी नाम लिया जा सकता है. यही हाल उपेंद्र कुशवाहा का भी है.

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वहीं डीएम दिवाकर मानते हैं कि इस तरह के विवादों से बचने के लिए नीतीश कुमार पार्टी को ख़ुद से उपर समझेंगे तो बेहतर होगा. अगर वो सबकी सहमति से चलेंगे तो कोई परेशानी नहीं होगी. अगर नेताओं को इम्पोर्ट करेंगे तो परेशानी बनी रहेगी.

जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार इस मुद्दे पर कहते हैं, "चाहे कोई भी पार्टी हो वह किसी को नंबर दो नहीं चुनती है. कोई नेता ख़ुद ही अपने को नंबर दो मान ले क्या कर सकते हैं. नेताओं की महत्वाकांक्षा की वजह से ऐसा संकट आता है."

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