बेगूसराय में गिरिराज सिंह का 'गिरवी गमछा' क्यों बन गया है बड़ा मुद्दा - ग्राउंड रिपोर्ट

गिरिराज सिंह

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    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, बेगूसराय से, बीबीसी हिंदी के लिए

2019 लोकसभा चुनाव में बिहार में बेगूसराय की लड़ाई राष्ट्रीय स्तर पर सुर्ख़ियों में थी.

उस समय यहाँ मुख्य लड़ाई बीजेपी के निर्वतमान सांसद गिरिराज सिंह और कन्हैया कुमार के बीच थी. कन्हैया कुमार उस समय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) में थे.

बाद में कन्हैया कुमार कांग्रेस में शामिल हो गए. इस बार वे उत्तर पूर्व दिल्ली से कांग्रेस के उम्मीदवार हैं.

इस लोकसभा चुनाव में बेगूसराय में मुख्य मुक़ाबला बीजेपी के गिरिराज सिंह और सीपीआई उम्मीदवार अवधेश राय के बीच है.

दिलचस्प है कि साल 2019 की लड़ाई में कन्हैया के लिए देश भर से प्रचारक आए थे और कन्हैया बहुत मज़बूत उम्मीदवार लगते थे. लेकिन गिरिराज सिंह ने उन्हें चार लाख से अधिक वोट से हराया था.

अबकी बार यानी 2024 में ये सीट राष्ट्रीय स्तर पर उतनी सुर्ख़ियों में नहीं है. लेकिन सीपीआई भी इस चुनाव में ज़ोर-शोर से उतरी है.

बेगूसराय में गिरिराज सिंह के घर के ठीक सामने एक किराना दुकान के मालिक कहते हैं, "अबकी बार की लड़ाई 50-50 की है, कुछ कहा नहीं जा सकता. जो भी जीतेगा, उसकी जीत कम अंतर से ही होगी."

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गिरिराज सिंह का 'गिरवी गमछा'

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बेगूसराय लोकसभा चुनाव पर बात शुरू करने से पहले, बात चेरिया गाँव की. चेरिया, बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र का एक गाँव है.

दस हज़ार की आबादी और 2,200 वोटर वाला ये गाँव आजकल 'गिरिराज के गिरवी गमछे' वाले गाँव के तौर पर मशहूर हो गया है.

दरअसल चेरिया गाँव बूढ़ी गंडक नदी के पास बसा है. स्थानीय लोग साल 2002 से यहाँ पुल बनाने की मांग कर रहे है.

इसको लेकर 24 करोड़ रुपये का डीपीआर भी बिहार सरकार ने साल 2014 में बनाया था. लेकिन पुल आज तक नहीं बना.

साल 2019 में गिरिराज सिंह अपना चुनाव प्रचार करने यहाँ आए थे.

गाँव के कुशेश्वर पासवान बताते है, "उन्हें सम्मान में हमने गमछा पहनाया था. जिसे उन्होंने वापस करते हुए कहा था कि इसे रख लीजिए. जब पुल बन जाएगा तो वापस ले जाएँगे. लेकिन कुछ नहीं हुआ."

चेरिया गाँव ने साल 2020 के विधानसभा चुनाव में वोट का बहिष्कार किया था और अबकी बार भी गाँव वाले वोट के बहिष्कार का मन बना रहे है.

गाँव के जितेंद्र राय कहते हैं, "किसी को वोट देना ही नहीं है. सबका बहिष्कार है. मुखिया चुनाव हो, विधानसभा हो, लोकसभा हो. जब हमको टापू पर डाल दिया तो हम क्यों किसी को वोट करें?"

समस्याओं से परेशान गाँव के लोग

शशिभूषण शर्मा

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इमेज कैप्शन, शशिभूषण शर्मा कहते हैं, "डर लगता है रोज़ नाव से लाने-ले जाने में. लेकिन पढ़ाई भी तो ज़रूरी है."

चेरिया गाँव भगवानपुर ब्लॉक में पड़ता है, लेकिन नदी पार करके जो पहला प्रखंड संपर्क में आता है, वो चेरिया बरियारपुर ब्लॉक है.

लोग नाव के सहारे नदी पार करके ही चेरिया बरियारपुर ब्लॉक पहुँचते है. जहाँ से वो स्कूल, अस्पताल जैसी आधारभूत जरूरतों के लिए उन्हें जाना पड़ता है.

शशिभूषण शर्मा से जब हम मिले, तो वो अपनी बेटी को स्कूल से नाव से वापस ला रहे थे.

वो कहते हैं, "बहुत दिक़्क़्त है. डर लगता है रोज़ नाव से लाने-ले जाने में. लेकिन पढ़ाई भी तो ज़रूरी है. सावन में तो नदी में पानी बहुत बढ़ जाता है तो भी बच्ची स्कूल जाती है क्योंकि 75 प्रतिशत अटेंडेंस ज़रूरी है."

चेरिया गाँव में सिर्फ़ आठवीं क्लास तक सरकारी स्कूल है और गाँव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं है.

गाँव की आशा सहायिका कहती हैं, "जब कोई इमेरजेंसी केस पड़ता है तो नाव से पारकर ले जाना पड़ता है. बहुत दिक़्क़त है, लेकिन नेता सुनते ही नहीं हैं."

दिलचस्प बात ये है कि चेरिया बहुत समृद्ध गाँव है और इलाक़े में 'मिनी कलकत्ता' के तौर पर मशहूर है.

क्योंकि आसपास के गाँव के लोग नदी पार करके चेरिया के लोगों के गाँव में खेत मज़दूरी करने आते है.

गाँव के नौजवान विदेशों में कमाने जाते है और कम से कम 11 परिवार अमेरिका में बसे हुए हैं.

अभिषेक कुमार मेहता दुबई के एक सेवेन स्टार होटल में काम करते हैं. लेकिन अभी तक उनकी शादी नहीं हो पाई.

अभिषेक कुमार मेहता

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इमेज कैप्शन, अभिषेक कुमार मेहता का कहना है कि गाँव में पुल न देखकर अगुआ भाग जाता है

अभिषेक कहते हैं, "लव मैरिज के लिए पापा मानते नहीं और गाँव में पुल न देखकर अगुआ (शादी का रिश्ता लाने वाला) भाग जाता है."

गाँव के नौजवान आलोक बताते हैं, "वोट बहिष्कार की बात सुनकर गिरिराज सिंह 10 दिन पहले आए थे. उन्होने माफ़ी मांग ली और हमने उनका गमछा उन्हें दे दिया. लेकिन वोट देंगें या नहीं, ये तय नहीं हुआ है. मोदी जी चंद्रयान भेज रहे हैं और हम अपनी एक बेसिक ज़रूरत पुल भी नहीं मांगें."

इस मसले पर जब बीबीसी हिंदी ने गिरिराज सिंह से पूछा, तो उन्होंने कहा, "बहुत जगह पुल बने हैं, बहुत जगह नहीं भी बने हैं. मेरी कोशिश रहेगी कि चेरिया में पुल बन जाए."

स्थानीय पत्रकार घनश्याम देव बीबीसी से कहते हैं, "पुल का मुद्दा इस इलाक़े में इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि गिरिराज सिंह को नितिन गडकरी की सभा करानी पड़ी है, ताकि पुल निर्माण को लेकर लोगों का आक्रोश कम हो."

बेगूसराय लोकसभा का चुनाव प्रचार देखें, तो गिरिराज सिंह को इस बार विरोध का सामना भी करना पड़ रहा है.

बेगूसराय, गिरिराज सिंह

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उनके विरोध को लेकर कई वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें से कुछ बीजेपी समर्थकों की ओर से भी किए जा रहे हैं.

गिरिराज सिंह बीबीसी से कहते हैं कि उनके ख़िलाफ़ 'एंटी इन्कम्बेंसी क्रिएट' की जा रही है.

वो कहते हैं कि वे 200 प्रतिशत जीतेंगें, लेकिन जीत का मार्जिन क्या पिछली बार की तरह होगा, इस पर टिप्पणी करने से इनकार करते हैं.

उनके प्रतिद्वंद्वी अवधेश राय 72 साल के हैं और बेगूसराय की बछवाड़ा विधानसभा से तीन बार विधायक रहे हैं.

वो बीबीसी से कहते हैं, "एंटी इन्कम्बेंसी तो है ही. लेकिन उनकी भाषा (गिरिराज) की अशिष्टता के चलते जेडीयू और बीजेपी की मानसिकता वाला मतदाता भी हमारी तरफ़ आ रहा है. बेगूसराय की संस्कृति में अशिष्टता का कोई स्थान नहीं है. फ़िलहाल हम अभी यहीं कह सकते है कि जीत का मार्जिन पलटने वाला है."

अवधेश राय

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इमेज कैप्शन, बेगूसराय में गिरिराज सिंह के प्रतिद्वंद्वी अवधेश राय बछवाड़ा विधानसभा से तीन बार विधायक रहे हैं

स्थानीय पत्रकार भी इस बात को मानते है कि गिरिराज सिंह की राह आसान नहीं है.

दैनिक भास्कर के बेगूसराय के ब्यूरो चीफ कुमार भवेश कहते हैं, "इस बार की लड़ाई मुश्किल है. गिरिराज सिंह जीतते भी हैं, तो उनकी जीत का मार्जिन एक लाख से कम हो जाएगा. इंडिया ब्लॉक अवधेश राय के साथ मज़बूती से खड़ा दिखता है लेकिन गिरिराज सिंह के कैंप में बिखराव है."

दरअसल, बेगूसराय में जेडीयू और बीजेपी के समर्थक ही गिरिराज का विरोध करते नज़र आ रहे हैं.

इसी साल मार्च में गिरिराज सिंह को स्थानीय नेता विनोद राय के नेतृत्व में बीजेपी समर्थकों ने ही काला झंडा दिखाया था, जिसका वीडियो वॉयरल हुआ था.

ये सभी सांसद की ओर से गोद लिए गए आदर्श ग्राम में किसी तरह का काम नहीं किए जाने से नाराज़ थे.

इसी तरह तीन बार मटिहानी से विधायक रहे जेडीयू के नरेंद्र कुमार सिंह उर्फ़ बोगो सिंह ख़ुद को 'नीतीश का लठैत' कहते हैं, लेकिन वो खुलेआम गिरिराज सिंह के ख़िलाफ़ और अवधेश राय के पक्ष में प्रचार कर रहे है.

बोगो सिंह स्थानीय मीडिया में ये बयान दे रहे है कि गिरिराज सिंह 'हिंदू-मुसलमान में विभाजन' करते हैं, जो बेगूसराय के ख़िलाफ़ है.

बीबीसी ने जब इस संबंध में गिरिराज सिंह से बात की, तो उन्होंने कहा, "जब कांग्रेस हिंदुओं के साथ दोहरी नीति अपनाएगी, सनातनी हिंदू को समाप्त करने की कोशिश करेगी तो गिरिराज जैसे लोग चुप नहीं बैठेंगे."

2019 के चुनाव से क्या कुछ अलग है?

बेगूसराय, गिरिराज सिंह

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लेकिन बेगूसराय लोकसभा में क्या 2019 से कुछ अलग होने वाला है? तब जबकि मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टियाँ इस बार भी बीजेपी और सीपीआई हैं.

साथ ही साल 2024 में साल 2019 के मुक़ाबले समाज ज़्यादा पोलराइज्ड नज़र आता है.

बीते चुनाव में चार लाख से ज़्यादा वोट से हार चुकी सीपीआई अपनी ओर से हरसंभव कोशिश कर रही है.

उम्मीदवार अवधेश राय कहते हैं, "बेगूसराय की जनता सेक्यूलर विचारों की धरती है. पिछली बार हम चुनाव हारे क्योंकि भारत भर से प्रचारक आ गए थे और हमारे स्थानीय कार्यकर्ता (कॉमरेड) पीछे चले गए थे. लोग कंफ्यूज हो गए थे. फिर कन्हैया का बेगूसराय से कोई ताल्लुक तो था नहीं, वो सब दिन जेएनयू रहा. लेकिन इस बार चुनाव स्थानीय कॉमरेड लड़ रहे हैं."

लेकिन अवधेश राय की आशा से इतर गिरिराज सिंह मानते है कि 2024 का चुनाव 'कम्युनिस्टों का दफ़न' करने वाला साबित होगा.

वो कहते हैं, "बेगूसराय अपनी महिलाओं की सूनी मांगे नहीं भूलेगा जो इन कम्युनिस्टों के चलते हुआ. किसान मजदूरों का जीवन इन्हीं कम्युनिस्टों के चलते बर्बाद हो गया."

बेगूसराय: बिहार का लेनिनग्राद

बेगूसराय में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का दफ़्तर

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इमेज कैप्शन, बेगूसराय में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का दफ़्तर

बिहार के बेगूसराय में सीपीआई की मज़बूत स्थिति के चलते इसे बिहार का लेनिनग्राद भी कहा जाता है.

बिहार विधानसभा में सीपीआई के दो विधायक बेगूसराय ज़िले के दो विधानसभा क्षेत्र तेघड़ा और बखरी से ही आते हैं.

कृषि प्रधान बेगूसराय में सात विधानसभा क्षेत्र आते हैं. चेरिया बरियारपुर, बछवाड़ा, तेघड़ा, मटिहानी, साहेबपुर कमाल, बेगूसराय और बखरी.

साल 2014 में यहाँ से बीजेपी के भोला सिंह जीते थे.

साल 2019 में यहाँ लड़ाई त्रिकोणीय थी. राजद ने यहाँ से तनवीर हसन को उम्मीदवार बनाया था.

उस वक़्त कन्हैया दूसरे नंबर पर और तनवीर हसन 2 लाख 68 हज़ार वोट लाकर तीसरे नंबर पर थे.

गिरिराज सिंह ने कन्हैया को 4 लाख 20 हज़ार के बड़े अंतर से हराया था.

अबकी बार क्या बेगूसराय बीजेपी को जीत की हैट्रिक लगाने का मौक़ा देगा या फिर सीपीआई की होगी जीत, ये देखना दिलचस्प होगा.

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