बिहार में बीजेपी और आरजेडी ने मुसलमानों और महिलाओं को कितनी दी है हिस्सेदारी?

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    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से

बिहार में पिछले साल जातिगत जनगणना के आँकड़े सामने आए थे. उसके बाद देश और राज्य में यह पहला बड़ा चुनाव हो रहा है. इस समय हर राजनीतिक दलों के पास मौक़ा था कि लोकसभा चुनाव में हर जाति और समुदाय की आबादी के हिसाब से टिकट बंटवारा कर सके.

यही नहीं पिछले साल ही संसद में महिला आरक्षण विधेयक पारित हुआ था. भले ही यह क़ानून अभी लागू नहीं हुआ है लेकिन राजनीतिक दल स्वेच्छा से टिकट बंटवारे में देश की आधी आबादी को उचित प्रतिनिधित्व दे सकते थे.

पिछले साल बिहार में जातिगत जनगणना के आँकड़े जारी होने के बाद विपक्षी दलों ने ऐसी गणना पूरे देश में कराने की मांग की थी.

विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ने पिछले साल जुलाई में बेंगलुरु की अपनी बैठक में इससे जुड़ा एक प्रस्ताव भी पारित किया था.

जातिगत जनगणना के साथ एक नारा भी लगाया जाता है, “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी.” जातिगत जनगणना का समर्थन करने वाले राजनीतिक दलों का दावा है कि इससे हर जाति, वर्ग को उनकी आबादी के हिसाब से अधिकार और सरकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा.

बिहार में नीतीश कुमार के महागठबंधन से अलग होने के बाद उनका दावा रहा है कि राज्य में जातिगत सर्वे कराने का श्रेय उनको जाता है. जबकि राष्ट्रीय जनता दल इसका श्रेय ख़ुद को देता है.

बिहार में पिछले साल 2 अक्टूबर को जातिगत जनगणना के आँकड़े जारी किए गए थे. उस वक़्त राज्य में महागठबंधन की सरकार थी, जिसमें आरजेडी, जेडीयू, कांग्रेस और वाम दल शामिल थे.

बीजेपी ने बिहार विधानसभा में राज्य में जातिगत सर्वे कराने के मुद्दे पर सरकार का समर्थन किया था. लेकिन मौजूदा लोकसभा चुनावों के लिहाज़ से देखें तो बिहार में कोई भी राजनीतिक दल चुनाव मैदान में जातिगत सर्वे के कथित मक़सद पर चलता नज़र नहीं आता है.

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जातिगत सर्वे बनाम जातिगत समीकरण

NITISH TEJASHWI

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बिहार के चुनावी मैदान में मूल रूप से दो गठबंधनों के बीच मुक़ाबला माना जा रहा है. इनमें एक बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए है, जिसमें बीजेपी, जेडीयू, एलजेपीआर, हम (सेक्युलर) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा शामिल हैं.

जबकि विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ में आरजेडी, काँग्रेस, वीआईपी, सीपीआईएमएल, सीपीआई और सीपीआईएम शामिल हैं. अगर अंतिम समय में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ तो इनमें से ज़्यादातर दलों ने बिहार में अपने हिस्से की लोकसभा सीट पर उम्मीदवार तय कर लिए हैं.

वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, “टिकट बंटवारे में महिला, मुसलमान या कोई जाति नहीं, बल्कि ‘विनिब्लिटी’ यानी उम्मीदवार के जीतने की संभावना देखी जाती है. यही केवल बिहार ही नहीं पूरे देश में होता है. इसलिए बीजेपी ने गुजरात में साल 2019 में 5 लाख वोट से चुनाव जीतने वाली दो महिलाओं के टिकट काट दिए.”

बीजेपी ने इस साल के लोकसभा चुनावों में सूरत से दर्शना जरदोश की जगह मुकेश दलाल को टिकट दिया है. पिछले लोकसभा चुनाव में दर्शना जरदोश क़रीब साढ़े पाँच लाख वोट से जीती थीं, हालाँकि मुकेश दलाल इस बार बिना चुनाव लड़े ही विजेता घोषित हो चुके हैं.

गुजरात की ही वडोदरा सीट से पिछली बार क़रीब 6 लाख वोट से चुनाव जीतने वालीं रंजनबेन भट्ट का टिकट काटकर बीजेपी ने हेमांग जोशी को अपना उम्मीदवार बनाया है.

उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटों में ‘इंडिया’ गठबंधन ने कुर्मी समुदाय से आने वाले 10 उम्मीदवारों को टिकट दिया है. वहीं 5 यादव और 6 मुस्लिम उम्मीदवारों को भी टिकट दिया गया है. यूपी में मुस्लिम-यादव की कुल आबादी क़रीब 30 फ़ीसदी मानी जाती है.

रोहिणी आचार्य सारण लोकसभा सीट से आरजेडी की उम्मीदवार हैं.

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सुरूर अहमद मानते हैं कि जीत की संभावना को देखते हुए ही मीसा भारती और रोहिणी आचार्य चुनाव मैदान में हैं और इसी वजह से ही कोइरी समुदाय को टिकट बंटवारे में बड़ा फ़ायदा हुआ है.

बिहार में एनडीए और इंडिया गठबंधन ने मिलाकर 16 यादवों को जबकि 11 कोइरी को टिकट दिया है.

बिहार के जातिगत जनगणना के आँकड़ों के मुताबिक़ राज्य में यादव आबादी क़रीब 14 फ़ीसदी है जबकि कोइरी (कुशवाहा) आबादी क़रीब 4.2 फ़ीसदी है.

मुस्लिमों की हिस्सेदारी

कार्ड

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र कुमार मानते हैं, “टिकट बंटवारे में कोई भी नया प्रयोग ख़ासकर छोटे क्षेत्रीय राजनीति दलों के लिए आसान नहीं है. इससे उनके कैडर नाराज़ हो सकते हैं और यह जोख़िम भरा फ़ैसला हो सकता है. बीजेपी जैसे बड़ी और संगठन के तौर पर मज़बूत पार्टी ऐसा कर सकती है कि किसी का भी टिकट काट दो, किसी को भी दे दो.”

बिहार में सबसे ज़्यादा सीटों पर विपक्षी गठबंधन की प्रमुख पार्टी राष्ट्रीय जनता दल चुनाव लड़ रही है. आरजेडी राज्य में कुल 23 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. यहाँ उसने दो सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिया है.

आरजेडी ने अररिया से शाहनवाज़ आलम को जबकि मधुबनी से अली अशरफ फ़ातमी को टिकट दिया है.

बिहार में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ में सीटों की साझेदारी में 9 सीटें कांग्रेस के हिस्से में आई हैं. कांग्रेस में इनमें से दो सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिया है.

काँग्रेस ने किशनगंज सीट से अपने मौजूदा सांसद मोहम्मद जावेद को चुनाव मैदान में उतारा है, जबकि कटिहार सीट से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तारिक अनवर एक बार फिर से पार्टी के उम्मीदवार हैं.

बिहार में टिकट बंटवारे में मुस्लिमों को बहुत कम प्रतिनिधित्व मिला है. सांकेतिक तस्वीर

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एनडीए ने बिहार की 40 सीटोंमें केवल एक सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारा है, जबकि ‘इंडिया’ ने 4 मुस्लिमों को अपना उम्मीदवार बनाया है.

पसमांदा मुसलमानों के अधिकारों के लिए लड़ रहे पूर्व पत्रकार और जेडीयू के राज्यसभा सांसद रहे अली अनवर कहते हैं, “बीजेपी को न मुस्लिम वोट देते हैं न बीजेपी उन्हें टिकट देती है. जबकि प्रधानमंत्री ने ख़ुद हैदराबाद, दिल्ली और भोपाल में पार्टी की बैठक में पसमांदा मुसलमानों का मुद्दा उठाया था.”

उनका मानना है कि फ़िलहाल मुद्दा सांप्रदायिक सद्भाव, लोकतंत्र और संविधान को बचाने का है, बाक़ी मुद्दों और बाक़ी दलों से बाद में हिसाब-किताब करेंगे.

बिहार में किशनजंग की सीट पर मुसलमानों की तादाद सबसे ज़्यादा है और यही एकमात्र सीट है जहाँ से जेडीयू ने भी मुस्लिम उम्मीदवार मुजाहिद आलम को चुनाव मैदान में उतारा है.

एनडीए के साझेदार और चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी (रामविलास) बिहार में 5 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन उसने एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया है. हालाँकि साल 2019 में एलजेपी ने खगड़िया सीट पर महबूब अली कैसर को चुनाव मैदान में उतारा था और जीते भी थे.

जातिगत जनगणना के आँकड़े

बिहार में पिछले साल जारी किए गए जातिगत जनगणना के आँकड़ों के मुताबिक़ राज्य में क़रीब 17.7% मुस्लिम आबादी है.

बिहार में हिन्दू सवर्ण जातियों की बात करें तो इनकी आबादी क़रीब 11 फ़ीसदी है. जिसमें ब्राह्मण 3.65%, राजपूत 3.45%, भूमिहार 2.86% और कायस्थ क़रीब 0.6% है.

जातिगत गणना को लेकर बिहार में कई तरह के दावे किए गए थे.

साल 2024 के लोकसभा चुनावों में बिहार में बीजेपी ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है. लेकिन उसने अपने कोटे की 17 में से 10 सीटों पर अगड़ी जाति के उम्मीदवारों को टिकट दिया है. इसमें 5 राजपूत, दो भूमिहार, दो ब्राह्मण, एक कायस्थ शामिल है.

बीजेपी की सूची में एक ख़ास बात और भी है कि उसने इन चुनावों में बिहार में एक भी महिला उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है.

पुष्पेंद्र कुमार के मुताबिक़, “टिकट बंटवारे में छोटे दलों के सामने चुनावी ख़र्च बड़ा मुद्दा होता है. उसे ऐसे उम्मीदवार को टिकट देना होता जो अपने चुनाव का ख़र्च उठा सके और कुछ मौक़ों पर दूसरे उम्मीदवार की भी आर्थिक मदद कर सके. इस लिहाज़ से भी बीजेपी जैसी अमीर पार्टी अपने हिसाब से टिकट बाँट सकती है, छोटे दल नहीं.”

महिला उम्मीदवार

साल 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने शिवहर सीट से रमा देवी को अपना उम्मीदवार बनाया था. इस बार साझेदारी में बीजेपी ने यह सीट जेडीयू को दे दी है.

जबकि पिछले साल ही बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने संसद के दोनों सदनों में महिला आरक्षण विधेयक पारित कराया था.

इस क़ानून के लागू होने के बाद लोकसभा और राज्यों की विधानसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित होंगी.

अली अनवर कहते हैं, “जब महिला आरक्षण क़ानून लागू होगा तभी महिलाओं को उनका अधिकार मिल पाएगा. इसके बिना कोई नहीं मानने वाला है. इसके बावजूद भी आप देखेंगे कि ग्राम पंचायत या स्थानीय चुनावों में महिलाएं आरक्षण के आधार पर खड़ी होती और जीत जाती हैं, लेकिन काम उनके पति करते हैं.”

एनडीए के बाक़ी दलों की बात करें तो जेडीयू ने बाहुबली नेता माने जाने वाले आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद को शिवहर से अपना उम्मीदवार बनाया है, जबकि सिवान से विजय लक्ष्मी कुशवाहा को जेडीयू ने टिकट दिया है.

पटना वीमेंस कॉलेज की छात्रा शशिकला कहती हैं, "इस बार महिलाओं को आरक्षण नहीं मिला लेकिन अगली बार मिल जाएगा. असल में एक महिला ही महिलाओं को बेहतर तरीके समझ सकती है. चाहे वो महिलाओं की सुरक्षा का मामला हो या उनकी शिक्षा का. हर क्षेत्र में महिलाओं का आगे आना ज़रूरी है."

महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बाद बीजेपी समर्थकों ने पूरे देश में जश्न मनाया था.

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अली अनवर कहते हैं, "महिलाओं को टिकट देने की बात तो छोड़ दीजिए. महिला पहलवानों के साथ जो हुआ, मणिपुर में महिलाओं के साथ जो हुआ और अब कर्नाटक में जो कुछ हुआ है, वह ज़्यादा बड़ा मुद्दा है."

महिलाओं को टिकट देने के मामले में एलजेपी (आर) जैसी छोटी पार्टी भी बीजेपी से आगे दिखती है. उसने वीणा देवी को एक बार फिर से वैशाली से चुनाव मैदान में उतारा है, जबकि शांभवी चौधरी को समस्तीपुर से अपना उम्मीदवार बनाया है.

पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, “सभी राजनीतिक दलों में पुरुषों का वर्चस्व है और इसमें बीजेपी सबसे आगे है. अगर उसे महिलाओं को आरक्षण देना था तो इसे अभी से लागू क्यों नहीं किया गया? यह केवल महिलाओं का वोट लेने की राजनीति थी. बीजेपी असल में महिलाओं को उसका अधिकार देना नहीं चाहती थी. उसने इसे भविष्य के लिए छोड़ दिया है कि जो आएगा वो देखेगा.”

लोकसभा चुनावों में महिलाओं को अवसर देने के मामले में राज्य में आरजेडी सबसे आगे दिखती है.

आरजेडी ने कुल 6 महिला उम्मीदवारों को इस बार लोकसभा का टिकट दिया है. हालाँकि पाटलिपुत्र सीट से मीसा भारती और सारण सीट से खड़ी रोहिणी आचार्य आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव की बेटियाँ हैं.

इसके अलावा आरजेडी ने पूर्णिया से बीमा भारती, जमुई से अर्चना रविदास, मुंगेर से अनीता देवी और शिवहर से ऋतु जायसवाल को अपना उम्मीदवार बनाया है.

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