बृजमोहन अग्रवाल: बीजेपी के वो नेता जिनके समर्थकों ने कभी मोदी के सामने किया था हंगामा

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- Author, आलोक पुतुल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, रायपुर से
यह 1988 का किस्सा है. तब छत्तीसगढ़ अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा था और तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह रायपुर के दौरे पर थे.
तब 320 सीटों वाली विधानसभा में 250 सीटें कांग्रेस पार्टी के पास थीं और भारतीय जनता पार्टी के पास महज 58 सीटें थीं.
मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह का काफ़िला जब शहर के मालवीय रोड से गुजर रहा था, उसी समय एक दुकान की सीढ़ियों पर बैठे नौजवानों में से एक ने काला कपड़ा निकाला और मुख्यमंत्री की तरफ़ उछाल दिया था.
कांग्रेस पार्टी के एक पुराने नेता कहते हैं, ''पुलिस ने विरोध करने वालों पर लाठीचार्ज किया और उन्हें हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया. मुझे लगता है कि यह लाठी कांग्रेस को भारी पड़ गई.''
मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की ओर काला कपड़ा फेंकने और लाठी चार्ज में घायल होने वाले उस युवक का नाम बृजमोहन अग्रवाल था.
इस घटना के दो साल बाद 31 साल के बृजमोहन अग्रवाल को भारतीय जनता पार्टी ने रायपुर शहर से अपना उम्मीदवार बनाया और अपने पहले ही चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के दस सालों से विधायक स्वरूपचंद जैन को हरा कर अपनी चुनावी राजनीति की शुरुआत की.
तब से यानी पिछले 33 सालों से बृजमोहन अग्रवाल लगातार रायपुर के विधायक बने हुए हैं. वर्तमान में वो रायपुर दक्षिण से विधायक और राज्य सरकार में मंत्री हैं.
बृजमोहन अग्रवाल 33 साल से हैं विधायक

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अब तक आठ बार के विधायक और पांच बार के मंत्री रहे बृजमोहन अग्रवाल को भारतीय जनता पार्टी ने ताज़ा चुनाव में रायपुर लोकसभा से उम्मीदवार बनाया है.
उनके विरुद्ध कांग्रेस पार्टी ने पूर्व विधायक विकास उपाध्याय को मैदान में उतारा है. कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार में रायपुर पश्चिम से विधायक और संसदीय सचिव रह चुके विकास उपाध्याय को पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था.
49 साल के विकास उपाध्याय कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय सचिव तो हैं ही, युवाओं के बीच उनकी अच्छी पैठ मानी जाती है. सामाजिक और धार्मिक आयोजनों में उनकी सक्रियता हमेशा चर्चा में रही है.
विकास उपाध्याय लोकसभा चुनाव मैदान में खूब पसीना बहा रहे हैं.
विधानसभा चुनाव में बृजमोहन अग्रवाल के ख़िलाफ़ हर बार नया प्रत्याशी खड़ा करने वाली कांग्रेस पार्टी के कई नेता मानते हैं कि लोकसभा चुनाव में पहली बार उतरे बृजमोहन अग्रवाल के ख़िलाफ़ कांग्रेस के पास विकास उपाध्याय से बेहतर कोई विकल्प नहीं था.
हालांकि कांग्रेस का ही एक धड़ा मान कर चल रहा है कि बृजमोहन अग्रवाल के चुनाव प्रबंधन को तोड़ना बहुत आसान नहीं होगा.
यह दिलचस्प है कि चुनाव मैदान के अजेय योद्धा कहे जाने वाले बृजमोहन अग्रवाल के समर्थक तो जी-जान से चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं लेकिन अगर आप उन्हें कुरेद कर पूछें तो वो बिल्कुल भी नहीं चाहते कि बृजमोहन अग्रवाल केंद्र की राजनीति में जाएं.
वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध कहते हैं, ''यह तो बहुत साफ़ है कि भाजपा उन्हें छत्तीसगढ़ की राजनीति से बाहर करके राष्ट्रीय राजनीति में लाना चाहती है. ऐसी कोशिशें पहले भी हुई हैं लेकिन अब जाकर वो केंद्र की राजनीति के मैदान में उतरे हैं.''
छात्र राजनीति से सत्ता की राजनीति का सफर
1990 में रायपुर शहर से बृजमोहन अग्रवाल ने जीत दर्ज की और पहली ही बार में उन्हें मध्य प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री बनाया गया.
इसके बाद उन्होंने कभी पलट कर नहीं देखा. 1990 से वो रायपुर से चुनाव लड़ते रहे और 2023 के ताज़ा विधानसभा चुनाव में तो रिकॉर्ड 67,719 मतों के अंतर से जीते थे.
बृजमोहन अग्रवाल की व्यवहार कुशलता और राजनीति के तौर-तरीकों ने पिछले चार दशकों से उनकी छवि 'यारों का यार' जैसी बना कर रखी है. माना जाता है कि हर राजनीतिक दल में उनके 'करीबी लोग' हैं.
लेकिन इतनी लोकप्रियता के बाद भी वे महज मंत्री क्यों बने रहे?
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने बीबीसी से कहा, ''रमन सिंह के कार्यकाल में उन्होंने कई दफा मुख्यमंत्री बनने की कोशिश की. साथी मंत्री-विधायकों के साथ रायपुर से लेकर दिल्ली तक की दौड़ लगाई. लेकिन बात बनी नहीं. उलटा रमन सिंह के ख़िलाफ़ बगावत की बात रायपुर से लेकर दिल्ली तक फैल गई.''
''यही कारण है कि तब के मुख्यमंत्री रमन सिंह के साथ भी उनके रिश्ते खटास भरे रहे. संकट ये है कि बृजमोहन अग्रवाल को इग्नोर नहीं किया जा सकता था, इसलिए वे मंत्री बने रहे अन्यथा कोई और होता तो अब तक उसे हाशिये पर डाल दिया गया होता.''
बृजमोहन अग्रवाल भी बड़ी बेबाकी से यह स्वीकार करते रहे हैं कि रमन सिंह के साथ उनके मतभेद रहे हैं लेकिन वे यह भी कहना नहीं भूलते कि उनसे मनभेद कभी नहीं रहा.
अग्रवाल समर्थकों का बवाल

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हालांकि दिवाकर मुक्तिबोध, बृजमोहन अग्रवाल के पीछे रह जाने के लिए एकात्म परिसर कांड को भी जिम्मेदार मानते हैं. क्या थी ये घटना?
साल 2000 में, छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बने डेढ़ महीने भी नहीं हुए थे. राज्य में कांग्रेस पार्टी के अजीत जोगी मुख्यमंत्री थे. दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी, विधानसभा में अपने नेता प्रतिपक्ष के चयन की तैयारी में जुटी हुई थी.
13 दिसंबर को रायपुर के रजबंधा तालाब के एक हिस्से पर बने भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय, एकात्म परिसर में भारी गहमागहमी थी.
बृजमोहन अग्रवाल का दावा था कि भाजपा के 36 में से अधिकांश विधायकों का समर्थन उन्हें हासिल है. उनके सैकड़ों समर्थक माला-मिठाई और ढोल-नगाड़ों के साथ एकात्म परिसर के बाहर जश्न मनाने के लिए उपस्थित थे.
लेकिन जिस कमरे में नेता प्रतिपक्ष के चयन की बैठक चल रही थी, वहां बीजेपी के तत्कालीन केंद्रीय पर्यवेक्षक नरेंद्र मोदी के इशारे पर बृजमोहन अग्रवाल को ही नेता प्रतिपक्ष पद के लिए आदिवासी विधायक नंद कुमार साय के नाम का प्रस्ताव रखना पड़ा.
इस तरह नंद कुमार साय छत्तीसगढ़ विधानसभा के पहले नेता प्रतिपक्ष चुन लिए गए.
नंद कुमार साय के नेता प्रतिपक्ष चुने जाने की ख़बर जैसे ही कमरे से बाहर आई एकात्म परिसर के बाहर उपस्थित बृजमोहन अग्रवाल समर्थक कार्यकर्ताओं का गुस्सा फूट पड़ा.
बृजमोहन अग्रवाल भी इन कार्यकर्ताओं को संभाल नहीं पाए और कार्यकर्ताओं ने पार्टी कार्यालय में तोड़फोड़ मचाना शुरू कर दिया.
घटना के अगले दिन स्थानीय अख़बारों की सबसे बड़ी सुर्खी, यही घटना थी. जिस एकात्म परिसर में यह घटना हुई, उसके आसपास ही राज्य के प्रमुख अख़बारों के दफ़्तर हैं.
एकात्म परिसर के पास एक खाली ज़मीन का टुकड़ा है और उसी से लगा हुआ ‘नवभारत’ अख़बार का कार्यालय है.

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14 दिसंबर को दैनिक ‘नवभारत’ ने इसे अपनी सबसे प्रमुख ख़बर तो बनाया ही, अंदर के पन्नों पर भी कई ख़बरें छापीं.
अख़बार ने लिखा, ''भाजपा कार्यालय की खिड़की, दरवाजे के शीशे, टेबल, कुर्सियां, फोन, बिजली के बल्ब, ट्यूब लाइट भी तोड़फोड़ दिये गये... प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक बृजमोहन समर्थक कार्यालय छोड़ने के पहले एक कमरे में दरवाजे को धक्का देकर घुस गए थे और वहां संगठन के पदाधिकारियों से हाथापाई भी की."
"इस दौरान एक अन्य कमरे को बंद कर दिया गया था, जिसमें पर्यवेक्षक नरेंद्र मोदी, भाजपा नेता लखीराम अग्रवाल और नवनिर्वाचित नेता प्रतिपक्ष नंदकुमार साय मौजूद थे.''
अख़बार ने बीजेपी के पर्यवेक्षक नरेंद्र मोदी के हवाले से एक अन्य ख़बर में लिखा, “...नरेंद्र मोदी ने आज यहां भाजपा कार्यालय में हुई तोड़फोड़ की घटना को शर्मनाक बताते हुए रायपुर की इकाई एवं छत्तीसगढ़ के नेताओं को जांच कर रिपोर्ट भेजने कहा है."
"रिपोर्ट राष्ट्रीय अध्यक्ष को प्रेषित की जायेगी.…उन्होंने स्वीकार किया कि ऐसी घटनाओं से पार्टी की छवि खराब होती है.''
हंगामे के बाद कई बीजेपी नेता हुए थे निलंबित

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‘नवभारत’ के संपादक राजेश जोशी उस दिन की घटना को याद कर बताते हैं, “बैठक के बाद बृजमोहन अग्रवाल भाजपा दफ़्तर से निकल ही रहे थे कि साय के चयन से बिफरे उनके समर्थकों ने उपद्रव शुरू कर दिया."
वे बताते हैं, "भाजपा कार्यालय की ऊपरी मंजिल पर बवाल मचता देख खुद बृजमोहन वापस भाजपा दफ्तर लौटे और कई लोगों को वहां से खदेड़ा, लेकिन उनके भाजपा के दफ़्तर से निकलते ही फिर उपद्रव शुरू हो गया.”
'टाइम्स ऑफ इंडिया' ने 'रायपुर बीजेपी एमएलएस मैन ऑन द रैम्पेज' शीर्षक से इस घटना पर लिखा, "साय और अन्य को गंदी-गंदी गालियां दी गईं, पार्टी के केंद्रीय पर्यवेक्षक नरेंद्र मोदी के साथ धक्का-मुक्की की गई, जबकि विधायक अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागे."
इस घटना के 48 घंटे के भीतर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण के निर्देश पर विधायक बृजमोहन अग्रवाल और पूर्व मंत्री प्रेम प्रकाश पांडेय समेत आठ भाजपा नेताओं को पार्टी से निलंबित कर दिया गया.
साथ ही इन नेताओं को पार्टी से निष्कासित करने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी भी जारी किया गया था.
दिवाकर मुक्तिबोध का मानना है कि एकात्म परिसर में जो घटना घटित हुई थी, उससे बृजमोहन अग्रवाल को काफी नुकसान हुआ.
वे कहते हैं कि रमन सिंह ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में उन्हें पूरी तरह से हाशिये पर रखा. हालांकि वे अभी भी विष्णुदेव साय की सरकार के ट्रबल शूटर और सबसे अनुभवी नेता भी हैं.
दिवाकर कहते हैं, “उस वक्त नरेंद्र मोदी के साथ जो हुआ उसका कोई चश्मदीद तो नहीं है. अलबत्ता यह जरूर कहा जाता है कि अग्रवाल समर्थक भीड़ से बचने के लिए उन्हें छिपना पड़ा. इस घटना को उन्होंने उस वक्त बहुत गंभीरता से लिया.''
भ्रष्टाचार के आरोप

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हालांकि कांग्रेस नेता और 2018 में बृजमोहन अग्रवाल के ख़िलाफ़ रायपुर से विधानसभा चुनाव लड़ चुके कन्हैया अग्रवाल का मानना है कि बृजमोहन अग्रवाल गढ़ी हुई छवि का लाभ उठाते रहे हैं और छवि प्रबंधन ही उन्हें जीत दिलाता रहा है.
कन्हैया अग्रवाल कहते हैं, “पिछले 33 सालों से वो रायपुर के विधायक हैं लेकिन मैं दावा कर सकता हूं कि पूरे राज्य में अपने विधानसभा के प्रति उनसे अधिक उदासीन और निष्क्रिय विधायक कोई दूसरा नहीं होगा. इन 33 सालों की उनकी उपलब्धियां क्या हैं, यह कोई नहीं बताता.”
कन्हैया अग्रवाल उन पर भ्रष्टाचार के भी गंभीर आरोप लगाते हैं.
बृजमोहन अग्रवाल पर आरोप है कि अपने पारिवारिक व्यवसाय को बढ़ाने के लिए उन्होंने सत्ता का सहारा लिया.
उनके ख़िलाफ़ कई गंभीर आरोप भी लगे. कहीं उनके परिजनों द्वारा सड़क की ज़मीन पर कब्ज़ा करने का आरोप लगा तो कहीं कई एकड़ वन विभाग की ज़मीन पर.
छत्तीसगढ़ के इंदिरा प्रियदर्शिनी बैंक घोटाले में बृजमोहन अग्रवाल के मंत्री रहते 2007 में इस बैंक के प्रबंधक उमेश सिन्हा की जब नार्को जांच कराई गई तो उसने नार्को जांच में तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह समेत जिन लोगों को करोड़ों की रकम देने की बात कही, उनमें बृजमोहन अग्रवाल भी शामिल थे.
हालांकि वे इन आरोपों में अपनी संलिप्तता से इनकार करते रहे हैं.
2017 में कई एकड़ सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा करके उस पर रिजॉर्ट बनाने का मामला महीनों तक सुर्खियों में रहा.
महासमुंद ज़िले की जलकी में यह रिसॉर्ट तब के कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की पत्नी और बेटे के नाम पर था.
इस रिजॉर्ट में सरकारी जंगल के साथ-साथ आदिवासियों की ज़मीन और दान में दी गई ज़मीन पर भी कब्ज़ा कर लिया गया था. इसकी जांच हुई और जांच में आरोप सही भी पाए गए.
फसल बीमा के नाम पर करोड़ों रुपये के हेर-फेर में भी बृजमोहन अग्रवाल का नाम उछला. लेकिन बृजमोहन अग्रवाल इन सारे आरोपों को राजनीतिक षडयंत्र करार देते रहे हैं.
बृजमोहन अग्रवाल ख़ुद बताते हैं कि उनके ख़िलाफ़ 60 मुकदमे हुए हैं और वो लगभग 30 बार जेल जा चुके हैं, लेकिन ये सारे के सारे मुकदमे राजनीतिक कारणों से हुए हैं.
कांग्रेस की चुप्पी

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यह भी दिलचस्प है कि विपक्ष में रहने वाली कांग्रेस, इंदिरा प्रियदर्शिनी बैंक घोटाला या जलकी रिसॉर्ट घोटाला जैसे मुद्दे पर महीनों हंगामा करती रही.
फसल बीमा घोटाले पर भी कांग्रेस सक्रिय रही, लेकिन पांच साल सत्ता में रहते हुए, कांग्रेस सरकार इस पूरे मसले पर चुप्पी साधे बैठी रही.
यहां तक कि 2018 में भाजपा की सरकार जाने के बाद भूपेश बघेल सरकार ने बृजमोहन अग्रवाल का बंगला, अपने मंत्री को आवंटित कर दिया.
लेकिन बृजमोहन अग्रवाल ने वह बंगला कभी खाली ही नहीं किया. भूपेश बघेल सरकार के मंत्री को दूसरी जगह जाना पड़ा. इसे भूपेश बघेल और बृजमोहन अग्रवाल के करीबी रिश्ते से जोड़ा जाता है.
बहरहाल लोकसभा चुनाव मैदान में उतरे बृजमोहन अग्रवाल को लेकर भाजपा में कई लोग मानते हैं कि नरेंद्र मोदी लोकसभा में कद्दावर और दमदार वक्ताओं को संसद में लाना चाहते हैं.
संभव है, बृजमोहन अग्रवाल को मंत्री भी बनाया जाए. वहीं भाजपा का एक धड़ा इस बात से ख़ुश है कि छत्तीसगढ़ भाजपा को उनके राजनीतिक वर्चस्व से मुक्ति मिलेगी.
लेकिन बृजमोहन अग्रवाल कहते हैं, “बृजमोहन अग्रवाल दिल्ली से भी छत्तीसगढ़ को देखेंगे.”
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