मुख़्तार अंसारी: क्या है उनके परिवार का राजनीतिक मॉडल जो लगातार दिलाता रहा है चुनावी जीत

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- Author, अनंत झणाणें
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मुख़्तार अंसारी की मौत ने उनके परिवार के राजनीतिक प्रभाव और भविष्य पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं.
जहाँ ग़ाज़ीपुर लोकसभा सीट से उनके बड़े भाई अफ़ज़ाल अंसारी समाजवादी पार्टी के टिकट से चुनावी मैदान में हैं, लेकिन उनके प्रभाव की दो सीटें मऊ और ग़ाज़ीपुर से अब तक बीजेपी ने किसी उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अंसारी परिवार के दो युवा चेहरे सुहैब अंसारी और अब्बास अंसारी विधायक हैं और उनके चाचा अफ़ज़ाल अंसारी लोकसभा सांसद हैं.
मुख़्तार अंसारी के दादा डॉक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी देश की आज़ादी के संघर्ष में गांधी जी का साथ देने वाले नेता के रूप में जाने जाते हैं और 1926-27 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे थे.
उनके नाना ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान 1947 की लड़ाई में मोर्चे पर मारे गए थे जिसके लिए उन्हें महावीर चक्र से नवाज़ा गया था.
ग़ाज़ीपुर में साफ़-सुथरी छवि रखने वाले और कम्युनिस्ट बैकग्राउंड से आने वाले मुख़्तार के पिता सुब्हानुल्लाह अंसारी स्थानीय राजनीति में सक्रिय थे.
तो ऐसी विरासत वाले अंसारी परिवार की राजनीति की बुनियाद क्या है और मुख़्तार अंसारी के निधन के बाद उसका क्या भविष्य है?
कम्युनिस्ट पार्टी से हुई शुरुआत

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अंसारी परिवार की राजनीति को दशकों से क़रीब से देखते आ रहे वरिष्ठ पत्रकार पवन सिंह कहते हैं कि अंसारी परिवार का समकालीन पॉलिटिकल करियर अफ़ज़ाल अंसारी के साथ शुरू होता है.
पवन सिंह कहते हैं कि, "कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के ग़ाज़ीपुर से 1967 और 1971 में सांसद रह चुके सरजू पांडेय के सहारे अफ़ज़ाल अंसारी पहली बार मोहम्मदाबाद से विधायक बने और अफ़ज़ाल की उनके शिष्य के रूप में पहचान थी."
"अफ़ज़ाल ने पहला चुनाव मुहम्मदाबाद विधानसभा की सीट से 1985 में जीता था. आज से 40 साल पहले अफ़ज़ाल अंसारी की एक कॉमरेड वाले छवि थी और उस समय मुख़्तार का बाहुबल का कोई फैक्टर नहीं था."
पवन सिंह कहते हैं, "जब अफ़ज़ाल पहली बार विधायक बने तभी मुख़्तार की क्रिमिनल गतिविधियों की शुरुआत हुई और उन पर हत्या का पहला मुक़दमा 1986 में परिवार के गढ़ मोहम्मदाबाद के थाने में दर्ज हुआ. जैसे-जैसे मुख़्तार के अपराध का दायरा बढ़ता गया, वैसे ही परिवार के राजनीतिक प्रभाव का फैलाव बढ़ता गया."
मुख़्तार का बढ़ता आपराधिक ग्राफ़

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ग़ाजीपुर ज़िले के मोहम्मदाबाद थाने में दर्ज आपराधिक रिकॉर्ड के अनुसार, मुख़्तार अंसारी पर कुल 65 मुक़दमे चल रहे थे. उन पर मकोका (महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ़ ऑर्गनाइज्ड क्राइम ऐक्ट) और गैंगस्टर ऐक्ट के तहत भी मामले दर्ज थे.
साल 2005 में बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी और कृष्णानंद के साथ कुल छह और लोग भी गाड़ी में थे. गाड़ी पर तक़रीबन 500 गोलियां चलाई गई थीं, जिस दौरान सभी सातों लोग मारे गए थे.
मुख़्तार अंसारी को बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय हत्या मामले में 10 साल की सज़ा सुनाई गई थी.
पत्रकार पवन सिंह कहते हैं, "मुख़्तार अंसारी को अपराधों से ही पहचान मिली. अंसारी परिवार की पहली पहचान सिर्फ़ पॉलिटिकल पहचान थी. लेकिन मुख़्तार के खिलाफ मुकदमे और बड़ी संगीन वारदातों में नाम आने लगे."
"साल 1997 में जब वीएचपी नेता नंद किशोर रूंगटा की हत्या के मामले में मुख़्तार का नाम आया तो उसमें सीबीआई जांच के आदेश हुए. उस मामले में दो अभियुक्त और मुख़्तार अंसारी के सहयोगियों की आज तक गिरफ्तारी नहीं हो पाई है."
"भाजपा नेता कृष्णानंद राय हत्याकांड में मुख़्तार पर भाई अफ़ज़ाल अंसारी की चुनावी हार का बदला लेने का आरोप था. तो इन हत्याओं का इस्तेमाल राजनीतिक रूप से भी हुआ और इन बड़े लोगों की हत्याओं में नाम आने के बाद एक तबके में उनकी रॉबिनहुड वाली छवि भी बनी."
राजनीति में एंट्री

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मुख़्तार अंसारी ने अपना पहला विधानसभा चुनाव 1993 में सीपीआई के टिकट पर ग़ाज़ीपुर सदर सीट से लड़ा और बहुत कम मार्जिन से हारे. फिर अफ़ज़ाल अंसारी सीपीआई छोड़ सपा में शामिल हुए.
पत्रकार पवन सिंह कहते हैं, "बसपा ने मुख़्तार अंसारी को घोसी लोकसभा सीट से पहली बार सांसदी का चुनाव लड़ाया, और उन्होंने कांग्रेस के कल्पनाथ राय को कड़ी टक्कर दी. लेकिन मुख़्तार फिर भी काफी कम मार्जिन से हारे. 1996 में मुख़्तार ने मऊ विधानसभा से बसपा के टिकट पर अपना पहला चुनाव जीता और इस तरीके से मऊ उनकी कर्मभूमि बनी."
अंसारी परिवार के प्रभाव का दायरा समझाते हुए पत्रकार पवन सिंह कहते हैं, "आप परिवार का असर मऊ, ग़ाज़ीपुर, चंदौली के कुछ हिस्से, आज़मगढ़ के कुछ हिस्से में देख सकते हैं. 2009 में जब मुख़्तार अंसारी ने वाराणसी में भाजपा के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी के खिलाफ चुनाव लड़ा तो जोशी महज़ 17,000 वोटों से जीत पाए."
'ग़रीबों के मसीहा' की छवि के पीछे वजह

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उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार उमर रशीद कहते हैं कि पूर्वांचल की राजनीति में आपराधिक छवि के बाहुबली नेताओं का अपनी पैठ जमाकर चुनाव जीतना आम बात है.
उमर कहते हैं कि, "बाहुबली नेता के बारे में अकसर ऐसी सोच हो जाती है कि वो नेता हमारे मुद्दों के लिए लड़ाई लड़ रहा है और इसी वजह से उसके ख़िलाफ़ इतने मुक़दमे दर्ज हैं. तो भूमिहारों में, ठाकुरों में, ब्राह्मणों में और कुछ मुसलमानों में ऐसे बाहुबली नेताओं के उदाहरण हैं जैसे अतीक़ अहमद, मुख़्तार अंसारी, राजा भैया, धनंजय सिंह, रमाकांत यादव, बृजेश सिंह, हरिशंकर तिवारी. यह सभी पूर्वांचल की पिछले 30 से 40 सालों की राजनीति पर अपना प्रभाव डालते रहे हैं."
मुख़्तार अंसारी के जनाज़े में हमारी मुलाकात अजय यादव से हुई. वो पास ही के नगवां गांव से आए थे जो अंसारी परिवार की 'छावनी' हुआ करती थी.
एक बार गंगा में बाढ़ की वजह से तीन चार गाँव कट गए और अजय यादव दावा करते हैं कि अंसारी परिवार ने बिना पैसे के इन गाँवों को फिर से बसाने के लिए अपनी ज़मीन दे दी.
वो कहते हैं, "जब से मुख़्तार अंसारी की मौत की खबर आई है, तब से हमारे गाँव में भोजन नहीं बन रहा है. सारे लोग मायूस हैं. यह ऐसे व्यक्तित्व के लोग हैं."

इसे समझाते हुए ओमर रशीद कहते हैं, "मुख़्तार अंसारी के ख़िलाफ़ राजनीति करने वाले लोग भी सिर्फ उनके आपराधिक रिकॉर्ड का इस्तेमाल कर उन पर निशाना साधते हैं और उन्हें हिंदू विरोधी बताने से बचते हैं."
"कम्युनिस्ट पार्टी से राजनीति करते वक्त ये परिवार ठाकुर, ब्राह्मण और भूमिहार बिरादरियों के बाहुबलियों को सीधे टक्कर देते दिखा जिससे इस परिवार से लोगों की सहानुभूति बनती गई. इन कारणों की वजह से गरीब, दलित और पिछड़ी जाति के हिंदू अंसारी परिवार को एक मसीहा के रूप में देखते हैं."
उमर बताते हैं कि ग़ाज़ीपुर में मुस्लिम आबादी महज़ 10 प्रतिशत है, इस तरीके से अंसारी परिवार ने हिंदू बनाम मुस्लिम राजनीति के मॉडल को तोड़ कर अपनी अलग पहचान बनाई.
उनके मुताबिक़ अंसारी परिवार के संरक्षण का जो नेटवर्क था वो एक जाति या धर्म के परे था.
उधर, पत्रकार पवन सिंह कहते हैं कि, "चाहे अतीक़ अहमद हो, शहाबुद्दीन हो, या मुख़्तार अंसारी हो, यह साफ़ दिखाता है कि उनके अधिकतर समर्थकों को कोई बहुत आदर्शवादी नेता नहीं चाहिए. वो एक दबंग नेता पसंद करते हैं."
लेकिन उमर रशीद मानते हैं कि बीजेपी जब भी सत्ता में आती है तो वो अपनी राजनीति को मज़बूत करने के लिए मुस्लिम बाहुबली नेताओं के अपराधों के उदाहरणों को प्रमुखता से दर्शाती है. और पिछले पांच से छह सालों में हमने मुख़्तार अंसारी और अतीक़ अहमद के ज़रिए यही होते देखा है.
"दूसरी ओर राजा भैया जैसे बाहुबली नेता हैं जो मायावती सरकार के शासनकाल में जेल में थे, उनके आज दो विधायक हैं और वो भाजपा का समर्थन करते हैं. वहीं, मुख़्तार विरोधी बाहुबली नेता बृजेश सिंह जैसे नेता हैं जो वाराणसी की सेंट्रल जेल में रहते हुए 2022 में वाराणसी से अपनी पत्नी अन्नपूर्णा सिंह को एमएलसी का चुनाव जितवा देते हैं."
ओम प्रकाश राजभर और मुख़्तार अंसारी के रिश्ते

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मुख़्तार अंसारी के निधन पर योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष का बयान आया कि, "जिन गरीबों की उन्होंने (मुख़्तार अंसारी ने) मदद की, उनके सुख दुख में काम किए, वो गरीब उनको अपना मसीहा मानता है."
"जब कौमी एकता दल बना तब मैं उनके साथ था और तब हम मिल कर चुनाव लड़े. फिर हम समाजवादी पार्टी के साथ गए, और एक बार फिर उनके साथ मिल कर चुनाव लड़ा. घटना दुखद है, ईश्वर के आगे किसी की चलती नहीं है."
अंसारी परिवार के ग़ैर मुसलमान वोटरों में पहचान को पत्रकार उमर रशीद अपने अनुभव से समझते हुए कहते हैं कि, "2017 में जब मैं मुख़्तार के बड़े बेटे अब्बास अंसारी का घोसी विधान सभा में कैंपेन कवर कर रहा था तब मैंने राजभर बाहुल्य गाँव में अंसारी परिवार के बारे में पूछा तो लोगों ने कहा कि बिजली जाने से लेकर, विवाद सुलझाने तक सारी समस्याओं का समाधान करने के लिए इस परिवार ने अपना सिस्टम बैठा रखा है."
"और क्योंकि वहां पर पिछड़े वर्ग की संख्या ज़्यादा है तो लोगों को एक ताकतवर राजनीतिक परिवार से जुड़ना फायदेमंद नज़र आता है. और वही वफ़ादारी की शक्ल ले लेता है."
उमर रशीद मानते हैं कि अंसारी परिवार ने राजभर जैसी पिछड़ी बिरादरी के नेता ओम प्रकाश राजभर को हर किस्म का सपोर्ट देने से लेकर शुरुआती दौर में उनके साथ काम किया.
उमर कहते हैं, "मैंने सुना है कि मुख़्तार अंसारी के बेटे अब्बास अंसारी ओम प्रकाश राजभर को चाचा कहकर बुलाते थे. जब 2022 में ओम प्रकाश राजभर अखिलेश यादव के साथ मिल कर चुनाव लड़ रहे थे तब उनके पक्ष में मुस्लिम ओबीसी गोलबंदी अच्छी हुई थी और तब भाजपा ग़ाज़ीपुर ज़िले में एक भी सीट नहीं जीत पाई थी."
अंत में उमर कहते हैं, "मुख़्तार अंसारी ने ओम प्रकाश राजभर की उनकी ज़िंदगी में कितनी मदद की वो तो राजभर ही बता सकते हैं. लेकिन जो दिखता है और जैसे उन्होंने साथ में राजनीति की उस आधार पर कह सकते हैं की वो काफी करीब थे."
अंसारी परिवार का राजनीतिक भविष्य

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उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार पवन सिंह कहते हैं कि लगभग दो दशक जेल में गुज़ार चुके मुख़्तार अंसारी को कहीं न कहीं आभास था कि उन्हें मुक़दमों में सज़ा होने वाली है तो उन्होंने अपने आप को राजनीति में पीछे कर लिया था और अगली पीढ़ी को मौके मिलने शुरू हो गए.
मुख़्तार अंसारी ने अपने बेटे अब्बास अंसारी को अपनी सीट मऊ से विधायक बनने का मौका दिया.
अब मुख़्तार की मौत के बाद उनके छोटे बेटे उमर अंसारी भी पूरी तरह मीडिया के सामने आ चुके हैं.
पवन सिंह कहते हैं, "उमर के ताज़ा बयानों से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वो राजनीति में काफी तेज़ हैं."
पवन सिंह मानते हैं कि सबसे बड़े भाई सिबगतुल्लाह अंसारी के बेटे सुहैब अंसारी जो मोहम्मदाबाद से विधायक हैं और मुख़्तार अंसारी के बड़े बेटे अब्बास अंसारी और छोटे बेटे उमर अंसारी, यह नई पीढ़ी अब खानदान की कमान सँभालने के लिए तैयार है.
क्या 2024 के चुनाव में मिलेगी सहानुभूति?

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पत्रकार उमर रशीद मानते हैं कि मऊ और घोसी विधानसभा सीट ऐसी दो सीटें हैं जहाँ अंसारी परिवार का सीधा प्रभाव पड़ता है.
वो कहते हैं, "जिन परिस्थितियों में मुख़्तार अंसारी की मौत हुई और उससे जुड़े सवाल अब भी बने हुए हैं. सोशल मीडिया के ज़माने में आम लोगों की राय भी छिपी नहीं है. तो उस वजह से उनके समर्थकों में सहानुभूति रहेगी."
"मुझे लगता है कि मुख़्तार अंसारी की मौत से अंसारी परिवार को एक नया राजनीतिक जीवन मिल सकता है. लेकिन यह लोकसभा का चुनाव है, लोग देश का प्रधानमंत्री चुनने के लिए वोट देंगे, तो ये सहानुभूति की लहरें कितनी बड़ी होंगी और उसके चुनाव जिताने की क्षमता को देखना होगा."
लेकिन हमें मुख़्तार अंसारी की मौत और उसके उभरते काउंटर नैरेटिव को समझने की भी कोशिश करनी पड़ेगी.
उत्तर प्रदेश में हाल ही में संपन्न हुए राज्य सभा चुनावों में समाजवादी पार्टी की बाग़ी विधायक पूजा पाल ने भाजपा के उम्मीदवार के लिए क्रॉस वोटिंग करने के बाद कहा कि योगी सरकार को अपना एक वोट देकर एक बहन अपने भाई को धन्यवाद कर रही .

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आपको बता दें कि 2023 में बाहुबली नेता और 100 से अधिक मामलों में अपराधी अतीक़ अहमद और उनके भाई अशरफ की लाइव टीवी पर तीन लोगों ने गोली मार कर हत्या कर दी थी.
अतीक़ पूजा पाल के पति राजू पाल की हत्या के मुख्य अभियुक्त थे.
और जब मुख़्तार अंसारी के मौत हुई तो पूर्व भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की पत्नी अलका राय ने कहा कि, "योगी जी का आशीर्वाद मिला है."
मुख़्तार अंसारी पर जेल मे रहते हुए भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या करवाने का आरोप था.
पत्रकार उमर रशीद कहते हैं, "एक तरफ उत्तर प्रदेश सरकार औपचारिक तौर पर कह रही है कि अतीक़ और अशरफ़ दोनों की तीन लोगों द्वारा हत्याएं की गईं और मुख़्तार अंसारी की हार्ट अटैक से मौत हुई, और दूसरी और इन दोनों बाहुबलियों के विरोधी योगी सरकार का धन्यवाद कर रहे हैं और राज्य सभा चुनाव में मदद कर उन्हें जिता रहे हैं."
तो 2024 के चुनाव में कौन सा नैरेटिव ज़्यादा हावी होगा और किसकी जीत होगी, आने वाला वक़्त बताएगा.
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