योगी आदित्यनाथ चुनावी रैलियों में क्यों कर रहे हैं 'लव जिहाद', 'गो तस्करी' और इसराइल की कार्रवाई का ज़िक्र?

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- Author, संदीप राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की रैली
जगहः छत्तीसगढ़ का कवर्धा
तारीख़ः 5 नवंबर
योगी आदित्यनाथ कहते हैं,“मैं अपील कर रहा हूं कि छत्तीसगढ़ में डबल इंजन की सरकार बनाएं. कांग्रेस लव जिहाद, गौ तस्करी, खनन माफिया के नाम पर क़ानून व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश कर रही है. उत्तर प्रदेश की तरह ऐसे कामों के ख़िलाफ़ कार्यवाही की जाएगी. इसके बाद सारी समस्या समाप्त.”
जगहः छत्तीसगढ़ का भानुप्रतापपुर
तारीख़ः 4 नवंबर
"यहां पर विकास की विभिन्न योजनाओं में भ्रष्टाचार की शिकायत भी आ गई और ये शिकायत यहां तक पहुंच गई है कि इनके एक पार्टनर ने बिहार में चारा घोटाला किया था. इन्होंने छत्तीसगढ़ में गोबर घोटाला कर दिया."
जगहः राजस्थान का अलवर
तारीख़ः 2 नवंबर
“तालिबान का उपचार तो बजरंग बली की गदा ही है. देख रहे हैं न इस समय गाजा में इसराइल, तालिबानी मानसिकता को कैसे कुचलने का काम कर रहा है. आज आतंकवादियों को गाजा में चुन चुन कर मारा जा रहा है.”
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चुनावी रैलियों में दिए गए इन बयानों ने टीवी चैनलों और अख़बारों में सुर्खियां बनाईं तो सोशल मीडिया पर भी इनकी चर्चा हुई.
बीजेपी के स्टार प्रचारक योगी आदित्यनाथ ने वोटरों को 'लुभाने' और राजस्थान, छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकारों को घेरने के लिए अपने भाषण में कुछ 'ख़ास मुद्दों' का ज़िक्र ज़रूर किया.
उनके भाषणों में उत्तर प्रदेश में अपने शासन को 'मॉडल' के रूप में दिखाने, भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस को घेरने और विकास के लिए डबल इंजन सरकार बनाने की अपील थी.
वहीं, जानकारों की राय है कि इन भाषणों में धार्मिक लाइन पर वोटरों को 'रिझाने और ध्रुवीकरण' की कोशिशें भी साफ़ दिखीं. लेकिन क्या आने वाले चुनाव में इसका कोई असर होगा, इस सवाल के जवाब का इंतज़ार राजनीतिक विश्लेषक भी कर रहे हैं.
योगी आदित्यनाथ ऐसे बयानों से 'माहौल बनाने का फार्मूला' पहले भी आजमा चुके हैं. 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान उनके कई बयान चर्चित हुए थे. इनमें "80 बनाम 20" और कैराना के लिए दिए बयान, "मैं मई और जून की गर्मी में भी 'शिमला' बना देता हूं..." की तब काफी चर्चा हुई थी.

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'उम्मीद के मुताबिक नहीं जुटी भीड़'
लेकिन अभी जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उनकी तासीर उत्तर प्रदेश से अलग है. खासकर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का मिज़ाज और ज़मीनी हालात बहुत अलग हैं.
भोपाल में मौजूद बीबीसी संवाददाता सलमान रावी के अनुसार, “एक स्टार प्रचारक के रूप में योगी आदित्यनाथ की सभाएं भीड़ को उतना आकर्षित नहीं कर पा रही हैं जितनी बीजेपी अपेक्षा लगाए हुए थी.”
इसका एक महत्वपूर्ण कारण यह भी रहा है कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में अल्पसंख्यक आबादी बहुत कम है.
मध्य प्रदेश में कुल आठ प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी है और 230 सदस्यों वाली विधानसभा में केवल दो अल्पसंख्यक विधायक हैं. इसलिए यहां 'ध्रुवीकरण की कोशिशों का कोई ख़ास असर होगा, ऐसा दिखता नहीं.'
यही हाल छत्तीसगढ़ का है जहां बहुसंख्यक आबादी आदिवासी है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मध्य प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर को कम करने में मौजूदा शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने काफी कोशिशें कीं लेकिन इनका कितना असर हुआ है, ये नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा.
मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार संजय सक्सेना कहते हैं, "योगी आदित्यनाथ और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की उन्हीं इलाकों में चुनावी सभाएं हो रही हैं जो उत्तर प्रदेश से सटे हैं और यहां भी इनका प्रभाव सीमित है."
उनके मुताबिक, यह चुनाव इस मायने में भी थोड़ा अलग है कि 'स्थानीय मुद्दे सब पर भारी' हैं और 'योगी फ़ैक्टर' बहुत प्रभावी नज़र नहीं' दिख रहा है.

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योगी के चुनाव प्रचार से बीजेपी की दूरी
योगी की चुनावी सभाओं की मध्य प्रदेश में उतनी चर्चा होती नहीं दिख रही है. मध्य प्रदेश में उनकी सभाओं को मीडिया में भी ज़्यादा कवरेज नहीं मिली.
सलमान रावी कहते हैं, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नारा ‘एमपी के मन में मोदी’ की चर्चा तो है लेकिन योगी की सभाओं का ज़िक्र पार्टी के सोशल मीडिया हैंडल तक पर नहीं है. ये एक ताज्जुब की बात है.”
हालांकि, कई टीवी चैनल और सोशल मीडिया पर उनके बयानों की चर्चा ज़रूर हुई है.
असल में मध्य प्रदेश में बीजेपी ने मुख्यमंत्री उम्मीदवार का चेहरा घोषित नहीं किया है और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का टिकट घोषित करने में देरी से ये संदेश भी जा रहा है कि बीजेपी चौहान को फिर से दोहराना नहीं चाह रही है.
पीएम मोदी और शिवराज सिंह चौहान के बीच 'मनमुटाव' की ख़बरें भी फिजा में हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनाव अभियान की अगुवाई मोदी खुद कर रहे हैं और बीजेपी के सर्वमान्य नेता वही हैं.
ऐसे में इन चुनावों में 'योगी फ़ैक्टर' की बहुत अहमियत रह नहीं गई है.
सलमान रावी का कहना है कि योगी आदित्यनाथ की सभा में बहुत भीड़ भी नहीं जुट रही है.
कई जानकार इसे लेकर बीजेपी के भीड़ प्रबंधन पर भी सवाल उठा रहे हैं.
वरिष्ठ पत्रकार संजय सक्सेना का मानना है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में योगी का उतना असर नहीं है, जो थोड़ा बहुत असर है वो ग्वालियर, बुंदेलखंड, चंबल से सटे इलाकों में है.
वो कहते हैं, "लेकिन ये असर इतना बड़ा भी नहीं है कि जीत का भरोसा मिल सके. यहां स्थानीय मुद्दे और जातीय समीकरण राष्ट्रीय पार्टियों पर भी भारी पड़ते हैं."

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ध्रुवीकरण का कितना असर
जानकारों की राय है कि मध्य प्रदेश में धार्मिक मुद्दे अब बीजेपी के लिए उतने फलदायी होते नहीं दिखते क्योंकि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने एक तरह से ये मुद्दे हथिया लिए हैं.
बजरंग बली का मुद्दा बीजेपी के पक्ष में बहुत काम नहीं करता दिख रहा क्योंकि कमलनाथ ने खुद को 'हनुमान का बड़ा भक्त' घोषित कर दिया है.
यहां कमलनाथ अपने तरीके से चुनावी रणनीति बनाते दिख रहे हैं. प्रदेश भर के कांग्रेस कार्यालयों में हनुमान जयंती मनाई गई.
प्रदेश कांग्रेस कमिटी ने एक ‘पुजारी प्रकोष्ठ’, ‘मठ मंदिर प्रकोष्ठ’ और ‘धार्मिक उत्सव प्रकोष्ठ’ बनाए हैं. इसी तरह के 45 अन्य प्रकोष्ठ बनाए गए हैं.
कमलनाथ ने अपने चुनावी क्षेत्र छिंदवाड़ा में हनुमान मंदिर बनवाया है और ऐसा लगता है कि वो बीजेपी की चुनावी पिच से उसे ही बेदखल करने की तैयारी है.
जानकारों का दावा है कि यहां धार्मिक मुद्दे को कमलनाथ ने बीजेपी से हथिया सा लिया है. इसलिए भी बीजेपी की 'ध्रुवीकरण की कोशिशें' बहुत कामयाब नहीं होती दिख रहीं.
यही हाल छत्तीसगढ़ में है जहां मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ‘राम वन गमन पथ’ के विकास के माध्यम से बीजेपी के एजेंडे में सेंध लगा दी है.
उधर, छत्तसीगढ़ में भूपेश बघेल ने चंदखुरी में माता कौशल्या मंदिर बनवाया है. यहां कांग्रेस के न्योते पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी दर्शन करने पहुंचे थे.
ये भी काफी चर्चा का विषय रहा और राजनीतिक विश्लेषक इसे भूपेश बघेल का एक और सफल दांव मानते हैं.

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'नतीजों से जाहिर होगा असर'
बीते मई में कर्नाटक के विधानसभा चुनाव के दौरान भी योगी आदित्यनाथ की चुनावी सभाएं हुई थीं. राज्य में 9 विधानसभा क्षेत्रों में उनकी सभाएं हुई थीं.
लेकिन यहां भी 'योगी फ़ैक्टर का जादू' बहुत नहीं चला. कांग्रेस ने 135 सीटें जीत कर बहुमत हासिल किया.
सलमान रावी के अनुसार, "मध्यप्रदेश में योगी आदित्यनाथ की आधा दर्जन के करीब सभाएं हो चुकी हैं लेकिन मीडिया में उसका कोई कवरेज नहीं दिखता."
मध्य प्रदेश में मतदान 17 नवंबर को होने वाला है और इस दौरान हो सकता है कि उन सीटों पर चुनावी अभियान के लिए योगी आदित्यनाथ की मांग हो जहां कुछ फर्क पड़ने की संभावना हो सकती है.
इन राज्यों में मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर उठ रहे सवालों पर पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था कि बीजेपी किसी चेहरे की बजाय कमल के निशान को लेकर चुनाव लड़ेगी.
सलमान रावी कहते हैं, 'इस लाइन ने बीजेपी के बाकी दिग्गज नेताओं को भी पृष्ठभूमि में डाल दिया है. योगी आदित्यनाथ उससे अलग नहीं हैं.'
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुकाबले योगी आदित्यनाथ का राजस्थान में ज़्यादा असर दिखा. उन्होंने ‘इसराइल-हमास संघर्ष’ का ज़िक्र यहीं किया था.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ की सभाएं ऐसे शहरों में कराई गई हैं जहां मिश्रित आबादी ज़्यादा है. चाहे वो राजस्थान का अलवर हो या फिर छत्तीसगढ़ का कवर्धा.
जानकार ये भी दावा करते हैं कि योगी आदित्यनाथ की रैलियों में भले ही उम्मीद के मुताबिक भीड़ नहीं आई हो लेकिन उन्होंने जो मुद्दे उठाए हैं, उसका असर कितना है, ये चुनाव नतीजों से ही तय होगा.
हालांकि, लगता ऐसा कि योगी आदित्यनाथ ने प्रचार की अपनी ‘लाइन’ तय की हुई है और यही इन राज्यों में उनकी रैलियों को मिल रहे प्रचार की वजह भी है.
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