मध्य प्रदेश: बीजेपी में 'महाराज' के आने से शिवराज पर क्या असर पड़ा?

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, भोपाल

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह बीते 15 दिनों में दो बार मध्य प्रदेश का दौरा कर चुके हैं.

भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व मध्य प्रदेश में इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए रणनीति बनाने में जुट गया है.

राज्य में केन्द्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और अश्विनी वैष्णव के अलावा नरेंद्र सिंह तोमर को इसके लिए रणनीति बनाने का जिम्मा दिया गया है.

हालांकि नेन्द्र सिंह तोमर केंद्रीय मंत्री बनने से पहले मध्य प्रदेश में संगठन की कमान संभाल चुके हैं, चुनावों के ठीक पहले उन्हें राज्य की ज़िम्मेदारी सौंपना दिलचस्प है.

कांग्रेस से बग़ावत कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी भाजपा ने मध्य प्रदेश विधान सभा के चुनावों के लिए अपना ‘स्टार प्रचारक’ बनाया है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व इस बार सबकुछ प्रदेश संगठन पर नहीं छोड़ना चाह रहा है.

रविवार को ग्वालियर प्रवास के दौरान अमित शाह ने ग्वालियर- चंबल संभाग के जिला अध्यक्षों के साथ बैठक की.

उन्होंने कहा कि राज्य में ‘एक एक सीट के दस-दस दावेदार’ हो गए हैं जबकि किसी एक को ही टिकट मिलना है.

भारतीय जनता पार्टी ने 39 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी की जिससे संगठन में ही विरोध खुलकर सामने आ गया है.

उन्होंने कहा, “दूल्हा कैसा भी हो, उसकी बुराई न करें और संगठन के लिए ही काम करें.”

चेहरा कौन - मोदी या शिवराज?

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अमित शाह ने विधानसभा की सीटों के ‘दूल्हों’ यानी उम्मीदवारों की बात तो की लेकिन ये स्पष्ट नहीं किया कि राज्य में पार्टी का मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा.

इस सवाल को ‘डॉज’ कर अमित शाह ने ‘सस्पेंस’ को और बढ़ा दिया है.

रविवार को ही ग्वालियर में ही प्रदेश कार्य समिति की बैठक उन्होंने सदस्यता अभियान की शुरुआत की जिसका ‘स्लोगन’ है – ‘एमपी के मन में मोदी’.

ऐसा उन्होंने भोपाल में मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के ‘20 वर्षों के रिपोर्ट कार्ड’ को जारी करने के कुछ ही घंटों बाद कहा.

भोपाल में ‘रिपोर्ट कार्ड’ जारी करते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ‘ईमानदार, लोकप्रिय’ और ‘मेहनती’ भी कहा.

बाद में पत्रकारों के पूछने पर उन्होंने कहा, “पार्टी का जो काम है वो आप क्यों कर रहे हैं? शिवराज जी मुख्यमंत्री ही हैं. पार्टी का काम पार्टी करेगी.”

पार्टी के नेता और राजनीतिक विश्लेषक उनके इस बयान की अपने अपने तरीक़े से व्याख्या करने में लग गए हैं.

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आखिर अमित शाह के इस बयान का क्या मतलब हो सकता है?

इस सवाल के जवाब में राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार एन के सिंह कहते हैं, “अमित शाह ने मध्य प्रदेश में 20 सालों का रिपोर्ट कार्ड जारी किया. उसके बाद शाह ने राज्य के लिए केंद्र सरकार की योजनायों लंबा वर्णन किया."

"अगर वो ये भी कह देते कि भाजपा की विधानसभा चुनाव में जीत की सूरत में मुख्यमंत्री कौन होगा ये विधायक दल तय करेगा, तो इतनी अटकलें लगनी शुरू नहीं होतीं. जवाब उनका गोल मटोल था मगर एक चीज़ उन्होंने साफ़ कर दी – राज्य में पीएम मोदी के चेहरे को आगे रखकर ही ये चुनाव लड़ा जाएगा.”

ग्वालियर में ज़िला अध्यक्षों को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘सिर्फ़ योजनाएं गिनवाने से कुछ नहीं होगा.’

जानकार कहते हैं कि बहुत जल्द प्रदेश भर में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा “मध्य प्रदेश के लिए जारी योजनाओं और कल्याणकारी नीतियों” के ‘कट आउट’ लगने लगेंगे.

एक तबका ऐसा भी है जो मानता है कि ‘सत्ता विरोधी लहर’ और ‘अंदरूनी रस्साकशी’ से निपटने के लिए ये पार्टी की एक ‘रणनीति’ भी हो सकती है.

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दैनिक सांध्य प्रकाश के संपादक संजय सक्सेना कहते हैं कि राजनीति है तो स्वाभाविक है सब अपना भविष्य देखते हैं और शीर्ष पार जाने लिए हर प्रयास करते हैं.

संजय सक्सेना ने कहा, “राजनीति में बिना तिकड़म के कोई आगे नहीं बढ़ सकता. सो संगठन के अंदर भी कई खेमों का होना स्वाभाविक है. अभी तक तो कैलाश विजयवर्गीय के साथ उनके निष्ठावान समर्थक पार्टी के अन्दर ही हैं और वो उनके साथ ही हैं."

"वैसे ही प्रह्लाद पटेल और नरोत्तम मिश्रा के चाहने वाले समर्थक भी हैं जो अपने नेता को संगठन में ऊंचाई तक जाता हुआ देखना चाहते हैं. मगर पहले से खेमे बाज़ी झेल रही भाजपा में एक नए खेमे के आ जाने से मामला और भी ज़्यादा रोचक हो गया है. वो खेमा है ‘महाराज’ का यानी ज्योतिरादित्य सिंधिया का.”

दिलचस्प है कि वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव ‘शिवराज बनाम महाराज’ के नारे पर लड़ा गया था.

सक्सेना मानते हैं, “बेशक सिंधिया भाजपा में आ गए हों लेकिन ये चुनाव अब भाजपा के अंदर ही शिवराज बनाम महाराज बना हुआ है. टिकट हासिल करने के लिए सभी प्रमुख नेता अपने समर्थकों के लिए ‘लॉबिइंग’ भी कर रहे हैं.”

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ग्वालियर–चंबल संभाग में सिंधिया का क़द ऊंचा है. कांग्रेस के ज़माने से उनका इस क्षेत्र में दबदबा रहा है.

भाजपा में आने के बाद उनके साथ संगठन में उनके समर्थक विधायक शामिल हुए. उनमें से कई मंत्री भी बने तो कईयों को निगमों और मंडलों में अहम पद दिए गए.

सक्सेना कहता हैं, "अब टिकट का बंटवारा होना है. एक अनार है और सौ बीमार. लेकिन इस वर्चस्व को नियंत्रित करने के लिए ऐन वक़्त पर केन्द्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के हाथों में कमान आ गयी.”

मगर ग्वालियर में प्रदेश कार्यकारिणी समिति की बैठक के इतर पत्रकारों से बात करते हुए सिंधिया ने कहा, “भारतीय जनता पार्टी में जिस व्यक्ति की जीतने की ज़्यादा क्षमता है वो ही नामांकित होगा. भाजपा में टिकट वितरण में न मेरा है, न तेरा है.”

सिंधिया के इस बयान से उनके समर्थकों में बेचैनी दिख रही है.

ख़ास तौर पर वो जो इस उम्मीद से उनके साथ कांग्रेस से भारतीय जनता पार्टी में आये थे कि उन्हें अपने क्षेत्रों से टिकट मिलेगा. मगर अब उनका सामना ‘पुरानी भाजपा’ से है जो पिछले कई दशकों से सिंधिया का विरोध कर चुनाव जीतती आ रही थी.

एक ऐसे ही निराश नेता से बीबीसी की मुलाक़ात भोपाल में हुई.

वो टिकट के दावेदार हैं और उसके लिए प्रयास भी कर रहे हैं.

पहचान ज़ाहिर नहीं करने की शर्त के साथ वो कहने लगे, “हम ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. जब हम आ रहे थे तो आश्वासन मिला था कि सिंधिया जी मुख्यमंत्री बनेंगे और इस लिए हम कांग्रेस छोड़कर उनके साथ भाजपा में आ गए. अब टिकट के लिए दौड़ रहे हैं तो ये जवाब मिल रहा है.”

पिछले एक महीनों में पांच ऐसे सिंधिया समर्थक कद्दावर नेता वापस कांग्रेस में लौट गए. इनमें सबसे बड़ा नाम है समंदर पटेल का है जो भाजपा की कार्यसमिति के सदस्य थे.

कांग्रेस की गुटबाज़ी, बीजेपी कितनी एकजुट

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पंकज चतुर्वेदी ज्योतिरादित्य सिंधिया के नज़दीकी रहे हैं और कांग्रेस छोड़कर वो अपने नेता के साथ भाजपा में शामिल हो गए हैं.

फ़िलहाल वो भाजपा की मध्य प्रदेश इकाई के प्रवक्ता हैं.

बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं कि कांग्रेस में ‘गुटबाज़ी ही हावी’ रही इस लिए कांग्रेस में जब तक नेता थे, वो गुट के साथ रहना पसंद करते थे.

वो कहते हैं, “वर्ष 1885 से 2023 तक कांग्रेस में गुटबाज़ी ही चलती रही. लेकिन भाजपा में आकर सबको पता चल गया कि यहाँ गुटबाज़ी की कोई जगह नहीं है.”

पंकज चतुर्वेदी का कहना है कि कांग्रेस किस तरह काम करती है ये तो वही लोग बता सकते हैं. मगर बीजेपी के बारे में कहते हैं कि उनकी पार्टी ने बूथ स्तर पर बहुत काम किया है. उनका दावा है कि राज्य भर के 64 हज़ार एक सौ बूथों को डिजिटल कर दिया गया है.

भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार और समीक्षक राजेश जोशी की माने तो भाजपा के सामने ज्योतिरादित्य सिंधिया को लेकर अभी भी दुविधा बनी हुई है. वो कहते हैं कि अगर भाजपा सिंधिया को आगे करती है तो पुराने नेताओं की नाराज़गी झेलनी पड़ेगी.

जोशी का मानना है कि सिंधिया का प्रभाव जन नेता के रूप में ग्वालियर और चंबल से आगे नहीं रहा है. प्रदेश के बाक़ी के हिस्सों में उनकी अपील उतनी ख़ास नहीं है. पिछला लोक सभा का चुनाव वो अपने ओएसडी से हार गए थे.

वे कहते हैं, "वैसे भी अब रजवाड़ों का वर्चस्व ख़त्म हो चुका है. वैसे भी जब वो कांग्रेस में थे तो उनकी संगठन में तूती बोलती थी. महत्वपूर्ण पद थे. लेकिन अब वो ऐसे मंत्रालय के मंत्री हैं जिसके पास कोई सरकारी एयरलाइन भी नहीं है और एअरपोर्ट भी निजी हाथों में जा रहे हैं. उनके करने के लिए ज़्यादा काम ही नहीं बचा है.”

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