व्यापम के 10 साल: संदेह, साज़िश और अपराध का व्यापक जाल

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- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, भोपाल से
- देश के इतिहास का सबसे बड़ा परीक्षा-भर्ती घोटाला
- घोटाले में लेन-देन की अनुमानित राशि तीन अरब डॉलर
- मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर भी लगे थे आरोप
- मामला 2013 में दस साल पहले सामने आया, अब तक ठोस नतीजा नहीं
- घोटाले के 40 से ज़्यादा अभियुक्तों, गवाहों और जाँचकर्ताओं की संदिग्ध मौत
- ज़हर पीने, फाँसी लगाने, डूबने और अज्ञात कारणों से हुई मौतें

साल 2012, 19 साल की एक लड़की की लाश उज्जैन में रेलवे ट्रैक पर मिली, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत की वजह दम घुटना बताया गया.
पुलिस ने इसे पहले हत्या माना, आदिवासी लड़की की लाश को लावारिस बताकर दफ़न कर दिया गया, बाद में एक बार फिर पोस्टमॉर्टम कराया गया और इसे आत्महत्या बता दिया गया.
झाबुआ ज़िले की नम्रता डामोर के पिता मेहताब सिंह ने पिछले दिनों मुझे बताया, "नम्रता को व्यापम से जुड़े मामलों की जानकारी हो गई थी इसीलिए उसे मार डाला गया."
जब मेहताब सिंह मुझसे बात कर रहे थे तो मेरे शरीर में एक सिरहन-सी उठ रही थी क्योंकि मैं जिस सोफ़े पर बैठा था, उसी पर साल 2015 की एक दोपहर मेरे जैसा ही एक पत्रकार बैठा था, वह अचानक ही रहस्यमय ढंग से मौत की नींद सो गया था.

नम्रता डामोर की संदिग्ध मौत और व्यापम घोटाले से जुड़े तारों की तफ़्तीश करते हुए आठ साल पहले 'आजतक' के रिपोर्टर अक्षय सिंह मेहताब सिंह के घर पहुँचे थे. मेहताब सिंह ने बताया, "चाय पीने के बाद अक्षय सिंह के मुँह से झाग निकला और उनकी साँसें सदा के लिए रूक गईं."
व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) घोटाले से जुड़े तक़रीबन 40 लोगों की संदिग्ध हालत में मौतें हुईं हैं जिसने इस भर्ती घोटाले को भयावह और रहस्यमय बना दिया है.
इस मामले में लोग बात करने से कतराते हैं, यहाँ तक कि पत्रकार भी इस मामले की तह में जाने की कोशिश को ख़तरनाक बताते हैं जबकि राज्य सरकार का कहना है कि ये सभी स्वाभाविक मौतें हैं जिनका व्यापम से कोई ताल्लुक नहीं है.
इन संदेहास्पद मौतों के बाद जानी-मानी पत्रिका 'इकोनॉमिस्ट' ने परीक्षा घोटाले पर अपनी रिपोर्ट को 'डायल एम फॉर मध्य प्रदेश' शीर्षक दिया था.
'इकोनॉमिस्ट' ने अपनी रिपोर्ट में लेन-देन की कुल अनुमानित राशि को तीन अरब डॉलर (तकरीबन 240 अरब रुपए) बताया है.

व्यापम का व्यापक जाल और राजनीति
ताज़ा अपडेट ये है कि व्यापम घोटाले की जांच को लेकर इंदौर हाई कोर्ट में 10 अगस्त को एक याचिका दायर की गई है.
मामले को उजागर करने में अग्रणी रहे पारस सकलेचा ने अदालत से अनुरोध किया है कि उनकी जो शिकायत दिसंबर 2014 से लंबित है उसमें निश्चित अवधि के भीतर कार्रवाही करने का हुक्म जारी करे.
अपनी शिकायत में रतलाम के पूर्व निर्दलीय विधायक पारस सकलेचा ने राज्य के मुख्यमंत्री से लेकर, बड़े अधिकारियों और प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की जाँच की माँग की थी. सकलेचा 2017 से कांग्रेस पार्टी के सदस्य हैं.
पारस सकलेचा कहते हैं कि उन्होंने प्री-मेडिकल टेस्ट (पीएमटी) घोटाले की जानकारी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को साल 2009 में ही दे दी थी जिसके बाद फ़र्ज़ीवाड़े की छानबीन के लिए दिसंबर माह में समिति का भी गठन किया गया था.

रतलाम के अपने घर पर बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं, “समिति बनाए जाने और मुख्यमंत्री के कड़ी कार्रवाई के आश्वासन के बाद भी चार सालों तक घोटाला जारी रहा बल्कि इसका दायरा भी बढ़ता गया तो इससे लगता है कि मुख्यमंत्री घोटाला रोकने के प्रति गंभीर नहीं थे."
"आपके पास विभाग है, जाँच की बात भी आप कह रहे हैं, फिर भी घोटाला जारी रहता है, तो हम कह रहे हैं कि इसमें शिवराज सिंह चौहान की भागीदारी की भी जाँच होनी चाहिए.”
तमाम तरह के राजनीतिक हंगामों, दबावों और मुख्यमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी की गिरफ़्तारी के बावजूद शिवराज सिंह चौहान से मामले में कभी पूछताछ भी नहीं हुई.
किसी तरह का केस ज़ाहिर है उनके विरूद्ध कभी दर्ज नहीं हुआ.

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता गोविंद मालू इन आरोपों को सिरे से निराधार बताते हैं और कहते हैं कि मामले में जो भी पहल हुई वो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ख़ुद व्यवस्था को ठीक करने के लिए की.
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी आरोपों को बार-बार निराधार बताया है, उनका दावा है कि व्यापम से जुड़े मामलों में उन्होंने ठोस कार्रवाई की है.

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बर्बाद हो गए कई परिवार
केवल पत्रकार अक्षय सिंह या छात्रा नम्रता डामोर की ही बात नहीं है, संदेह पैदा करने वाले हालात में हुई तक़रीबन 40 मौतों की वजह से बड़ी संख्या में परिवार तबाह हुए हैं.
घोटाले के एक अभियुक्त राजीव कहते हैं, “इसके चक्कर में फँसकर कई परिवार तबाह हो गए. भारी मानसिक तनाव में लोगों ने सुसाइड कर लिया, शादियां टूट गईं, कई के मां-बाप इसी ग़म में चल बसे.”
ऐसा ही एक मामला ग्वालियर का है, घोटाले में नाम आने के बाद गजराज मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस कर चुके रामेंद्र सिंह ने फांसी लगाकर ख़ुदकुशी कर ली.
जवान बेटे की मौत के ग़म में चंद ही दिनों बाद मां ने तेज़ाब पी लिया और चल बसीं.
बेटे और बीवी की मौत के बाद 62 साल के नारायण सिंह भदौरिया कहते हैं, “चार दिनों के भीतर ही बेटे और बीवी को गंवाने के बाद अब मुझे मरने की जल्दी है, अब जीने की कोई तमन्ना नहीं है."

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व्यापम के फंदे में फँसे नौजवानों का हाल
इस घोटाले में बिचौलियों, राजनेताओं और अफ़सरों के नेटवर्क ने 20-22 साल के नौजवानों को पैसों के बदले पीएमटी (प्री-मेडिकल टेस्ट), इंजीनियरिंग वग़ैरह की प्रवेश परीक्षाएँ धोखाधड़ी से पास करवाकर दाख़िले का सपना बेचा, अब मध्य प्रदेश के सैकड़ों युवा महीनों जेल की सलाखों के पीछे काटने के बाद आज भी अदालतों के चक्कर काट रहे हैं.
अपनी ज़िंदगी की कहानी शेखर ने एक वाक्य में सुना दी,“हमसे कहा गया कि हमारे आगे जो व्यक्ति बैठा है उससे जवाब नक़ल करना है, इस तरह हमने पीएमटी पास कर ली, कॉलेज में एडमिशन हो गया, फिर प्रदेश में व्यापम नाम का घोटाला उजागर हुआ, हमारे ख़िलाफ़ क्रिमनल केस रजिस्टर्ड हुआ, हमें कॉलेज से निकाल दिया गया, जेल हुई, सात-आठ माह जेल में काटने पड़े, फ़िलहाल हाई कोर्ट से ज़मानत पर रिहा हैं.”
राजीव कहते हैं, "फँस गए हैं हम. कुल मिलाकर कहीं के नहीं रहे, हमारे दस साल निकल गए हैं, शायद हमें सज़ा हो जाएगी, इस तरह हमारे कुल सतरह साल निकल जाएंगे. सतरह साल के बाद मुझे नहीं लगता हम किसी मतलब के रह जाएँगे".
मध्य प्रदेश के एक छोटे से क़स्बे में पले-बढ़े राजीव का ख़्वाब था कि वो पीएमटी पास करें, मगर पीएमटी में जब लगातार दो बार नाकामी मिली तो उनके परिवार वालों ने एक बिचौलिए को पाँच लाख रूपये दिए. इन पैसों के एवज में बिचौलिये ने राजीव के लिए एक ऐसा व्यक्ति उपलब्ध करवाया जिसने उनके बदले इम्तहान दिया.

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लंबी खिंच रही जांच के दस सालों में राजीव और शेखर की जिंदगियों में भी बड़े बदलाव साफ़ देखने को मिलते हैं, कभी डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले राजीव पिता की आटा चक्की में कभी-कभार मदद करते हैं, शेखर का गुज़ारा एक प्राइवेट कंपनी में छोटी-मोटी नौकरी करके होता है, दोनों की उम्र और तीस को पार कर गई है.
शेखर अपने पैतृक शहर में नहीं रहते क्योंकि “लोगों से नज़रें नहीं मिला सकते. हालांकि मुझसे अधिक पीड़ा मेरे बूढ़े माता-पिता को झेलनी पड़ रही है.”
राजीव कहते हैं कि लोगों का ग़लत ख़्याल है कि हम जैसे सभी लोग बड़े पैसे वाले थे, कुछ के पास शायद एक-दो बीघा ज़मीन थी जिसे बेचकर लोगों ने बिचौलियों के पैसे चुकाए. हमारे परिवार को सूद पर पैसे लेने पड़े थे उन लोगों को देने के लिए.
हाई कोर्ट के वकील उमेश बोहरे ने राजीव और शेखर जैसे पचास से ज़्यादा लोगों की ज़मानत करवाई है, वो कहते हैं कि व्यापम घोटाले में “जो अच्छे परिवार से हैं वो बच जाएंगे, ग़रीब मारे जाएँगे.”
न्याय व्यवस्था से जुड़े एक अन्य व्यक्ति का कहना है कि जिन्होंने मेडिकल-इंजीनियरिंग या दूसरे कोर्सेस में दाख़िले के लिए रिश्वत और धोखाधड़ी का सहारा लिया उनके साथ क्यों किसी तरह की हमदर्दी की जाए?

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'इंजन-बोगी सिस्टम' कैसे काम करता था?
सरकारी संस्था व्पापम सूबे के तकनीकी कॉलेजों में प्रवेश के लिए परीक्षा करवाने के लिए ज़िम्मेदार है. उसके ऊपर सरकारी नौकरियों में भर्तियों के लिए भी इम्तहान कराने की ज़िम्मेदारी है.
बिहार के चारा घोटाला से भी बड़ा बताए जाने वाले इस परीक्षा स्कैम में पुलिस के मुताबिक़ मेडिकल-इंजीनियरिंग वग़ैरह की प्रवेश परिक्षाओं में कैंडिडेट की बजाए दूसरों से लिखवाए जाते थे. एग्ज़ाम शीट्स इम्तिहान का वक़्त ख़त्म होने के बाद भरे जाते थे.
‘इंजन-बॉगी सिस्टम’ नाम की व्यवस्था में बैठने का इंतज़ाम इस तरह किया जाता था ताकि आगे-पीछे बैठे परीक्षार्थी नक़ल कर सकें.

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दूसरों के बदले परीक्षा देने वाले लोग या फिर जिनके जवाब की नक़ल दूसरों को करने को कहा जाता था, वो सभी ज़्यादातर मामलों में पहले से ही मेडिकल कॉलेजों में पढ़ रहे होते थे और इन सभी को पैसे देकर दूसरे शहरों से लाया जाता था, इन्हें सॉल्वर कहा जाता है.
सीबीआई ने अपने एक बयान में कहा है कि इन सॉल्वर्स को उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, राजस्थान, झारखंड, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र जैसे प्रदेशों से लाया जाता था. ज़्यादातर मामलों में ये साल्वर्स या तो मेडिकल कॉलेजों में पढ़ रहे छात्र हुआ करते थे या ये कोचिंग में पीएमटी की तैयारी कर रहे तेज़ दिमाग़ लड़के होते थे.

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नौजवान कैसे फँसते थे चंगुल में?
राजीव और शेखर एक दूसरे से सैकड़ों किलोमीटर के फ़ासले पर रहते हैं, लेकिन दोनों की ज़िंदगियां लगभग एक-सी हैं. दोनों पीएमटी पास करने में नाकाम रहे थे और परिवार वालों का दबाव झेल रहे थे, जिसके बाद उन्होंने बिचौलिए का सुझाया रास्ता चुना.
शेखर के मुताबिक, उन जैसे लोग ही व्यापम घोटाला नेटवर्क का टार्गेट हुआ करते थे, “ये उनकी मार्केटिंग स्ट्रेटजी थी जिससे हम लोगों का संपर्क ऐसे लोगों से हुआ.”
राजीव के मामले में उनके भाई के एक रिश्तेदार ने उनसे क़स्बे में संपर्क करके कहा कि परेशान होने से बेहतर है कि पाँच लाख रूपये ख़र्च करो, मेडिकल कॉलेज में सेलेक्शन पक्का, 20-25 हज़ार रूपए एडवांस देने के बाद उनके डॉक्यूमेंट्स ले लिए गए और उन्हें बताया गया उनकी जगह कोई और व्यक्ति पीएमटी में बैठेगा और उनका नाम एडमिशन लिस्ट में शामिल होगा. इसके बाद उन्हें एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाख़िला भी मिल गया.
राजीव कहते हैं, “हम एडमिशन लेने गए तो वहां पूरी कमेटी बैठी थी. उन्होंने हमारे डॉक्यूमेंट्स देखे फिर भी हमें एडमिशन दे दिया जबकि हमारे एडमिट कार्ड में जो तस्वीर लगी थी वो उस व्यक्ति की थी जिसने मेरे बदले में मेडिकल की प्रवेश परीक्षा दी थी.”
वे कहते हैं, "ये एजेंट, एग्ज़ाम हॉल में होने वाली गड़बड़ियां, दाख़िले की जांच समिति में बैठे लोग, ये पूरा नेटवर्क दस बारह लोगों का नहीं हो सकता, एक पूरा सिस्टम काम कर रहा था लेकिन आज दस सालों बाद हम लोगों को सज़ा हो रही है, लेकिन ये नहीं देखा जा रहा है कि हम इस जाल में कैसे फँसे, हमें आगे करके असली दोषियों को बचाने की कोशिश हो रही है."
एसटीएफ़ और सीबीआई ने अपने मुकदमों में सैकड़ों परीक्षार्थियों और अभिवावकों को भी शामिल किया, जिसको लेकर नागरिक समूहों से लेकर, व्हिस्लब्लोअर, राजनेता और ख़ुद छात्र सवाल उठाते रहे हैं.

क्या घोटाले के ज़िम्मेदार लोग पकड़े गए?
ऐसे सवाल बहुत सारे दूसरे लोग भी उठाते हैं. ख़ास तौर पर इसलिए भी कि पीएमटी में घोटाले को लेकर राज्य के विभिन्न थानों में 25 साल पहले से ही मामले दर्ज होते रहे हैं. इनकी संख्या कई रिपोर्टों में 55 तक बताई गई है.
बीबीसी से बातचीत में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह जांच को ग़लत दिशा में ले जाने का आरोप लगाते हैं.
वे हरियाणा की मिसाल देते हैं जहाँ शिक्षक घोटाले में जिन लोगों ने बहाली के लिए पैसा दिया था उन्हें अभियुक्त नहीं गवाह बनाया गया और इस तरह जाँच करने वाले टॉप पर बैठे लोगों तक पहुँचे.
''लेकिन यहां जिन्होंने पैसे दिए हैं, उन्हें ही अधिकतर जेल हो रही है. कुछ उन लोगों को भी जेल हुई जिन्होंने पैसे लिए लेकिन वो सब छूट रहे हैं. मेरा सवाल है सीबीआई से कि उन लोगों को क्यों नहीं गवाह बनाया गया जो बता रहे हैं कि कैसे हम इस जाल में फँस गए?''
व्यापम घोटाले को उजागर करने वालों में शामिल रहे डॉक्टर आनंद राय कहते हैं, “जेल हो रही है छोटे लोगों को. यह एक पिरामिड की तरह है, जिसमें नीचे परीक्षार्थी हैं, अभिवावक हैं, जेल इन लोगों को हो रही है जिन लोगों ने पैसा बनाया वे पिरामड में ऊपर हैं, उन्हें कुछ नहीं हो रहा, वो छूट गए सब बड़े लोग थे. अब आप 10-15 साल तक भी जांच जारी रखोगे तो क्या होगा?”

डॉक्टर आनंद राय का कहना है कि लंबी लड़ाई कभी-कभी हताश कर देती है, बड़ी अदालतों में तो फिर भी कई बड़े वकील मुफ़्त मुक़दमे लड़ने और दूसरी तरह की मदद कर देते हैं लेकिन छोटी अदालतों में ये बहुत मुश्किल है.
कुछ सप्ताह पहले ही मध्य प्रदेश में पटवारियों की भर्ती में घोटाले का मामला सामने आया है यानी भर्ती और शायद प्रवेश परीक्षा घोटाला सूबे में बदस्तूर जारी है.
विपक्षी दल कांग्रेस का कहना है कि आगामी विधानसभा चुनाव में भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा रहेगा और ज़ाहिर है व्यापम घोटाला उसी से जुड़ा है.
सुप्रीम कोर्ट में भी व्पापम घोटाले की जांच को लेकर कई अर्ज़ियां सुनवाई के लिए लंबित हैं.

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