मध्य प्रदेश के गवर्नर को सियासी ऑक्सीजन क्यों?

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- Author, राजेश चतुर्वेदी
- पदनाम, भोपाल से, बीबीसी हिंदी के लिए
व्यापमं घोटाले में एसटीएफ़ ने मध्य प्रदेश के गवर्नर रामनरेश यादव के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की तो यह धारणा बनी कि या तो वह खुद इस्तीफ़ा दे देंगे या भारत सरकार उन्हें पद छाेड़ने के लिए कहेगी, लेकिन ये दोनों ही चीजें नहीं हुईं.
अब बदली हुई तस्वीर में रामनरेश की कुर्सी फिर ख़तरे में है.
राजनीतिक क्षेत्रों में सवाल पहले भी था और अब भी है कि एक तरफ तो यूपीए के बनाए दीगर राज्यपालों को केंद्र सरकार किसी न किसी बहाने से एक-एक कर हटाती रही, लेकिन दूसरी ओर सियासी तौर पर मध्य प्रदेश के गवर्नर को अॉक्सीजन देने का काम किया गया.
भाजपा या उसके हाईकमान का यह रवैया राजनीतिक प्रेक्षकों के लिए चौंकाने वाला रहा है. जाहिर है, इसके पीछे सियासी नफ़ा-नुकसान ही कारण रहे हैं.
नफ़ा-नुकसान

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दरअसल, व्यापमं मामले में जब एसटीएफ़ की जांच राजभवन तक पहुंची तो तस्वीर में बदलाव शुरू हुआ.
जानकार बताते हैं कि अपने ओएसडी धनराज यादव और बेटे शैलेश यादव के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज होने के बाद ही रामनरेश यादव ने राज्यपाल के पद से इस्तीफ़ा देने का मन बना लिया था.
यह उन दिनों की बात है जब फ़रवरी में राज्य विधानसभा का बजट सत्र प्रारंभ हुआ था. राज्यपाल कितना असहज महसूस कर रहे थे, अंदाज़ा लगा सकते हैं कि बजट अभिभाषण के शुरू और अंत की कुछ पंक्तियां पढ़ने की रस्म भर ही उन्होंने निभाई थी.

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24 घंटे के अंदर ही केंद्रीय मंत्री उमा भारती, राज्य के गृह मंत्री बाबूलाल गौर और स्वयं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राजभवन जाकर उनसे मुलाकात की थी.
उन्हें इस्तीफ़ा नहीं देने के लिए मना लिया गया था.
इसलिए यादव को मनाया!
असल में राज्यपाल के मामले में भाजपा तब यह मान रही थी कि अगर ओएसडी और बेटे के अभियुक्त बनने से बुजुर्ग यादव कुर्सी छोड़ देंगे तो मुख्यमंत्री चौहान पर भी ऐसा करने का दबाव बनेगा.

इसके कुछ कारण हैं, मसलन- मुख्यमंत्री के निजी सचिव प्रेम प्रसाद भी घोटाले में अभियुक्त हैं और उन्हें अग्रिम जमानत मिली हुई है. अगर रामनरेश यादव चले जाते तो नैतिक तौर पर बीजेपी पर दबाव बढ़ जाता.
कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह का एक्सेलशीट के साथ छेड़छाड़ कर मुख्यमंत्री को लाभ पहुंचाने का आरोप भी कायम था. उन दिनों दिल्ली विधानसभा में करारी शिकस्त के कारण भाजपा का ग्राफ भी गिरा हुआ था.
यही वजह है कि 24 फ़रवरी को एफ़आईआर के बावजूद भाजपा ने रामनरेश यादव को छेड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, जबकि उनके समकालीन बारी-बारी से विदा कर दिए गए.
शिवराज को क्लीन चिट!

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इस दौरान दो बातें और हुईं. राज्यपाल को हाईकोर्ट से राहत मिल गई. जबलपुर हाईकोर्ट ने जाने-माने वकील राम जेठमलानी की दलीलें सुनने के बाद एफ़आईआर से उनका नाम हटाने का अादेश पारित कर दिया और दूसरा एसटीएफ़ ने व्हिसल ब्लोअर प्रशांत पांडे द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट को सौंपे दस्तावेजों को फर्जी करार दिया.
इसे मुख्यमंत्री चौहान ने अपने लिए क्लीन चिट माना. बस, भाजपा गोया इसी का इंतज़ार कर रही थी. अब उसकी नज़र में राज्यपाल और मुख्यमंत्री का मामला अलग-अलग हो गया है. वैसे सीबीआई जांच में क्या होता है, इंतज़ार करना होगा.

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इस मामले में भाजपा प्रवक्ता विश्वास सारंग ने कहा, "राज्यपाल और मुख्यमंत्री का मामला-अलग अलग है. महामहिम राज्यपाल के ख़िलाफ़ तो एफ़आईआर हुई थी. हाईकोर्ट ने उनका नाम एफ़आईआर से हटा दिया था और कार्रवाई नहीं करने का आदेश दिया था, उसका ही पालन हो रहा है."
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सत्यदेव कटारे ने इस संबंध में टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. उनका कहना था कि वह चार हफ़्ते बाद इस बारे में कुछ बोलेंगे, क्योंकि अभी यह विषय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है.
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