ट्रंप के कॉन्फिडेंस में कमी नहीं, लेकिन ईरान के ख़िलाफ़ ये विकल्प क्यों होगा ख़तरनाक?

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- Author, एंथनी जर्चर
- पदनाम, उत्तर अमेरिकी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
अमेरिका और इसराइल के ईरान के ख़िलाफ़ संयुक्त युद्ध के तीसरे हफ़्ते में डोनाल्ड ट्रंप ऐसे फ़ैसलों का सामना कर रहे हैं जो उनके बाकी के कार्यकाल का स्वरूप तय कर सकते हैं.
लेकिन अगर अमेरिकी राष्ट्रपति एक ऐसे युद्ध से जूझ रहे हैं जो उनके नियंत्रण से बाहर जा सकता है, तो यह चिंता सार्वजनिक तौर पर दिखाई नहीं दे रही है.
सोमवार को व्हाइट हाउस में एक घंटे से ज़्यादा के सार्वजनिक संबोधन में उन्होंने युद्ध की स्थिति के साथ-साथ कैनेडी सेंटर के नवीनीकरण, व्हाइट हाउस में बॉलरूम बनाने की योजना, इस साल के वर्ल्ड कप, एक रिपब्लिकन सांसद की सेहत और कई अन्य मुद्दों पर भी बात की.
ट्रंप की यह खांटी शैली थी, जैसे वह बिना स्क्रिप्ट के अलग-अलग विषयों पर बोलते हैं. पिछले सप्ताहांत उन्होंने फ़्लोरिडा स्थित अपने रिसॉर्ट में गोल्फ़ खेला. वहीं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर उन्होंने ईरान युद्ध जितना ही समय सुप्रीम कोर्ट की आलोचना में भी लगाया.
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हालांकि ट्रंप अन्य मुद्दों में व्यस्त दिखते हैं, लेकिन वह उस सच्चाई का सामना कर रहे हैं जिसे पहले के अमेरिकी राष्ट्रपति भी झेल चुके हैं यानी युद्ध उनके बाकी के कार्यकाल पर हावी हो सकता है.
अब यह संकेत मिल रहे हैं कि जिस युद्ध को ट्रंप पहले 'पहले ही जीत लिया गया' और 'पूरी तरह ख़त्म' बता चुके थे, वह कई हफ़्तों या उससे भी ज़्यादा लंबा खिंच सकता है.
ट्रंप की अपील बेअसर?

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सोमवार को ट्रंप ने घोषणा की कि ईरान युद्ध के कारण अप्रैल की शुरुआत में प्रस्तावित चीन दौरे को एक महीने के लिए टाल दिया गया है.
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा, "राष्ट्रपति की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी इस समय कमांडर-इन-चीफ़ के तौर पर ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' की सफलता सुनिश्चित करना है."
अमेरिका ने ईरान युद्ध को 'एपिक फ़्यूरी' नाम दिया है.
पिछले सप्ताहांत ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि वह होर्मुज़ स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा के लिए उन देशों का गठबंधन बना रहे हैं, जिन्हें ईरान के हमलों से ख़तरा है.
उन्होंने लिखा, "उम्मीद है कि चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और अन्य देश जहाज़ भेजेंगे. किसी भी तरह हम जल्द ही होर्मुज़ स्ट्रेट को खुला, सुरक्षित और स्वतंत्र बनाएंगे."
हालांकि इस अपील के बाद जापान, ऑस्ट्रेलिया और कई यूरोपीय देशों ने इसमें शामिल होने में दिलचस्पी नहीं दिखाई है.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने कहा, "हम व्यापक युद्ध में शामिल नहीं होंगे," हालांकि उन्होंने स्थिति से निपटने के लिए सामूहिक योजना पर बातचीत की बात कही.
अब ट्रंप के सामने यह कठिन फ़ैसला है कि क्या अमेरिका अपनी नौसेना को उस संकरे समुद्री रास्ते की सुरक्षा के लिए ज़्यादा सक्रिय रूप से तैनात करे, जहां से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति होकर गुजरती है.
सोमवार को उन्होंने कहा कि अमेरिका ईरान के बारूदी सुरंग बिछाने वाले जहाज़ों को नष्ट कर रहा है, जोकि स्ट्रेट में आवाजाही के लिए ख़तरा पैदा करते हैं.
उन्होंने कहा, "यह थोड़ा ग़ैरवाज़िब है. आप युद्ध जीतते हैं, लेकिन उन्हें ऐसा करने का अधिकार नहीं है, जो वो कर रहे हैं."
ज़मीन पर सेना उतारने का विकल्प खुला

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संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका अपने सैन्य विकल्प खुले रख रहा है. पिछले शुक्रवार अमेरिकी मीडिया ने बताया कि राष्ट्रपति ने जापान से 5000 सैनिकों और नौसैनिकों वाली मरीन यूनिट को मध्य पूर्व भेजने का आदेश दिया है.
अगर ट्रंप कार्रवाई करते हैं तो अमेरिकी सैनिकों के ईरान के क़रीब होने के कारण जोखिम बढ़ सकता है.
अगर वह कार्रवाई नहीं करते और यह घोषणा करते हैं कि अमेरिका ने ईरान की सैन्य क्षमता को काफ़ी कमज़ोर कर दिया है और अपने सैन्य अभियान को समेट लेते हैं तो शिपिंग की आवाजाही के लिए ईरान ख़तरा बना रह सकता है और तेल की क़ीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं.
दूसरी स्थिति ये है कि अमेरिका अरबों डॉलर ख़र्च करने के बाद भी मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन को निर्णायक रूप से नहीं बदल पाएगा.
पोलिंग कंपनी इप्सोस में पब्लिक अफ़ेयर्स और रणनीतिक मामलों के प्रमुख क्लिफ़र्ड यंग के अनुसार, ऊर्जा की क़ीमतों में लंबे समय तक बढ़ोतरी राष्ट्रपति के लिए असली राजनीतिक ख़तरा बन सकती हैं, जोकि अमेरिकी जनता की नज़र में पहले ही बहुत कमज़ोर स्थिति में हैं.
वो कहते हैं, "फ़िलहाल सर्वे बताते हैं कि ट्रंप के कोर समर्थक उनके साथ बने हुए हैं, हालांकि कुछ मुद्दों पर उनके मन में संदेह है, जैसे ईरान अभियान और, आप्रवासन और टैरिफ़ जैसे अन्य प्रमुख मुद्दे. समर्थन में यह गिरावट मुख्य रूप से मध्यमार्गी रिपब्लिकन और स्वतंत्र मतदाताओं में देखी गई है."
हालांकि ट्रंप की लोकप्रियता 40 प्रतिशत के आसपास है, जिसे लेकर रिपब्लिकन के बीच चिंता होनी चाहिए, लेकिन अभी तक ईरान युद्ध से उनकी रेटिंग बहुत नीचे नहीं गई है.
यह स्थिति बदल सकती है अगर युद्ध का असर आम लोगों के मुद्दों जैसे महंगाई और जीवन यापन की लागत पर पड़ता है.
ट्रंप के मौजूदा कार्यकाल के पहले साल में भले ही महंगाई दर में कुछ कमी आई हो, लेकिन घर, राशन और उपभोक्ता वस्तुओं की क़ीमतें अब भी ऊंची हैं.
कम से कम इतना ज़रूर है कि ईरान युद्ध ट्रंप प्रशासन का ध्यान आर्थिक मुद्दों से भटका रहा है. अगर पेट्रोल की क़ीमतें ऊंची बनी रहती हैं, जोकि हाल-फ़िलहाल तक ट्रंप के लिए बड़े गर्व का विषय हुआ करता था, तो इसका राजनीतिक असर गंभीर हो सकता है.
अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत 3.72 डॉलर प्रति गैलन पहुंच गई है, जो एक महीने पहले औसतन 2.94 डॉलर थी.
क्लिफ़र्ड यंग ने कहा, "यह सब कुछ उलट-पुलट देता है. यह रिपब्लिकन के किफ़ायती जीवन के एजेंडे को ध्वस्त कर देता है."
युद्ध खिंचा तो होगा राजनीतिक नुकसान

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जोखिम के समीकरण के दूसरे छोर पर राष्ट्रपति के लिए मिडिल ईस्ट में अमेरिकी अभियानों को बढ़ाने का फ़ैसला, असल ख़तरा है.
हज़ारों मरीन्स के इस इलाक़े की ओर बढ़ने की ख़बरों के बीच, ट्रंप होर्मुज़ स्ट्रेट को सुरक्षित करने, ईरान के तेल निर्यात टर्मिनलों पर कब्ज़ा करने या देश के परमाणु कार्यक्रम के हिस्सों को ढूंढकर उन्हें पूरी तरह नष्ट करने के लिए अमेरिकी सेना को तैनात कर सकते हैं.
हालांकि, अमेरिकी सैनिकों का किसी भी तरह इस्तेमाल अमेरिकी जनता के बड़े हिस्से में ज़्यादा विरोध को जन्म दे सकता है, जो एक और लंबे अमेरिकी सैन्य अभियान को लेकर आशंकित हैं.
इनमें कई लोग ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि ट्रंप ने अपने चुनावी वादों में विदेश में युद्धों से दूर रहने की बात कही थी.
यंग ने कहा, "लगातार चलते रहने वाले युद्ध को लेकर थकान है. अगर हम ज़मीन पर सैनिक उतारते हैं, तो यह प्रशासन के लिए बिल्कुल नया जोखिम होगा. इससे सब कुछ बदल जाएगा."
हालांकि, अगर ईरान में अमेरिका की भूमिका हवाई अभियान तक सीमित रहती है, तो ट्रंप के पास अपनी राजनीतिक स्थिति को फिर से मज़बूत करने का समय होगा.
जहां अमेरिकी लोग पेट्रोल की बढ़ती क़ीमतों के लिए राष्ट्रपति को जल्दी ज़िम्मेदार ठहरा देते हैं, वहीं अगर ये क़ीमतें कम हो जाएं तो उनका ग़ुस्सा ज़्यादा देर तक नहीं रहता.
नवंबर में होने वाले मध्यावधि कांग्रेस चुनाव अभी सात महीने से ज़्यादा दूर हैं, जिससे राष्ट्रपति को ऐसा समाधान खोजने का समय मिल सकता है जो घरेलू आर्थिक संकट से बचाए.
ट्रंप ने सोमवार को कहा, "हमें किसी की ज़रूरत नहीं है."
उन्होंने कहा, "हम दुनिया के सबसे ताक़तवर देश हैं."
हालांकि, ट्रंप के सामने चुनौती यह है कि मदद हो या न हो उनके मौजूदा कोई भी विकल्प जोखिम से खाली नहीं हैं.
जबकि तेज़ व आसान समाधान की संभावना हर दिन कम होती जा रही है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.












