अमेरिका ने खार्ग द्वीप के तेल ठिकानों को निशाना बनाया तो चीन का क्या होगा?

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- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि उनकी सेना ने ईरान के खार्ग द्वीप पर ज़बरदस्त हमला किया है. ईरान के तट से महज़ 24 किलोमीटर दूर ये द्वीप ईरान के तेल निर्यात का हब है. इसे देश की लाइफ़लाइन माना जाता है.
ईरान के लगभग 90 फ़ीसदी कच्चे तेल का निर्यात इसी द्वीप पर बने टर्मिनल से होता है.
ये तेल यहां से होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में पहुंचता है.
डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिकी सेना ने अभी खार्ग की तेल फैसिलिटीज़ पर हमला नहीं किया है लेकिन ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट में तेल टैंकरों की आवाजाही को रोकने की कोशिश की तो वो अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार कर सकते हैं.
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सैटेलाइट तस्वीरों की मदद से जहाज़ों की आवाजाही पर नज़र रखने वाली कंपनी टैंकरट्रैकर्स.कॉम के को-फाउंडर समीर मदनी ने सीएनबीसी को बताया कि युद्ध शुरू होने के बाद 28 फ़रवरी से अब तक कम से कम 1.17 करोड़ बैरल कच्चा तेल होर्मुज़ स्ट्रेट के रास्ते भेजा गया है और ये पूरा तेल चीन की ओर जा रहा था.
सैटेलाइट तस्वीरों की मदद से जहाज़ों की आवाजाही पर नज़र रखने की वजह से उन जहाज़ों का भी पता चल जाता है, जो अपने ट्रैकिंग सिस्टम बंद कर देते हैं.
दरअसल, ईरान ने चेतावनी दी थी कि जो भी जहाज़ इस समुद्री रास्ते से गुज़रने की कोशिश करेगा, उस पर हमला किया जा सकता है. इसके बाद कई जहाज़ों ने अपने ट्रैकिंग सिस्टम बंद कर दिए और "डार्क" मोड में चले गए.
शिपिंग इंटेलिजेंस डेटा मुहैया करने वाली कंपनी कैप्लर ने सीएनबीसी को बताया कि युद्ध शुरू होने के बाद से लगभग 1.2 करोड़ बैरल कच्चा तेल होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर गुज़रा है.
कंपनी में कच्चा तेल विश्लेषक नेवे किन सो ने कहा, "हाल के वर्षों में चीन ईरानी कच्चे तेल का सबसे बड़ा ख़रीदार रहा है, इसलिए इन बैरल्स का बड़ा हिस्सा अंततः वहीं जा सकता है."
हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि इन जहाज़ों की आख़िरी मंजिल कहां है इसकी पुष्टि करना अब काफ़ी कठिन काम हो गया है. लेकिन ऐसा अनुमान है कि खार्ग द्वीप का अधिकतर तेल चीन की ओर जा रहा है.
चीन ने बढ़ाई तेल स्टॉक करने की रफ़्तार

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इसराइल और अमेरिकी हमले के बाद छिड़े युद्ध के बावजूद ईरान चीन को तेल भेजता रहा है. हालांकि निर्यात की रफ़्तार पहले से कम हो गई है.
सीएनबीसी के मुताबिक़ इस साल की शुरुआत के दो महीनों में चीन ने अपने तेल भंडार बढ़ाने की रफ़्तार तेज़ कर दी.
चीन के कस्टम डेटा के मुताबिक़ इस अवधि के दौरान चीन के कच्चे तेल का आयात एक साल पहले की तुलना में क़रीब 15.8 फ़ीसदी बढ़ गया.
चीन ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान बड़े पैमाने पर तेल का स्टॉक किया है. जनवरी तक उसके पास क़रीब 1.2 अरब बैरल का भंडार था, जो देश की मांग को 3 से 4 महीने तक पूरा कर सकता है.
अटलांटिक काउंसिल के मुताबिक़ तेल का ये स्टॉक किसी बड़े सप्लाई संकट से निपटने के लिए किया गया है.
चीन की ये तैयारी उस समय और तेज़ हो गई जब डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेज़ुएला को निशाना बनाया. वेनेज़ुएला चीन को तेल सप्लाई करने वाला अहम देश रहा है.
इसके बाद ईरान के साथ अमेरिका की तनातनी के बाद चीन की ये कोशिश और तेज़ हो गई.
संकट से कब तक बचा रहेगा चीन

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चीन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है. लेकिन अभी ऐसी स्थिति नहीं आई है कि ईरान संकट का असर उसकी अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुंचाए.
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दाम 104 डॉलर के आसपास चल रहे हैं. जबकि ईरान युद्ध शुरू होने से पहले ये 68 से 70 डॉलर प्रति बैरल पर था.
लेकिन कुछ विश्लेषकों का कहना है कि तेल के दाम इस लेवल पर आने के बावजूद चीन बाक़ी देशों के मुक़ाबले इस संकट का बेहतर तरीक़े से मुक़ाबला कर सकता है.
हालांकि कुछ विश्लेषक कहते हैं कि तीन-चार महीने का स्टॉक चीन को ज़्यादा राहत नहीं दे सकता क्योंकि उसकी ऊर्जा ज़रूरतें बहुत ज़्यादा है.
थिंक टैंक काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन्स में चाइना स्ट्रेटजी इनिशिएटिव केरूश दोशी ने सीएनबीसी से कहा, ''तीन से चार महीनों के तेल भंडार का मतलब है कि किसी भी सप्लाई संकट का असर तुरंत नहीं दिखेगा. लेकिन ये असर कुछ समय बाद पक्का दिखेगा. हालांकि चीन के समुद्री तेल आयात का 40 से 50 फ़ीसदी ही होर्मुज़ स्ट्रेट से आता है और उसने ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों पर भी तेज़ी से काम किया है. लेकिन इससे दीर्घकालिक असर कम नहीं होंगे.''
चीन का लक्ष्य है कि वह 2030 तक अपनी कुल ऊर्जा खपत में ग़ैर जीवाश्म ईंधन की हिस्सेदारी बढ़ाकर 25 तक ले जाए. 2025 में ये हिस्सेदारी 21.7 फ़ीसदी थी.
भारत में जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजॉल्यूशन के फ़ैकल्टी मेंबर प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं, ''अगर अमेरिका खार्ग द्वीप के तेल इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर हमले करने का फ़ैसला लेता है तो चीन के लिए निश्चित तौर पर मुश्किलें बढ़ेंगी. अगर हमले की वजह से खार्ग द्वीप में तेल प्रोडक्शन ही ख़त्म हो जाएगा तो ईरान कहां से निर्यात कर पाएगा.''
ये दावा किया जा रहा है कि चीन के पास कच्चे तेल का अच्छा स्टॉक है और वो लंबे समय तक तेल संकट झेल सकता है. लेकिन आख़िर कितने लंबे समय तक?
प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं, "हालांकि चीन के पास तीन-चार महीने के तेल का स्टॉक है. वह दूसरे वैकल्पिक ईंधनों का इस्तेमाल कर और रूस से तेल ख़रीदकर छह महीने तक भी इस संकट को टाल सकता है. लेकिन चीन को जितनी आसानी से ईरानी तेल मिल रहा है उसका कोई विकल्प नहीं है."
वो कहते हैं कि अगर खार्ग द्वीप में तेल प्रोडक्शन रुक जाता है और होर्मुज़ स्ट्रेट में हालात और ख़राब होते हैं तो ये निश्चित तौर पर चीन की एनर्जी सिक्योरिटी पर बहुत बुरा असर डालेगा.
खार्ग द्वीप के तेल ठिकानों पर हमला हुआ तो क्या करेगा चीन

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आंकड़ों में चीन तेल स्टॉक को लेकर अच्छी स्थिति में दिख रहा है लेकिन इसके घरेलू बाज़ार पर मौजूदा तेल संकट का असर दिखने लगा है.
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के मुताबिक़ चीन में तेल के दाम बढ़ने लगे हैं, चीन में मंगलवार आधी रात से पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें बढ़ा दी गई हैं.
पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमत 1 जनवरी के बाद चौथी बार बढ़ाई गई है. मौजूदा बढ़ोतरी हाल के वर्षों में सबसे बड़ी बढ़ोतरी मानी जा रही है.
डोनाल्ड ट्रंप ने हाल में जिन देशों से होर्मुज़ स्ट्रेट में युद्धपोत भेजने की अपील की है उनमें चीन भी शामिल है.
उन्होंने नेटो देशों से कहा कि अगर इसके सदस्य देशों ने होर्मुज़ को सुरक्षित करने के लिए युद्धपोत नहीं भेजे तो बहुत बुरा होगा.
इसी तरह उन्होंने चीन को भी संकेत दिए हैं कि अगर चीन होमुर्ज़ स्ट्रेट खोलने में मदद नहीं करता है तो वो बीजिंग दौरे को टाल सकते हैं.
ट्रंप की चीन यात्रा को टालने का संकेत ऐसे समय आया है जब अमेरिका के साथ उसके संभावित व्यापार समझौतों को लेकर कई दौर की बातचीत हो चुकी है.
चीनी सामानों पर अभी भी अमेरिकी टैरिफ़ 48 फ़ीसदी के आसपास है. अगर समझौते होते हैं तो चीन को बड़ी राहत मिल सकती है.
अगर चीन ने होर्मुज़ स्ट्रेट को सुरक्षित करने के लिए ट्रंप की अपील को अनसुना किया और अमेरिका ने खार्ग द्वीप के तेल इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर हमले का फ़ैसला किया तो शी जिनपिंग के लिए मुश्किल स्थिति खड़ी हो सकती है.
अमेरिका ने तेल ठिकानों को निशाना क्यों नहीं बनाया

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विशेषज्ञों के अनुसार अगर द्वीप का इन्फ़्रास्ट्रक्चर ध्वस्त कर दिया जाता तो इससे ईरान की अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा झटका लगता और युद्ध भी काफ़ी ज़्यादा भड़क सकता था.
इससे वैश्विक तेल क़ीमतों में भारी उछाल आ सकता था और ईरान मध्य-पूर्व के अन्य तेल प्रतिष्ठानों को भी निशाना बना सकता था.
सैन्य विश्लेषक जस्टिन क्रम्प का कहना है कि यह हमला ईरान को संघर्ष को और न बढ़ाने की चेतावनी देने के लिए किया गया.
उनके मुताबिक़ ट्रंप यह दिखाना चाहते हैं कि वह अभी संयम बरत रहे हैं, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर आईआरजीसी की इकोनॉमिक लाइफ़लाइन को भी निशाना बना सकते हैं.
क्या अमेरिका खार्ग द्वीप पर क़ब्ज़ा कर सकता है?

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कुछ विश्लेषकों के बीच यह अटकलें भी लग रही हैं कि अमेरिकी सेना भविष्य में खार्ग द्वीप पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश कर सकती है.
ऐसा होने पर ईरान के तेल निर्यात पर लगभग पूरी तरह रोक लग सकती है और यह द्वीप ईरान की मुख्य भूमि पर हमले के लिए एक सैन्य ठिकाना भी बन सकता है.
अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़, क़रीब 5000 सैनिकों को लेकर युद्धपोत खाड़ी की ओर भेजे जा रहे हैं. हालांकि अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है.
सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि अगर यह द्वीप अमेरिका के नियंत्रण में चला गया, तो आईआरजीसी की इकोनॉमिक लाइफ़लाइन पर गंभीर असर पड़ेगा और उसकी युद्ध क्षमता कमज़ोर हो सकती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















