पाँच राज्यों का चुनावी खेल, रुझानों में योगी-मोदी हुए पास, विपक्ष हुआ फ़ेल

इमेज स्रोत, Getty Images
पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के शुरुआती रुझान सामने आ रहे हैं.
इन रुझानों में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर में बीजेपी आगे चल रही है.
पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनती हुई दिख रही है.
उत्तर प्रदेश में जहाँ बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच कांटे का मुक़ाबला माना जा रहा था, वहाँ समाजवादी पार्टी शुरुआत में पिछड़ती नज़र आ रही है.
कांग्रेस के लिए संदेश साफ़ है. उन्हें बड़ी सर्जरी की ज़रूरत है.
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त
यूपी के लिए योगी हैं 'उपयोगी'
पिछले तीस सालों में उत्तर प्रदेश में किसी भी पार्टी ने एक के बाद एक दो बार जीत दर्ज नहीं की है.
योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में सालों बाद ऐसा होता दिख रहा है.
इस चुनाव को कई राजनीतिक विश्लेषक 2024 के लोकसभा चुनाव का सेमी फ़ाइनल करार दे रहे थे.
तो कई इसे योगी आदित्यनाथ के आगे के राजनीतिक सफ़र के लिए अहम मान रहे थे.
रुझान अगर नतीजों में तब्दील हो जाते हैं तो उत्तर प्रदेश में ब्रांड योगी और भारत में ब्रांड मोदी और मज़बूत होगा.
ये भी पढ़ें : यूपी चुनाव: वीआईपी सीटों पर कौन आगे, कौन पीछे

इमेज स्रोत, Getty Images/BBC
चुनाव में किसान आंदोलन बेअसर
उत्तर प्रदेश की बात हो या फिर पंजाब की, किसान आंदोलन का असर दोनों राज्यों में बीजेपी पर नकारात्मक पड़ता नहीं दिख रहा.
कई जानकार ये मान रहे है कि नए कृषि क़ानून वापस लेकर मोदी सरकार ने अपने होने वाले नुक़सान को कम कर लिया है.
किसान नेताओं ने पंजाब में अलग पार्टी बना कर चुनाव लड़ने का फैसला किया जिसका लाभ उन्हें पंजाब में नहीं मिलता दिख रहा.
उसी तरह से किसान आंदोलन की वजह से पश्चिम उत्तर प्रदेश में जाट-मुसलमान एकता की वापसी की बात हो रही थी.
लेकिन उस इलाके में बीजेपी को बहुत नुक़सान नहीं हुआ है, ऐसा लग रहा है.
किसान नेताओं ने चुनाव में उत्तर प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में बीजेपी के ख़िलाफ़ प्रचार भी किया, लेकिन उसका असर नतीजों के रुझान में नहीं दिख रहा.

इमेज स्रोत, Twitter
ग़ैर यादव ओबीसी फ़ैक्टर
चुनाव की तारीखों के एलान के ठीक बाद और टिकट बंटवारे से ठीक पहले कई ग़ैर यादव ओबीसी नेताओं ने बीजेपी का साथ छोड़ समाजवादी पार्टी का दामन थामा.
स्वामी प्रसाद मौर्य, धर्म सिंह सैनी और दारा सिंह चौहान जैसे नेताओं के दल बदलने को अखिलेश यादव ने सामाजिक न्याय से जोड़ते हुए उनके फ़ोटो ट्वीट किए. लेकिन इस चुनाव में ये वोट बैंक समाजवादी पार्टी की तरफ़ पूरा शिफ़्ट होता हुआ नहीं नज़र आ रहा.
जातिगत जनगणना का मुद्दा हो या फिर ओबीसी की अनदेखी करने की बात, बीजेपी के इन बाग़ी नेताओं को साथ लाने के पीछे अखिलेश की मंशा यही थी कि ग़ैर यादव ओबीसी जनता ने इस बार इन मुद्दों को गंभीरता से नहीं लिया.
ये भी पढ़ें : उत्तर प्रदेश, पंजाब समेत पांच राज्यों में किसकी बनेगी सरकार और सियासत पर क्या होगा दूरगामी असर

इमेज स्रोत, FACEBOOK/ANUPRIYASPATEL
छोटे दल नहीं कर पाए बड़ी चोट?
अखिलेश यादव ने पिछले चुनावों के नतीजों से सबक लेते हुए बहुजन समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे दलों के साथ समझौता नहीं किया और राष्ट्रीय लोक दल, ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया. शुरुआती रुझानों से लगता है कि समाजवादी पार्टी को उसका लाभ मिला, लेकिन अब तक के रुझानों से ऐसा लगता है कि सीएम की कुर्सी तक पहुंचाने में कामयाब नहीं हो पाए.
चुनाव आयोग की वेबसाइट बता रही है कि बीजेपी का वोट शेयर उत्तर प्रदेश में बढ़ा है, तो अखिलेश का भी बढ़ा है.
इस बढ़त को कौन कितना सीटों में बदल पाया, इसके लिए फ़ाइनल नतीजों का इंतज़ार करना होगा.
ये भी पढ़ें :EVM की सुरक्षा पर अखिलेश यादव का संदेह कितना सही?

इमेज स्रोत, Getty Images
बेरोज़गारी और महँगाई पर भारी क़ानून व्यवस्था और लाभार्थी स्कीम का मुद्दा
इस चुनाव में बीजेपी मुद्दों के कॉकटेल के साथ मैदान में उतरी.
जहाँ ज़रूरत पड़ी वहाँ विकास का सहारा लिया. टिकट बंटवारे में मुसलमानों को ज़्यादा टिकट नहीं देने की पुरानी रणनीति कायम रखी. निषाद पार्टी और अपना दल जैसी पार्टियों को साथ लेने से भी परहेज़ नहीं किया.
लेकिन चुनावी सभाओं की बात करें तो समाजवादी पार्टी के राज के दौरान चरमराई क़ानून व्यवस्था की याद भी जनता को ख़ूब दिलाई गई.
दूसरी तरफ़ अखिलेश यादव अपनी रैलियों और संबोधन में हाथरस और उन्नाव की घटना का ज़िक्र करते रहे और बेरोज़गारी के आंकड़े गिनाते रहे. रोज़मर्रा की ज़रूरत की चीज़ों के महंगे होने का डर भी दिखाते आए.
लेकिन नतीजों के रुझान बता रहे हैं कि लोग लाभार्थी स्कीम के फ़ायदों से ज़्यादा ख़ुश रहे. किसान सम्मान निधि के पैसों और मुफ़्त राशन ने वो काम किया जो अखिलेश महंगाई और बेरोज़गारी का डर दिखा कर नहीं कर पाए.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












