शिवराज सिंह चौहान को बीजेपी ने मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित नहीं किया फिर भी क्यों पड़ रहे हैं भारी- प्रेस रिव्यू

शिवराज सिंह चौहान

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मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश नहीं किया है.

ऐसा कहा जा रहा है कि 18 साल से सत्ता पर काबिज शिवराज सिंह चौहान को बीजेपी फिर से दोहराना नहीं चाहती है.

माना जा रहा है कि शिवराज सिंह चौहान अब थक गए हैं और यह वह 'थकान' फैक्टर है, जिसके चलते नए चेहरों को मौक़ा दिए जाने की बात हो रही है.

द हिंदू अखबार ने एक रिपोर्ट की है जो कहती है कि कैसे इस दौड़ में शिवराज सिंह चौहान अब भी मज़बूत स्थिति में बने हुए हैं और पार्टी के चुनाव जीतने पर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है.

रिपोर्ट के मुताबिक़ शिवराज सिंह चौहान के विधानसभा क्षेत्र बुधनी के लोग इस 'थकान' फैक्टर को राजनीतिक तौर पर नहीं देखते हैं, बल्कि वे कहते हैं कि यह शारीरिक थकान है, जिसे लेकर वे चिंतित हैं, क्योंकि शिवराज सिंह चौहान एक लंबे चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं.

जैत गांव में शिवराज सिंह चौहान के पुराने पड़ोसी मुकेश चौहान द हिंदू अख़बार को बताते हैं, “हमने उनसे कहा है कि चुनाव के लिए नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद उन्हें यहां आने की जरूरत नहीं है. हम यह तय करेंगे कि वे फिर से चुनाव जीतें.”

वह कहते हैं, “कहीं कोई थकान नहीं है. जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान लगभग सभी 230 सीटों को कवर करने के बाद वे दिन में कम से कम तीन या चार विधानसभा क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं.”

अगर बीजेपी, मध्य प्रदेश में फिर से जीतकर आती है तो मुख्यमंत्री पद के लिए संभावित दावेदारों के रूप में सात सांसद मैदान में हैं, जिनमें से तीन केंद्रीय मंत्री हैं.

अख़बार के मुताबिक़ ऐसी चर्चा है कि शिवराज सिंह चौहान प्रचार के लिए राज्य भर में यात्रा कर रहे हैं, जबकि केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल को छोड़कर बीजेपी ने जिन सांसदों को मैदान में उतारा है, वे सिर्फ़ अपनी-अपनी विधानसभा तक ही सीमित हैं.

शिवराज सिंह के छोटे भाई नरेंद्र चौहान अख़बार को बताते हैं कि 41 प्रतिशत लोग उन्हें मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में चाहते हैं.

वे कहते हैं, “आप बाक़ी सांसदों को एक तरफ़ रख दो और शिवराज को एक तरफ़.”

इसके अलावा नरेंद्र चौहान ने चुनाव लड़ रहे सांसदों और मंत्रियों पर कोई टिप्पणी नहीं की. उन्होंने बस इतना कहा कि यह आलाकमान का आदेश था और इसके पीछे कोई वजह रही होगी.

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बीजेपी में विरोधाभास

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बुधनी विधानसभा के शाहगंज बाज़ार में घूम रहे दीपक पटेल इस बात पर ज़ोर देते हैं कि शिवराज सिंह चौहान को छिपाने की हर संभव कोशिश की जा रही है, बावजूद वही राज्य में मुख्यमंत्री का चेहरा हैं.

राज्य के दूसरे हिस्सों में लगे चुनावी पोस्टरों में शिवराज सिंह चौहान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा और राज्य इकाई प्रमुख वी. डी के साथ एक चौथा चेहरा हो सकते हैं लेकिन बुधनी में लगे पोस्टरों पर शिवराज सिंह इकलौता चेहरा हैं.

शिवराज सिंह को लेकर लोगों की ये सारी बातें, मध्य प्रदेश में बीजेपी के बड़े चुनावी अभियान के उस विरोधाभास को दिखाती हैं, जहाँ एक तरफ़ पार्टी यह दिखाने का काम कर रही है कि वह शिवराज सिंह चौहान के बिना सब कुछ कर रही है, वहीं दूसरी तरफ यह भी मान रही है कि वे मध्य प्रदेश में पार्टी का सबसे जाना-माना चेहरा हैं.

पार्टी का काम, शिवराज सिंह के साथ जुड़ने वाले थकान फैक्टर को कम करना और लीडरशिप के सवाल पर कोई साफ़ जवाब नहीं देना है, ताकि अलग-अलग नेताओं के साथ जुड़ा बीजेपी कैडर, पार्टी की जीत के लिए कड़ी मेहनत करे.

अख़बार को बीजेपी के वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया, “दिमनी में नरेंद्र सिंह तोमर, नरसिंहपुर में प्रह्लाद पटेल, निवास से फग्गन सिंह कुलस्ते जैसे सभी बड़े नेताओं के साथ अच्छा जनाधार और कैडर जुड़ा हुआ है. नेतृत्व के सवाल को भ्रमित कर हाईकमान को उम्मीद थी कि इससे कैडर मज़बूत होगा.

अखबार के मुताबिक़ यह कुछ हद तक हुआ है और इसने शिवराज सिंह चौहान को पहले की तरह पार्टी के चुनावी अभियान के अंदर मुख्य भूमिका लेने से भी नहीं रोका है.

शिवराज सिंह चौहान का बड़ा चुनावी अभियान राज्य में लागू की गई लाडली बहना योजना है, जिसके तहत महिलाओं को हर महीने 1250 रुपए दिए जा रहे हैं.

वे चुनावी सभाओं में खुद को ‘मामा’ की तरह पेश करते हैं, यानी वे बताते हैं कि महिलाओं के भाई हैं और अगर बीजेपी जीतकर सत्ता में वापस नहीं आई, तो लाडली बहना योजना बंद हो सकती है.

अख़बार के मुताबिक़ यह साफ़ है कि शिवराज सिंह चौहान का सूर्यास्त इतनी जल्दी होने वाला नहीं है.

नीतीश कुमार

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विपक्षी गठबंधन इंडिया में कांग्रेस से नाराज़ नीतीश

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विपक्षी गठबंधन इंडिया में कांग्रेस पार्टी की भूमिका को लेकर सवाल उठाए हैं.

इस खबर को इंडियन एक्सप्रेस अख़बार ने आठवें पन्ने पर जगह दी है.

सीपीआई के आयोजित की गई 'भाजपा हटाओ, देश बचाओ' रैली में बोलते हुए नीतीश कुमार ने कहा, “आज केंद्र में जो सरकार है, उसका आजादी से कोई लेना-देना नहीं है.''

देश में आज़ादी की लड़ाई हुई और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को ये लोग ख़त्म कर देना चाहते हैं. इसलिए हम लोगों ने सभी दलों के साथ बातचीत की और कहा कि एकजुट हों और जो देश के इतिहास को बदल रहे हैं, उसे बचाइये और इससे मुक्ति पाना है तो सब एकजुट होकर लड़ें.”

उन्होंने कहा, “इसके लिए पटना और अन्य जगह मीटिंग हुई और उसके बाद यह तय हो गया है इंडिया गठबंधन बना. यह तेजी से हुआ, लेकिन अभी काम तेज़ी से नहीं हो रहा है. पांच जगह पर विधानसभा का चुनाव है, कांग्रेस पार्टी तो उसी में ज्यादा इंटरेस्टेड है, अभी तो हम लोग कांग्रेस पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए हम लोग एकजुट होकर काम कर रहे थे, लेकिन अभी उनको इस सब चीज की चिंता नहीं है.”

नीतीश कुमार ने कहा, “अभी तो लगे हुए पांच राज्य के चुनाव में. इसलिए पांच राज्य का चुनाव होगा, तो उसके बाद बुलाएंगे कि आज कर लो, कभी कोई चर्चा नहीं हो रही है. हम तो देश को एकजुट करने के लिए और देश के इतिहास को बदलना चाहते हैं, उसे ठीक करने के लिए हम कर रहे हैं.‌”

अख़बार ने कांग्रेस के सूत्रों के हवाले से लिखा है कि पार्टी का मानना है कि विधानसभा चुनावों के बाद सीट शेयरिंग को लेकर बातचीत को तवज्जो देगी, क्योंकि कांग्रेस को उम्मीद है कि विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करने से वह अच्छी सौदेबाजी कर पाएगी.

पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में सिर्फ तेलंगाना ही ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस और वाम दलों के बीच समझौता होने की संभावना दिख रही है.

अख़बार के मुताबिक़ समाजवादी पार्टी और जेडीयू ने सार्वजनिक रूप से कांग्रेस को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की है.

मध्य प्रदेश में करीब 10 उम्मीदवारों को मैदान में उतारने वाली जेडीयू के वरिष्ठ नेता के सी त्यागी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि यह पूरी तरह से कांग्रेस की जिम्मेदारी थी कि वह हमें लेकर चले, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

वहीं राज्य में समाजवादी पार्टी 40 से ज्यादा उम्मीदवारों के साथ मैदान में है. पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा है कि उन्हें सीट शेयरिंग को लेकर कांग्रेस ने लटकाए रखा.

उन्होंने पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस को भी उत्तर प्रदेश में इसी चीज का सामना करना पड़ सकता है.

चुनावी चंदे पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

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चुनावी चंदे पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

राजनीतिक दलों को चुनावी बॉन्ड के जरिए मिले चंदे के सोर्स को जानने के हक पर सुप्रीम कोर्ट में क्या सुनवाई हुई, इस खबर को जनसत्ता अखबार ने अपनी लीड बनाया है.

अखबार के मुताबिक चुनावी बांड योजना-2018 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने गुरुवार को कहा कि सरकार की इस दलील को स्वीकार करना थोड़ा मुश्किल है कि मतदाताओं को राजनीतिक दलों के चंदे के सोर्स के बारे में जानने का अधिकार नहीं है.

रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को भारतीय निर्वाचन आयोग को 30 सितंबर, 2023 तक चुनावी बांड के माध्यम से राजनीतिक दलों को मिलने वाले धन की जानकारी सीलबंद लिफाफे में पेश करने का निर्देश दिया है.

खबर के मुताबिक शीर्ष अदालत ने सुझाव दिया है कि मौजूदा योजना में गंभीर खामिया हैं, जिन्हें दूर कर एक बेहतर चुनावी बांड योजना तैयार की जा सकती है.

जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा, ‘क्यों न सब कुछ जाहिर कर दिया जाए….जैसा कि यह है, हर कोई इसके बारे में जानता है(चुनावी बांड के जरिए चंदा). पार्टी इसके बारे में जानती है. एकमात्र व्यक्ति जो वंचित है वह मतदाता है.

जस्टिस खन्ना ने कहा, ‘इस अदालत ने के कई फैसलों के बाद आपकी यह दलील कि मतदाताओं को जानने का अधिकार नहीं है, को स्वीकार करना थोड़ा मुश्किल है.'

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