धर्म बनाम जाति: 2024 चुनाव के लिए क्या बीजेपी के ख़िलाफ़ 'इंडिया' ने एजेंडा तय कर दिया है?- नज़रिया

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- Author, नलिन वर्मा
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार की नीतीश कुमार सरकार ने महात्मा गांधी की जयंती के दिन राज्य के जातिगत सर्वे की रिपोर्ट को जैसे ही जारी किया, उसके तुरंत बाद राहुल गांधी ने ट्वीट कर लिखा कि बिहार की जातिगत जनगणना से पता चला है कि वहां ओबीसी, एससी और एसटी की आबादी 84 प्रतिशत है.
राहुल गांधी ने लिखा, “केंद्र सरकार के 90 सचिवों में सिर्फ 3 ओबीसी हैं, जो भारत का मात्र 5 प्रतिशत बजट संभालते हैं. इसलिए भारत के जातिगत आंकड़े जानना ज़रूरी है. जितनी आबादी, उतना हक- ये हमारा प्रण है.”
राहुल गांधी का ट्वीट राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के ट्वीट से मेल खाता है. वे लिखते हैं, “जितनी संख्या, उतनी हिस्सेदारी हो.”
लालू प्रसाद यादव ने कहा कि अगर विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' सत्ता में आता है, तो राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना करवाई जाएगी.
जाति सर्वे को लेकर जो रिपोर्ट हमारे सामने आई है, उससे यह साफ है कि 28 पार्टियों वाला विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' इसका इस्तेमाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से बाहर करने के अपने चुनावी अभियान में ज़रूर करेगा.
विपक्षी गठबंधन केंद्र सरकार को घेरने के लिए ओबीसी के प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाएगा और यह 2024 के चुनावों में बीजेपी की हिंदुत्व की राजनीति को मात देने में एक हथियार की तरह काम आएगा.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस मुद्दे पर विपक्षी गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस का बिहार में आरजेडी, जेडीयू और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ पूरी तरह से तालमेल है.
इंडिया गठबंधन के लिए ये एक अच्छी खबर है.

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पिता राजीव से अलग है राहुल का रुख़
शासन में पिछड़ों और दलितों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने का जो संकल्प राहुल गांधी का है, वह उनके पिता राजीव गांधी से अलग है. साल 1990 में लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में राजीव गांधी ने मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू करने का विरोध किया था.
इस रिपोर्ट के बाद ही प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने नौकरियों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत कोटा लागू किया था.
राजीव गांधी ने तब सरकारी नौकरियों में चयन के लिए जाति की बजाय योग्यता की वकालत की थी. हालांकि गरीबों और वंचितों के नेता के तौर राहुल गांधी एक नए अवतार में सामने आए हैं.
उन्होंने कांग्रेस पार्टी के सत्ता में रहते हुए ओबीसी को उसकी हिस्सेदारी न दिला पाने के लिए दुख जाहिर किया है और कहा कि वे इसे पूरा करेंगे.
बिहार में ओबीसी की बड़ी आबादी ने कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' की दूसरी पार्टियों को बीजेपी के आक्रामक रूप से ओबीसी कार्ड इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया है.
सोमवार को जारी किए गए जाति आधारित सर्वे के आंकड़े भी इस बात को प्रमाणित करते हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक़, बिहार की आबादी में 63.13 प्रतिशत ओबीसी हैं, जिसमें 36.01 प्रतिशत अत्यंत पिछड़ा वर्ग, 27.12 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग शामिल हैं. इसके अलावा 19.65 प्रतिशत अनुसूचित जाति की आबादी है.

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सर्वे के मुताबिक़, राज्य में सामान्य जाति की जनसंख्या 15.52 प्रतिशत है, जिसमें ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ शामिल हैं. इन जातियों के बारे में माना जाता है कि ये बड़े पैमाने पर बीजेपी का समर्थन करती हैं.
हालांकि इस 15.52 प्रतिशत में मुसलमानों की करीब पांच प्रतिशत जातियां भी शामिल हैं, जिसका मतलब है कि बिहार में अपर कास्ट हिंदुओं की संख्या क़रीब दस प्रतिशत है.
देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा राहुल गांधी ने हिंदी पट्टी के उन राज्यों में ओबीसी की हिस्सेदारी को प्रमुख मुद्दा बनाया है, जहां चुनाव होने हैं. इन राज्यों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान शामिल हैं.
मध्य प्रदेश में अपनी हालिया चुनावी रैली में राहुल गांधी ने कहा था कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो राज्य में जाति सर्वे करवाया जाएगा.
विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' की पार्टियों के बीच यह आम धारणा है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में फैली एक बड़ी आबादी को बिहार की मदद से समझा जा सकता है.
इसका मतलब है कि इन राज्यों को समझने के लिए बिहार का जाति सर्वे काफी मदद कर सकता है.
'इंडिया' गठबंधन के समर्थक सोशल मीडिया पर सवाल कर रहे हैं कि केंद्र सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को दस प्रतिशत आरक्षण क्यों दिया है, जबकि उनकी आबादी सिर्फ दस प्रतिशत है. समर्थकों का मानना है कि राज्य में ओबीसी की आबादी 63.13 प्रतिशत है, जबकि उन्हें आरक्षण सिर्फ 27 प्रतिशत मिल रहा है.
सोशल मीडिया पर कुछ लोग इसे इस तरह देख रहे हैं कि बीजेपी, अपर कास्ट हिंदुओं को फायदा पहुंचाने के लिए ओबीसी को दबा रही है.

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बीजेपी के लिए कितना मुश्किल
जाति सर्वे के आंकड़े यह भी बताते हैं कि लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार बिहार में सबसे शक्तिशाली नेता हैं और इन दोनों नेताओं का एक साथ आना कैसे बीजेपी को राज्य में खत्म कर सकता है.
लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी ने 1990 से 2005 तक बिहार में शासन किया है.
मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद लालू प्रसाद यादव, ओबीसी एक बड़े शक्तिशाली नेता के रूप में सामने आए. उन्हें मुसलमानों का भी समर्थन हासिल था, जिनकी आबादी सर्वे के मुताबिक बिहार में 17.70 प्रतिशत है.
यही एक बड़ा कारण था कि लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी 15 सालों से भी ज्यादा बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज रहे.
नवंबर 2005 में बीजेपी के साथ गठबंधन कर नीतीश कुमार ने लालू-राबड़ी शासन को सत्ता से बाहर कर दिया.

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नीतीश की सोशल इंजीनियरिंग
2013-14 में 9 महीनों के लिए नीतीश कुमार ने जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था. इन 9 महीनों को छोड़कर वे साल 2005 से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने हुए हैं.
अपनी सोशल इंजीनियरिंग के जरिए नीतीश कुमार ने अत्यंत पिछड़ा वर्ग(ईबीसी) के एक बड़े हिस्से को तोड़ दिया और उन्हें पिछड़े वर्ग की तुलना में स्थानीय निकायों और नौकरियों में ज्यादा आरक्षण दिया, जिससे इस वर्ग में नीतीश कुमार का प्रभाव बढ़ा.
ईबीसी के समर्थन की मदद से ही नीतीश कुमार, बिहार में लालू प्रसाद यादव को सत्ता से बाहर कर पाए थे. सर्वे के मुताबिक ईबीसी की आबादी 36.01 प्रतिशत है, वहीं पिछड़ा वर्ग की आबादी 27.12 प्रतिशत है. यह ईबीसी के बीच नीतीश कुमार के दबदबे के कारण ही संभव है कि वे इतने लंबे समय से बिहार के मुख्यमंत्री बने हुए हैं.
चाहे वह बीजेपी हो या राष्ट्रीय जनता दल, नीतीश कुमार जिस भी पार्टी के साथ गठबंधन करते हैं, उसे जीत दिलवाते हैं.
2024 के चुनावों में बीजेपी ने बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से 32 पर जीत दर्ज की थी और केंद्र में अपनी सरकार बनाई थी. हालांकि जब नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने 2015 में बीजेपी को करारी हार देते हुए हाथ मिलाया था, तो जेडीयू-आरजेडी और कांग्रेस गठबंधन ने राज्य की 243 सीटों में से 178 सीटों पर विजय प्राप्त की थी. इस चुनाव में बीजेपी के खाते में महज 53 सीटें आई थीं.
साल 2017 में जब नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ हाथ मिलाया तो वह फिर से मजबूत हो गई. 2019 के आम चुनावों में जेडीयू-बीजेपी गठबंधन ने बिहार की 40 में से 39 सीटों पर जीत दर्ज की थी.
मौजूदा समय में अगर बिहार के सत्तारूढ़ गठबंधन की बात करें तो इसमें जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस के साथ वाम पार्टियां भी शामिल हैं. यही वजह है कि विपक्षी गठबंधन को ये लग रहा है कि कम से कम बिहार के अंदर तो आम चुनावों में बीजेपी का सफाया किया जा सकता है.

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बीजेपी ने बढ़ाई मुश्किलें?
जब नीतीश कुमार और बिहार के उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के साथ कई लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर देश में जाति सर्वे करवाने के लिए कहा था, तो उन्होंने मना कर दिया था.
हालांकि प्रधानमंत्री ने नीतीश कुमार को राज्य के पैसों और संसाधनों से सर्वे कराने का सुझाव दिया था, लेकिन उनकी सरकार और पार्टी ने राज्य में सर्वे करवाने के रास्ते में कई मुश्किलें पैदा करने का काम किया.
देश के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर बिहार में जाति सर्वे पर आपत्ति जताई थी, हालांकि बाद में सरकार ने अपना विरोध वापस ले लिया था.
बीजेपी के समर्थकों ने इस सर्वे को पटना हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिससे इसे करवाने में बिहार सरकार को मुश्किलों का सामना करना पड़ा.
आखिर में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को जाति सर्वे के लिए हरी झंडी दिखाई.
अब बीजेपी परेशान नजर आ रही है. राज्यसभा में पार्टी के सांसद और वरिष्ठ नेता सुशील कुमार मोदी ने एक वीडियो मैसेज में बिहार में हुए जाति सर्वे का श्रेय लिया है.
उनका कहना है कि यह फैसला तब हुआ था, जब बिहार में जेडीयू और बीजेपी की सरकार गठबंधन में थी.
वहीं केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का कहना है कि जातीय जनगणना बिहार की गरीब जनता में भ्रम फैलाने के सिवा कुछ नहीं है.
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