बिहार में जातिगत सर्वे से मुसलमानों को कितना फ़ायदा?

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- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार सरकार ने जातिगत सर्वे के आंकड़े सार्वजनिक कर दिए हैं. सर्वे के मुताबिक़ बिहार की कुल आबादी 13 करोड़ है. इसमें 81.99 फ़ीसदी हिंदू और 17.70 फ़ीसदी मुसलमान हैं.
इन आंकड़ों के आने के बाद मुस्लिमों के लिए ज्यादा राजनीतिक हिस्सेदारी की मांग उठने लगी है.
राजनीतिक नेतृत्व में मुस्लिम भागीदारी बढ़ाने की मांग करने वालों को कहना है कि बिहार में 14 फीसदी यादव और तीन फीसदी कुर्मी जाति से आने वाले मुख्यमंत्री पिछले 33 साल से शासन कर रहे हैं. लेकिन वहां मुसलमान हाशिये पर रहे हैं.
उनका कहना है कि भले ही लालू यादव और नीतीश कुमार की जीत में मुसलमानों की अहम भूमिका रही हो लेकिन बिहार में आज तक मुस्लिमों के बीच से कोई मजबूत राजनीतिक नेतृत्व नहीं उभर सका है.
राजनीतिक दलों में ज्यादातर नुमाइंदगी अगड़े मुसलमानों की ही है. पिछड़े यानी पसमांदा मुसलमानों की नुमाइंदगी नाम मात्र है.
बिहार में मुसलमान और यादव यानी ‘माय’ समीकरण पहले से मौजूद था. लेकिन क्या अब जाति सर्वे में मुस्लिमों की आबादी 17 फीसदी से ज्यादा होने की पुष्टि होने के बाद राजनीतिक दलों को उन्हें ज्यादा तवज्जो देनी होगी.
क्या सरकार के लिए शिक्षा,नौकरी और विधानसभा में उनके लिए ज्यादा नुमाइंदगी के इंतज़ाम करने होंगे.
क्या इस जातिगत सर्वे से मुस्लिमों के लिए कुछ बदलेगा? उससे भी बड़ा सवाल ये है कि जातिगत सर्वे में मुसलमानों की आबादी के आंकड़े आने के बाद नीतियां बनाते समय अशऱाफ (अगड़े मुसलमान) मुसलमानों के बजाय अजलाफ़ और अरज़ाल को तवज्जो दी जाएगी.
अगड़े और पिछड़े मुसलमान

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आम धारणा ये है कि मुसलमानों में जाति के आधार पर कोई भेद ही नहीं है. लेकिन भारत के मुसलमान वर्गों और जातियों में बंटे हुए हैं.
हालांकि जाति के नाम पर उनमें उतने गंभीर मतभेद नहीं हैं जितना हिंदुओं में.
भारतीय मुसलमान मूल रूप से तीन जाति समूहों में बंटे हुए हैं- 'अशराफ़', 'अजलाफ़', और 'अरज़ाल'. ये जातियों के समूह हैं, जिनमें अलग-अलग जातियां शामिल हैं.
हिंदुओं में जैसे ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र वर्ण होते हैं, वैसे ही अशराफ़,अजलाफ़ और अरज़ाल को देखा जाता है.
पूरे देश की तरह बिहार में भी अगड़ी जाति के मुसलमानों को तीन वर्गों में बंटे हैं- सैयद, शेख और पठान.
जातिगत सर्वे के मुताबिक़ बिहार के मुस्लिमों की आबादी 17.7 फीसदी है. इनमें चार से साढ़े चार फ़ीसदी आबादी अगड़े मुस्लिमों की है.बाकी आबादी पिछड़े यानी पसमांदा और दलित मुसलमानों की है.
अगड़ी जाति में सबसे बड़ी संख्या शेख मुसलमानों की है. इनकी तादाद 3.8217 फ़ीसदी है.इसके बाद पठान 0.7548 फीसदी और फिर सैय्यद 0.2279 फ़ीसदी हैं.
इनके अलावा बाकी पिछड़े या पसमांदा और दलित मुस्लिम हैं.
पिछड़ों में मदरिया,नालबंद,सुरजापुरी,अंसारी और मलिक मुस्लिम शामिल हैं. पिछड़े या पसमांदा मुसलमानों में सबसे अधिक आबादी मोमिन अंसारी की है.
वहीं दूसरी बड़ी आबादी सुरजापुरी मुस्लिमों की है.पिछड़ी जाति में आने वाले चिक मुस्लिमों की जनसंख्या 0.0386 फीसदी, कसाई 0.1024 फीसदी, डफाली 0.056 फीसदी, धुनिया 1.4291 फीसदी, नट 0.0471 फ़ीसदी हैं.
पमरिया 0.0496 फ़ीसदी,भटियारा 0.0209 फ़ीसदी,भाट 0.0681 फ़ीसदी और मेहतर 0.0535 फ़ीसदी हैं.
कुल्हैया 0.9591, जाट 0.0344, धोबी 0.3135 फ़ीसदी, सेखदा 0.1904 फ़ीसदी, गद्दी 0.0441 फ़ीसदी, लालबेगी की आबादी 0.0021 और हलालखोर की आबादी 0.0058 फ़ीसदी है.
‘जातिगत सर्वे पिछड़े मुसलमानों के लिए फायदेमंद’

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पूर्व सांसद और पिछड़े, दलित मुस्लिमों के हकों के लंबा आंदोलन चलाने वाले अली अनवर ने इस जातिगत सर्वे में धर्म के नाम पर गिनती पर आपत्ति जताई है.
बीबीसी हिंदी से बातचीत में उन्होंने कहा कि जब जातिगत सर्वे हो रहा हो तो मुसलमान, ईसाई या बौद्ध के नाम पर गिनती करना ठीक नहीं है.
हालांकि वो कहते हैं कि अब इस सर्वे से अगड़े और पिछड़े मुसलमानों की आबादी के जो आंकड़े आए हैं, उसने ये साबित कर दिया कि मुस्लिम समुदाय एक नहीं है. इसमें भी जाति भेद है.
इससे पिछड़े यानी पसमांदा मुस्लिमों के हक के लिए चलाए जा रहे उनके आंदोलन का औचित्य साबित हो गया है.
वो कहते हैं कि पहली बार ऐसा हुआ है जब मुसलमानों में पिछड़ों और दलितों की गिनती हुई है.
अली अनवर ने ही पहली बार 18 दिसंबर 2009 को राज्यसभा में जाति जनगणना की मांग उठाई थी.
अली अनवर के मुताबिक़ सर्वे ने यह साबित कर दिया है कि मुसलमानों में पसमांदा की आबादी अगड़े मुसलमानों की तुलना में काफी ज्यादा है लेकिन राजनीतिक दलों में उनका प्रतिनिधित्व काफी कम हैं.
नीतीश सरकार के पांच मुसलमान मंत्रियों में सिर्फ एक पसमांदा है.
वो कहते हैं, "इस सर्वे के बाद सरकार को अब पसमांदा और दलित मुसलमानों की सहूलियतों के लिए ज्यादा इंतजाम करने होंगे. इससे इस बात का दबाव बढ़ेगा कि उन्हें शैक्षणिक संस्थानों, नौकरियों और विधानसभा में ज्यादा प्रतिनिधित्व मिले.जाहिर तौर पर ये ‘जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का सवाल है.’’

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हालांकि मुसलमानों और उनमें भी पिछड़े मुसलमानों के आर्थिक और सामाजिक तरक्की के लिए सरकार की ओर से ज्यादा प्रावधान किए जाने की मांग पर वरिष्ठ आरजेडी नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं,’’अभी तो आंकडे़ आए ही हैं. अभी से कैसे कहा जा सकता है कि क्या होगा. ये सिर्फ मुसलमानों का ही सवाल नहीं है. ये अति पिछड़ों का भी सवाल है. उनकी आबादी 36 फ़ीसदी है. वो भी एक उपेक्षित तबका है, जिसमें कुछ लोगों की हालत तो दलितों से भी खराब है.’’
क्या जातिगत सर्वे के बाद सरकार पिछड़े मुसलमानों की भलाई पर ज्यादा ध्यान देगी?
इस सवाल पर शिवानंद तिवारी कहते हैं, "देखिये, देश में मुसलमानों की स्थिति पर सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के बाद कुछ कार्यक्रम शुरू किए थे.लेकिन अब सुनने में आ रहा है कि आबादी में काफी कम होने के बावजूद शिक्षा, नौकरियों और राजनीति में अशराफ मुसलमानों का ही कब्जा है. तो ये बहुत जटिल मामला है.हिंदुस्तान की जाति व्यवस्था ‘अद्भुत’ है.’’
तिवारी कहते हैं, "अभी तो सिर्फ मुसलमानों की गिनती सामने आई है.उनके सामाजिक आर्थिक हालात के आंकड़े सामने नहीं आए हैं. इन आंकड़ों पर गौर करने के बाद ही सरकार कोई नीति बनाएगी. लेकिन इतना तय है कि पिछड़े मुसलमानों के लिए ज्यादा सहूलियतें मुहैया कराई जाएंगीं.’’
मुसलमानों की राजनीतिक नुमाइंदगी कितनी बढ़ेगी?

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बीजेपी कुछ वक्त़ से पसमांदा मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रही है.
ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि पसमांदा मुसलमानों की गिनती सामने आने के बाद बीजेपी उन्हें टिकट देने में दिलचस्पी दिखाती है नहीं.
चुनाव में मुस्लिमों को टिकट देने के मामले में बिहार में भी बीजेपी ने यूपी जैसी ही नीति अपना रखी है. बिहार में 17.7 फीसदी और यूपी में 19 फीसदी मुस्लिम आबादी होने के बावजूद बीजेपी ने उन्हें एक भी टिकट नहीं दिया.
2017 में यूपी में 384 सीटोंं में बीजेपी ने एक भी मुसलमान उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था.
जबकि बिहार में 2020 के चुनाव में आरजेडी ने मुसलमान उम्मीदवारों को 16 टिकट दिए थे. कांग्रेस ने दस सीटें दी थीं. जनता दल (यूनाइटेड) 101 सीटों पर चुनाव लड़ी थी लेकिन सिर्फ सात सीटों पर उसने मुसलमान उम्मीदवार खड़े किए थे.
अली अनवर कहते हैं, "राजनीतिक दलों को अब ज्यादा मुसलमान उम्मीदवार खड़े करने होंगे. वो अब सिर्फ चंद अशराफ़ मुसलमानों को राज्यसभा में भेज कर जिम्मेदारी से बच नहीं सकते.जाति सर्वे में पसमांदा मुसलमानों की आबादी सामने आने के बाद राजनीतिक दलों पर उन्हें ज्यादा नुमाइंदगी देने का दबाव बढ़ गया है.’’
आरक्षण का सवाल

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हालांकि कुछ पसमांदा मुसलमानों को ओबीसी कैटेगरी के तहत आरक्षण मिलता है. लेकिन अब बिहार में मुसलमानों को आरक्षण देने की मांग उठ सकती है.
भारत के संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण देने का प्रावधान नहीं है. ऐसे में बिहार में मुसलमानों को आरक्षण कैसे दिया जा सकता है.
अली अनवर कहते हैं, "ये आरक्षण जाति के आधार पर दिया जा सकता है. जैसे बिहार में पंचायत चुनाव में अति पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण है. इस आरक्षण का लाभ हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के अति पिछड़े वर्ग के लोगों को मिलता है. धार्मिक आधार पर आरक्षण देने पर इसे कोर्ट में चैलेंज किया जा सकता है.’’
अली अनवर कहते हैं कि कर्नाटक में मुसलमानों को मिल रहे चार फीसदी आरक्षण को इसी आधार पर चैलेंज किया गया था. हालांकि इस आरक्षण का फायदा भी अशराफ़ मुसलमान ही उठा रहे थे.
देश में जातीय जनगणना से मुसलमानों को कितना फ़ायदा

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देश में हर दस साल के बाद जनगणना होती है. इसमें किसी जाति की कितनी संख्या है, उसका विवरण नहीं होता. पहली बार ऐसा है कि हर दशक में होने वाली जगणना में देरी हो रही है, जो जनगणना 2021 में होने वाली थी, वह अभी तक नहीं हुई है और कब होगी, इसको लेकर भी स्पष्टता नहीं है.
इस बीच देश में जातिगत गणना की मांग तेजी से उठी है. हाल में राहुल गांधी ने जातिगत जनगणना की मांग उठाई है. भारत में जातिगत जनगणना की मांग कई दशक पुरानी है.
इसका मक़सद अलग-अलग जातियों की संख्या के आधार पर उन्हें समाज के हर क्षेत्र में उचित प्रतिनिधित्व मुहैया कराना है. ज़रूरतमंदों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना भी इसका मकसद है.
माना जाता है कि बीजेपी को इस तरह की जनगणना से डर यह है कि इससे अगड़ी जातियों के उसके वोटर नाराज़ हो सकते हैं, इसके अलावा बीजेपी का परंपरागत हिन्दू वोट बैंक इससे बिखर सकता है.
अगर देश में जातीय जनगणना होती है तो हर धर्म में मौजूद जातियों की तरह मुसलमानों की जातियों का भी पता चलेगा. तब उन्हें भी उस हिसाब से समाज के हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व देने का दबाव बना सकता है.
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