दंगों के 10 साल बाद मुज़फ़्फ़रनगर में 'इंसाफ़ नहीं', सुलह से लौटती शांति, ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुज़फ़्फ़रनगर से लौटकर
जले हुए घरों से उठता धुआं, सिसकती महिलाएँ, कैंपों में पड़े बेबस-बदहवास लोग, हर दिल में दहशत-हर आंख में खौफ़.
ये मिली-जुली आबादी वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर और आसपास के इलाक़ों में भड़की सांप्रदायिक हिंसा का मंज़र था.
2002 के गुजरात दंगों के बाद देश की इस सबसे बड़ी सांप्रदायिक हिंसा में अनेक लोग मारे गए, हजारों बेघर हुए और सदियों से क़ायम आपसी भरोसा टूट गया.
लेकिन ये हिंसा अचानक नहीं हुई.
2012 में उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मिली-जुली आबादी वाले ज़िलों में हो रही छोटी-बड़ी घटनाओं से सांप्रदायिक तनाव पनप रहा था.
27 अगस्त 2013 को मुज़फ़्फ़रनगर के कवाल गांव में हुई एक आपराधिक घटना ने इस तनाव को सतह पर ला दिया.

सचिन और गौरव नाम के दो हिंदू जाट युवकों ने शाहनवाज़ नाम के एक मुसलमान युवक की हत्या कर दी.
मौक़े पर मौजूद भीड़ ने सचिन और गौरव को वहीं पीट-पीट कर मार दिया.
मीडिया के एक वर्ग ने इस घटना को ‘हिंदू बहन की इज्जत बचाने के लिए भाइयों के जान क़ुर्बान करने’ की कहानी के रूप में पेश किया.
सचिन और गौरव की हत्या की एफ़आईआर में दर्ज है कि ये घटना ‘मोटरसाइकिल टकराने से हुई नोकझोंक’ से शुरू हुई थी.
व्हाट्सएप और सोशल मीडिया पर सचिन और गौरव की ‘पीट-पीट कर हत्या’ के फ़र्ज़ी वीडियो लोगों को भड़का रहे थे.
शाहनवाज़ की हत्या के आरोप में सचिन और गौरव के परिजनों पर हुई एफ़आईआर ने इस आक्रोश को और बढ़ा दिया.

समाजवादी पार्टी की सरकार के रातोंरात ज़िलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक का तबादला कर दिया, इसे जाट समुदाय ने ‘एकतरफ़ा कार्रवाई’ के रूप में देखा.
जाट समुदाय एकजुट होने लगा. कई महापंचायतें हुई. तीखी बयानबाज़ियां हो रहीं थीं. उत्तेजक नारे लगाए जा रहे थे. धार्मिक उन्माद बढ़ रहा था. माहौल गर्म था.
सात सितंबर को नगला मंदौड़ गांव में हुई महापंचायत के बाद हिंसा भड़क उठी. कई गांवों में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सीधा टकराव हुआ.
अफवाहों, अविश्वास और आक्रोश ने इस टकराव को बड़े सांप्रदायिक दंगे में बदल दिया.
शाम होते-होते मुज़फ़्फ़रनगर सुलग उठा. हिंसा उन गांवों तक फैल गई जहां सदियों से हिंदू-मुसलमान मिल-जुल कर रह रहे थे.

उत्तर प्रदेश सरकार को हालात नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय सुरक्षा बल बुलाने पड़े.
दंगे की आग जब ठंडी हुई, 64 लोग मारे जा चुके थे, जिनमें हिंदू और मुसलमान दोनों थे. मौतें और भी हुईं लेकिन वो रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं हैं.
हज़ारों मुसलमान, अपना सब कुछ छोड़कर जान बचाने के लिए भागे, इनमें से अधिकतर फिर कभी अपने गांव नहीं लौट सके.
रातोरात मुस्लिम बहुल बस्तियों में 60 से अधिक राहत कैम्प खड़े हो गए. अगले कई महीनों तक लोग सर्द मौसम में तंबुओं में रहे. कैम्पों में जन्म ले रहे बच्चों की मौतें सुर्ख़ियां बननें लगी.
अमानवीय हालात में रहने को मजबूर लोगों की मौतें कभी आंकड़ों में शामिल नहीं हो सकीं. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया कि क़रीब सौ जानें (जिनमें बच्चे भी शामिल थे) कैम्पों में ख़राब हालात की वजह चली गईं.
बदल गया गांवों का नक़्शा

मुज़फ़्फरनगर के पलड़ा गांव से कुटबा-कुटबी गांव की दूरी महज़ पांच किलोमीटर है, लेकिन शमशाद और उन जैसे सैकड़ों लोगों के लिए ये फासला तय करना आसान नहीं.
शमशाद के पिता, दादा और उनसे पिछली कई पीढ़ियां मुज़फ्फरनगर के कुटबा गांव में पैदा हुईं और यहीं दफन हो गईं. लेकिन शायद शमशाद और गांव छोड़कर गए उन जैसे मुसलमानों को अब अपने पुश्तैनी गांव में क़ब्र नसीब ना हो.
केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान का गांव कुटबा भी प्रभावित गांवों में से एक है. दंगों से पहले यहां क़रीब ढाई हज़ार मुसलमान रहते थे, अब यहां सिर्फ वीरान मस्जिदें और ईदगाह ही कभी यहां आबाद रहे मुसलमानों की आख़िरी निशानी हैं.
कुटबा गांव की शुरुआत क़ब्रिस्तान और उससे सटी ईदगाह से होती है. अब क़ब्रिस्तान में उग आई ऊंची घास के बीच अपनों की क़ब्र खोजना आसान नहीं है. ईदगाह में अब गोबर और कूड़े का ढेर है, दीवारों पर काई है और जगह-जगह झाड़-झंखाड़ उग आए हैं.

क़ब्रिस्तान में दाख़िल होते ही उदासी शमशाद को घेर लेती है. झाड़ियों के बीच छुपी क़ब्रों की तरफ़ वो इशारा करते हुए कहते हैं, “उधर मेरे अब्बा और दादा दफ़न है. पहले यहां साफ़ सफ़ाई रहती थी, अब बस कूड़े के ढेर हैं.”
ईदगाह को दिखाते हुए उनकी आंखों में आंसू आ गए. शमशाद कहते हैं, “पहले यहां ईद होती थी, ख़ुशी होती थी. अब सब वीरान है.”
यहां आठ मुसलमानों को मार दिया गया था और उनके घरों में आग लगा दी गई थी. दंगे के दौरान यहां से भागे लोग फिर नहीं लौटे.
अधिकतर ने अपने घर बेच दिए. लेकिन मौसम जैसे कुछ लोग हैं जो गांव में अपने घर को पुश्तैनी निशानी के रूप में बचाये रखना चाहते हैं.

अपने वीरान पड़े घर में दाखिल होते हुए मौसम उदास हो जाते हैं. कभी उनके पड़ोसी रहे लोग हालचाल पूछते हैं तो वो मायूस होकर कहते हैं, “सब ठीक है.”
लेकिन ये कहने की बात है, उनकी जिंदगी गांव से उजड़ने के बाद पटरी पर नहीं लौट सकी और ना ही कभी कुछ ठीक हो सका.
मौसम कहते हैं, “हम यहां लोहे का काम करते थे, अच्छी रोजी रोटी चल रही थी. दस साल बाद भी हमारा काम पहले जैसा नहीं हो सका है.”
क्या वो इस घर को बेचेंगे, इस सवाल पर एक लंबी खामोशी के
बाद वो कहते हैं, “पुरखों की ज़मीन है, नहीं बेचेंगे, ऐसे ही रहेगी.”
कुटबा गांव में जगह- जगह लोग ताश खेल रहे हैं. चौपालों पर भीड़ थी. गांव से उजड़े हुए कुछ मुसलमान जब मस्जिद की तरफ आगे बढ़े तो सबने उनका हालचाल पूछा. मैं अपने साथ चल रहे शमशाद से कहता हूं, क्या कभी गांव वापस आने का सोचा है. वो बस इतना ही कहते हैं, “उस ख़ौफ को भूलना आसान नहीं है.”
जो लौटा उसका क्या हाल है?

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यहां से करीब 25 किलोमीटर दूर शामली के लिसाढ़ गांव में दंगों से पहले क़रीब तीन हज़ार मुसलमान रहते थे. अब यहां सिर्फ़ एक ही परिवार बचा है. वो अभी अब गांव छोड़ने का सोचते हैं.
इसरार सैफ़ी का परिवार लिसाढ़ का अकेला मुसलमान परिवार है. वो लोहे का काम करते हैं. गांव के बीच में उनका घर है. उनके सगे रिश्तेदारों के घर अब वीरान पड़े हैं.
गांव में उनके परिवार का जीवन सीमित है. छोटा भाई और बहन पढ़ाई कर रहे हैं. आसपास के लोगों से उनकी ज़रूरत भर ही बात होती है. उनके चाचा के एक खाली घर में एक हिंदू पड़ोसी ने अपनी भैंसे बांध रखी है.
इसरार के परिवार ने भी पलायन किया था, लेकिन वो फिर लौट आये. उनके पास खेती की कुछ ज़मीन भी है. इसरार कहते हैं, “दंगों के बाद जिसने भी घर ज़मीन बेची, बहुत कम क़ीमत मिली. हमने अपनी पुश्तैनी ज़मीन को बचाए रखा है.”
उन्हें गांव में अब कैसा महसूस होता है? वो कहते हैं, “महसूस तो कुछ होता नहीं, ना ही अब कोई डर है. बस अपनों की याद आती है. पूरा ख़ानदान यहीं था. अब कोई नहीं है. कई बार बहुत अकेलापन महसूस होता है.”

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तो क्या वो भी एक दिन गांव से चले जाएंगे? इसरार कहते हैं, “जाना तो पड़ेगा, एक दिन तो गांव छोड़ना ही है, लेकिन मैं किसी के दबाव या डर में गांव नहीं छोड़ूंगा, जब भी छोड़ूंगा अपनी मर्ज़ी से छोड़ूंगा.”
लिसाढ़ गांव में तीन बड़ी मस्जिदें थीं. एक में ताला लगा है. एक के दरवाज़े को तोड़ दिया गया है. मस्जिद के मिंबर के पास शराब की बोतलें पड़ीं थीं. यहां की हालत देखकर लगता है कि अब यहां लोग बैठकर शराब पीते हैं.
तीसरी मस्जिद के चारों तरफ़ अब हिंदू आबादी है. यहां के मुसलमानों के अधिकतर मकान ख़रीद लिए गए हैं. ये मस्जिद बिलकुल साफ़ थी. एक मुसलमान का घर ख़रीदने वाला एक हिंदू परिवार इसकी साफ़ सफ़ाई करता है.
मस्जिद की सफ़ाई करने वाली हिंदू महिला कहती हैं, “पवित्र जगह है ये, गंदी रहेगी तो बुरा लगेगा. मेरी बेटियां यहां झाड़ू लगा देती हैं.”
क्या कभी लौट सकेंगे विस्थापित लोग?

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मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के दौरान क़रीब चालीस हज़ार लोगों ने पलायन किया था. ये सब हिंदू बहुल गांवों में बसे मुसलमान थे.
दंगों के समय कुछ हिंदू परिवारों ने भी पलायन किया था लेकिन ये कुछ दिनों के भीतर ही अपने घरों को लौट गए.
हिंदू बहुल गांवों से उजड़े लोगों ने अब अपनी बस्तियां बसा ली हैं.
लिसाढ़ छोड़कर आए अब्दुल बासित अब कांधला में एक ऐसी ही बस्ती में रहते हैं. दंगों के दस साल बाद भी उनकी ज़िंदगी पटरी पर नहीं आ सकी है.
अब्दुल बासित लिसाढ़ गांव की मस्जिद में इमाम थे. गांव में उनकी इज़्ज़त थी. काम धंधा सही चल रहा था.
सरकार ने उजड़े हुए परिवार के पुनर्वास के लिए पांच लाख रुपये की आर्थिक मदद की थी. पलायन करने वाले अधिकतर लोगों ने इस पैसे से नई जगह ज़मीन ख़रीदी और घर बनाये.

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अब्दुल बासित ने भी घर बनाया, लेकिन अभी ये अधूरा ही है.
अपना हाल सुनाते हुए अब्दुल बासित कहते हैं, “मेरा कच्चा मकान है, बारिश में छत टपकती है, बच्चों को एक वक़्त खाना मिलता है एक वक़्त नहीं मिलता. गांव छोड़कर आये अधिकतर लोग इसी हाल में है.”
पलायन करके आए लोगों के लिए नई जगह अपनी पहचान बनाना और घर बसाना मुश्किल था. ना वो ही इन जगहों को अपना सके और ना उन्हें ही पूरी तरह अपनाया गया.
बासित कहते हैं, “गांव में सब हमें समझते थे, हम गांव को समझते थे. सबको पता था कि हम क्या काम करते हैं. यहां के लोग हमें कुछ नहीं समझते हैं, उनके लिए हम तो भागे हुए लोग हैं.”
इन लोगों के दिल से ना गांव की याद गई है और ना दंगों का वो ख़ौफ़.

कुटबा और लिसाढ़ जैसे गांवों के लोग हिंसा में मारे गए और यहां से पलयान करने वाले लोगों के बारे में बात करने से हिचकते हैं.
कई को अफसोस है कि अब मज़दूर नहीं मिलते.
लिसाढ़ के एक बुज़ुर्ग कहते हैं, “उन लोगों से हमदर्दी थी, वो चारा काटते थे, बुग्गी बनाते थे, खेतों में काम करते थे. गांव को नुक़सान ही हुआ है क्योंकि अब काम करने के लिए मज़दूर नहीं मिलते.
दंगों के बाद पलायन करने वाले लोगों को वापस लाने के लिए कई पंचायतें भी हुईं थीं. लेकिन यहां से गए मुसलमानों में अब वापस लौटने की हिम्मत नहीं है.
कुटबा गांव के रहने वाले और केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान कहते हैं कि वे चाहते हैं कि गांव से गये लोग वापस लौटें..
बालियान कहते हैं, “शुरू में हमने प्रयास किया था का गांव में उन लोगों के घरों को कोई ना ख़रीदे. हम पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाये क्योंकि ये सामाजिक रूप से ही हो सकता था, ऐसा क़ानूनी तरीक़े से नहीं किया जा सकता."

बालियान कहते हैं, “मेरा इन लोगों से गांव का भावनात्मक रिश्ता है. कई ऐसे लोगों है जिन्होंने बचपन में मुझे खिलाया, मे इस रिश्ते को राजनीतिक या धार्मिक नज़रिये से नहीं देखता.”
संजीव बालयान भले ही दावा करते हैं कि वो लोगों को वापस लाना चाहते हैं, लेकिन पलायन करने वाले लोग डर की वजह वापस नहीं लौटना चाहते. विस्थापितों की वापसी के आसार दिखाई नहीं देते.
लिसाढ़ की लापता लाशें

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लिसाढ़ दंगे में सर्वाधिक प्रभावित गांवों में से एक है. यहां तेरह लोगों के मारे जाने की एफ़आईआर हुई. लेकिन गांव के अधिकतर लोग मारे गए लोगों के बारे में एक सुर में यही कहते हैं, ‘मारे कहां गए, वो तो कहीं भाग गए थे, होंगे कहीं.’
लिसाढ़ गांव के जिन तेरह लोगों की हत्या का मुक़दमा दर्ज हुआ था उनमें से दो की ही लाशें मिल सकी थीं. बाक़ी 11 लोगों के परिवारों को राज्य सरकार की तरफ़ से मुआवज़ा तो मिला लेकिन प्रशासन ने हिंसा में ‘लापता’ माने गए इन लोगों के डेथ सर्टीफ़िकेट जारी नहीं किए.
इस कारण इनके परिजनों को बाक़ी अन्य मृतकों के परिवारों की तरह सरकारी नौकरी नहीं मिल सकी.
रिज़वान एक छात्र हैं और लिसाढ़ में मारे गए अपने दादा का डेथ सर्टिफ़िकेट हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
रिजवान का कहना है कि उनके दादा कमरुद्दीन सैफ़ी को लिसाढ़ में मार दिया गया था. लाश ना मिलने की वजह से उनका डेथ सर्टिफ़िकेट नहीं बना. उनके पिता दफ़्तरों के चक्कर काटते-काटते गुज़र गए. अब वो इन कोशिशों में लगे हैं.

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इस संघर्ष में रिज़वान अकेले नहीं है. लिसाढ़ में मारे गए 11 लोगों के परिवारों की कहानी भी उन जैसी ही है.
रिज़वान कहते हैं, “प्रभावित परिवारों को नौकरी नहीं मिल पाई, मृतकों के बैंक खातों में पैसे हैं जो निकल नहीं पा रहे हैं. मृत मान लिया जाएगा तो मुक़दमा भी आगे बढ़ सकेगा और इंसाफ़ की उम्मीद जगेगी, अभियुक्तों की गिरफ़्तारी है.”
हालांकि रिज़वान को अब उम्मीद नहीं है कि उनके दादा की हत्या के मामले में कभी इंसाफ़ हो सकेगा. वो कहते हैं, “दस साल हो गए, अभी तक का जो अनुभव है लगता है कि इंसाफ़ नहीं मिलेगा. सरकारें बदल गईं, आगे हो सकता है फिर और कोई सरकार आ जाए, लेकिन हमारे लिए कुछ नहीं बदलेगा.”
रिज़वान कहते हैं, “इन दंगों ने हमें बहुत पीछे धकेल दिया है. हमारे बुज़ुर्गों ने काम में जो कमाया था, जो भी बनाया था, वो सब पीछे छोड़कर आना पड़ा. सबसे बड़ा अफ़सोस तो यही है कि हम इंसाफ़ नहीं दिला सके.”
रिज़वान का परिवार कांधला में जिस बस्ती में रहता है वहां न पक्की सड़क है, ना स्कूल और न पीने का पानी. रिज़वान कहते हैं, “बच्चों को पढ़ने के लिए दूर जाना पड़ता है. पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है. हमारा जी जो पहचान थी, जो मान सम्मान था, वो कभी लौटकर वापस नहीं आएगा. पूरा गांव हमें दादा के नाम से जानता है. आज हमें यहां कोई नहीं जानता. हम गुमनाम सी ज़िंदगी जी रहे हैं.”
अपनों को खोने का ग़म

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मुजफ़्फ़रनगर अब 2013 के दंगों से आगे बढ़ गया है. हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जो नफ़रत पैदा हुई थी, वो भी अब कम नज़र आती है. लेकिन जिन परिवारों के लोग मारे गये, वो अंतहीन पीड़ा के चक्र में उलझकर रह गए.
पत्रकार राजेश वर्मा 7 सितंबर की हिंसा को कवर करते हुए मारे गए थे. दस साल बाद भी उनका परिवार इस सदमे से उबर नहीं सका.
राजेश वर्मा के बेटे को बाक़ी मृतक आश्रितों की तरह चतुर्थ श्रेणी की नौकरी मिली.
राजेश वर्मा की पत्नी नीरू वर्मा कहती हैं, “बेटे को नौकरी मिली लेकिन उससे पति की कमी पूरी नहीं होगी, ना ऐसी नौकरी से परवार ही चल सकता है.”
नीरू वर्मा को नहीं पता कि उनके पति की हत्या किसने की. वो कहती हैं, “हमारे पति की हत्या के केस के बारे में हमें कुछ नहीं पता. किसी को पकड़ा या नहीं, ये भी हमें नहीं पता.”
राजेश वर्मा का परिवार मुज़फ़्फ़रनगर के शिव चौक के पास स्थित पुश्तैनी मकान में रहता है. घर में दाख़िल होते ही दीवार पर राजेश वर्मा की बड़ी तस्वीर नज़र आती है. उनके चेहरे पर मुस्कान है.

राजेश वर्मा के परिवार की सरकार और जिस मीडिया संस्थान में में काम करते थे वहां से आर्थिक मदद मिली.
नीरू वर्मा चाहती हैं कि उनके पति की याद में शहर में कोई स्मारक बनना चाहिए ताकि उनके काम और दंगों के उस दर्द को याद रखा जा सके.
कवाल गांव में शाहनवाज़ की हत्या के बाद हिंसक भीड़ ने सचिन और गौरव को वहीं मार दिया था.
सचिन एक बेटे के पिता थे. उनकी मौत के बाद पत्नी को सरकारी नौकरी मिलीं जो अब उनके परिवार को छोड़कर मुजफ्फरनगर में रहती हैं.

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सचिन का गांव मलिकपुरा कवाल से क़रीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर है. यहां चारों तरफ़ ईख के खेत हैं. मलिकपुरा एक छोटी सी बस्ती है जिसमें अधिकतर लोग एक ही बड़े परिवार के हैं.
गांव शुरू होते ही सचिन का घर है. उनकी मां मुनेश घर में अकेली उदास बैठी थीं.
मुनेश को याद नहीं उन्होंने आख़िरी बार अपने पोते की शकल कब देखी थी. बेटे की मौत और उसके बाद बहू के चले जाने ने उनके घर को सूना कर दिया है.
घटना के दस साल बाद भी वो उस वक़्त से आगे नहीं बढ़ सकी हैं.
मुनेश कहती हैं, “जिस घर से बेटा जाता है वो बिखर जाता है. हमारी अब कोई ज़िंदगी नहीं है, बस यूं ही वक़्त काट रहे हैं."

मुनेश ने अपने पोते को खिलौनों को संभाल कर रखा है. वो उन्हें देखकर भावुक हो जाती हैं.
मुनेश कहती हैं, “पोता साथ में होता तो लगता ज़िंदगी में कुछ बचा है. लेकिन बहू अलग रहती है, उसे यही सही लगता है. हम बस इंतेज़ार करते हैं कि किसी दिन हमारा पोता घर आए. जब वो बड़ा होगा तो शायद हमारा हाल-चाल पूछ ले.”
गौरव के पिता रविंद्र चौधरी को शाहनवाज़ की हत्या के आरोप में कुछ महीने जेल रहना पड़ा, मुक़दमा अब भी चल रहा है.
मलिकपुरा में गौरव का घर अब वक़्त के साथ वीरान हो गया है. रविंद्र चौधरी मुज़फ़्फ़रनगर में अपनी बेटी को मिले सरकारी मकान में रहते हैं.
रविंद्र चौधरी कहते हैं, “इन मामलों में परिवार उजड़ जाता है. कमाई का साधन बंद हो जाता है. कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने पड़ते हैं, उसमें पैसा ख़र्च होता है. इंसान मानसिक रूप से भी टूट जाता है.

बेटे की मौत, उसके बाद हुए सांप्रदायिक दंगे से शुरू हुई बात राजनीति पर आ जाती है. रविंद्र को बहुत अफ़सोस है कि उनके परिवार का राजनीतिक इस्तेमाल हुआ.
रविंद्र कहते हैं, “जो उस समय सरकार थी, उसके नेताओं ने पहले घटना की जांच को प्रभावित किया. फिर दंगा हुआ, फिर दूसरी पार्टी के नेताओं ने इस घटना का राजनीतिक फ़ायदा उठाया. हमारे परिवार का बस राजनीतिक इस्तेमाल किया गया. हमारे नाम पर सरकारें बन गईं लेकिन हमारा हाल किसी ने नहीं पूछा.”
2013 में सांप्रदायिक हिंसा की आंधी ने मुज़फ़्फ़रनगर और आसपास के इलाक़ों के लोगों में नफ़रत भर दी थी. सदियों से एक-दूजे के पड़ोसी बनकर रह रहे लोग मरने-मारने पर उतारू हो गए थे.
मुज़फ़्फ़रनगर के कवाल गांव में लोग दस साल पहले हुए घटना को बीते दौर की बात मानते हैं. यहां अधिकतर लोग ये कहते हैं कि ये इलाक़ा अब उस घटना से आगे बढ़ गया है.
यहां एक चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ा रहे कुछ बुज़ुर्ग कहते हैं, ‘यहां हिंदू-मुसलमान ऐसे मिल-जुलकर रहते थे कि पता नहीं चलता था कौन क्या है. फिर 2013 आया, कवाल की घटना को चिंगारी बनाकर पूरे इलाक़े में आग लगा दी गई. अब शांति तो है, लेकिन पहले जैसी बात नहीं.’
एक बुज़ुर्ग कहते हैं, “अब लोगों को अक्ल में आग लग गई है.”

वक़्त आगे बढ़ गया है लेकिन शाहनवाज़ के पिता सलीम के लिए दुनिया वहीं ठहर गई है. वो बाहर के कमरे में अकेले बैठे हैं. बुढ़ापा उन पर हावी है, बमुश्किल सहारा लेकर चलते हैं.
सचिन और गौरव की हत्या के आरोप में शाहनवाज़ के दो भाइयों समेत 7 लोगों को उम्रक़ैद की सज़ा हुई है.
सलीम कहते हैं, “हमारे परिवार से छह लोग जेल में हैं, कुल सात को सज़ा हुई है. पूरा परिवार ख़त्म हो गई है, रह क्या गया.”
सलीम कहते हैं, “सबसे बड़ा अफ़सोस यही है कि पूरा परिवार बिख़र गया, लड़का मारा गया, दो लड़के जेल में हैं और हमारी सुनने वाला कोई नहीं हैं.”
सलीम ने अपने बेटों की सज़ा के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में याचिका दायर की है और उन्हें उम्मीद है कि घटना का पूरा सच एक दिन सामने आएगा. सलीम कहते हैं, “इंसाफ़ होगा, इंशाअल्लाह.”
ये कहते-कहते उनकी आंखों से आंसू निकलने लगते हैं. वो कुछ देर ख़ामोश रहते हैं और फिर अपने कमरे की तरफ़ धीरे-धीरे चलने लगते हैं. उन्हें सहारा देने वाला यहां कोई नहीं है.
‘उस दिन के बाद से बीमार रहती हूँ’

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दंगों के दौरान बलात्कार के सात मामले दर्ज हुए थे जिनमें से सिर्फ़ एक में ही सज़ा हुई है.
गैंगरेप का शिकार हुई सर्वाइवर को लगता है कि ये सज़ा उनके ज़ख़्मों को भरने के लिए काफ़ी नहीं है.
सर्वाइवर इस समय दंगों के दौरान पलायन करने वाले लोगों की एक बस्ती में रहती हैं. एक कमरे के उनके घर के ही एक हिस्से में पति दर्जी का काम करते हैं. काम ना होने की वजह से उनका परिवार गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है.
उनका कहना है, “तब से मैं बीमार रहती हूं, अभी भी बहुत बीमार है, मेरे दिमाग़ में बस वही बातें घूमती रहती हैं. मैंने अपना सबकुछ खो दिया है, गांव छोड़ना पड़ा, दुनिया मेरे बारे में ग़लत बोलती है, बेइज़्ज़ती करती है, हर तरह के ताने मुझे सुनने पड़ते हैं. जो मेरा हाल हुआ, मैं यही कहूंगी कि ये सज़ा उनके लिए कम है, उन्हें फांसी ही होनी चाहिए.”
सर्वाइवर कहती हैं, “मुक़दमा लड़ने के दौरान हमें छुपकर रहना पड़ा. दिल्ली की सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हमारी मदद की. हमारे बस की बात नहीं थी कि हम इस मुक़दमे को लड़ लेते.”
मृतकों के परिजनों पर ही मुक़दमे

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जोगेंद्र वर्मा के पिता सोहन वीर सिंह की जौली हिंसा में हत्या हुई थी.
जांच कर रही एसआईटी ने उन्हें लताफ़त और मोहम्मद नज़र की हत्या का अभियुक्त बना दिया. उन्हें जेल भी जाना पड़ा.
जब पुलिस ने जोगेंद्र को पकड़ने आई तो सदमे में उनकी मां की मौत हो गई. जोगेंद्र ने इन दंगों में अपने पिता और मां दोनों को खो दिया. वो हत्या के अभियुक्त भी हैं.
इन दंगों ने उनके जीवन को बदलकर रख दिया. उनका लंबा समय क़ानूनी लड़ाई लड़ते हुए बीता है.
जोगेंद्र कहते हैं, “बाप दंगों में मारा गया, मां मेरी सदमे में गई क्योंकि एसआईटी ने मुझे ही अभियुक्त बना दिया था. मां की मौत के बाद मैं अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने के लिए पैरोल पर आया था.”

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भोपा में मारे गए लताफत के भाई गय्यूर मानते हैं कि उनके रिश्तेदारों के ख़िलाफ़ रिपोर्ट हुई थी इसलिए उन्होंने भी हिंदू मृतकों के परिजनों के नाम रिपोर्ट लिखा दी. हालांकि अब उन्होंने अदालत के बाहर सुलह भी कर ली है.
अपने भाई की हत्या से जुड़े दस्तावेज़ों को पलटते हुए गय्यूर कहते हैं, “हमारे भाइयों को भीड़ ने मारा था. कोई नहीं जानता मारने वाले कौन थे. लेकिन उन्होंने हमारे रिश्तेदारों पर मुक़दमा कर दिया तो हमने भी उन पर रिपोर्ट दर्ज करा दी.”
अब गय्यूर और जोगेंद्र ने अदालत के बाहर सुलह कर ली है. गय्यूर कहते हैं, “अब हमने उनके साथ अदालत के बाहर फैसला कर लिया है.”

अपने भाई की तस्वीर हाथ में लेकर वो उदास हो जाते हैं. गय्यूर कहते हैं, “ना किसी से कोई झगड़ा था ना रार थी, बस रास्ते में चलते हुए मार दिया. हमारा परिवार इस ग़म को कभी नहीं भूल पायेगा. सरकार ने मेरे भाई की पत्नी को नौकरी दी तो किसी तरह परिवार का गुज़ारा चल रहा है. अगर वो सहारा ना होता तो मेरे भाई का परिवार तो सड़क पर ही आ गया होता.”
अदालत के बाहर हुई सुलह के बारे में बताते हुए कहते हैं, “इंसाफ ये होता कि जिन्होंने मारा वो अंजाम भुगतते, लेकिन हमें नहीं पता था कि किसने मारा, इसलिए हमने नामजद रिपोर्ट करवा दी. लेकिन अब हमारा उनके साथ फैसला हो गया है, अदालत में भी एक दिन फैसला हो ही जाएगा.”

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एसआईटी ने जौली में मारे गए ब्रिजपाल और अजय की हत्या के मुक़दमे में सैयद मंज़र ज़ैदी को घटना के दो साल बाद अभियुक्त बनाया था. वो अपने आप को बेग़ुनाह मानते हैं. जैदी दावा करते हैं कि जिन लोगों की हत्या का मुक़दमा उन पर चल रहा है, उनके परिजनों से अब उनके पारिवारिक संबंध हैं.

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जैदी अपना फ़ोन निकालकर कहते हैं कि उनके मृतकों के परिजनों के साथ अब पारिवारिक संबंध हैं और वो उनके घर आते-जाते हैं.
जैदी कहते हैं, “मैं बीस-पच्चीस दिन जेल में रहा था. सबूत मेरे ख़िलाफ़ नहीं थे, जल्द ही ज़मानत मिल गई. एक दिन में बरी भी हो जाउंगा. लेकिन इस मुक़दमे ने मेरी ज़िंदगी तबाह कर दी है. सामाजिक मान-सम्मान तो गया ही, परिवार का सुकून भी गया. मेरा साफ़ सुधरा रिकॉर्ड ख़राब हो गया. मैंने ज़िंदगी में कभी किसी को गाली नहीं दी थी और अब मैं दो-दो लोगों को जान से मारने का अभियुक्त हूं. मेरे जेल जाने के बाद मेरी मां बीमार हो गईं थीं.”
दंगों के दौरान हुई हत्याओं के मुक़दमों की पड़ताल करने पर पता चलता है कि अधिकतर मामलों में काउंटर एफ़आईआर की गईं ताक़ि आगे चलकर अदालत के बाहर समझौते हो सकें.
शाहनवाज़ की हत्या के मामले में सचिन और गौरव के परिवार के 6 लोग जेल गए जो अब ज़मानत पर हैं. जेल जा चुके देवेंद्र को लगता है कि उनके परिवार के नाम पर सिर्फ़ राजनीति हुई.
देवेंद्र कहते हैं, “हमारे परिवार के जवान बेटों की मौत पर राजनीति हुई. नेताओं ने अपनी सरकार बना ली लेकिन हमारा नाश हो गया. हम अब भी मुक़दमा झेल रहे हैं.”

दंगों की जांच कैसे हुई?
दंगों के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी. मौजूद डाटा के मुताबिक़ मुज़फ़्फ़रनगर में 42 और शामली में 22 लोग मारे गए थे. सरकार के मुताबिक़ कुल 64 लोग मारे गए थे.
हालांकि इन लापता लोगों की संख्या शामिल नहीं की गई थी जो लापता हुए थे और जिन्हें दिसंबर 2013 में दंगों की जांच के लिए गठित की गई विशेष जांच टीम ने मृत मान लिया था.
मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के मामलों में गठित एसआईटी ने कुल 510 मुक़दमे दर्ज किए थे.
इनमें 170 मुक़दमे शुरुआती जांच में बंद हो गए. 165 मुक़दमों में फ़ाइनल रिपोर्ट लग गई. जिन मुक़दमों में फ़ाइनल रिपोर्ट लगी उनमें 19 क़त्ल के मुक़दमे भी शामिल हैं.
हत्या के प्रयास के आरोप में 47 मुक़दमे दर्ज हुए थे. इनमें से 14 को जांच के दौरान ही ख़ारिज कर दिया गया था. हत्या के प्रयास के 15 मुक़दमों में फ़ाइनल रिपोर्ट लग गई थी जबकि 18 में चार्जशीट दाख़िल हुई थी.

दंगों के दौरान हिंसा और लूटपाट के अलग-अलग मामलों में 1100 से अधिक लोग गिरफ़्तार किए गए थे जिनमें से लगभग सभी ज़मानत पर छूट चुके हैं.
अब तक सिर्फ़ तीन मामलों में अब तक अदालत से सज़ा हुई है. इनमें से एक मामला सचिन और गौरव की हत्या का है, जिसमें कवाल में मारे गए शाहनवाज़ के परिवार से जुड़े 6 और कुल 7 लोग जेल में हैं.
दंगा-फ़साद के एक अन्य मामले में कवाल गांव के ही रहने वाले और बीजेपी के विधायक रहे विक्रम सैनी सहित 12 लोगों को दोषी क़रार दिया गया और दो साल की सज़ा हुई है. सैनी की विधायकी भी इस सज़ा की वजह से चली गई है.
सैनी कवाल गांव के रहने वाले हैं जहां से दंगों की शुरुआत हुई थी. सैनी अपने आप को बेग़ुनाह बताते हुए कहते हैं, “मैं निश्चिंत था कि मुझे सज़ा नहीं होगी क्योंकि मैंने कुछ किया ही नहीं था. लेकिन पता नहीं कैसी क़ानून है कि मुझे सज़ा दे दी गई. किसी भी एक व्यक्ति ने मेरे ख़िलाफ़ गवाही नहीं दी है. पुलिस ने ही मुक़दमा दर्ज किया और वही गवाह थी.”
इसके अलावा दंगों के दौरान गैंगरेप के एक मामले में भी दो दोषियों को उम्रक़ैद की सज़ा हुई है.
यानी मुज़फ़्फ़रनगर दंगों में अब तक कुल 21 लोग दोषी क़रार दिए गए हैं.
अदालत के बाहर समझौते लेकिन इंसाफ़ कहां?

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दंगों के अधिकतर मामलों में अदालत के बाहर समझौते हो गए हैं. कुछ मुक़दमे सरकार ने वापस ले लिए हैं, हालांकि इनके बारे में अधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है.
कुटबा और लिसाढ़ में हुए हत्याकांडों में भी पंचायतों के बाद सुलह हो गई. कुटबा के मुक़दमे में गवाही दे रहे अख़्तर कहते हैं वो अदालत में सिर्फ़ दस्तख़त करने जाते हैं.
अख़्तर बताते हैं, “पांच गांवों में हुई हिंसा में आपसी सुलह हो गई है. दबाव कुछ नहीं है, लोगों ने मिलकर समझौता किया है. अब इन पांचों गांवों के मुक़दमों में गवाही चल रही है. वो हमारे पक्ष में गवाही दे रहे हैं और हम उनके पक्ष में.”
क्या अदालत में कभी पूछा गया कि क्या हुआ था, इस सवाल के जवाब में अख़्तर कहते हैं, “हमसे कभी किसी ने नहीं पूछा कि दंगे के दौरान क्या हुआ था या लोग कैसे मारे गए थे. हम बस जाते हैं और दस्तखत करके आ जाते हैं.”
अख़्तर और उनके परिवार ने दंगों के दौरान पलायन कर लिया था और वो अब कुटबा के पास ही पलड़ा गांव में रहते हैं.
केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान मानते हैं कि वो मुक़दमों में सुलह कराने में अहम भूमिका निभा रहे हैं.

बालियान कहते हैं, “बाहर समझौता होने के बाद भी अदालती प्रक्रिया लंबी चलती है. अब हम इस मोड में हैं कि गवाहियां चल रही हैं. कुछ थोड़े-बहुत मुक़दमे हैं जिनमें अदालत के बाहर समझौता नहीं है. कुछ बाहरी ताक़तें इन्हें प्रभावित कर रही हैं, जनपद में सभी चाहते हैं कि समझौते हो जाएं. लेकिन दिल्ली या बाहर के कुछ एनजीओ हैं जिन्हें ज़मीनी वास्तविकता का पता नहीं है. अगर ये हस्तक्षेप ना करते तो अभी तक सौ प्रतिशत मामलों में समझौते हो चुके होते और सब बरी हो गए होते.”
अपराध के बाद इंसाफ़ की क़ानूनी प्रक्रिया को दरकिनार कर अदालत के बाहर आपसी सहमति से हो रहे समझौतों को सही ठहराते हुए बालियान कहते हैं, “ये फ़ैसले आपसी सौहार्द की नींव को मज़बूत कर रहे हैं. मुक़दमेबाज़ी से नफ़रत ही बढ़ती है, कोई नहीं चाहता कि लोगों के बीच में नफ़रत बढ़े.”

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इन दिनों अदालत में मुज़फ़्फ़रनगर दंगों से जुड़े कई मामलों में गवाही चल रही है. हालांकि इनमें से अधिकतर मामलों में समझौते हो चुके हैं.
दंगों के मामलों पर नज़र रख रहे अधिवक्ता अकरम अख़्तर को लगता है कि सरकारों ने अपराधियों को सज़ा दिलाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए.
अकरम कहते हैं, “हत्या के 19 मामलों में फ़ाइनल रिपोर्ट पेश की गई है. हत्या के प्रयास के पंद्रह मामलों पुलिस ने फ़ाइनल रिपोर्ट लगा दी. पुलिस ने कहा कि हम कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं करा सके. लिसाढ़ में तेरह लोग मारे गए थे, इनमें से 11 की बॉडी नहीं मिली. इस मामले में भी लोग आरोप मुक्त हुए और राज्य ने अपील नहीं की. इससे पता चलता है कि राज्य मुज़फ़्फ़रनगर के मुक़दमों को लेकर गंभीर नहीं है.”
अकरम कहते हैं, “अदालत के बाहर हो रहे समझौते से साफ़ है कि मुज़फ़्फ़रनगर हिंसा पीड़ितों को इंसाफ़ देने की मंशा ही नहीं है.”
दंगों ने बदल दी सियासत की तस्वीर

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2013 के दंगों के बाद बनें सांप्रदायिक माहौल ने भारत की सियासत की तस्वीर भी बदल दी. 2014 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में 80 में से 71 सीटे जीतकर पूर्ण बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में पहुंची.
2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 325 सीटें जीतकर सरकार बनाई और केंद्र और राज्य में बीजेपी अभी भी सत्ता में बनीं हुई हैं. विश्लेषक मानते हैं कि दस साल बाद भी मुज़फ़रनगर दंगा सिसायत पर असर डालता रहेगा.
स्थानीय पत्रकार राजीव प्रताप सैनी कहते हैं, “दंगे के बाद जो सोच पैदा हुई, उसका फ़ायदा अभी भी राजनीतिक दल उठा रहे हैं. धरातल पर सबकुछ सामान्य लग रहा है, लेकिन सतह के लिए अभी भी हलचल है और उसका मज़ा केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी ले रही है.”
राजीव सैनी कहते हैं, “अगर उस दौर की सरकार संवेदनशील रही होती, कवाल की घटना में निष्पक्ष कार्रवाई होती तो शायद मुज़फ़्फ़रनगर दंगे ना होते. अपराध की घटना को सिर्फ़ आपराधिक घटना के रूप में देखा जाता, संलिप्त लोगों की धर्म-जाति ना देखी जाती तो मुज़फ़्फ़रनगर की ये तस्वीर ना होती.”

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गन्ने की खेती के लिए मशहूर मुज़फ़्फ़रनगर में नहर किनारे सूनसान सी सड़क पर स्कूली बच्चियां साइकिल चलाते हुए लौट रही हैं. शांति और सुरक्षा का अहसास होता है, इस अहसास के साथ ही ये ख्याल भी ज़ेहन में कौंधता है कि ये शांति इंसाफ़ की क़ीमत पर लौट रही है.
अदालत के बाहर हुए समझौतों ने सांप्रदायिक भाईचारा बहाल होने का भरोसा पैदा किया है लेकिन ये सवाल भी है कि जिन लोगों ने दंगों का दंश झेला, जिनके घर उजड़े क्या उन्हें कभी इंसाफ़ मिल सकेगा.
(इस रिपोर्ट में अमित सैनी ने सहयोग किया)
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