मुज़फ़्फ़रनगर दंगेः क्या था गैंगरेप का मामला जिसमें 9 साल बाद हुई सज़ा

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में साल 2013 दंगों के दौरान हुए गैंगरेप के एक मामले में उत्तर प्रदेश की एक अदालत ने तीन अभियुक्तों को दोषी क़रार दिया है. इनमें से एक अभियुक्त की पहले ही मौत हो चुकी है. जीवित बचे दोनों अभियुक्तों को अदालत ने बीस-बीस साल की सज़ा सुनाई है और उन पर पंद्रह-पंद्रह हज़ार रुपए का जुर्माना भी लगाया है.
2013 में दंगों के दौरान मुस्लिम महिला के साथ हुए गैंगरेप के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर विशेष पॉक्सो अदालत में रोज़ाना सुनवाई शुरू हुई थी.
फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में 9 साल से चल रही इस मामले की धीमी सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने हैरत जताते हुए नाराज़गी भी व्यक्त की थी.
गैंगरेप का ये मामला यूँ तो फ़ास्ट ट्रैक अदालत में चल रहा था, लेकिन इसमें लगातार देरी हो रही थी. अब घटना के लगभग 10 साल बाद इसका फ़ैसला आया है.
अदालत के फ़ैसले के बाद दोनों अभियुक्तों ने कहा है कि वो इस फ़ैसले को ऊपरी अदालतों में चुनौती देंगे.
एक अभियुक्त ने फैसले के बाद ने मीडिया से बात करते हुए दावा किया, "मैं उन्हें जानता भी नहीं हूं, 22 साल से बाहर रहता हूं."
क्या था गैंगरेप का ये मामला?

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आठ सितंबर 2013 को भड़के दंगे में शामली ज़िले के फ़ुगाना थाना इलाक़े के लांख गाँव में मुसलमानों के घर जला दिए गए थे.
हिंसा की वजह से क़रीब 300 परिवार अपना सब कुछ छोड़कर जंगलों के रास्ते भाग निकले थे. इन्हीं परिवारों में से रेप पीड़िता का भी परिवार शामिल था.
पीड़ित परिवार अब कांधला में रहता है. उनके पति सिलाई करते हैं और किसी तरह घर चलाते हैं.
अदालत का फ़ैसला आने से पहले बीबीसी ने इस पीड़ित परिवार से मुलाक़ात की थी.
पीड़िता के पति ने उस समय बताया था, "हमें पाँच लाख का मुआवज़ा मिला था. जिससे हमने ये घर ख़रीदा था. हमने बहुत कुछ खोया है."
दंगों के दौरान जान बचाने की आपाधापी में परिवार भी बिखर गए थे.
दंगों में भागे बहुत से लोग मुसलमान बहुल कांधला के कैंप पहुँचे थे. पीड़िता यहीं एक कैंप में तीन दिन बाद अपने पति को मिली थीं.
गैंगरेप की उस घटना को याद करते हुए पीड़िता के पति ने बीबीसी से कहा था, "जब मलकपुर कैंप में तीन-चार दिन बाद बीवी से मिला, तो उसने रेप के बारे में बताया. उस वक़्त मैंने उससे चुप रहने को कहा, लेकिन वो इंसाफ़ के लिए लड़ाई लड़ना चाहती थी. फिर मैंने उसका पूरा साथ दिया. मैं आज भी उसकी लड़ाई में साथ खड़ा रहा. हमे इंसाफ़ की पूरी उम्मीद थी."
पीड़िता के पति ने दावा किया, "मुझे मुक़दमा वापस लेने के लिए लगातार धमकियाँ मिली. एसआईटी की टीम में शामिल एक महिला अधिकारी ने भी डराने की कोशिश की. उन्होंने कहा था कि इन लोगों से तुम जीत नहीं पाओगे. लेकिन हम डरे नहीं और ना ही हार मानी."
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क्या हुआ था उस दिन?

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मुज़फ़्फ़रनगर दंगों को भले ही अब लगभग 10 साल हो गए हैं लेकिन वो वक़्त पीड़ितों के ज़ेहन से नहीं निकला है. पीड़िता आज भी उस दिन को याद करके सिहर जाती हैं.
बीबीसी हिंदी के सहयोगी अमित सैनी से बात करते हुए पीड़िता कहती हैं, "वो मनहूस दिन मैं कभी नहीं भूल सकती. 8 सितंबर 2013 की शाम गाँव के मंदिर में लाउड स्पीकर से ऐलान हुआ कि मंदौड़ पंचायत में गए जाटों को मुसलमानों ने जौली में मार दिया है. सब लोग इकट्ठे हो जाओ और मुसलमानों को मारो."
वो कहती है कि "ये सब सुनकर हम डर गए थे. फिर गाँव के कुछ जाटों ने सहारा दिया तो जैसे-तैसे रात कटी. बड़ा बेटा बीमार था. पति उसको शामली में डॉक्टर के पास लेकर चले गए. क़रीब 9.30 बजे दंगा भड़क गया. सब मुसलमान अपनी जान बचाने के लिए जंगल के रास्ते भाग रहे थे. मैं भी अपने छोटे बेटे को गोद में उठाकर भागने लगी, लेकिन रास्ता भटक गई और एक स्कूल के पीछे छिपकर बैठ गई."
पीड़िता बताती है कि "उसी दौरान गाँव के ही कुलदीप, सिकंदर और महेशवीर आए. बेटे को छीनकर उसे मारने की धमकी दी और मेरे साथ बारी-बारी से बलात्कार किया. वारदात के बाद धमकी देकर वापस लौट गए. किसी तरह ख़ुद को संभालते हुए खेतों से होते हुए रास्ते तक पहुँची. एक ऑटो में बैठकर मलिकपुरा पहुँची."
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क्यों हुई देरी?

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इस मामले में हुई देरी की वजह बताते हुए सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर कहती है, "इस गैंगरेप के मामले में कुल सात गवाह थे. सबकी गवाही भी पूरी हो चुकी थी. इसके बावजूद भी बचाव पक्ष किसी ना किसी बहाने से सुनवाई को लंबा खींच रहा था. बीच-बीच में जज के भी ट्रांसफ़र हो जाते थे. जिस वजह से हमे बहस में पूरी कहानी दोबारा से शुरू करनी पड़ती थी."
वृंदा ग्रोवर बताती है, "सुनवाई में लंबा वक़्त होने की वजह हमने एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की थी. सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि रेप जैसे मामलों का निपटारा जल्द होना चाहिए. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में रोज़ाना सुनवाई कर जल्द फ़ैसला सुनाने का आदेश दिया था."
गैंगरेप के इस मामले में कुलदीप नामक अभियुक्त की पहले ही मौत हो चुकी थी. अब केवल दो अभियुक्त महेशवीर और सिकंदर बाकी बचे हैं.
बीबीसी ने फ़ैसला आने से पहले अभियुक्तों के वकील से बात की थी और मामले में लगातार हो रही देरी पर उनसे सवाल पूछा था.
अभियुक्तों के वकील सीनियर अधिवक्ता ब्रजपाल सिंह डबास ने बीबीसी से कहा था, "हर बार हम पर आरोप लगाए गए कि इनकी वजह से सुनवाई में देरी हुई. हमारी वजह से कोई देरी नहीं हुई. दिसंबर 2021 में अभियोजन पक्ष के साक्ष्य समाप्त होकर मुल्जिमान के बयान भी पूरे हो गए थे और जनवरी 2022 से इसमें बहस शुरू हो गई थी."
अधिवक्ता ब्रजपाल सिंह डबास इस मामले के लंबित होने का कारण कंडोलेंस, जजों के ट्रांसफ़र और कोरोना को वजह मानते हैं.
उन्होंने कहा था, "कई बार तारीख़ों के दौरान कभी कंडोलेंस की वजह से सुनवाई नहीं हुई, तो कई बार जज का ट्रांसफ़र हो गया. कोरोना काल में भी काफ़ी दिनों तक सुनवाई नहीं हुई."
वो बताते हैं, "इसमें तीन अभियुक्त थे. एक अभियुक्त कुलदीप की मौत हो चुकी है. अब केवल दो अभियुक्त महेशवीर और सिकंदर बाक़ी बचे हैं."
दंगे कैसे भड़के

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मुजफ्फरनगर ज़िले के कवाल गाँव में 27 अगस्त से दंगे की चिंगारी भड़की थी.
पास के गाँव मलिकपुरा के सचिन और गौरव का कवाल के शाहनवाज़ से विवाद हुआ था. तीनों में मारपीट हुई.
मारपीट की इस घटना के बाद फिर से झगड़ा हुआ था. इसमें कवाल के युवक शाहनवाज़ की मौत हो गई थी.
शाहनवाज़ की मौत से ग़ुस्साईं भीड़ ने सचिन और गौरव को पीट-पीटकर मार दिया था.
दो जाट युवकों की हत्या के विरोध में 7 सितंबर को मुज़फ़्फ़रनगर के ही मंदौड स्कूल के मैदान में महापंचायत हुई थी, जिसमें लाखों की भीड़ इकट्ठा हुई थी.
इस महापंचायत के बाद इलाक़े में सांप्रदायिक तनाव भड़क गया था.
दंगे के दौरान हिंसा की अलग-अलग घटनाओं में 65 लोगों की जान गई थी, जिनमें अधिकतर मुसलमान थे.

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कई मुसलमान परिवारों के घर जला दिए गए थे और हजारों लोगों ने पास के मुसलमान बहुल गाँवों की तरफ़ पलायन किया था.
इन दंगों के दौरान कई महिलाओं ने रेप के आरोप भी लगाए थे. हालाँकि कुछ शिकायतों के बावजूद भी रेप के मुक़दमे दर्ज नहीं हुए थे.
इसी बीच समाजसेवी संस्थाओं के माध्यम से कई रेप पीड़ित महिलाओं ने मुक़दमे दर्ज करवाए थे. सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने इन महिलाओं की क़ानूनी मदद की थी.
अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर बताती है, "दंगों में सात महिलाओं ने रेप होने की बात कही थी. पुलिस ने शिकायत के बाद भी रिपोर्ट दर्ज नहीं की थी. हमने दिसंबर 2013 में सात रेप पीड़िताओं के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. 26 मार्च 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने मोहम्मद हारून वर्सेज यूपी सरकार के नाम एक कॉमन आदेश दिया था, जिसमें रेप के मामलों को लेकर स्पष्ट रूप से आदेश दिया था. इस आदेश के बाद ही रेप के सात मुक़दमें दर्ज हुए थे."
रेप के पाँच मामलों में सभी बरी
मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के दौरान दर्ज हुए रेप के पाँच मामलों में सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया गया था.
अधिवक्ता वृंदा बताती है, "सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर दंगे के दौरान रेप के सात मामले दर्ज हुए थे. पीड़ित महिलाओं ने कोर्ट में शपथ-पत्र देकर कोर्ट में बताया था कि उन पर केस वापस लेने के लिए दबाव बनाया जा रहा है. बाद में चार मामलों में अभियुक्त बरी हो गए. एक मामले में पीड़िता की मौत हो चुकी है. जबकि एक मामले में पुलिस ने एफ़आर लगा दी थी. जिसके ख़िलाफ़ हमने प्रोटेस्ट दाखिल कर फ़ाइल रिपोर्ट को ख़ारिज करवाते हुए निजी दावा दायर कराया था. पिछले काफ़ी दिनों से पीड़ित पक्ष ने हमसे कोई संपर्क नहीं किया."
मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के दौरान हुए कथित बलात्कार के मामलों में ये सिर्फ़ एकमात्र मामला है, जिसमें अभियुक्तों को दोषी क़रार दिया गया है.
नौ साल से इंसाफ़ का इंतज़ार

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इस मामले में पीड़िता लंबे समय से इंसाफ़ का इंतज़ार कर रहीं थीं.
बीबीसी से बात करते हुए पीड़िता कहती हैं, "मुझे नौ साल से इंसाफ़ का इंतजार था. दो साल हमें गवाही देते हो गए. हर बार अभियुक्तों के वकील किसी ना किसी बहाने अगली तारीख़ ले लिया करते थे. वो मामले को ज़्यादा लंबा खींचना चाहते थे. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद रोज़ाना सुनवाई शुरू हुई. मैं बहुत ख़ुश हूँ कि अब मुझे इंसाफ़ मिला है. मुझे अदालत पर पूरा भरोसा था.
तीन साल तक दिल्ली में छिपकर रहा परिवार
इस मामले में पीड़ित पक्ष का दावा है कि उन पर कई तरह से दबाव बनाया गया और डर की वजह से उन्हें मुज़फ़्फ़रनगर छोड़कर दिल्ली में छिपकर रहना पड़ा.
पीड़िता बताती है, "हम पर मुक़दमा वापस लेने का दबाव बनाया गया. पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी दी गई. पैसे का भी प्रलोभन दिया गया. वो लोग हमारे इस नए घर तक आ गए, जो हमने मुआवज़े के पैसे से बनाया था. हमने तीन साल तक वो भी घर छोड़कर रखा और दिल्ली में छिपकर रहे. साल 2019 में हम लोग वापस आए."
(इस रिपोर्ट में मुज़फ़्फ़रनगर से अमित सैनी ने सहयोग किया)
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