मुज़फ़्फ़रनगरः दंगे के बाद कैसे कट रही हैं रातें

- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुज़फ़्फ़रनगर से
काँकड़ा गाँव के किसी कोने में रात क़रीब साढ़े दस बजे शोर की आवाज़ हुई और चंद मिनट में ही पुरुष सड़कों पर और महिलाएं छतों पर आ गईं.
ग्रामीण भारत में किसान दिन भर काम करके जल्दी ही सो जाते हैं. लेकिन मुज़फ़्फ़रनगर में आजकल गाँव जाग रहे हैं. आहट डर में, डर अफ़वाह में और अफ़वाहें दहशत में बदल रही हैं. दंगों के बाद की दहशत ने लोगों का सुकून छीन लिया है.
जिस वक़्त ये सब हुआ हम मुज़फ़्फ़रनगर से शाहपुर की ओर जा रही सड़क पर स्थित काँकड़ा गाँव में ही बैठे हालात पर चर्चा कर रहे थे.
अचानक किसी की आवाज़ आई और सब चौंक गए. एक-दो मिनट के भीतर ही कुछ युवक भागे हुए आए. पता चला कि गाँव के किसी कोने में शोर हुआ है. जल्द ही समूह भीड़ में बदल गया.
किसी ने कहा कि दो अनजान युवक भागते हुए आए हैं और गाँव में घुसे हैं और उन्हें खोजा जा रहा है, तो किसी ने खेत में गए किसी किसान पर हमला होने की बात बताई.
न आहट, न निशान

गंडासे, लाठिया, फरसे और फावड़े लिए लोग खोजबीन करने की बात करने लगे लेकिन जंगल में जाने की हिम्मत कोई नहीं जुटा सका. क़रीब पाँच मिनट बाद गश्त कर रही सेना की एक गाड़ी रुकी.
इंस्पेक्टर वेद प्रकाश ने लोगों से बात की और खोजबीन के लिए और जवान बुला लिए. तय हुआ कि गाँव के जिस इलाक़े में शोर हुआ है वहाँ जाकर खोजबीन की जाएगी.
रात के अंधेरे में जवान ईख के खेतों को खंगालने लगे. हम भी साथ हो लिए. लेकिन न ही कोई आहट मिली न निशान.
पता चला कि मोहित नाम का युवक खेत पर पानी चलाने गया था जहाँ उसे कुछ लोग दिखाई दिए. लोगों को देखकर वो उल्टा भागा और गाँव में घुसते ही शोर मचा दिया.

मोहित ने बताया, "मैंने टॉर्च जलाई तो लगा कि सामने चार लोग खड़े हैं, अंधेरे में मैं देख नहीं पाया कि उनके हाथों में हथियार थे या नहीं. गाँव में घुसते ही मैंने शोर मचा दिया."
तैरती अफ़वाहें
शोर के कारण लोग घरों से बाहर निकल आए थे और महिलाएँ छतों पर आ गईं थी. चंद मिनटों में ही तरह-तरह की अफ़वाहें तैरने लगीं.
सेना के जवान लोगों को भरोसा देकर चले गए. उनकी मौजूदगी ने लोगों में सुरक्षा का भाव ज़रूर बढ़ाया लेकिन कब तक के लिए? रात क्या, किसान दिन में भी अकेले खेतों की ओर जाने से डर रहे हैं.
60 वर्षीय किसान विरेंद्र सिंह कहते हैं, ''हम घास लेने के लिए जंगल नहीं जा सकते. हमारे पशु भूखे मर रहे हैं. समरसैट तोड़कर उनमें पत्थर भर दिए गए हैं. कई लोगों के खेत सूख रहे हैं.''

सात सितंबर को महापंचायत से लौटते वक़्त हिंसा का शिकार हुए काँकड़ा गाँव में दो लोगों की मौत हो गई थी जबकी एक अन्य आईसीयू में भर्ती है. यहाँ के दर्जनों लोग घायल भी हुए थे. क़रीब दस हज़ार की आबादी के इस गाँव के लोगों ने गाँव में रह रहे अल्पसंख्यकों पर कोई हमला नहीं किया. लेकिन डर के माहौल में तमाम अल्पसंख्यक अपने घरों पर ताले लगाकर चले गए हैं.
काँकड़ा गाँव के एक बुजुर्ग ने कहा, "हमारे गाँव के लोगों पर यहाँ के मुसलमानों ने थोड़े ही हमला किया था जो हम उनसे बदला लेते, हम तो उनके साथ प्रेम चाहते हैं."
वोटों की राजनीति
दिल्ली पुलिस से रिटायर हुए 69 वर्षीय रंधीर सिंह ने बताया, "हमें अल्पसंख्यकों के ख़ाली घरों की रखवाली भी करनी पड़ रही है ताकि किसी पर कोई झूठा इलज़ाम न लगे."
विरेंद्र सिंह मानते हैं कि वोटों की राजनीति के कारण ही ये सब हो रहा है. हालाँकि वे यह भी स्वीकार करते हैं कि आगामी चुनावों में वे धर्म के आधार पर ही वोटिंग करेंगे. गाँव के ज़्यादातर किसानों का यही मानना है.
काँकड़ा गाँव से पलायन करके गए एक मुस्लिम परिवार के घर में छूटे क़रीब डेढ़ लाख रुपए की नकदी और गहने भी ग्रामीणों ने सुरक्षित लौटा दिए. शाहपुर कैंप में रह रहे कई लोगों ने इसकी तस्दीक़ की.
यहाँ के किसानों को लगता है कि बांग्लादेशी मुसलमान मुज़फ़्फ़रनगर में घुस आए हैं और वे ऑटोमैटिक हथियारों से लैस हैं. किसी के पास इस जानकारी का कोई पुख़्ता आधार नहीं है. लेकिन कई लोगों ने कहा कि वे इस तरह कि अफ़वाहों में यक़ीन करते हैं. और यही अफ़वाहें ख़ौफ़ का कारण बन रही हैं.
हम काँकड़ा से मुज़फ़्फ़रनगर की और लौटे तो रास्ते में तावली गाँव पड़ा. इस मुस्लिम बहुल गाँव में भी लोग रात के क़रीब साढ़े ग्यारह बजे हाथों में लाठियाँ और टार्च लिए सड़कों पर गश्त लगा रहे थे.
'कहीं साज़िश न हो जाए'

एक बुजुर्ग ने बताया, "यहाँ सभी धर्मों के लोग प्यार से रहते हैं. हमे डर हैं कि कहीं रात के अंधेरे में कोई साज़िश न कर जाए और गाँव में माहौल न ख़राब हो जाए इसलिए हम मिलजुलकर पहरा लगा रहा है. पहरेदारी में हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल हैं. हम अज़ान के वक़्त तक जागते रहेंगे और उसके बाद सोएंगे."
उन्होंने बताया, "आसपास के गाँवों में कई बड़ी वारदातों हुई हैं. पूरा गाँव ख़ौफ़ में हैं. तरह-तरह की ख़बरों ने डर को और बढ़ा दिया. सभी डरे हुए हैं कि कहीं कुछ हो न जाए. हमसे जितना हो सकता है उतना एहतियात बरत रहे हैं. गाँव में हिंदू कम है, अगर उन्हें कुछ हो गया तो क्या होगा?"
काँकड़ा और तावली गाँव आसपास ही हैं. एक मुस्लिम बहुल गाँव है जबकि दूसरा हिंदू बहुल. दोनों ही गाँव के लोग चिंतित है. डरे हुए हैं. बस फ़र्क़ इतना ही है कि काँकड़ा के मुसलमान अपने घर छोड़ गए हैं जबकि तावली के हिंदू परिवार गाँव में ही रह रहे हैं.
उम्मीद है ख़ौफ़ और दहशत का यह माहौल जल्द ख़त्म होगा और दिन भर मेहनत करने वाले किसानों को रात की नींद नसीब हो सकेगी.
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