अब इन घरों में रहने कोई नहीं आएगा

मुसलमानों के पलायन के बाद मुज़फ़्फ़रनगर के कई गाँवों में घर वीरान पड़े हैं. दंगों के सौ दिन बाद मुज़फ़्फ़रनगर के कुटबा गाँव पहुँचे दिलनवाज़ पाशा. देखें तस्वीरें.

कुटबा गाँव के खाली मकान
इमेज कैप्शन, आठ सितंबर 2013 की सुबह ने मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के कुटबा गाँव का इतिहास और सामाजिक ताना बाना पूरी तरह बदल दिया. इस जाट बहुल गाँव ने पहले कभी सांप्रदायिक हिंसा नहीं देखी थी. न ही यहाँ रहने वालों ने कभी सोचा था कि ऐसा भी दिन आएगा सैकड़ों सालों से सौहार्दपूर्ण माहौल में रहते आ रहे लोग एक दूसरे की जान के दुश्मन हो जाएँगे. खाली पड़े मकान उस दिन के गवाह हैं जब गांव बंट गया.
कुटबा गाँव के खाली मकान
इमेज कैप्शन, आठ सितंबर को कुटबा में हिंसा हुई थी जिसमें आठ लोग मारे गए थे और कई अन्य घायल हुए थे. हिंसा के दौरान फँसे लोगों को पुलिसबल ने गाँव से बाहर निकाला था. तब से ये लोग न गाँव लौटे हैं और न ही लौटने के बारे में सोचते हैं.
कुटबा गाँव के खाली मकान
इमेज कैप्शन, दंगों के 100 दिन बाद भी कुटबा में ऐसा सन्नाटा पसरा है कि ख़ौफ़ का एहसास होता है. जाटों के घरों के सामने बनी मस्जिद, जहां से मुसलमानों का मोहल्ला शुरू होता है अब वीरान पड़ा है. जो बच्चे यहाँ खेलते थे, स्कूल जाते थे वे अब राहत शिविरों में रह रहे हैं.
कुटबा गाँव के खाली मकान
इमेज कैप्शन, राहत कैंप में रह रहे कुटबा गाँव के बुज़ुर्ग यूसुफ़ बताते हैं कि सरकार की ओर से राहत पैकेज मिलने के बाद कुटबा के ज़्यादातर लोग किराये के घरों में रहने लगे हैं. गाँव के बाकी लोगों की तरह ही यूसुफ़ भी अब लौटना नहीं चाहते.
कुटबा गाँव के खाली मकान
इमेज कैप्शन, दंगों से पहले कुटबा में रहने वाले 28 साल के कल्लू बताते हैं, "हम जिस दिन से गाँव से आए हैं सिर्फ़ एक बार पुलिस बलों के साथ अपना बचा सामान लेने के लिए गए थे उसके बाद अपने गाँव की ओर देखने की हिम्मत भी हम नहीं जुटा पाए हैं."
कुटबा गाँव के खाली मकान
इमेज कैप्शन, कल्लू कहते हैं, "हम गाँव वापस जाने की सोच भी नहीं सकते, भले ही हमें भीख माँगनी पड़े. हमसे न ही गाँव के किसी आदमी ने वापस आने के बारे में कोई बात की है और न ही हम कभी लौटना चाहते हैं."
कुटबा गाँव के खाली मकान
इमेज कैप्शन, एक और बुज़ुर्ग ने कहा, "कुटबा में हमारा घर, ज़मीन, जानवर सब कुछ थे. हम सब छोड़ आए सिर्फ़ अपनी जान साथ ले आए. कभी-कभी तो लगता है कि जान भी पीछे छूट गई."
कुटबा गाँव के खाली मकान
इमेज कैप्शन, कुटबा के ही इक़बाल कहते हैं, "हमारे घरों के दरवाज़े के पल्लों तक को लूट लिया गया. पहले हम सिर्फ़ अपने घरों से बर्तन और ज़रूरी सामान ही लेकर आए थे. हमने सोचा था कि कभी माहौल बेहतर होगा तो हम लौटेंगे लेकिन बाद में हमारे घरों में कुछ भी नहीं छोड़ा गया. सब कुछ लूट लिया गया. अब हम क्यों और किसके लिए गाँव लौटें?"
कुटबा गाँव के खाली मकान
इमेज कैप्शन, इक़बाल याद करते हैं, "हमारे सामने ही हमारे रिश्तेदारों को बेदर्दी से काट दिया गया था. मैं बड़ी मुश्किल से अपनी गर्भवती पत्नी को गाँव से निकालकर लाया था. हमने कभी सोचा भी नहीं था कि कभी इस तरह हम अपने पुश्तैनी गाँव से जान बचाकर भागेंगे."
कुटबा गाँव के खाली मकान
इमेज कैप्शन, "हमे अपने घरों के बारे में सोचकर सिर्फ रोना ही याद आता है. हमारे दादा-परदादा के घर- ज़मीनें थी जो अब हमारी होते हुए भी हमारी नहीं है. हमारे बच्चों को बस यही याद रहेगा कि कभी हम कुटबा के थे."
कुटबा गाँव के खाली मकान
इमेज कैप्शन, कुटबा के जाट समुदाय का कोई भी व्यक्ति कैमरे पर बात करने के लिए तैयार नहीं हुआ. एक युवक ने कई बार यह ज़रूर दोहराया कि उनके गाँव के मुसलमानों के साथ बहुत ग़लत हुआ.
कुटबा गाँव के खाली मकान
इमेज कैप्शन, कुटबा के एक अन्य जाट युवक ने कहा, "दंगों ने सिर्फ़ मुसलमानों की ही नहीं बल्कि जाटों की ज़िंदगी भी बर्बाद कर दी है. हम लोग गिरफ़्तारी के डर में जी रहे हैं. गाँव के कई ऐसे नौजवान हैं जो दंगों के दौरान यहाँ थे ही नहीं लेकिन उनके ख़िलाफ़ भी मामले दर्ज़ हैं."
कुटबा गाँव के खाली मकान
इमेज कैप्शन, क्या दंगों के बाद वीरान पड़े घर हिंसा और नफ़रत की निशानी बनकर रह जाएंगे? इस सवाल पर मुज़फ़्फ़रनगर के डीएम कौशल राज कहते हैं कि यह बुरा दौर है जो गुज़र जाएगा.
कुटबा गाँव के खाली मकान
इमेज कैप्शन, मैं जब पहली बार कुटबा गया था तब भी ये घर वीरान थे लेकिन इतने भयावह नहीं. उस वक़्त लगा था कि गाँव से गए लोग लौट आएँगे. लेकिन दंगों के तीन महीने बाद भी कुटबा के लोगों की बात डर और ख़ौफ़ जैसे शब्दों के बिना पूरी नहीं होती. इस डर ने सिर्फ़ कुटबा के ही नहीं मुज़फ़्फ़रनगर के कई गांवों के लोगों को अपने घर और ज़मीन को छोड़ने के लिए मजबूर किया है.