राजस्थान चुनाव: 25 लाख का इंश्योरेंस क्या गहलोत के लिए 'चुनावी बीमा' साबित होगा

राजस्थान चुनाव में चर्चा में है सरकार की 'चिरंजीवी योजना'

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    • Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, प्रतापगढ़ से

जब पता चला कि सांवरी देवी को कैंसर है तो उनके पति केसरीमल को ये चिंता सताने लगी कि “इलाज के लिए इतना पैसा कहाँ से आएगा!”

छोटे खेतिहर-मज़दूर केसरीमल पिछले तीन साल से बीमार चल रही पत्नी के इलाज के लिए पहले ही प्रतापगढ़ से लेकर उदयपुर और बांसवाड़ा तक ले जा चुके थे.

उनकी जेब ख़ाली हो चुकी थी, अब बात क़र्ज़ लेने की तरफ़ जाती दिख रही थी.

संयोग से उनके भाई लक्ष्मण मीणा की मुलाक़ात स्वास्थ्य कार्यकर्ता विजय पाल से हो गई, जिन्होंने लक्ष्मण के शब्दों में उनसे कहा “इतना पैसा कैसे ख़र्च करोगे, चिरंजीवी लगाओ.”

साल 2021 से राजस्थान में लागू मुख्यमंत्री चिरंजीवी योजना एक स्वास्थ्य बीमा स्कीम है जिसमें ग़रीबी रेखा से नीचे आने वाले परिवारों को 25 लाख रुपए सालाना तक मुफ़्त इलाज की सुविधा हासिल है.

पिछले साल (2022) तक इसकी सीमा 15 लाख रुपए प्रति परिवार हुआ करती थी जिसे अब बढ़ा दिया गया है.

वो लोग भी इस कैशलेस स्वास्थ्य बीमा स्कीम का हिस्सा बन सकते हैं, जो आयकर देते हैं लेकिन इसके लिए उन्हें 850 रुपए वार्षिक प्रीमियम भरना होता है.

चिरंजीवी स्वास्थ्य कार्ड बनवाने के बाद सांवरी देवी का इलाज उदयपुर के एक प्राइवेट अस्पताल में शुरू हुआ जहाँ पहली बार उन्हें पंद्रह दिनों तक भर्ती रहना पड़ा.

लक्ष्मण मीणा कहते हैं, “पहली बार गए तो डेढ़ लाख रुपए ख़र्च हुए, मोबाइल पर मैसेज भी आया,” लेकिन हमें आने-जाने में ख़र्च हुए रुपयों के अलावा एक भी पैसा नहीं देना पड़ा.

बाद में सांवरी देवी को ‘कीमो’ के लिए भी ले जाना होता था, हालांकि दो साल के इलाज के बाद वो इस साल फ़रवरी में चल बसीं.

लक्ष्मण कहते हैं- भाभी का नौ लाख रुपयों से अधिक का इलाज हुआ.

चिरंजीवी योजना कितनी कारगर?

लक्ष्मण मीणा- चिरंजीवी योजना की वजह से संभव हुआ कैंसर पीड़ित भाभी सांवरी देवी का इलाज

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राज्य के स्वास्थ्य मंत्री परसादी लाल मीणा दावा करते हैं, “हमारे 90 फ़ीसदी परिवार चिरंजीवी योजना से कवर हो रहे हैं जो देश में सबसे ज़्यादा है. एक लाख 38 हज़ार परिवारों का प्रीमियम सीधे सरकार भरती है जिस पर सालाना 2500 करोड़ रुपए हम ख़र्च कर रहे हैं. बड़ी से बड़ी बीमारी किडनी ट्रांसप्लांट, कैंसर, हार्ट के मर्ज़ वग़ैरह की चिकित्सा सरकारी ख़र्च पर करवाया जा सकता है.”

केंद्र सरकार की 'आयुष्मान भारत' बीमा स्कीम की सुविधा सिर्फ़ ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन गुज़ारने वालों यानी बीपीएल परिवारों को ही हासिल है और उसकी सीमा पाँच लाख रुपए सालाना है.

राजस्थान में एक हज़ार प्राइवेट अस्पताल योजना से जुड़े हैं यानी सरकारी के साथ-साथ इन निजी अस्पतालों में भी चिरंजीवी बीमा के तहत इलाज हो सकता है.

परसादी लाल मीणा
BBC
राज्य सरकार 1.38 लाख परिवारों का प्रीमियम भरती है जिसका सालाना ख़र्च 2500 करोड़ रुपए है. इससे किडनी ट्रांसप्लांट जैसी बड़ी बीमारियों का इलाज़ भी सरकारी ख़र्च पर करवाया जा सकता है.
परसादी लाल मीणा
स्वास्थ्य मंत्री, राजस्थान

हालाँकि स्वास्थ्य के क्षेत्र से जुड़ी स्वयंसेवी संस्थाएँ निजी क्षेत्र को साथ लिए जाने को लेकर बहुत अधिक उत्साहित नहीं हैं.

जन स्वास्थ्य अभियान की छाया पंचोली का तर्क है कि इससे सरकार और आम लोग दोनों की निर्भरता निजी स्वास्थ्य क्षेत्र पर बढ़ जाएगी.

वे कहती हैं, “कई बार निजी अस्पताल पैकेज होते हुए भी इलाज से मना कर देते हैं, या पहले पैसा जमा करने को कहते हैं. ग़ैर ज़रूरी इलाज के मामले भी सामने आए हैं. सरकार जितने पैसे प्राइवेट सेक्टर को दे रही है वही पैसा लगाकर सरकारी क्षेत्र को मज़बूत किया जा सकता है ताकि प्राइवेट सेक्टर पर निर्भरता कम हो सके.”

क्या हैं लोगों की शिकायतें?

3 साल के बच्चे की मां लीला को नहीं मिला चिरंजीवी योजना का लाभ

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प्रतापगढ़ शहर से कुछ ही दूर पर बसे बड़ी बंबोरी गाँव की लीला के साथ कुछ ऐसा ही हुआ.

उनके तीन साल के बेटे गौरव को एक मोटरसाइकिल सवार ने धक्का मार दिया और उसके टांग की हड्डी टूट गई.

लीला ने जब चिरंजीवी योजना के तहत इलाज करने को कहा तो प्राइवेट अस्पताल ने ये कहकर मना कर दिया कि छह साल से कम के बच्चे योजना के दायरे में नहीं आते हैं.

ऑपरेशन के 18 हज़ार रुपए, जाँच, दवाइयाँ, अस्पताल का ख़र्च मिलाकर गौरव के इलाज पर 33 हज़ार रुपए ख़र्च हुए, जिसके लिए परिवार को क़र्ज़ लेना पड़ा, और गहने गिरवी रखने पड़े.

वही अस्पताल अब एक्सीडेंट के बाद पैर में डाले गए रॉड को निकालने का इलाज चिरंजीवी योजना के तहत करने को तैयार हैं, लेकिन कह रहे हैं कि 12 हज़ार रुपए के कुल ख़र्च में से तीन हज़ार लीला को अपने पास से देने होंगे.

3 साल के गौरव के पांव में लगी रॉड निकालने के लिए डॉक्टर मांग रहे हैं एक चौथाई खर्च

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इस सवाल पर कि योजना में तो इलाज के लिए किसी तरह के पैसे नहीं देने होते हैं,

लीला कहती हैं, "हम सोच रहे हैं कि नौ हज़ार तो बच रहे हैं, तीन हज़ार रुपए ही लगेंगे."

छाया पंचोली कहती हैं, "दूर-दराज़ के गाँवों से आने वाले लोगों को मालूम ही नहीं होता कि शिकायत कहाँ करनी है. हमें लगता है कि जब तक प्राइवेट सेक्टर पर पूरी निगरानी नहीं है तब तक आप बीमा योजना लाएँगे तो उसका ग़लत दोहन ही होगा.”

डॉक्टर नरेंद्र गुप्ता ताज़ा सीएजी रिपोर्ट का हवाला देते हैं जिसमें सामने आया है कि केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना में मृत या मृत दिखाए गए मरीज़ों का फिर से इलाज दिखाया गया.

एक ही मरीज़ का एक ही समय में कई-कई अस्पतालों में इलाज के मामले सामने आए.

एक ही मोबाइल नंबर से ढेरों मरीज़ों का पंजीकरण हुआ, कम-से-कम 2.25 लाख ऐसे मामले थे, जिनमें मरीज़ के ऑपरेशन की तारीख़ डिस्चार्ज डेट से पहले दिखाई गई थी.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इनमें से बहुत सारे आरोपों को ग़लत बताया है.

निजी अस्पताल कितने मददगार हैं?

सरकारी योजना के बावजूद निजी अस्पताल करते हैं मनमानी

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नरेंद्र गुप्ता प्रयास नाम की संस्था चलाते हैं जो स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करती हैं.

सरकार की मुफ़्त दवा योजना की रूपरेखा तैयार करने में नरेंद्र गुप्ता का अहम योगदान रहा है.

‘सरकारी बीमा योजनाओं में निजी अस्पतालों का व्यवहार’ नाम के एक शोध में ये पाया गया कि प्राइवेट अस्पताल बीमा में उन सेवाओं के क्लेम भर रहे हैं, जो महँगी हैं.

क्लेम की गई बहुत सारी स्वास्थ्य सुविधाएँ वैसी थीं जो उन अस्पतालों ने मरीज़ों को मुहैया ही नहीं करवाई थी.

निजी अस्पतालों ने उन सेवाओं के पैसे भी मरीज़ों से अलग से लिए, जो बीमा योजना में शामिल थीं यानी इनके पैसे मरीज़ से नहीं लिए जाने थे क्योंकि वो बीमा कवरेज का हिस्सा थे.

ये शोध लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज की अर्थशास्त्री राधिका जैन ने राजस्थान में पुरानी स्वास्थ्य बीमा योजना (भामाशाह) को लेकर किया था.

इस शोध में 16 लाख बीमा दावों का अध्ययन किया गया था, साथ ही 20 हज़ार मरीज़ों एक सर्वे भी हुआ था.

जानकार कहते हैं कि भले ही यह शोध कुछ समय पुराना हो लेकिन उसने जिन तौर-तरीक़ों को उजागर किया था वे अब भी बदस्तूर जारी हैं.

क्या कहते हैं निजी अस्पताल?

ज़िला स्तर पर संजीवनी योजना को लेकर जागरुकता के बावजूद कई ख़ामियां

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सिर्फ़ राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश के उन सभी राज्यों में, और केंद्र की बीमा योजना के तहत भी इलाज और ऑपरेशन के लिए एक पैकेज तय है जिसे लेकर बहुत सारे निजी अस्पताल सहज नहीं हैं.

उनका कहना है कि एक ही ऑपरेशन के दो अलग-अलग अस्पतालों में दो रेट हो सकते हैं, जो सुविधाओं पर निर्भर करते हैं.

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की राजस्थान इकाई के पूर्व उपाध्यक्ष डॉक्टर अशोक गोयल कहते हैं कि शासन ने “स्टेंट का एक रेट तय कर दिया है लेकिन कभी-कभी उसमें कुछ दिक्क़त आ जाती है तो उसके लिए मामूली ऑपरेशन करना होता है, जो पैकेज में शामिल नहीं है. अगर बीमा योजना के तहत स्टेंट लगाने के बाद किसी तरह की परेशानी उत्पन्न हो जाती है तो चिकित्सक मरीज़ को किस तरह समझा पाएगा?”

डॉक्टर गोयल कहते हैं कि इन्हीं जटिलताओं की वजह से उन्होंने अपने नर्सिंग होम को किसी भी सरकारी योजना का हिस्सा नहीं बनाया है.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के शोध में ये भी पाया गया कि लागू होने के पहले चार साल में 75 प्रतिशत क्लेम्स निजी अस्पतालों के माध्यम से आए. जिसका एक अर्थ ये भी निकाला गया कि मरीज़ स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सरकारी के बदले प्राइवेट सेक्टर की सेवाएँले रहे हैं.

स्वास्थ्य क्षेत्र में हुए एक सरकारी सर्वे के मुताबिक़ देश की तक़रीबन 65 प्रतिशत जनसंख्या निजी अस्पतालों में इलाज करवाती है.

बीमा योजना की निगरानी कैसे होती है?

परसादी लाल मीणा, स्वास्थ्य मंत्री, राजस्थान

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प्राइवेट सेक्टर की अधिक सेवा लेने का मामला सरकारी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी की वजह से भी हो सकती है.

इस तरह स्वास्थ्य सुविधाओं को आम लोगों तक पहुँचाने के लिए सरकार भी निजी क्षेत्र पर निर्भर होती जा रही है.

ऑक्सफ़ैम के साल 2020 के एक सर्वे के अनुसार स्वास्थ्य पर ख़र्च करने के मामले में भारत नीचे से चौथे स्थान पर है. सरकारें सामान्यत: जीडीपी का एक प्रतिशत ही स्वास्थ्य सेक्टर पर ख़र्च करती हैं.

राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री परसादी लाल मीणा स्वास्थ्य बीमा योजना को ठीक तरह से लागू करने के लिए एक सुचारु सिस्टम मौजूद होने का दावा करते हैं जिसमें चिरंजीवी योजना के लिए एक सीईओ है जिसके अधीन मौजूद टीम इसकी लगातार ऑनलाइन मॉनिटरिंग करती है.

अठारह मेडिकल और चालीस नर्सिंग कॉलेजों के खोले जाने और पंचायत स्तर के हेल्थ सेंटर्स से लेकर ज़िला चिकित्सालय खोले जाने की बात भी परसादी लाल मीणा करते हैं और कहते हैं कि 25 लाख रुपए प्रति परिवार बीमा देकर सरकार ने “ग़रीब से ग़रीब आदमी को जीने का अधिकार दिया है.”

विपक्ष और सरकार की बहस

राजेंद्र राठौर, बीजेपी
नेता प्रतिपक्ष, राजस्थान विधानसभा
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पच्चीस लाख रुपये का लाभ महज़ 14 लोगों को हासिल हो पाया है, दस लाख के लाभार्थी भी सौ से कुछ अधिक होंगे, बाक़ी सभी पांच-पांच लाख या उससे कम वाले हैं.
राजेंद्र राठौर, बीजेपी
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विधानसभा में विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के नेता राजेंद्र राठौर कहते हैं कि 25 लाख रुपए का लाभ महज़ 14 लोगों को हासिल हो पाया है, 10 लाख के लाभार्थी भी सौ से कुछ अधिक होंगे, बाक़ी सभी पाँच-पाँच लाख या उससे कम वाले हैं.

बीजेपी नेता कहते हैं, "पाँच लाख की बीमा योजना तो केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से सभी ग़रीब परिवारों को दे रखा है, अशोक गहलोत सरकार ने तो उसी आयुष्मान योजना को विकृत करके दूसरा नाम भर दे दिया है."

इसी साल मार्च में राजस्थान में लाए गए 'स्वास्थ्य अधिकार बिल' को स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाली कई स्वंयसेवी संस्थाएँ मील का पत्थर बता रही हैं.

ये भी कहा गया है कि कई स्वास्थ्य मानकों जैसे शिशु मृत्यु दर, जन्म दर आदि के आधार पर राजस्थान पिछड़ा है लेकिन हाल के सालों में उसने क्षेत्र में कुछ अहम क़दम उठाए हैं जैसे मुफ़्त दवा वितरण और इस साल विधानसभा से पास हुआ 'स्वास्थ्य का अधिकार' क़ानून.

सस्ती दवाइयों की बिक्री का पहलू

बीजेपी विधायक दल और विपक्ष के नेता राजेंद्र राठौड़

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मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना राज्य में पिछले बारह साल से लागू है.

शासन का कहना है कि इसकी वजह से सरकारी अस्पतालों में मरीज़ों की कुल तादाद में लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, पहले के 26 से बढ़कर 36 प्रतिशत.

योजना के तहत सभी सरकारी अस्पतालों में जेनरिक मेडिसिन मुफ़्त उपलब्ध करवाई जाती हैं. इसके लिए राज्य भर में 150 ड्रग डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर्स भी खोले गए हैं जहाँ 2400 क़िस्म के ड्रग्स उपलब्ध हैं.

राजस्थान मेडिकल सर्विसेज़ कार्पोरेशन के एक अधिकारी के अनुसार ये देश भर में किसी भी राज्य से अधिक है.

जेनरिक मेडिसिन्स वो दवाएँ हैं जो किसी दवा के पेटेंट ख़त्म हो जाने के बाद तैयार की जा सकती हैं और उनमें भी वही रसायन होते हैं जो ओरिजिनल कंपनी की दवा में होते हैं.

यूं तो निशुल्क दवा योजना राज्य भर में 2011 से लागू हुई.

लेकिन इसकी नींव साल 2005 में ही पड़ गई थी जब मेडिसिन्स की पढ़ाई में मास्टर्स (एमडी) कर चुके समित शर्मा की पोस्टिंग एक आईएएस अधिकारी के रूप में झालावाड़ ज़िले में हुई.

विश्व स्वास्थ्य संगठन
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हर साल साढ़े पाँच करोड़ भारतीय इलाज पर अपनी जेब से ख़र्च करने के कारण कमज़ोर आर्थिक स्थिति की तरफ़ धकेल दिए जाते हैं.
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जयपुर के अपने दफ़्तर में बीबीसी से बातें करते हुए समित शर्मा बताते हैं, "बहुत सारी दवाइयाँ जिनका उत्पादन मूल्य दो रुपए होता है उनके पैकेट पर उसकी क़ीमत 30 रुपए छपी होती है, जबकि केमिस्ट को भी बहुत कम क़ीमत पर मुहैया हो जाती हैं. मुझे लगा कि अगर हम कंपनी से सीधे ख़रीदकर मरीज़ों को जेनरिक मेडिसिन मामूली क़ीमत पर बेचें तो लोगों के लिए इलाज बहुत सस्ता हो जाएगा".

साल 2011 में दो सौ करोड़ रुपए की लागत से लांच की गई योजना पर 2023 में कुल 1200 करोड़ रुपए ख़र्च होंगे.

कम दामों पर जेनरिक दवाएँ उपलब्ध करवाने के लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने भी ज़िला और शहर स्तर पर दुकानें खोलने की शुरुआत की है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, इलाज पर अपनी जेब से ख़र्च करने के कारण हर साल साढ़े पाँच करोड़ भारतीय कमज़ोर आर्थिक स्थिति की तरफ़ धकेल दिए जाते हैं.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के स्वास्थ्य पर होने वाले ख़र्च का ब्योरा देने वाले नेशनल हेल्थ अकाउंट्स के अनुसार भारत में स्वास्थ्य पर 55 प्रतिशत लोग अपनी जेब से ख़र्च करते हैं.

इलाज में सरकार की मदद आधी से भी कम
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दवाइयों की बिक्री से जुड़ी शिकायतें

समित शर्मा के साथ बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली

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निशुल्क दवा योजना के क्रम में राज्य सरकार ने इलाज के दौरान होने वाली कुछ जाँचों को भी इसका हिस्सा बना दिया है.

मुफ़्त दवा स्कीम बहुत हद तक काम कर रही है लेकिन सरकारी योजनाओं की दिक्क़तें इसमें भी कहीं-कहीं दिख जाती हैं.

प्रतापगढ़ के सरकारी ज़िला अस्पताल में गाँव बरखेड़ी से आए जगदीश की माँ का “एक्स-रे फ़िल्म नहीं होने के कारण नहीं हो पाया” और इसके लिए उन्हें प्राइवेट एक्स-रे सेंटर में तीन सौ रुपए ख़र्च करने पड़े.

लेकिन अस्पताल से मुफ़्त दवाइयाँ मिलने में उन्हें किसी दिक्क़त का सामना नहीं करना पड़ा.

जेनरिक मेडिसिन के प्रसार में अभी काफ़ी काम होना है, वे हर जगह आसानी से उपलब्ध हों ये ज़रूरी नहीं है.

समित शर्मा कहते हैं कि दुनिया में हथियारों के बाद फ़ार्मास्यूटिक्ल्स सबसे बड़ा उद्योग है और उसके अपने हित हैं.

'स्वास्थ्य का अधिकार' क़ानून पर विवाद

सरकारी योजना और निजी अस्पतालों के रुख के बीच इलाज को मोहताज़ तमाम मरीज़

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राजस्थान सरकार का स्वास्थ्य का अधिकार क़ानून भी विधानसभा से पास होने के बाद प्राइवेट सेक्टर और सरकार के बीच पैदा हुए टकराव की वजह से लागू नहीं हो पाया.

सुप्रीम कोर्ट ने 1996 के एक फ़ैसले में स्वास्थ्य के अधिकार को जीवन के अधिकार से जोड़ा था.

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि ये राज्य की ज़िम्मेदारी है कि सभी को स्वास्थ्य की सुविधा मुहैया करवाए.

स्वास्थ्य के अधिकार क़ानून को मार्च माह में मंज़ूरी मिलने के बाद प्रत्येक नागरिक को इलाज का अधिकार देने वाला राजस्थान देश का पहला राज्य बन गया.

लेकिन क़ानून पास होने के कुछ ही दिनों बाद राज्य के सभी निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम्स में काम करने वाले चिकित्सक और पैरा मेडिकल स्टॉफ़ हड़ताल पर चले गए.

प्राइवेट सेक्टर की चिंता क़ानून के उस हिस्से को लेकर है जिसमें कहा गया है कि इमरजेंसी में राज्य के भीतर मौजूद कोई भी स्वास्थ्य संस्थान मरीज़ के इलाज से इनकार नहीं कर सकता है.

निजी अस्पतालों का कहना है कि बहुत सारे प्राइवेट अस्पताल या नर्सिंग होम ऐसे हैं जिसमें आकस्मिक स्थिति से निपटने की क्षमता नहीं है तो उस स्थिति में वो क्या करेंगे, दूसरा सवाल है मरीज़ के इलाज पर आने वाले ख़र्च की भरपाई किस तरह होगी?

परसादी लाल मीणा कहते हैं कि ये पैसे सात दिनों के भीतर सरकार की तरफ़ से निजी संस्थाओं को इलाज के बाद दे दी जाएगी.

उन्होंने बताया कि ये बात चिकित्सकों से कह दी गई है, इसलिए क़ानून लागू करने में अब कोई रुकावट नहीं है.

डॉक्टर अशोक गोयल कहते हैं कि पिछली सरकार के समय लागू बीमा योजना में प्राइवेट सेक्टर के काफ़ी लोगों के पैसे नहीं मिल पाए, जिससे उनका नुक़सान हुआ.

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