वसुंधरा राजे सिंधिया: राजस्थान बीजेपी की 'रानी' के लिए मौजूदा लड़ाई कितनी मुश्किल, कितनी आसान

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- Author, त्रिभुवन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
बात मार्च, 2018 की है. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर राजस्थान के झुंझुनूं में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक कार्यक्रम में मौजूद थे और साथ थीं तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे.
इस सभा के बाद एक फोटो वायरल हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी सावधान की मुद्रा में खड़े थे और वसुंधरा राजे उनके सामने गर्वीली अदा में तनी हुई थीं. उनकी एक उंगली उठी हुई थी.
देश की राजनीति के सबसे ताकतवर नेता के सामने भारतीय जनता पार्टी की नेता की यह मुद्रा उनकी भीतरी ताक़त, न झुकने की अदा और आत्मविश्वास से लबरेज़ शख़्सियत का प्रतिबिंब है.
अब यह परिदृश्य बदल चुका है. प्रधानमंत्री मोदी की सभाओं में अब वे मंच पर तो होती हैं, लेकिन एक शालीन मुद्रा में उनके आसपास. लेकिन अपराजेय होने का भाव अब भी उनकी दैहिक भाषा से टपकता है.
पांच बार विधायक और पांच बार लोकसभा सांसद रहीं ग्वालियर राजघराने की बेटी और धौलपुर राजघराने की बहू वसुंधरा राजे की शख़्सियत के सुर्ख़-रू होने का एक बड़ा कारण उनका पांच जातियों से सीधे-सीधे जुड़ाव भी है.
वे मराठा राजपूत हैं तो जाट राजघराने में उनकी शादी हुई है. उनके पति का जन्म सिख राजघराने में हुआ और वे जाट राजघराने में नाना की गोद आए. इसी की बदौलत उन्हें राजस्थान की राजनीति में अपना कद इतना बड़ा कर सकने का मौका मिला.
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में विदेश राज्य और कार्मिक मंत्रालय जैसे विभागों की मंत्री रह चुकी वसुंधरा राजे को राजस्थान के रण में उतारा गया तो उन्होंने भाजपा की 'उदास और कलह भरी' राजनीति के बावजूद 2003 के चुनाव में 200 में से 120 सीटें लाकर इतिहास रच दिया.

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वसुंधरा ने बदली राजस्थान की चुनावी बाज़ी
इससे पहले कभी भी भारतीय जनता पार्टी राजस्थान की राजनीति में बहुमत नहीं ला सकी थी.
पार्टी नेता भैरोसिंह शेखावत 1977 में 152 सीटें लाने वाली जनता पार्टी के समय बहुत जोड़तोड़ से मुख्यमंत्री बने थे. लेकिन उसके बाद उनके नेतृत्व में भाजपा कभी भी 95 का आंकड़ा पार नहीं कर सकी.
वसुंधरा राजे से पहले भैरोसिंह शेखावत और पार्टी के बाकी नेताओं के समय राजस्थान विधानसभा के चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन पर एक नज़र डालिए.


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'मोदी लहर का असर'
शेखावत तीन बार सीएम बने. एक बार जनता पार्टी के समय जब 152 सीटें आईं. इसके बाद भाजपा के नेता के तौर पर वे दो बार सीएम बने, जिनमें एक बार 1993 में भाजपा महज 95 सीटें ला पाई और एक बार 1990 में जब भाजपा 85 से आगे नहीं बढ़ सकी.
उस समय बहुत के लिए 101 सीटों की जरूरत थी.
वसुंधरा राजे दो बार मुख्यमंत्री बनीं. एक बार 2003 में उनके नेतृत्व में 120 सीटें आईं तो 2013 में उन्होंने 163 सीटों के साथ सियासी सुनामी ला दी.
लेकिन राजनीतिक प्रेक्षकों का यह भी मानना है कि इतनी सीटें आने के पीछे एक बड़ी वजह उस समय मोदी लहर थी.
उस चुनाव में नरेंद्र मोदी ने जब प्रदेश के तमाम इलाकों में जनसभाओं को संबोधित किया था तो भीड़ जबरदस्त रही थी.
प्रेक्षक यह भी मानते हैं कि उस चुनाव में वसुंधरा राजे ने समय रहते तत्कालीन गहलोत सरकार के खिलाफ़ एक बड़ी यात्रा निकाली थी, जिसमें उनके साथ भाजपा नेता भूपेंद्र यादव थे.
लेकिन इस बार उन्हें गहलोत की मौजूदा सरकार के खिलाफ राजनीतिक यात्रा निकालने की अनुमति पार्टी हाईकमान ने नहीं दी.
बल्कि इस बार चार अलग-अलग टीमों के माध्यम से प्रदेश की चार अलग-अलग दिशाओं में राजनीतिक यात्राएँ निकाली गईं. लेकिन वे वसुंधरा राजे की यात्राओं जैसा असर पैदा नहीं कर सकीं.

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'मेरी डोली राजस्थान आई थी, अब अर्थी ही जाएगी'
साफ़ है, अब राजस्थान भाजपा की राजनीति का परिदृश्य जब नया आकार ले रहा है, सियासी गुलों में रंग भरने और सत्ता के गुलशन का काराेबार चलाने के लिए कई नए चेहरे चर्चा में हैं और वसुंधरा राजे थोड़ा किनारे पर लग रही हैं.
इस बदलाव के संकेत पांच साल पहले उस समय मिले जब वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली भाजपा की सरकार चली गई और अशोक गहलोत के नेतृत्व में काँग्रेस सत्तासीन हुई.
कुछ ही दिन बाद 10 जनवरी, 2019 को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की टीम में उन्हें उपाध्यक्ष बनाया गया. इससे यह तय कर दिया गया कि उन्हें नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाया जाएगा.
नेता प्रतिपक्ष बने पार्टी के वरिष्ठ नेता गुलाबचंद कटारिया.
कटारिया को बाद में असम का राज्यपाल नियुक्त किया गया तो उनकी जगह नेता प्रतिपक्ष बने राजेंद्र सिंह राठौड़. इससे पहले प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए सीपी जोशी.
इससे यह और तय हो गया कि वसुंधरा राजे का स्थान राष्ट्रीय राजनीति में पार्टी हाईकमान तय करने जा रहा है.
वसुंधरा राजे ने अपने चुनाव क्षेत्र झालरापाटन की एक रैली में 20 जनवरी, 2019 को कहा, "मैं पहले ही कह चुकी हूँ कि मेरी डोली राजस्थान आई थी. अब अर्थी ही यहाँ से जाएगी. मेरा पूरा का पूरा जीवन मेरे इस राजस्थान परिवार के लिए समर्पित रहेगा. मैं राजस्थान की सेवा से कभी पीछे हटने वाली नहीं हूँ.'

वरिष्ठ पत्रकार संजीव श्रीवास्तव कहते हैं, "वसुंधरा राजे 2013 से 2018 के दौरान कई बार हाईकमान के सामने खड़ी रही हैं. इससे पहले भी कई बार ऐसा हुआ है. वे इसी का परिणाम भुगत रही हैं. लेकिन 2003 की राजनीतिक रूप से अल्हड़ वसुंधरा और 2023 की कारसाज़ वसुंधरा के बीच एक उथल-पुथल और अनुभवों से भरी एक यात्रा है."
संजीव श्रीवास्तव आगे कहते हैं, "भैरोसिंह शेखावत और जसवंत सिंह की छाया से निकलकर आगे आईं वसुंधरा राजे ने मुख्यमंत्री बनने के बाद जैसा नियंत्रण प्रदेश की प्रशासनिक और राजनीतिक स्थितियों पर किया, वह उनकी शख़्सियत के भावों और प्रभावों को मुखरता से बताता है. वे कभी जिद्दी दिखीं तो कभी हठधर्मिता वाली. उनकी पसंद-ना पसंद बहुत स्ट्राँग है."

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बनाई अपनी अलग पहचान
वसुंधरा राजे के पहले कार्यकाल में काम कर चुके एक आला अफसर बताते हैं, "उनकी निर्णय क्षमता गजब है. वे सिर्फ "यस ओर नो' में विश्वास करती हैं."
संजीव श्रीवास्तव मानते हैं, "वसुंधरा राजे का सौंदर्यबोध कमाल है. वे राजस्थान की ब्रांड एंबेसडर नज़र आती हैं. उनका विजन प्रदेश के पारंपरिक नेताओं से बहुत अलग है."
वे यह भी बताते हैं, "उनके नेतृत्व में जैसा औद्योगिक विकास हुआ, वह पहले से बहुत अलग था. लेकिन पहले कार्यकाल में ललित मोदी फ़ैक्टर उनके लिए भारी पड़ा तो दूसरे कार्यकाल में मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी ख़ैर नहीं जैसे नारों ने उनका बहुत नुकसान किया."
यह भी दिलचस्प तथ्य है कि वसुंधरा राजे का दोनों कार्यकाल में जितना विरोध पार्टी के भीतर से हुआ, उतना बाहर से नहीं.
कांग्रेस के एक रणनीतिकार बताते हैं, 'पहले कार्यकाल में उनकी सरकार के खिलाफ आरोपों की सूची तैयार की जाने लगी तो उनमें अधिकतर आरोप भाजपा के नेताओं के थे. इन्हीं को आधार बनाकर काँग्रेस उनके खिलाफ चुनाव अभियान में उतरी.'
उनका उत्कर्ष ऐसे समय हुआ जब 76 साल की उम्र को पार कर चुके भैरोसिंह शेखावत को राजस्थान से विदा कर उनकी जगह नया नेतृत्व तैयार किया जा रहा था.
संजीव श्रीवास्तव राजस्थान की राजनीति में वसुंधरा राजे के केंद्रीय भूमिका में आने के दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "उस समय 2003 में उनकी उम्र वही थी, जो आज दीयाकुमारी की है. बल्कि उनसे दो साल कम ही थी. वसुंधरा राजे आज भले 71 वर्ष की हों, लेकिन वे फिट हैं और योग, जिम-ट्रेडमिल आदि नियमित करती हैं. वे सेहत के प्रति बहुत सजग हैं और खानेपीने का बहुत ख़याल रखती हैं.'
उन्हें जानने वाले पारिवारिक सूत्रों के अनुसार वे बिना पूजा-पाठ किये न किसी से मिलती हैं और न ही कुछ खाती-पीती हैं.
सीएम बनने के कितने मौके?

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प्रदेश की चुनावी राजनीति पर गहरी निगाहें लगाए प्रेक्षकों का मानना है, "जहाँ सब ये मानकर बैठे हैं कि इस बार भाजपा सत्ता में आई तो वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री नहीं बन सकतीं, उन्हें यह एहसास नहीं कि चुनाव के नतीजों ने कुछ भी ऐसा संकेत दिया कि वसुंधरा राजे के बिना 2024 के लोकसभा चुनावों के नतीजे भाजपा के लिए प्रभावित हाे सकते हैं तो उनकी ताजपोशी फिर से हो भी सकती है क्योंकि वे ही प्रदेश की सभी 25 सीटों पर तूफानी ढंग से माहौल बनाने में मोदी की मददगार हो सकती हैं."
लेकिन एक सवाल यह खड़ा होता है कि आख़िर वे इतनी क़ामयाब और करिश्माई हैं तो फिर पार्टी हाईकमान उनसे नाराज़ क्यों है?
हम जैसे ही भारतीय जनता पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं से इस बात को समझने की कोशिश करते हैं तो वे बताते हैं, वे मुख्यमंत्री थीं और पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व राजस्थान में अपनी चाहत का प्रदेश अध्यक्ष बनाने में कामयाब ही नहीं हो सका.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह अलग तेवर वाले नेता होने के बावजूद केंद्रीय मंत्री और लंबे समय से संघ से जुड़े गजेंद्र सिंह शेखावत को राज्य इकाई का अध्यक्ष बनाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने न केवल इसे स्वीकार नहीं किया बल्कि शेखावत के पांव भी प्रदेश की ज़मीन पर नहीं लगने दिए. इसके बावजूद कि प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के संकेतों के बाद वे राज्य के कई इलाकों का दौरा भी कर चुके थे.
उस समय पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी इस्तीफ़ा दे चुके थे, लेकिन शेखावत की ताजपोशी नहीं हो सकी और पार्टी काफी समय तक बिना प्रदेश अध्यक्ष रही. इससे प्रदेश ही नहीं, देश की राजनीति में भी पार्टी की बहुत किरकिरी हुई और मोदी-शाह की असाधारण रूप से ताकतवर होने की छवि को भी धक्का पहुंचा.

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आलाकमान से टकराव का सिलसिला
हाईकमान से उनके टकराव की शुरुआत तभी से मानी जाती है जब मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने और वे प्रदेश के कई सांसदों को लेकर बीकानेर हाउस में बैठी रहीं. कहते हैं कि उनका दबाव था कि उनके सांसद बेटे दुष्यंतसिंह को मंत्री बनाया जाए. उनके समर्थक इसे किस्सेबाज़ी का हिस्सा बताते हैं.
पहली बार मुख्यमंत्री रहते हुए पार्टी के संगठन महामंत्री प्रकाशचंद्र से उनका विवाद हुआ तो फिर उन्होंने एक अरसे तक संघ के किसी स्वयं सेवक को पार्टी में महामंत्री संगठन के रूप में आने नहीं दिया.
हालांकि उनके पक्ष वाले जानकारों का कहना है कि यह पार्टी के अपने अनिर्णय के कारण हुआ. इसमें राजे का कोई लेनादेना नहीं था.
देश में भाजपा के क्षेत्रीय नेताओं में सिर्फ वसुंधरा राजे ही ऐसी थीं, जो केंद्रीय नेतृत्व के सामने एक शक्ति केंद्र के रूप में उभरीं.
इससे पहले वे राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे राजनाथ सिंह के सामने भी नहीं झुकी थीं.
वे भाजपा की धार्मिक विभाजन वाली राजनीति में भी फिट नहीं होतीं. उनकी राजनीति को निकट से देखते रहे और सिराकस विश्वविद्यालय के अध्येता रहे प्रो. मोहम्मद हसन बताते हैं कि वसुंधरा राजे से अल्पसंख्यक किसी भी समय न्याय की उम्मीद कर सकते हैं. वे वैसी 'कट्टर' नहीं हैं, जैसा आज के भाजपा नेता दिखते हैं.
वसुंधरा राजे के पुराने बयानों और साक्षात्कारों का अध्ययन करें तो वे मानती हैं, "माँ ने मुझे एक मंत्र दिया था कि अगर तुम राजनीति में जाओ तो एक बात ध्यान रखना लोगों को प्यार से जोड़ना. कभी जाति, धर्म और वोट के लिए लोगों को मत तोड़ना.'

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बीजेपी की 'कट्टर लीक' से अलग पहचान
किताबें पढ़ने की शौकीन वसुंधरा राजे को इतिहास बहुत भाता है और वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के राजनेताओं पर ख़ूब पढ़ती हैं. वे अध्यात्म, दर्शन, अच्छी जीवनियों से लेकर मर्डर मिस्ट्री तक सब पढ़ती हैं.
राजमहल से राजनीति के गलियारे तक का सफ़र तय कर चुकीं राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के व्यक्तित्व के कई पहलू बहुत दिलचस्प हैं.
बचपन में जहाज़ों में घूमने, रेस देखने, महलों में रहने, चाँदी के बर्तनों में खाने, नौकरों के बिगाड़े जाने और अपनी ट्रेन के सलून में चलने वाली वसुंधरा राजे का जीवन बहुत उतार-चढ़ाव भरा रहा है.
भाजपा की राष्ट्रीय नेता विजयराजे सिंधिया की यह बेटी तमिलनाडु के हिल स्टेशन कोडाइकनाल में बोर्डिंग स्कूल में पढ़ीं. हाउस कैप्टन बनीं. यहीं उन्होंने प्रतियोगिता के जरिए आगे बढ़ना सीखा.
पाँचवीं से 12वीं तक की शिक्षा बोर्डिंग में पूरी करने वाली राजे ने मुंबई में सोफिया कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस और इकोनॉमिक्स से ऑनर्स किया.
कॉलेज में पढ़ने के दौरान ही उनकी शादी हो गई और ग्रेजुएशन उन्होंने शादी-शुदा महिला के रूप में किया. वे यूनिवर्सिटी के दिनों में विदेश खूब घूमीं और इस दौरान उनके भाई माधव राव सिंधिया साथ रहे.
उनके पहले कार्यकाल में उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और दूसरी बार मुख्यमंत्री बने अशोक गहलोत ने उनके खिलाफ एक समिति भी गठित की, लेकिन वह किसी निर्णय पर ही नहीं पहुंच सकी.
भ्रष्टाचार के आरोपों पर उन्होंने तब ही कहा था, “मुझे हँसी आती है क्योंकि मेरे परिवार में कभी किसी चीज़ की कमी नहीं रही और इस परिवार ने हमेशा देना सीखा है, लेना नहीं.”
वसुंधरा राजे वैसे तो अपने जीवन में अपनी माँ विजय राजे को ही अपनी प्रेरणास्रोत बताती हैं, लेकिन वे गायत्री देवी को अपने समय की सबसे सुंदर महिला मानती हैं.
हमेशा साड़ी पहनने और बहुत नफ़ासत के साथ रहने वाली वसुंधरा राजे के फैशन प्रेम को लेकर भी विवाद हुए हैं.

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साड़ी प्रेम से लेकर रैंप तक, हर जगह चर्चित
पहली बार मुख्यमंत्री रहते हुए वे खादी के लिए रैंप पर उतरीं तो प्रदेश में वे चर्चा का विषय रहीं. इसे लेकर काँग्रेस और संघनिष्ठ खेमे ने उनका खूब विरोध किया.
वे फिल्में देखने की भी शौकीन रही हैं और विधानसभा के हर सत्र के आखिरी दिन पक्ष और विपक्ष के विधायकों को साथ लेकर किसी न किसी सिनेमा हॉल में शानदान आयोजन करवाती रही हैं.
वसुंधरा राजे ने रंगों, रेगिस्तान, हवेलियों, भेड़-बकरियों और ऊंटों वाले राजस्थान को आईटी, बीपीओ, औद्योगिकीकरण और पर्यटन का केंद्र बनाने की कोशिशें भी कीं.
वे अपने स्वास्थ्य का खूब ख़याल रखती हैं और नियमित व्यायाम करती हैं. उनका अपना ट्रेनर है और घर पर मशीनें भी हैं.
वे बागबानी की इतनी शौकीन हैं कि जब मुख्यमंत्री थीं तब दुर्गापुरा के पास एक ख़ूबसूरत नर्सरी में पौधों का चयन करने के लिए काफी समय गुजार आती थीं.
बाजरे की रोटी, गरम-गरम चने के साग और लहसुन की चटनी की शौकीन वसुंधरा राजे को लता मंगेशकर और आशा भोंसले के गाने बहुत पसंद हैं.
वसुंधरा राजे का सार्वजनिक जीवन 1984 में उस समय शुरू हुआ, जब उन्हें भारतीय जनता युवा मोर्चा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया.
वे 1985-90 में धौलपुर से विधायक रहीं. इसके बाद इस सीट पर तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत आ गए. लेकिन वे 1993 में इस विधानसभा सीट पर काँग्रेस के बनवारीलाल शर्मा से हार गईं.
इसके बाद उन्होंने अपना चुनाव क्षेत्र बदला और 2003 से निरंतर झालावाड़ जिले में झालरापाटन से निर्वाचित होती रहीं.
वे 1989-91 में 9वीं लोकसभा के लिए चुनी गईं. इसके बाद 1991-96, 96-98, 98-99 और 99-03 तक लोकसभा की सदस्य झालावाड़ से रहीं.
वे बेहद धार्मिक और श्रद्धालु हैं. वे दतिया पीठ की अनुयायी हैं. वे त्रिपुर सुंदर और चारभुजा जी में भी बहुत आस्था रखती हैं.

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दुश्मन को भी दोस्त बनाने का माद्दा
उनके व्यक्तित्व का सबसे दिलचस्प पहलू ये है कि वे कैसा भी टकराव मोल लेकर दोस्त को दुश्मन और दुश्मन को दोस्त बना सकती हैं.
पूर्व मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत और जसवंत सिंह उनके सबसे बड़े पैरोकार थे, लेकिन इनके साथ उनके रिश्ते बहुत खराब भी रहे.
देवीसिंह भाटी, कैलाश मेघवाल, प्रह्लाद गुंजल, गुलाबचंद कटारिया, नरपतसिंह राजवी जैसे कितने ही नेता हैं, जिनके साथ उनके रिश्ते बेहद कटुतापूर्ण हुए; लेकिन एक समय ऐसा भी आया, जब ये इनके साथ घी-शक्कर होते दिखे.
यह भी दिलचस्प है कि वे ही गजेंद्र सिंह शेखावत, दीयाकुमारी, अर्जुनराम मेघवाल जैसे नेताओं को पार्टी में लेकर आईं, लेकिन ये ही आज उनके बड़े प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरे हैं.
लेकिन केंद्र में मोदी-शाह के उत्कर्ष के बाद लग रहा था कि वसुंधरा राजे किसी न किसी तरह उनके साथ भी तालमेल बिठा लेंगी और राजस्थान भाजपा एक नए रूप में होगी लेकिन चाल-चरित्र और चेहरों के बदलाव की राह पर दौड़ पड़ी भाजपा की सियासत अब नए रंग और तरंग पर है.
राजस्थान में शेखावाटी हो या ढुंढाड़, नहरी इलाका हो या हाड़ौती, ब्रज-डांग हो या मेवाड़-मारवाड़ और वागड़, वसुंधरा राजे की वर्तमान स्थति को लेकर हर जगह सवाल हो रहे हैं और लोगों को उनकी कमी खल रही है.
आज केंद्र के साथ उनके रिश्तों को लेकर बहुत सवाल उठ रहे हैं, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक तौर पर अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि पार्टी या केंद्रीय नेतृत्व के प्रति उनकी कोई नाराज़गी है.
शेखावाटी के उनके एक मुरीद की प्रतिक्रिया कुछ यों सामने आई :
ये दाग़-दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर.
वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं.
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