राजस्थानः गहलोत सरकार का गिग वर्कर्स क़ानून क्यों है ख़ास और राहुल गांधी की क्यों है चर्चा

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- Author, मोहर सिंह मीणा
- पदनाम, बीबीसी के लिए, जयपुर से
“मैं 6 साल से कैब चला रही हूं. हमारी मेहनत का 40 प्रतिशत तक पैसा ऐप कंपनी काट लेती है. सुविधाओं के नाम पर हमें कुछ भी नहीं मिलता. न हमारा इंश्योरेंस है, न ही मेडिकल. ईएसआई, पीएफ़ जैसी कोई भी सुविधाएं नहीं हैं. मैं कंपनी में काम कर रही हूं, यदि मुझे कुछ हो गया तो मेरी दो बेटियों का क्या होगा? सरकार और कंपनी को यह तो सोचना चाहिए.”
यह कहना है जयपुर में बीते छह साल से अलग-अलग ऐप कंपनियों में कैब चला रहीं 38 साल की गिग वर्कर गंगा मंडल का.
राजस्थान में कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार ने गिग वर्कर्स की सामाजिक सुरक्षा के लिए विधानसभा से विधेयक पारित करवाया है. राज्यपाल के हस्ताक्षर के लिए ये विधेयक भेजा गया है.
हाल ही में तमिलनाडु सरकार ने भी गिग वर्कर्स के लिए एक वैलफ़ेयर फ़ंड बनाने का एलान किया है.
स्वरोज़गार और अंशकालिक रोज़गार से जो लोग अपना गुज़ारा करते हैं उन्हें गिग वर्कर्स कहा जाता है जबकि डिलीवरी का काम करने वाले और ऐप बेस्ड काम से जुड़े लोगों को ही गिग वर्कर समझा जाता रहा है.

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गंगा मंडल आगे कहती हैं, “इसमें जॉब गारंटी नहीं है. कंपनियां कभी भी आईडी ब्लॉक कर देती हैं, कोई सोशल सिक्योरिटी नहीं है. दुर्घटना होने पर कोई क्लेम की व्यवस्था नहीं है, कंपनी में सरकारी स्कीम से नहीं जुड़ पाते हैं. कंपनियां लगातार शोषण करती हैं.”
“लेकिन, अब सरकार क़ानून ला रही है तो हमें उम्मीद नज़र आ रही है.”

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राहुल गांधी से की थी मुलाक़ात
भारत जोड़ो यात्रा के दौरान गिग वर्कर्स का एक दल अलवर में राहुल गांधी से मिला था. इस दल में गंगा मंडल ने भी राहुल गांधी से मुलाक़ात कर गिग वर्कर्स की समस्याओं से कांग्रेस नेता को वाकिफ़ करवाया था.
इस मुलाक़ात के बाद ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गिग वर्कर क़ानून बनाने की घोषणा की. इस क़ानून के तहत गिग वर्कर्स को कई तरह की सामाजिक सुरक्षा दिए जाने का प्रावधान है.
राजस्थान के श्रम मंत्री सुखराम विश्नोई सरकार के इस प्रयास को ऐतिहासिक मानते हैं.
वह बीबीसी से कहते हैं, “यह बहुत बड़ा फ़ैसला है. हिंदुस्तान में किसी भी राज्य ने गिग वर्कर्स के लिए कुछ नहीं किया है. कांग्रेस ने घोषणा की और विधेयक लेकर आई है. राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद रूल्स बनाना शुरू करेंगे.”
भारत में अधिकतर गिग वर्कर्स ऐप प्लेटफॉर्म के ज़रिए काम कर रहे हैं.
ऑनलाइन कारोबार की बढ़ोत्तरी के साथ ही गिग वर्कर्स की संख्या में भी तेज़ी से बढ़ोत्तरी हो रही है. हालांकि, सरकार के पास इनका कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है.

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राजस्थान में 40 लाख गिग वर्कर
एक अनुमान के मुताबिक़ राजस्थान में क़रीब चार लाख गिग वर्कर्स हैं. जबकि एक अनुमान के मुताबिक भारत में डेढ़ करोड़ से ज़्यादा गिग वर्कर्स हैं.
इंडियन फेडरेशन ऑफ़ ऐप बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (आईएफएटी) के राष्ट्रीय महासचिव सलाउद्दीन शेख कहते हैं, “लोगों को अभी गिग वर्कर्स के बारे में पूरी जानकारी नहीं है. डिलीवरी से जुड़े काम करने वाले लोगों को ही गिग वर्कर समझा जा रहा है. जबकि, गिग वर्कर्स में कैब, डिलीवरी, अर्बन कंपनी समेत ऐप आधारित जो भी काम करते हैं, वह सभी गिग वर्कर में शामिल हैं.”
भारत जोड़ो यात्रा के दौरान हैदराबाद में सलाउद्दीन शेख ने राहुल गांधी से मुलाक़ात की थी और पहली बार उन्हें गिग वर्कर्स से जुड़े मुद्दों से अवगत करवाया.
अलवर में राहुल गांधी से मुलाकात कर गिग वर्कर्स के लिए क़ानून की मांग करने वाले जयपुर के आशीष सिंह बीबीसी से कहते हैं, “गिग वर्कर्स से जुड़ी कई अहम बातें सरकार को भी नहीं मालूम है.”
वह बताते हैं, “ट्रांसपोर्ट और डिलीवरी में सबसे ज़्यादा गिग वर्कर्स हैं. इनके लिए मोटर व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइन बनी हैं, हमने सरकार को इस पर भी सलाह दी थी. यह भी जल्द ही लागू होगी..”
“क़ानून के लिए रूल्स बनाने के दौरान गिग वर्कर को डिफाइन किया जाएगा. यदि कोई डॉक्टर एप के ज़रिए शुल्क लेकर सर्विस दे रहा है तो वह भी गिग वर्कर्स में शामिल होगा.”

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गिग वर्कर्स को ट्रेनिंग दी जाएगी
अशोक गहलोत सरकार के श्रम मंत्री सुखराम विश्नोई ने बीबीसी हिंदी से कहा, “हमने जो घोषणा की, उसकी पालना में विधेयक लाए हैं. इसमें दो सौ करोड़ रुपए का प्रावधान किया है. कोई गिग वर्कर यदि बीमार भी पड़ेगा तो उसके लिए व्यवस्था की गई है. ऐसा प्रावधान किया है कि कंपनियां गिग वर्कर को हटा नहीं सकती हैं.”
राजस्थान सरकार में श्रम विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी विकास भाले कहते हैं, “हमारे पास इसके लिए अपना बजट होगा. हम कर्मचारियों की सेफ्टी के लिए काम करेंगे. जैसे डिलीवरी से जुड़े लोगों को हेलमेट मिले, रात में काम के दौरान पहनने के लिए रिफ्लेक्टर जैकेट हों. गिग वर्कर्स का इंश्योरेंस हो और यदि हादसे का शिकार होते हैं तो उनको मुआवज़ा मिले.”
विकास भाले आगे कहते हैं, “क़ानून के प्रावधान के तहत कर्मचारियों को कुछ ट्रेनिंग भी दी जाएगी. जैसे इंग्लिश स्पीकिंग, कंप्यूटिंग, अकाउंटिंग आदि. जिससे कि कर्मचारी आगे बढ़ सकें. जीवनभर डिलीवरी का ही काम न करें.”

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गिग वर्कर्स वेलफ़ेयर बोर्ड बनेगा
गिग वर्कर्स के लिए 'राजस्थान प्लेटफॉर्म बेस्ड गिग वर्कर्स वेलफेयर बोर्ड' का गठन होगा. सभी गिग वर्कर्स का रजिस्ट्रेशन होगा और उनको यूनिक आईडी भी दी जाएगी. कल्याण बोर्ड के ज़रिए वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा दी जाएगी. इसके लिए 200 करोड़ के बजट की घोषणा की गई है.
गिग वर्कर्स की शिकायत पर सुनवाई और बोर्ड के ज़रिए वर्कर्स के वेलफेयर के लिए निर्णय लिए जाएंगे.
जयपुर के रहने वाले गिग वर्कर धर्मेंद्र वैष्णव कहते हैं, “हमारे दिए सजेशन और सरकार के साथ वार्ता के दौरान गिग वर्कर और एग्रीगेटर के पांच-पांच प्रतिनिधि का प्रावधान था. लेकिन, सरकार ने हमारे और एग्रीगेटर प्रतिनिधियों की संख्या घटा कर दो-दो कर दी गई है.”
गिग वर्कर्स की इस आपत्ति पर श्रम विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी विकास भाले कहते हैं, “हां, सही बात है कि शुरूआत में पांच-पांच प्रतिनिधियों का प्रावधान था. शुरुआत में बहुत कुछ था. पारित हुए विधेयक में दो-दो प्रतिनिधियों का ही प्रावधान है. लेकिन, समय के अनुसार बदलाव होते ही हैं.”
विधानसभा से पारित विधेयक में "प्लेटफॉर्म-आधारित गिग वर्कर्स वेलफेयर सेस" लगाने का प्रावधान है. सेस को एकत्रित करने और खर्च का काम बोर्ड करेगा.
सेस उपभोक्ता पर लगेगा या गिग वर्कर्स पर? बीबीसी के इस सवाल पर श्रम विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी कहते हैं, “कंपनी किसी प्रोडक्ट पर जो डिलीवरी चार्ज लेती है, उस चार्ज का अधिकतम दो प्रतिशत तक कंपनी से लिया जाएगा.”

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क़ानून से गिग वर्कर्स को उम्मीदें
गिग वर्कर्स के लिए क़ानून बनाने की मांग काफ़ी समय से की जा रही है. कई साल से गिग वर्कर्स के संगठन, सिविल सोसायटी इसके लिए प्रायसरत रही हैं.
सलाउद्दीन शेख कहते हैं, “हम यह नहीं कहते कि हमें फूल मिल गया, लेकिन फूल की पत्ती तो मिली है."
वह मानते हैं कि देश के अन्य राज्यों पर इसका दबाव है और इसके लिए अन्य राज्यों में भी प्रभाव देखने को मिलेगा.
सलाउद्दीन शेख बताते हैं कि, “गिग वर्कर्स को ट्रांसपोर्ट, फाइनेंस या सोशल सिक्योरिटी से जुड़ी समस्या आने पर सरकारी विभाग उनको नज़रअंदाज़ करते थे. लेकिन, अब इनकी सुनवाई होगी.”
आशीष सिंह कहते हैं, “कंपनी आईडी ब्लॉक कर डेटा डिलीट कर देती है. लेकिन, क़ानून के बाद सरकार के पास वर्कर्स का सारा डाटा होगा तो इनको सरकारी योजनाओं से जोड़ने में आसानी होगी.”
इनकी कमाई का भी सरकार को मालूम होगा. गिग वर्कर्स की समस्याओं की सुनवाई के लिए एक वेब पोर्टल बनेगा.
गंगा मंडल कहती हैं, “नियम बनेंगे तो इनके लिए सरकारी योजनाएं भी बनेंगी. महिलाओं के लिए विशेष सिक्योरिटी के प्रावधान होने चाहिए.”

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इंटरनेट बंद होने पर मिले मुआवज़ा
लेकिन राजस्थान ऐप आधारित श्रमिक यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष धर्मेंद्र वैष्णव अभी इस क़ानून को दूर की कौड़ी मानते हैं.
राजस्थान में अधिकतर भर्ती परीक्षाओं के दौरान इंटरनेट बंद रखा जाता है. बीते दिनों राज्य में कुछ घटनाओं के कारण भी लंबी अवधि तक इंटरनेट सेवाएं बंद रहने का रिकॉर्ड रहा है. इससे गिग वर्कर्स का काम भी ठप हो जाता है.
धर्मेंद्र वैष्णव कहते हैं, “फिलहाल विधेयक में इंटरनेट बंद होने पर मुआवज़े का प्रावधान नहीं है. लेकिन, सरकार को लिखा है कि इंटरनेट शट डाउन में हमें पांच सौ रुपए प्रतिदिन दिए जाएं. राजस्थान में रिकॉर्ड इंटरनेट बंद हुए हैं, ऐसे में हम तो बेरोजगार हो जाते हैं.”
“मुख्यमंत्री ने एक सितंबर तक इसे लागू करने की घोषणा की है. लेकिन, हमें उम्मीद नहीं है. सामने आचार संहिता है. नियम बनेंगे और लागू होगा या नहीं होगा यह सब दूर की कौड़ी है. मुझे नहीं लगता कुछ सोशल सिक्योरिटी हो पाएगी. न ईएसआई मिल पाएगा. न पीएफ की सुविधा मिल पाएगी.”

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गिग वर्कर्स की समस्याएं
राजस्थान ऐप आधारित श्रमिक यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष और इंडियन फैडरेशन ऑफ गिग वर्कर्स एसोसिएशन में फूड डिलीवरी सेक्टर के राष्ट्रीय महासचिव धर्मेंद्र वैष्णव कहते हैं, “हमारे साथ जो शोषण हो रहा है, वो नए युवाओं के साथ न हो इसलिए हम लड़ रहे हैं.
सुविधाओं के नाम पर हमारे लिए कुछ नहीं है. काम करते हुए मर जाएं तो क्लेम भी नहीं मिलता.”
आशीष सिंह 2014 से ऐप आधारित कंपनियों से जुड़े हुए हैं. उन्होंने कैब चलाई है फिर ख़ुद की कैब ख़रीदीं और ड्राइवर्स को नौकरी पर भी रखा. वह कहते हैं, “लेकिन, धीरे-धीरे सब ख़त्म हो गया.”
आशीष सिंह कहते हैं, “साल 2017 में एक गिग वर्कर को गोली मार दी गई थी. उनके परिजनों को मुआवज़े के नाम पर कुछ नहीं मिला. इसके बाद हमने हक़ के लिए लड़ाई शुरू की.”
सरकार ने भी माना गिग वर्कर्स परेशानी में
राहुल गांधी ने गिग वर्कर्स से मुलाक़ात के बाद अलवर में कहा था, “21वीं सदी में जिसको हम गिग वर्कर कहते हैं. यह लोग कैब चलाते हैं. डिलीवरी का काम करते हैं, छोटे-छोटे काम करते हैं उनके बारे में हमें सोचना है. जो सरकार में काम करता है उसे सरकार पेंशन देती है, उसकी सुरक्षा करती है.”
“लेकिन, करोड़ों लोग गिग इकॉनोमी में काम करते हैं, उनके लिए कोई पेंशन और सुरक्षा का सिस्टम नहीं है. उनके लिए सरकार को सोचना चाहिए.”
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा, “ऐप के आधार पर जो लोग काम कर रहे हैं. यह सब नई इकॉनोमी के प्रतीक हैं, यहां साठ फ़ीसदी से ज़्यादा युवा दलित, आदिवासी, ओबीसी और अल्पसंख्यक वर्ग से आता है.”
सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय ने एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा, “सरकार ने गिग वर्कर्स के लिए सोशल सिक्योरिटी के लिए जो किया है, उसे भले ही आज लोग न समझें लेकिन एक दिन सब समझेंगे. गिग वर्कर्स की कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है, इनकी सुरक्षा के लिए बना यह क़ानून बेहद महत्वपूर्ण क़ानून है.”
सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे ने बीते दिनों सरकारी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री के सामने तीन मांग रखी. निखिल डे ने कहा, “क़ानून के लिए रूल्स जल्दी बनाएं और संभव हो तो एक सितंबर से पहले ही रूल्स बनाकर काम चालू करें. इनके लिए स्कीम तुरंत चालू हो जाएं जिससे कि दो सौ करोड़ रुपए का बजट काम में आए. बोर्ड में इनके प्रतिनिधिओं के बीच का संवाद भी जल्द शुरू हो जाए.”

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कंपनियों को आशंका
ऐप आधारित कंपनियों से जुड़े गिग वर्कर्स के लिए पहली बार कोई क़ानून बनने जा रहा है. कंपनियों को भी इसे लेकर कई सवाल और शंकाएं हैं.
इस क़ानून को लेकर चर्चा के लिए श्रम विभाग के साथ बैठक में ऐप आधारित कंपनियां भी शामिल रहीं. इन कंपनियों से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन संपर्क नहीं हो सका है. इनका पक्ष मिलने पर छापा जाएगा.
प्रिंसिपल सेक्रेटरी विकास भाले कहते हैं, “मीटिंग में कर्मचारियों का डेटा शेयर करने पर एग्रीगेटर्स को लगता है कि डेटा शेयर करेंगे तो प्रतिस्पर्धा वाली कंपनी को इसकी जानकारी हो जाएगी.”
राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने यह पहल तो की है, लेकिन इसका लाभ कहां तक गिग वर्कर्स को मिलेगा और गिग वर्कर्स की तक़दीर और तस्वीर कहां तक बदल पाएगी. यह क़ानून लागू होने के बाद देखना होगा.
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