तमिलनाडु: 'बिहारी मज़दूर कम पैसे पर बिना छुट्टी के भी कर लेते हैं काम'

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से
बिहारी के मज़दूर और कामगार आमतौर पर दिल्ली, मुंबई और पंजाब जैसे इलाक़ों में काम की तलाश में जाते रहे हैं.
भाषा और प्रतिकूल मौसम की वजह से तमिलनाडु की तरफ़ उनका जाना कम ही होता था.
लेकिन हाल के वर्षों में बिहार, झारखंड जैसे राज्यों के मज़दूर बड़ी संख्या में काम के लिए तमिलनाडु की तरफ रुख़ कर रहे हैं.
तमिलनाडु में बिहार के प्रवासी मज़दूरों के साथ कथित हिंसा के बाद यह मुद्दा ख़बरों में बना हुआ है.
तमिलनाडु और बिहार पुलिस बार-बार इस तरह की हिंसा की ख़बरों को अफ़वाह बता रही है.
तमिलनाडु में बिहारी मज़दूरों पर हमले का दावा करने वाले कई वीडियो को पुलिस झूठे और भ्रामक बता चुकी है.
बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने भी इस तरह के वीडियो को सोशल मीडिया पर डालने वाले लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है.
इनमें फ़िलहाल बिहारी के जमुई से एक शख़्स को गिरफ़्तार भी किया गया है.
तमिलनाडु के जिस ज़िले में बिहारी मज़दूरों के साथ मारपीट की ख़बरें सबसे ज़्यादा आ रही हैं, वह है वस्त्र उद्योग के लिए मशहूर तिरुपुर ज़िला.
तमिलनाडु के पश्चिमी हिस्से में तिरुपुर और कोयंबटूर के आस-पास पिछले कुछ साल में प्रवासी मजदूरों की संख्या काफ़ी बढ़ी है.
तिरुपुर में प्रवासी मज़दूरों और तमिलों के बीच हिंसक झड़प के बाद यह बहस भी तेज़ हो गई है कि क्या प्रवासी मज़दूरों की वजह से तमिल लोगों को रोज़गार नहीं मिल पा रहा है?
बिहार के कितने मज़दूर

तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में बीते क़रीब 50 साल से मौजूद बिहार एसोसिएशन के सचिव मुकेश कुमार ठाकुर के मुताबिक़ पहले तमिलनाडु में बिहार के कम मज़दूर काम करते थे.
बीते कुछ साल में प्रवासी बिहारी मज़दूरों की संख्या यहां काफ़ी बढ़ी है. मुकेश दो साल पहले कोरोना महामारी के दौरान तमिलनाडु में मौजूद बिहारी प्रवासी मज़दूरों की संख्या के आधार पर एक अंदाज़ा लगाते हैं.
मुकेश का कहना है, "पक्के तौर पर बता पाना मुश्किल है लेकिन प्रवासियों के भोजन और ट्रेन के टिकट की व्यवस्था करने में हमने पाया था कि क़रीब साढ़े चार लाख़ बिहारी मज़दूर तमिलनाडु में हैं. यह आंकड़ा अब इससे बहुत बड़ा हो गया होगा क्योंकि कुछ समय से प्रवासियों के यहां आने में तेज़ी आई है."
तिरुपुर की कंपनियों का कहना है कि स्थानीय मज़दूरों की कमी के कारण ही वो बाहर के लोगों का काम पर रख रहे हैं.
प्रवासी मज़दूर काम के लिए पैसे या छुट्टी की कोई शर्त भी नहीं रखते हैं. ऐसे में उत्तर भारत से आने वाले मज़दूर उद्योगों के लिए लिए फ़ायदेमंद होते हैं.
तमिलनाडु के तिरुपुर में वस्त्र उद्योग की बात करें तो यहाँ क़रीब 4.5 लाख़ स्थानीय कामगार जबकि क़रीब डेढ़ लाख प्रवासी मज़दूर काम करते हैं.
तिरुपुर एक्सपोर्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष के एम सुब्रमण्यन के मुताबिक़ इन डेढ़ लाख प्रवासी कामगारों में बिहार के अलावा झारखंड, पश्चिम बंगाल और भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोग भी हैं.
के एम सुब्रमण्यन बताते हैं, "दस साल पहले बहुत कम प्रवासी मज़दूर तमिलनाडु आते थे. फिर धीरे-धीरे इनका आना शुरू हुआ और अब बड़ी संख्या में प्रवासी मज़दूर इस राज्य में काम के लिए आते हैं."

उनके मुताबिक़ न केवल कपड़ा उद्योग बल्कि कंस्ट्रक्शन और पॉल्ट्री उद्योग में भी प्रवासी मज़दूर बड़ी संख्या में काम करते हैं.
के एम सुब्रमण्यम कहते हैं कि अब तमिलनाडु के लोग भी तमिल नहीं रहे, वो हिन्दी समझते हैं; और बिहार के लोग भी बिहारी नहीं रहे, वो बड़े आराम से यहां काम करते और रहते हैं.
पटना के एन एन सिंहा इंस्टीट्यूट में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर विद्यार्थी विकास भी इस बात से सहमत हैं. उनका कहना है कि ग्लोबलाइजेशन का सबसे बड़ा असर यही है कि आज दो देशों, दो राज्यों और दो शहरों के बीच की सांस्कृतिक दूरी ख़त्म हो गई है.
खानपान भी संस्कृति का एक हिस्सा है और अब उत्तर भारत के घरों में भी इडली-सांभर बनता है जबकि पटना के होटलों में आपको बड़ी संख्या में डोसा खाने वाले लोग मिल जाएंगे.
वहीं मीडिया और मनोरंजन जगत की वजह से तमिलनाडु के लोग भी हिन्दी समझते हैं और वहाँ रहते-रहते बिहार के लोग भी तमिल के कुछ शब्द सीख जाते हैं.
मज़दूर कहां-कहां करते हैं काम

बिहार के प्रवासी मज़दूर अकेले या किसी जानने वाले के सहारे काम करने तमिलनाडु आते हैं. कई बार कंपनियां या एजेंसी भी काम के लिए दूसरे राज्यों के मज़दूरों को तमिलनाडु लाती हैं.
बिहार एसोसिएशन के मुताबिक़ तिरुपुर के कपड़ा उद्योग के अलावा तमिलनाडु के कंस्ट्रक्शन और होटल व्यवसाय में काम करने वाले क़रीब 70 फ़ीसदी बिहारी हैं.
उनके मुताबिक़ तिरुपुर में बिहार के गया, नवादा, बेगुसराय और इसके आसपास के ज़्यादा लोग काम कर रहे हैं. वहां झारखंड के भी कामगार बड़ी संख्या में हैं.
कंस्ट्रक्शन में बंगाल से सटे इलाक़े जैसे किशनगंज, पूर्णिया और बेगुसराय के आसपास के मज़दूर ज़्यादा हैं.
मधुबनी और दरभंगा के लोग तमिलनाडु में पंडित-पुजारी का काम भी करते हैं. इस इलाक़े के लोग स्ट्रीट फ़ुड के स्टॉल भी लगाते हैं.
नवादा और इसके आसपास के लोग होटल व्यवसाय में जबकि सीतामढ़ी, जहानाबाद के इलाक़े के लोग बैग बनाने या सिलाई के काम में ज़्यादा लगे हैं.
बीते क़रीब 15 दिन से इन कामगारों को तनाव और भय के माहौल से गुज़रना पड़ रहा है. हालांकि सरकार और प्रशासन का दावा है कि तिरुपुर ही नहीं पूरे तमिलनाडु में हालात सामान्य हैं और किसी प्रवासी बिहारी मज़दूर को घबराने की ज़रूरत नहीं है.
इसके लिए प्रशासन, फ़ैक्ट्री और उद्योगों से जुड़े लोग मज़दूरों के साथ बैठक भी कर रहे हैं और अफ़वाह फ़ैलाने वालों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई भी की जा रही है.
झगड़े की शुरुआत
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मुकेश कुमार ठाकुर का कहना है कि 15 दिन पहले दिन भर में क़रीब 20 फ़ोन आते थे कि बिहारी मज़दूरों के साथ कहीं हिंसा हुई है और एक मार्च से तो हर रोज़ ऐसे डेढ़-दो सौ फ़ोन आने लगे.
मुकेश कहते हैं, "मैंने ख़ुद 50-60 जगहों पर पता लगाया तो पता चला कि सब अफ़वाह है. कोई कहता उसने बताया, कोई कहता उनसे उसको बताया और उसको किसी और ने. किसी की आंख के सामने कहीं कोई हिंसा नहीं हुई है."
तमिलनाडु पुलिस के मुताबिक़ भी राज्य में बिहारी मज़दूरों के साथ कोई हिंसा नहीं हुई है और सोशल मीडिया पर डाले गए वीडियो भ्रामक हैं.
इनमें से एक वीडियो तिरुपुर का है, जिसमें एक बिहारी प्रवासी और एक झारखंड के मज़दूर के बीच झगडे में बिहारी प्रवासी का क़त्ल हुआ है. पुलिस ने इस मामले में अभियुक्त को गिरफ़्तार भी कर लिया है.
दूसरा वीडियो कोयंबटूर का है और इसमें स्थानीय लोगों के बीच झगड़ा हो रहा है. इसका बिहारी मज़दूरों से कोई संबंध नहीं हैं.
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तिरुपुर के पुलिस कमिश्नर प्रवीण कुमार अभिनपु के मुताबिक़ जनवरी महीने में शहर में बिहारी और तमिल लोगों के बीच चाय की दुकान पर झगड़ा हुआ था.
वहीं मुकेश कुमार ने बीबीसी को बताया है कि 14 जनवरी यानी पोंगल के समय तमिलनाडु में 4-5 दिनों की छुट्टी थी. इसी दौरान चाय की दुकान पर तमिल और बिहार के लोगों के बीच किसी बात पर बहस और फिर हाथापाई हो गई थी.
उनके मुताबिक़ जितने भी वीडियो सोशल मीडिया पर डाले गए हैं, उनमें से केवल एक सही है. यह वीडियो छह महीने पुराना है, जिसमें ट्रेन के अंदर कुछ तमिल लोग बिहारी प्रवासियों के साथ धक्का-मुक्की कर रहे हैं.
इस मामले में दक्षिण रेलवे ने बीबीसी को बताया था कि कई बार बिना रिजर्वेशन के भी मुसाफिर रिजर्वेशन वाले कोच में घुस जाते हैं, उस समय ऐसी स्थिति होती है तो रेलवे के लोग उसे कंट्रोल करते हैं.
बढ़ती बेरोज़गारी का संकट

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तिरुपुर की चाय दुकान पर हुआ झगड़ा केवल तात्कालिक वजह से था या इसके पीछे कोई तनाव है, जिस पर कम चर्चा हो रही है.
तिरुपुर के एक स्थानीय पत्रकार ने बीबीसी को बताया है कि हाल के दिनों में स्थानीय लोगों को कम काम मिल पा रहा है, लेकिन दोनों समुदायों के बीच कोई झगड़ा नहीं है.
एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के प्रो. विद्यार्थी विकास इसे बेरोज़गारी के एक बड़े संकट के तौर पर देखते हैं, जिसका कोई आंकड़ा मौजूद नहीं हैं.
उनके मुताबिक़, "सरकार को पता है कि जितने आंकड़े देंगे, लोगों को अर्थव्यवस्था और बेरोज़गारी के हालात की उनती जानकारी होगी, इसलिए सरकार आंकड़े छिपा लेती है."
प्रो. विद्यार्थी विकास का आरोप है कि आंकड़े जनगणना से समय सामने आते हैं, लेकिन सरकार जनगणना ही नहीं करा रही है, एनएसएसओ ने जब साल 2018 में बताया कि देश में बीते 45 साल की सबसे बड़ी बेरोज़गारी आ चुकी है तो एनएसएसओ से कई लोगों का हटा दिया गया.
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विद्यार्थी विकास कहते हैं, "सीएमआई की ताज़ा रिपोर्ट कहती है भारत में काम करने वाली उम्र यानी 15 से 64 साल के बीच के 107 करोड़ लोग हैं. इनमें 40 फ़ीसदी यानी क़रीब 42 करोड़ लोग काम कर रहे हैं."
वहीं साल 2013-14 के भारत सरकार के बेरोज़गारी सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक़ उस वक़्त क़रीब 56 फ़ीसदी लोग काम कर रहे थे.
उस समय की बेरोज़गारी दर के हिसाब से आज क़रीब 60 करोड़ लोगों को काम करना चाहिए. यानी देश में फ़िलहाल 18 करोड़ लोग बेरोज़गार हैं और हर साल इसमें दो करोड़ लोग जुड़ जाते हैं.
भारत में साल 2016 में सरकार ने नोटबंदी का फ़ैसला लिया था. हालांकि उस वक़्त कई जानकारों ने अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा असर पड़ने की आशंका जताई थी.
विद्यार्थी विकास कहते हैं कि काम की तलाश में लोग अलग-अलग जगहों पर भटकते रहते हैं और तमिलनाडु में इन्हें रोज़ 800 रुपये या इससे ज़्यादा की मज़दूरी मिल जाती है, जबकि उत्तर भारतीय राज्यों में यह 600 रुपये के आस पास होता है.
इस वजह से हाल के वर्षों में बिहार और झारखंड जैसे राज्यों से मज़दूर बड़ी संख्या में दक्षिण भारत की तरफ जा रहे हैं.
विद्यार्थी विकास कहते हैं कि आमतौर पर दक्षिण बिहार के मज़दूर दिल्ली और आसपास के इलाक़े में जाना पसंद करते हैं जबकि उत्तर बिहार के कामगारों को जहां काम मिल जाए वहीं चले जाते हैं.
बिहार में कोसी और इसके आसपास के बाढ़ प्रभावित इलाक़ों से हर साल बड़ी संख्या में प्रवासी लोग काम करने दूसरे राज्यों में जाते हैं.
इसके अलावा जिन इलाकों में ज़मीन का मालिकाना हक़ कुछ ही लोगों के पास है और वहां आम ग्रामीणों में ज़्यादा पिछड़ापन हैं. वहां के लोग भी बिहार के बाहर काम करने जाते हैं.
रूस-यूक्रेन युद्ध से संकट

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तिरुपुर के एक स्थानीय पत्रकार ने बीबीसी को बताया है कि बुरे लोग दुनिया में हर जगह हैं लेकिन जैसा बताया जा रहा है, वैसा कुछ भी तिरुपुर में नहीं है, यहां सब लोग मिलकर काम कर रहे हैं.
दरअसल, स्थानीय लोगों को नौकरी की तरह काम चाहिए होता है, जिसमें सैलरी भी हो और छुट्टी भी. बिहारी मज़दूरों को कई बार काम के हिसाब से काम पर बुलाया जाता है.
हाल के दिनों में तमिलों को काम नहीं मिलने के पीछे एक बड़ी वजह यूरोपीय देशों से मिलने वाले ऑर्डर में आई कमी है. इसका सबसे बड़ा कारण रूस-यूक्रेन युद्ध को माना जा रहा है.
तिरुपुर एक्सपोर्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष के एम सुब्रमण्यन का कहना है कि कोविड-19 के समय से ही पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी देखी जा रही है और रूस यूक्रेन युद्ध ने इसे और बड़ा कर दिया है.
उनके मुताबिक़ तिरुपुर से होने वाले कपड़े के निर्यात में 40% अमेरिका, 30% यूरोपीय संघ और 15% ब्रिटेन का हिस्सा है. लेकिन युद्ध की वजह से निर्यात के कारोबार में साल 2021 के मुक़ाबले साल 2022 के सितंबर, अक्टूबर और नवंबर महीने में 25 फ़ीसदी की कमी आ गई.

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उनका कहना है कि तिरुपुर से यूरोपीय देशों को बड़ी तादात में नाइट वियर निर्यात किया जाता है. इस साल की शुरुआत से निर्यात का कारोबार फिर से पटरी पर लौटता दिख रहा है.
तिरुपुर के कपड़ा उद्योग में काम करने वाले कई मज़दूर आमतौर पर होली के समय में हर साल अपने घर जाते हैं और 15-20 दिनों के बाद वापस लौट आते हैं.
तिरुपुर के फ़ैक्ट्री मालिकों को उम्मीद है कि प्रवासी कामगार अफ़वाहों पर ध्यान नहीं देंगे और इस साल भी छुट्टियों के बाद वापस काम पर लौट आएंगे.
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