पूर्वांचल के माफ़िया डॉन: बाहुबली नेता बृजेश सिंह की कहानी

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    • Author, प्रियंका दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पूर्वांचल से

पूर्वांचल के माफ़िया नेताओं की कहानी हिस्ट्रीशीटर माफ़िया नेता बृजेश सिंह के बिना पूरी नहीं होती.

बृजेश फ़िलहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीट वाराणसी से विधान परिषद के निर्दलीय सदस्य (एमएलसी) हैं और उनके भतीजे बाहुबली नेता सुशील सिंह चंदौली की सैयदराजा सीट से बीजेपी के विधायक.

बृजेश और उनके परिवार की विस्तृत राजनीतिक पृष्ठभूमि और 2019 के आम चुनाव में उनके भविष्य के बारे में बात करने से पहले बनारस के इस डॉन के देशव्यापी आपराधिक और व्यापारिक सिंडिकेट में झांकना ज़रूरी है.

आपराधिक पन्ना :

अपने तीन दशक लंबे आपराधिक जीवन में 30 से ज़्यादा संगीन आपराधिक मुक़दमों में नामज़द बृजेश सिंह पर मकोका (महाराष्ट्र कंट्रोल ओफ़ ऑर्गनाइज्ड क्राइम ऐक्ट), टाडा (टेररिस्ट एंड डिसरप्टिव एक्टिविटीज एक्ट) और गैंगस्टर एक्ट के तहत हत्या, अपहरण, हत्या का प्रयास, हत्या की साजिश रचने से लेकर, दंगा-बवाल भड़काने, सरकारी कर्मचारी को इरादतन चोट पहुंचाने, झूठे सरकारी काग़ज़ात बनवाने, जबरन वसूली करने और धोखाधड़ी से ज़मीन हड़पने तक के मुक़दमे लग चुके हैं.

2000 के दशक में कई सालों तक फ़रार रहे बृजेश का सुराग़ बताने वाले के लिए तब उत्तर प्रदेश पुलिस ने 5 लाख रुपए का इनाम भी घोषित किया था. 2008 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने भुवनेश्वर से उनको गिरफ़्तार किया. आगे चलकर गवाहों के पलट जाने, गवाहों के बयानों में विरोधाभास होने और विरोधी पक्ष के वकीलों की कमज़ोर पैरवी की वजह से कई बड़े मुक़दमों में वे बरी हो गए.

2016 में दिए गए अपने चुनावी शपथपत्र के अनुसार उन पर अब भी 11 मुक़दमे चल रहे हैं.

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राजनीतिक पन्ना :

बृजेश का आपराधिक इतिहास जहां उनके पूर्वांचल के बाहुबली होने की छवि की पुष्टि करता है, वहीं राजनीति में उनके दख़ल की ओर देखें तो वाराणसी-चंदौली में उनके परिवार का पुराना राजनीतिक प्रभाव साफ़ नज़र आता है.

वाराणसी की एमएलसी सीट पर बृजेश और उनका परिवार पिछले 4 बार से जीतता रहा है. पहले दो बार बृजेश के बड़े भाई उदयनाथ सिंह, उसके बाद बृजेश की पत्नी अन्नपूर्णा सिंह और उसके बाद मार्च 2016 में ख़ुद बृजेश वाराणसी से एमएलसी बनकार राज्य की विधानसभा में दख़िल हुए. आज भी क्षेत्र के आम मुलाकाती वाराणसी सेंट्रल जेल में उनसे मिलने आते रहते हैं

साथ ही, फ़िलहाल जेल में बंद बृजेश के परिवार के औपचारिक राजनीतिक चेहरे के तौर पर पहचाने जाने वाले उनके भतीजे सुशील सिंह लगातार तीसरी बार चंदौली से विधायक चुने गए हैं. कभी कृष्णानंद राय से लेकर राजनाथ सिंह जैसे भाजपा नेताओं के क़रीबी माने जाने वाले बृजेश के भतीजे सुशील भी अब औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हो चुके हैं.

हालांकि अभी प्रत्याशियों की घोषणा नहीं हुई है लेकिन सुशील को 2019 के चुनाव में जीतने की क्षमता रखने वाले प्रत्याशी के रूप में भी देखा जा रहा है. यहां यह भी बताना ज़रूरी है कि 2017 के चुनाव में जमा किए गए सुशील के शपथपत्र के अनुसार उनके ऊपर भी हत्या के प्रयास और धमकी देने के 5 मुक़दमे दर्ज हैं.

लेकिन राजनीति से इतर जो बात बृजेश को दूसरे बाहुबलियों से अलग करती है वह है अपराध के साथ-साथ लगभग फ़िल्मी तरीक़े से फैला उनके व्यापार का सिंडिकेट.

उत्तर प्रदेश एसटीएफ के मुताबिक़ पूर्वांचल के साथ-साथ बिहार, झारखंड और मुंबई तक में फैले बृजेश के व्यापारिक कनेक्शन, उनको आर्थिक तौर पर पूर्वांचल के सबसे मज़बूत माफ़िया नेताओं में से एक बनाते हैं.

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'फ़िल्मी'व्यावसायिक और आपराधिक यात्रा

बनारस के धरहरा गांव के रहने वाले बृजेश सिंह ने सन 1984 में हुई अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए अपराध की दुनिया में कदम रखा. उस वक़्त वह स्कूल अच्छे नंबरों से पास कर बनारस में बीएससी की पढ़ाई कर रहे थे. लेकिन तभी ज़मीन के एक विवाद से जुड़ी रंजिश में स्थानीय राजनीति में सक्रिय उनके पिता रवींद्र नाथ सिंह की हत्या कर दी गई.

इसके बाद बृजेश ने घर छोड़ दिया और एक साल के भीतर ही अपने पिता के तथाकथित हत्यारे हरिहर सिंह की हत्या कर दी. इस तरह बृजेश पर पहला मुक़दमा 1985 में दर्ज हुआ, लेकिन वह पुलिस की पकड़ से बाहर रहे, 1986 की अप्रैल में चंदौली ज़िले के सिकरौरा गांव में हुए हत्याकांड में उनका नाम आया.

इस मामले में बृजेश पर 32 साल तक मुक़दमा चला. उन पर अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए इस गांव के पूर्व प्रधान रामचंद्र यादव सहित उनके परिवार के 6 लोगों की हत्या में शामिल होने का आरोप था. घटना में चश्मदीद गवाह होने के बावजूद, गवाहों के बयानों को विरोधाभासी बताते हुए 32 साल बाद 2018 में स्थानीय अदालत ने बृजेश को इस मामले में बरी कर दिया.

वरिष्ठ पत्रकार पवन सिंह जोड़ते हैं, "32 साल पहले के इस हत्याकांड के बाद बृजेश को जेल भेजा गया जहां पहली बार उनकी मुलाक़ात ग़ाज़ीपुर के पुराने हिस्ट्रीशीटर त्रिभुवन सिंह से हुई थी. इसके बाद पूर्वांचल में इन दोनों के गैंगों ने कई बड़े अपराध किए. फिर रेलवे और बिजली के ठेकों पर वर्चस्व के सिलसिले में इनकी मुख़्तार अंसारी और उनके गैंग के साथ लंबी ऐतिहासिक दुश्मनी शुरू हुई जो आज तक जारी है."

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इमेज स्रोत, BBC/Priyanka Dubey

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जेजे अस्पताल हत्याकांड

मुंबई के अंडरवर्ल्ड के इतिहास के सबसे सनसनीख़ेज़ घटनाओं में शामिल, जेजे अस्पताल शूटआउट में बृजेश को नामज़द किया गया था.

वरिष्ठ पत्रकार उत्पल पाठक बताते हैं, "सितंबर 1992 की एक रात बीस से ज़्यादा लोग अचानक बंबई (मुंबई) के जेजे अस्पताल के वार्ड नम्बर 18 में घुस आए और बिस्तर पर लेटे शैलेश हलदरकर को गोलियों से छलनी कर दिया. हलदरकर बंबई के अरुण गवली गैंग के सदस्य थे और उनकी हत्या दाऊद इब्राहिम के रिश्तेदार इस्माइल पारकर की हत्या का बदला लेने के लिए की गई थी".

इस घटना में वार्ड की पहरेदारी कर रहे मुंबई पुलिस के दो हवलदार भी मारे गए थे. जेजे अस्पताल शूट-आउट में पहली बार एके 47 का इस्तेमाल कर 500 से ज़्यादा गोलियां चलाई गई थीं. घटना के बाद बृजेश पर टाडा के तहत लंबा मुक़दमा चला और सितंबर 2008 में उन्हें सबूतों की कमी के वजह से छोड़ दिया गया, लेकिन इस मामले ने बृजेश को पूर्वांचल के एक गैंगस्टर से पूरे देश में एक बड़े डॉन के तौर पर स्थापित कर दिया.

झरिया अध्याय

इसी बीच, 1990 के दशक में बृजेश सिंह ने धनबाद के पास झरिया का रुख़ किया. वे वहां के बाहुबली विधायक और कोयला माफ़िया सूर्यदेव सिंह के कारोबार की देखभाल करने के लिए उनके शूटर की तरह काम करने लगे और 6 हत्याओं में नामजद भी हुए.

2003 में सूर्यदेव के ही बेटे राजीव रंजन सिंह के अपहरण और हत्याकांड में मास्टरमाइंड के तौर पर बृजेश का नाम आया.

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उसरी चट्टी हत्याकांड

बृजेश सिंह पर अब तक चल रहे बड़े मुक़दमों में 2001 का गाज़ीपुर का उसरी चट्टी कांड है. बृजेश और मुख़्तार की सीधी गैंगवार में 2 लोगों की हत्या हुई थी और मुख़्तार घायल हुए थे. घटना के बाद बृजेश के ख़िलाफ़ मुक़दमा लिखवाते हुए मुख़्तार ने उनकी गाड़ियों के क़ाफ़िले पर अचानक हमला करने उनके गनर की हत्या करने का आरोप लगाया. इस घटना के बाद बृजेश काफ़ी साल तक फ़रार रहे.

इस बीच ,आम लोगों में उनकी हत्या की अफ़वाहें उड़ती रहीं और वह भुवनेश्वर में अरुण कुमार बनकर रहते रहे. 2008 में यहीं से दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने उनको गिरफ़्तार किया और फिर उन पर इकट्ठा हो चुके बीसियों मुक़दमों की सुनवाई देश की अलग-अलग अदालतों में शुरू हुई.

जेल से फैलता व्यापार

जेल के बाहर बृजेश सिंह का कारोबार संभालने वाले उनके एक क़रीबी, नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताते हैं, "वो हाई प्रोफ़ाइल होकर भी लो-प्रोफ़ाइल रहते हैं और मीडिया से बात नहीं करते इसलिए धीरे-धीरे उन पर लगे सारे मुक़दमे हटते जा रहे हैं. आगे हमारी कोशिश यही है कि बाक़ी के बचे मामलों में भी अदालत का निर्णय हमारे पक्ष में आए."

बृजेश और सुशील की राजनीतिक और व्यावसायिक रणनीति के बारे में बात करते हुए वह जोड़ते हैं, "बचपन में इंसान भावनाओं के आधार पर सम्बंध बनाता है लेकिन राजनीति में सिर्फ़ मतलब के लिए रिश्ते बनाए जाते हैं. अभी दोनों चाचा-भतीजा एक दूसरे की मजबूरी हैं इसलिए साथ हैं, लेकिन जेल से बाहर आने के बाद भैया भी सांसद का चुनाव लड़ना चाहेंगे क्योंकि दिल्ली जाकर संदद में बैठेंगे तभी तो पूर्वांचल पर कब्ज़ा मजबूत होगा और हमारा व्यापार बढ़ेगा. ज़मीन के अंदर जो भी चीज़ें हैं-जैसे रेता, गिट्टी और कोयला- जब तक इन पर हमारा कब्ज़ा नहीं होगा तो व्यापार में फ़ायदा कैसे होगा? इसके लिए राजनीतिक ताक़त की भी ज़रूरत है."

लोहे के स्क्रैप से अपना व्यापार शुरू करने वाले बृजेश सिंह, पहले कोयले के धंधे में उतरे और फिर आज़मगढ़ से शराब का व्यापार शुरू किया. बलिया, भदोही, बनारस से लेकर झारखंड-छत्तीसगढ़ तक काम फैलाया. फिर ज़मीन, रियल एस्टेट में आने के बाद अब रेत का व्यापार भी चल रहा है.

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2019 के लिए रणनीति :

जेल में बंद बृजेश सिंह का बाहर प्रतिनिधित्व करने के लिए चुनाव आयोग में नामित प्रतिनिधि हेमंत कुमार सिंह 2019 को लेकर परिवार की योजनाओं के बारे में बात करते हुए कहते हैं, "चुनाव ने पहले भैया (बृजेश) के बाहर आने की संभावना तो बहुत कम है इसलिए विधायक जी (सुशील) को ही भाजपा की ओर से प्रत्याशी बनाया जाए, ऐसी हम सब उम्मीद कर रहे हैं. टिकट मिलने पर पूरा परिवार उनके साथ रहेगा और एक साथ चुनाव प्रचार में भाग लेगा".

बृजेश सिंह के आपराधिक इतिहास के बारे में पूछे जाने पर हेमंत कुमार सिंह कहते हैं, "जहाँ तक बाहुबली होने का प्रश्न है, परिस्थितियाँ इंसान को अपराधी बना देती हैं. लेकिन प्रदेश की क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों (बसपा-सपा) का ऐसा है कि जब तक कोई चुनाव में पैसा लगा सकने वाला जिताऊ उम्मीदवार अपनी पार्टी में होता है तब तक सब ठीक रहता है और जैसे ही वह दूसरी पार्टी (भाजपा) में चला जाए, वह इनके लिए बाहुबली और अपराधी हो जाता है. जनता यह सब देखती-समझती है इसलिए हमें वोट मिलते हैं."

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