मुख़्तार अंसारी को जिस अवधेश राय हत्याकांड में उम्रक़ैद हुई, उसकी पूरी कहानी

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इमेज कैप्शन, अदालत में पेश होने के लिए जाते हुए मुख़्तार अंसारी
    • Author, विक्रांत दुबे
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

वाराणसी की एक विशेष अदालत ने बीते सोमवार बाहुबली नेता मुख़्तार अंसारी को 31 साल पुराने हत्याकांड के मामले में उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई.

विधायकों और सांसदों से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाली इस विशेष अदालत ने मुख़्तार अंसारी पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है.

उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर से आने वाले मुख़्तार अंसारी के ख़िलाफ़ हत्या, हत्या करने के प्रयास, हथियारबंद तरीक़े से दंगे भड़काने, आपराधिक साज़िश रचने और आपराधिक धमकियां देने जैसे एक दर्ज़न से अधिक मामले हैं.

इस आपराधिक पृष्ठभूमि के बाद भी मुख़्तार अंसारी अपने राजनीतिक जीवन में पांच बार विधानसभा चुनाव जीतने में सफल रहे. इनमें से तीन चुनाव उन्होंने देश की अलग-अलग जेलों में बंद रहते हुए लड़े हैं.

मुख़्तार अंसारी को अब उनके ख़िलाफ़ दर्ज तमाम आपराधिक मामलों में शामिल अवधेश राय हत्याकांड के सिलसिले में ही उम्रक़ैद की सज़ा मिली है.

लेकिन ये पूरा मामला क्या है, अवधेश राय कौन थे और मुख़्तार और अवधेश राय के बीच दुश्मनी की वजह क्या थी?

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मुख़्तार और अवधेश राय के बीच टकराव

ग़ाज़ीपुर के राजनीतिक रूप से प्रतिष्ठित अंसारी परिवार से आने वाले मुख़्तार अंसारी का दबदबा ग़ाज़ीपुर में था. लेकिन मुख़्तार ग़ाज़ीपुर से आगे बढ़कर अस्सी किलोमीटर दूर स्थित बनारस में भी अपना वर्चस्व बनाना चाहते थे.

ठीक उसी वक़्त कांग्रेस नेता अजय राय के बड़े भाई अवधेश राय भी बनारस में अपनी ज़मीन तैयार करने की कोशिशें कर रहे थे.

लेकिन अवधेश राय और मुख़्तार अंसारी के बीच दुश्मनी कैसे हुई.

इस सवाल का जवाब उन दिनों दैनिक जागरण में क्राइम बीट संभाल रहे वरिष्ठ पत्रकार राजनाथ तिवारी देते हैं.

तिवारी बताते हैं कि 'अपराध की दुनिया में हत्‍याएं या तो वर्चस्‍व के लिए होती हैं या आर्थिक कारणों की वजह से.'

मुख़्तार और अवधेश के बीच टकराव के लिए ये दोनों ही वजहें शामिल थीं.

नब्बे के दशक में बृजेश सिंह और उनका गुट बनारस में तमाम तरह के धंधों में अपना हाथ आज़मा रहा था. वहीं, ग़ाज़ीपुर का मुख़्तार अंसारी गैंग भी इसी शहर में अपने पैर पसारने की कोशिश कर रहा था.

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सोना उगलने वाला कोयले का कारोबार

ये वो दौर था जब बनारस में रेशम से लेकर कोयले के कारोबार पर सबकी नज़र थी.

राजनाथ तिवारी बताते हैं, "उन दिनों स्क्रैप, रेशम और कोयले का कारोबार मोटा पैसा देने वाले धंधे थे. इस पर दोनों लोगों की नज़र थी.''

''बनारस इन सब धंधों का प्रमुख केंद्र था. मुग़लसराय से बनारस नज़दीक होने के चलते कोयले के काले कारोबार का भी यहां से संचालन करना आसान था.''

''मुख़्तार को इन्हीं सब धंधों पर क़ब्‍ज़ा कर अपना आर्थिक साम्राज्‍य मज़बूत करना था और इसके साथ ही अपना वर्चस्‍व ग़ाज़ीपुर से बनारस तक फैलाना था.''

दबंग छवि वाले अवधेश राय को बृजेश सिंह का क़रीबी माना जाता था.

तिवारी कहते हैं, "अवधेश राय बृजेश सिंह के नज़दीकी माने जाते थे. दबंग छवि वाले अवधेश राय मुख़्तार अंसारी के साम्राज्‍य विस्‍तार में कांटा साबित हो रहे थे. और ऐसे में मुख़्तार ने बंदूकों की बदौलत अपने रास्‍ते का ये कांटा हटा दिया.''

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घर के पास ही हुई थी अवधेश की हत्‍या

वाराणसी के लहुराबीर क्षेत्र में 3 अगस्त, 1991 को अवधेश राय की गोली मारकर हत्या कर दी गई.

मारुति वैन से आये हथियारबंद हमलावरों ने अंधाधुंध गोलियां चलाकर अवधेश राय को मौत के घाट उतार दिया था.

ख़ास बात यह थी कि इस घटना को अवधेश राय के घर के पास ही अंजाम दिया गया था. जहां से चेतगंज थाना चंद मीटर की दूरी पर ही है.

अवधेश राय के भाई और पूर्व विधायक अजय राय ने मुख़्तार अंसारी, पूर्व विधायक अब्दुल कलाम, मुन्‍ना बजरंगी, भीम सिंह, कमलेश एवं राकेश समेत छह लोगों के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज कराया था.

इस मामले में सुनवाई शुरू तो हुई लेकिन पूरी नहीं हो सकी.

इसी बीच साल 2022 में पता चला कि इस केस की मूल केस डायरी ही गायब हो गयी है. और ये डायरी अंत तक नहीं मिली.

ऐसे में इस पूरे केस की सुनवाई फोटो स्‍टेट के आधार पर की गयी है और अब फैसला सुनाया गया है.

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हत्‍याकांड में वसूली का एंगल

इस हत्याकांड को मुख़्तार अंसारी गैंग की ओर से की जाने वाली कथित धन उगाही से भी जोड़कर देखा जाता है.

नब्बे के दशक में 'आज' अख़बार की क्राइम बीट संभाल रहे वरिष्ठ पत्रकार सुभाष सिंह बताते हैं, "इस हत्‍याकांड की कई वजहों में से एक वजह व्‍यापारियों से वसूली का भी था. चेतगंज थाना क्षेत्र में आने वाले लहुराबीर और हथुआ मार्केट बनारस के अच्‍छे व्‍यापारिक इलाके हैं.''

वह बताते हैं, ''चेतगंज थाने में ही हैदर अली टाइगर और संजय सिंह नाम के दो सिपाही थे जो इस पूरे इलाके में मुख़्तार अंसारी के लिए व्‍यापारियों से वसूली करते थे. हथुआ मार्केट में अवधेश राय दुर्गा पूजा कराते थे जिसमें व्यापारी बढ़-चढ़कर आर्थिक सहयोग देते थे. व्‍यापारियों ने चेतगंज के सिपाहियों की शिकायत अवधेश राय से की.''

सुभाष सिंह बताते हैं, ''अवधेश राय व्‍यापारियों के सरपरस्‍त थे जिसके चलते उन्होंने धरना प्रदर्शन भी किया. इसके बाद ये दोनों सिपाही निलंबित हो गए. बताया जाता है कि इन सिपाहियों और चेतगंज इलाके में उन दिनों रह रहे हत्‍या के एक अभियुक्त राकेश ने ही अवधेश राय की रेकी की. इसके बाद हत्‍याकांड को अंजाम दिया गया. कहा तो यहां तक जाता है हैदर गोली चलाने वालों में शामिल था.''

इस हत्याकांड के वक़्त तक मुख़्तार अंसारी ने राजनीतिक दुनिया में कदम नहीं रखा था.

लेकिन 1991 में हुए इस हत्याकांड के बाद मुख़्तार अंसारी ने अलग-अलग चुनावी दलों के साथ पांच बार मऊ विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और उनमें जीत हासिल की.

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