योगी आदित्यनाथ के ‘यूपी मॉडल’ में क्या बीजेपी को दिखता है भविष्य?
वात्सल्य राय
बीबीसी संवाददाता

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भारतीय जनता पार्टी को साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुमत मिला. करीब 15 साल बाद बीजेपी ने सत्ता में वापसी की थी.
सरकार का मुखिया कौन होगा यानी मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इस सवाल के जवाब में कई नाम सामने थे.
लेकिन, फ़ाइनल मुहर लगी योगी आदित्यनाथ के नाम पर. बहुत से लोगों के लिए ये फ़ैसला एक 'सरप्राइज़' था.
योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की रेस कैसे जीती, ये सवाल अब तक पूछा जाता है.
तब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अमित शाह ने भी कुछ साल पहले इसका ज़िक्र किया था, "जब योगी जी को मुख्यमंत्री बनाया तो किसी को कल्पना नहीं थी कि योगी जी मुख्यमंत्री बनेंगे. ढेर सारे लोगों के फ़ोन आए कि योगी जी ने कभी म्युनसपिलिटी भी नहीं चलाई. वास्तविकता थी. नहीं चलाई थी. योगी जी कभी किसी सरकार में मंत्री नहीं रहे."
अमित शाह के मुताबिक उस वक़्त उनसे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कुछ अलग सलाह दी गई थी, "योगी जी संन्यासी हैं, पीठाधीश हैं और इतने बड़े प्रदेश का आप उनको मुख्यमंत्री बना रहे हो."
लेकिन, छह साल बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई है. अब योगी आदित्यनाथ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्तराधिकारी तलाशने वालों की संख्या बढ़ती नज़र आ रही है.
ऐसे लोगों में सिर्फ़ योगी आदित्यनाथ के उत्साही समर्थक नहीं हैं.
बीजेपी के कई कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक भी दावा करते हैं कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का कद पार्टी में अपने समकालीन नेताओं से काफी ऊंचा हो गया है.
भारतीय जनता पार्टी की राजनीति पर वर्षों से करीबी नज़र रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन कहती हैं, "दिल्ली में अक्सर हमें दोनों का पोस्टर देखने को मिलता है, मोदी और योगी. योगी जी का स्टेटस सेकेंड अमंग इक्वल्स यानी पार्टी में दूसरे नंबर का हो गया है. उन्होंने सबको पीछे छोड़ दिया है. "
हर चुनाव में सबसे आगे

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इसका असर ज़मीन पर भी दिखता है. मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के पहले योगी आदित्यनाथ पांच बार लोकसभा के सांसद चुने जा चुके थे लेकिन कई विश्लेषक मानते हैं कि तब उनका प्रभाव क्षेत्र सीमित था.
मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ के कामकाज ने जिस यूपी मॉडल को खड़ा किया, उसकी चर्चा अब उसी तरह होती है जैसे साल 2014 के पहले बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और पार्टी के कार्यकर्ता नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल का ज़िक्र करते थे.
राधिका रामाशेषन कहती हैं, "योगी जी ने काफी प्रभाव छोड़ा है. मध्य प्रदेश और कर्नाटक (जब बीजेपी की सरकार थी) भी यूपी मॉडल का काफी ज़िक्र करते रहे हैं."
राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को चुनाव दर चुनाव मिलने वाली कामयाबी की वजह से हर तरफ योगी आदित्यनाथ के 'यूपी मॉडल' की बात हो रही है.
उत्तर प्रदेश की राजनीति पर करीबी नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र सिंह कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में प्रदेश में बीजेपी को मिले चुनाव नतीजों के जरिए उनका मूल्यांकन हो रहा है.
राजेंद्र सिंह कहते हैं, "किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन रिजल्ट से होता है. योगी आदित्यनाथ के साथ भी यही बात है. वो 2017 में सत्ता में आए. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में अच्छा रिजल्ट दिया. तब सपा, बसपा और आरएलडी का गठबंधन था. उस गठबंधन के मुक़ाबले 64 सीट जीतना (सहयोगियों के साथ) बड़ी उपलब्धि थी. तब लोगों को लग रहा था कि बीजेपी का सफाया हो जाएगा."
वो कहते हैं, "उसके बाद आया 2022 का विधानसभा चुनाव. दूसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाना निश्चित तौर पर एक बड़ी बात थी.फिर अभी निकाय चुनाव हुए, बीजेपी ने सारे बड़े शहरों में क्लीन स्वीप किया. ये रिपोर्ट कार्ड है उनका "
'योगी आदित्यनाथ रिलीजन, पॉलिटिक्स एंड पावर, द अनटोल्ड स्टोरी' किताब के लेखक और उत्तर प्रदेश की राजनीति को कई दशक से कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान दावा करते हैं कि आज की तारीख़ में प्रदेश में योगी आदित्यनाथ दूसरे सभी नेताओं से आगे हैं.
वो कहते हैं, "जहां तक यूपी का सवाल है यहां नरेंद्र मोदी से भी ज़्यादा योगी आदित्यनाथ का असर है. नरेंद्र मोदी (2024 में ) जहां फिर से पहुंचना चाहते हैं, उसके लिए यूपी ज़रूरी है और योगी भी. इसमें कोई शक नहीं है कि योगी आदित्यनाथ ने अपने आपको जिस तरह से आगे बढ़ाया है, वो काबिले तारीफ है."
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क्या है योगी का यूपी मॉडल

योगी आदित्यनाथ और यूपी मॉडल एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं.
लेकिन 'यूपी मॉडल' है क्या, राजेंद्र सिंह इसका जवाब देते हैं.
वो कहते हैं, "योगी जी का यूपी मॉडल है क़ानून व्यवस्था और विकास. साथ में हिंदुत्व का तड़का. यानी हिंदुत्व के तड़के के साथ विकास और क़ानून व्यवस्था पर फोकस करना. "
राधिका रामाशेषन भी कहती हैं कि नरेंद्र मोदी के 'गुजरात मॉडल' की ही तरह योगी आदित्यनाथ के 'यूपी मॉडल' में भी सबसे मुख्य बात हिंदुत्व है.
वो आगे कहती हैं, "लेकिन जैसे गुजरात मॉडल का मेन फ़ीचर विकास, इन्फ्रास्ट्रक्चर और आर्थिक उन्नति थी, यहां (यूपी मॉडल में) क़ानून व्यवस्था मुख्य स्तंभ है. विकास की बात उसके बाद आती है."
राधिका कहती हैं, "क़ानून व्यवस्था के मामले में योगी जी ने काफी प्रभाव छोड़ा है. मध्य प्रदेश और कर्नाटक भी यूपी मॉडल का काफी ज़िक्र कर रहे थे. वो कह रहे थे कि कोई क़ानून हाथ में ले या उल्लंघन करे तो एक ही उपाय है, बुलडोज़र चलना."
वो कहती हैं, "बुलडोज़र योगी आदित्यनाथ की सरकार का एक सिंबल बन गया है."
हालांकि, योगी आदित्यनाथ के इस 'यूपी मॉडल' को लेकर आलोचक लगातार सवाल उठाते रहे हैं.
शरत प्रधान कहते हैं, "योगी आदित्यनाथ की अभी मेन यूएसपी (यूनीक सेलिंग प्वाइंट) क्या है, जिसे दूसरे लोग भी कॉपी कर रहे हैं, खासकर बीजेपी शासित राज्य चाहे मध्य प्रदेश हो या असम वाले (मुख्यमंत्री), किसी ने कुछ गड़बड़ की, भले ही वो प्रूव नहीं हुआ हो, केस चल रहा हो, ये कहते हैं कि उसे बुलडोज़ कर दो. बकायदा ऐसी भाषा बोलते हैं. ये क़ानून के मुताबिक नहीं है. "
वो कहते हैं, "अगर आप देश के क़ानून को ताक़ पर रखकर अपना क़ानून चलाएंगे तो कुछ दिन तो अच्छा लगेगा लेकिन जब गाज आम आदमी पर गिरने लगेगी फिर लोगों को होश आएगा."
शरत प्रधान कहते हैं, "योगी आदित्यनाथ ने अपना प्रोफ़ाइल बना लिया है कि भई ये है सॉलिड आदमी, ये तुरंत तय करता है, लेकिन किसके ख़िलाफ़ तय करता है, ये भी तो सोचने की बात है. वही काम अतीक़ अहमद जैसा क्रिमिनल करता है तो उसके दूर दूर के रिश्तेदारों की प्रॉपर्टी भी जब्त कर ली जाती है लेकिन क्रिमिनल बीजेपी में है तो उसके सारे दोष माफ हैं."
वो आगे कहते हैं, "योगी आदित्यनाथ ने प्रचार के जरिए तरक्की की है. मोदी का मॉडल फोलो किया है, हक़ीकत सब जानते हैं कि गुजरात ऐसा ट्रांसफॉर्म नहीं हुआ था जैसा कि प्रोजेक्ट किया गया था. वो ही यहां की बात है. क्या यहां लॉ एंड ऑर्डर अच्छा हो गया है? क्या सारे अपराधी ख़त्म हो गए? एक ख़ास मजहब के अपराधी थे जिनको ख़त्म कर दिया गया."
80 बनाम 20

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शरत प्रधान कहते हैं, "योगी आदित्यनाथ की महाराथ सबसे बड़ी इसी में है कि ये 80- 20 कर देते हैं."
योगी आदित्यनाथ के यूपी मॉडल को लेकर राधिका रामाशेषन भी ऐसा ही सवाल उठाती हैं.
वो कहती हैं, "जब वो कहते हैं कि क़ानून में ढील नहीं आनी चाहिए तो इसका मतलब यही है कि एक कौम को सीधा करके रख दिया है. वो आवाज़ नहीं उठा पाएंगे. योगी जी जब से सत्ता में आए हैं इसी दिशा में काम करते रहे हैं. चाहे वो गोकशी रोकने का ऑर्डिनेंस हो, या एनकाउंटर और बुलडोज़र चलना हो. जब सीएए को लेकर विरोध हुआ था तब उस पर जबरदस्त क्रैक डाउन हुआ. "
राजेंद्र सिंह कहते हैं कि आलोचक भले ही कुछ भी कहें. योगी आदित्यनाथ का मॉडल एक ख़ास तरह से ही काम करता है.
वो कहते हैं, "कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि वो खास लोगों पर कार्रवाई करते हैं लेकिन वो उनके एजेंडे का हिस्सा है."
नेतृत्व की हर बात मंजूर नहीं?

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राधिका रामाशेषन कहती हैं कि योगी आदित्यनाथ के यूपी मॉडल में एक और ख़ास बात है जो बीजेपी शासित किसी और राज्य में दिखाई नहीं देती. वो कहती हैं कि योगी आदित्यनाथ केंद्र की हर बात आंख मूंदकर नहीं मानते.
वो कहती हैं, " (2017 में) मुख्यमंत्री पद के लिए मोदी जी की पहली पसंद मनोज सिन्हा थे. केशव प्रसाद मौर्य जैसे कुछ और नाम चल रहे थे. लेकिन अंत में योगी सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे. नोट करने वाली बात है कि पहले दिन से उन्होंने ये सिग्नल भेजा कि वो दिल्ली से निर्देश और आदेश नहीं लेने वाले हैं. वो खुद अपने तौर पर ही राज चलाएंगे. भले ही ये दिल्ली को पसंद न आया हो. कई ऐसे उदाहरण हैं जब दिल्ली और लखनऊ के बीच में टेंशन हुई है."
राधिका याद दिलाती हैं, "अरविंद शर्मा गुजरात में मोदी जी के पसंसीदा अधिकारी थे. उन्होंने इस्तीफ़ा दिया और उन्हें एमएलसी बनाया गया. बहुत प्रयास हुआ कि (2022 विधानसभा) चुनाव के पहले उन्हें मंत्री बनाया जाए. ख़बर है कि उनके लिए एक बंग्ला भी कालिदास मार्ग पर देखा गया था लेकिन योगी जी अड़े रहे और उन्हें अपने मंत्रिमंडल में नहीं लिया. अभी वो मंत्री हैं लेकिन उनकी ज़्यादा चर्चा नहीं है. केशव प्रसाद मोर्य को भी समानांतर खड़ा करने का प्रयास हुआ लेकिन वो भी सफल नहीं हो पाए हैं. "
शरत प्रधान दावा करते हैं कि योगी आदित्यनाथ ने आज "ऐसी पोजीशनिंग कर ली है कि वो (पार्टी में) कई लोगों की आंख का कांटा बन गए हैं."
मंडल और कमंडल से आगे योगी

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राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ के मॉडल में एक और बात है जो उन्हें मौजूदा दौर के दूसरे नेताओं से अलग करती है.
योगी आदित्यनाथ के आलोचक उन्हें एक ख़ास जाति का समर्थक बताते हैं लेकिन ये आरोप का उनके राजनीतिक ग्राफ पर असर होता नहीं दिखता.
राजेंद्र सिंह इसकी वजह बताते हैं.
वो कहते हैं, " इसकी वजह है, उनका भगवा परिधान. वो पीठाधीश्वर हैं गोरक्षनाथ पीठ के. वो भले ही सवर्ण हैं लेकिन उस पीठ की फॉलोइंग पिछड़ों में काफी है. दूसरे भगवा वेश की वजह से पिछड़े नेतृत्व की बात डाइल्यूट हो जाती है. फिर यूपी में अब मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह के कद का कोई पिछड़ा नेता भी नहीं है. मायावती का दलितों में आधार घट रहा है. "
राधिका रामाशेषन कहती हैं, "यूपी में रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान से ही ओबीसी और पिछड़ों का एक बड़ा वर्ग बीजेपी के साथ जुड़ा हुआ है. बीजेपी उन्हें पद भी देती है, जैसे केशव मौर्या उपमुख्यमंत्री हैं. वो योगी आदित्यनाथ के भी साथ है."
2024 की चुनौती

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उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में विपक्ष को हाशिए पर धकेलने वाले योगी आदित्यनाथ की अगली परीक्षा साल 2024 में लोकसभा के आम चुनाव के दौरान होगी. तब नरेंद्र मोदी और बीजेपी के साथ विपक्षी दलों के लिए बहुत कुछ दांव पर होगा.
उस वक्त योगी आदित्यनाथ और उनका मॉडल बीजेपी के लिए कितना अहम होगा?
इस सवाल पर शरत प्रधान कहते हैं, " योगी आदित्यनाथ ने सपोर्ट बेस सॉलिड बना लिया है. विपक्ष बिल्कुल कमज़ोर है. अखिलेश यादव सॉफ्ट हिंदुत्व प्ले करने लगे हैं. ये भी योगी के हक में जाता है, जब आप दूसरे की पिच पर खेलेंगे तो कैसे जीतेंगे."
वहीं, राजेंद्र सिंह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में आगे भी बीजेपी मौजूदा रास्ते पर ही चलेगी.
वो कहते हैं, "यूपी में कोई बड़ी चुनौती बीजेपी के सामने नहीं है. 2019 का आपको ध्यान है, तब सपा बसपा और आरएलडी का गठबंधन था लेकिन बीजेपी बहुत आगे रही."
हालांकि, उन्हें ये नहीं लगता कि योगी आदित्यनाथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कोई चुनौती बन सकते हैं.
राजेंद्र सिंह कहते हैं, "सरकार बनी तो मोदी पीएम होंगे. योगी आदित्यनाथ भी उनका गुणगान करते हैं."
वो कहते हैं कि जब कभी मोदी हटेंगे तब सवाल भले उठ सकता है.
राधिका रामाशेषन कहती हैं, " यूपी के अंदर विधानसभा में योगी नंबर वन हैं लेकिन लोकसभा के लिहाज से अभी भी शायद मोदी नंबर वन हैं. 2024 में अगर बीजेपी को पहले से ज़्यादा सीटें मिली तो मोदी ही पीएम होंगे, थोड़ा कम भी हो तो मोदी होंगे. योगी आदित्यनाथ अगर अपना दावा पेश भी करते हैं तो किन परिस्थिति में करेंगे, ये देखना होगा."
शरत प्रधान कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ अभी सिर्फ़ 51 साल के हैं और ये उनका एडवांटेज है.
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