लोकसभा चुनाव 2024: नरेंद्र मोदी का 'लाभार्थी क्लास' क्या जीत की 'गारंटी' दिला पाएगा

लोकसभा चुनाव 2024
इमेज कैप्शन, सुकुरतिन प्रजापति पहले मजदूरी करती थीं फिर गांव के एक स्कूल में खाना बनाने लगीं
    • Author, पायल भुयन और सेराज अली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

युवा, ग़रीब, महिला और किसान... प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन चारों को देश की सबसे बड़ी जाति और स्तम्भ बता चुके हैं. लोकसभा चुनाव में बीजेपी के घोषणापत्र पर भी इन चारों के सशक्तीकरण पर ख़ासा जोर था.

पिछले कुछ सालों में युवा, ग़रीब, महिला और किसान को ध्यान में रखते हुए की तरह की योजनाओं लाई गईं और एक ऐसा 'क्लास' तैयार हुआ है जिसे 'लाभार्थी क्लास' कहा जा सकता है.

ये 'लाभार्थी क्लास' जाति, धर्म और लिंग के दायरे से अलग सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से तैयार हुआ है.

ऐसे में आख़िर सरकारी योजनाओं के ये लाभार्थी कौन हैं? क्या सोचकर वोट करते हैं?

बीबीसी ने यही जानने के लिए दो राज्यों झारखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ लाभार्थियों से बात की है, साथ ही चुनाव विश्लेषकों से भी उनका नजरिया जाना है.

इस रिपोर्ट के लिए हमने तीन महिलाओं की ज़िंदगी को क़रीब से देखा है. झारखंड के गोड्डा ज़िले में रहने वाली फुदिया देवी, काजोरी और उत्तर प्रदेश के बांदा की रहने वाली सुकुरतिन प्रजापति.

तीन महिलाएं, कहानी अलग-अलग

लोकसभा चुनाव 2024

सुकुरतिन प्रजापति पहले मजदूरी करती थीं फिर गांव के एक स्कूल में खाना बनाने लगीं. उनके पति की मौत हो चुकी है. उनके छह बच्चे हैं. वो कहती हैं कि उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिला है. इन योजनाओं से उन्हें आवास, गैस, शौचालय, आधार कार्ड, पहचान पत्र मिला है. राशन और विधवा पेंशन मिलता है. सुकुरतिन के पास स्मार्ट कार्ड और आयुष्मान कार्ड भी है.

सरकारी योजनाओं का लाभ झारखंड की फुदिया देवी को भी मिला है. वो सरकारी योजनाओं से खुश नज़र आती हैं, फुदिया देवी कहती हैं कि गैस नहीं होता तो उन्हें चूल्हे पर खाना बनाना पड़ता.

लेकिन झारखंड की ही रहने वाली काजोरी देवी की कहानी ऐसी नहीं है. वो कहती हैं कि किसी योजना से उन्हें कुछ नहीं मिला. वो कहती हैं कि गैस, पेंशन या राशन उन्हें कुछ भी नहीं मिला.

फुदिया देवी और सुकुरतिन योजनाओं का लाभ पा कर सरकार से खुश हैं जबकि काजोरी खुश नहीं दिखाई देतीं.

अलग-अलग राज्यों में अलग हालात?

वीडियो कैप्शन, नरेंद्र मोदी का 'लाभार्थी क्लास' क्या जीत की 'गारंटी' दिलाएगा?

इन महिलाओं की कहानी में एक बुनियादी फर्क है.

सुकुरतिन प्रजापति उत्तर प्रदेश की रहने वाली हैं, जो बीजेपी शासित राज्य है जबकि फुदिया देवी और काजोरी झारखंड की रहने वाली है जो ग़ैर बीजेपी शासित राज्य है.

लाभार्थी योजनाओं के आंकड़ों पर नज़र डाले तो पाते हैं कि मोदी सरकार की कई योजनाएं ग़ैर-बीजेपी शासित राज्यों ने नहीं अपनाई. मसलन आयुष्मान योजना.

कई योजनाएं ग़ैर बीजेपी शासित राज्य अपने यहां दूसरे नाम से पहले से ही चला रहे हैं और मानते हैं कि उनकी योजनाएं केंद्र की मोदी सरकार की योजनाओं से बेहतर हैं.

कई ग़ैर बीजेपी शासित राज्यों पर आरोप भी लगाते हैं कि मोदी सरकार केंद्रीय योजनाओं के लिए उचित फ़ंड नहीं देती है.

जानकार क्या कहते हैं?

लोकसभा चुनाव 2024
इमेज कैप्शन, रितिका खेड़ा
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

आईआईटी दिल्ली में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर रितिका खेड़ा ने लाभार्थी योजनाओं के फ़ंडिंग पर काफी शोध किया है. आंकड़ों के आधार पर वो कहती हैं कि बीजेपी ने यूपीए सरकार के मुक़ाबले लाभार्थी योजनाओं पर पूरी जीडीपी का कम हिस्सा ख़र्च किया है.

वो कहती हैं, "लाभार्थी योजनाओं पर सरकार के ख़र्चे की बात करें तो यूपीए-1 में इसमें काफी बढ़त देखने को मिलती है, उसके बाद से लेकर वो आज तक घटता ही जा रहा है, अगर हम जीडीपी के प्रतिशत में ख़र्च को मापें तो कोविड के पहले साल में मोदी सरकार ने जीडीपी का तीन प्रतिशत लाभार्थी योजनाओं पर ख़र्च किया था, वो एक अपवाद है."

हालांकि, कुछ जानकार इस पर तर्क ये देते हैं कि अगर देश की जीडीपी बढ़ रही है तो लाभार्थी योजनाओं पर लोगों की निर्भरता कम होती है, इसलिए खर्च नहीं बढ़ना कोई ग़लत बात नहीं है. लेकिन रितिका का कहना है, "लाभार्थी योजनाओं को देखने का सही तरीका नहीं है खासतौर पर तब जब, नोटबंदी, जीएसटी और कोविड जैसे तीन झटकों को झेल कर अर्थव्यवस्था बाहर निकली हो."

हालांकि, लाभार्थी योजनाओं का लाभ पाने वालों से मिलकर इस कहानी की सभी परतें नहीं खुलतीं. मसलन मोदी सरकार के पहले भी ऐसी योजनाएं थी. लोगों तक लाभ भी पहुंचा था तो फिर इस 'लाभार्थी क्लास' के बारे में चर्चा अभी क्यों?

'लाभार्थी क्लास' पर अभी चर्चा क्यों?

वीडियो कैप्शन, बिहार की इन लोकसभा सीटों पर महिला उम्मीदवारों की इतनी चर्चा क्यों?

इस पर सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के राहुल वर्मा कहते हैं, "कुछ बदलाव हुए हैं. पहला बदलाव तो ये है कि पिछले दस सालों में टेक्नोलॉजी की वजह से योजनाओं को लोगों तक पहुंचाना ज़्यादा आसान हो गया है. दूसरा कि अब आप सीधे पैसे भेज सकते हैं उससे भ्रष्टाचार कम हुआ है. तीसरा, टेक्नोलॉजी ने मार्केट करने का भी ज़्यादा स्कोप दिया है."

राहुल जो कह रहे हैं उसका असर लाभार्थियों के जीवन में भी देखा जा सकता है. काजोरी देवी भी इससे सहमत हैं. वो कहती हैं, "अब अच्छा है कि खाता में पैसा आता है. जब मन करे तब निकालो, जब मन नहीं तो नहीं निकालो. पहले हाथ में देते थे तो ख़र्च हो जाता था."

भारत के जाने माने राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर भारत के नए ‘लाभार्थी क्लास’ को योजनाओं के नामकरण की स्टाइल से भी जोड़ते हैं.

वो कहते हैं, "कई सारी स्कीमें जो सरकार के अलग-अलग विभाग अलग-अलग नामों से चलाते थे. उनकी रीपैकेजिंग करके या कुछ नई योजनाएं भी शुरू की गई है. इनका सीधा लाभ लाभार्थियों तक पहुंचाया जा रहा है. क्योंकि ये सीधे प्रधानमंत्री की ओर से चलाई जा रही हैं. यही वजह है कि हर स्कीम का नाम है, प्रधानमंत्री रोजगार योजना, प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना आदि."

लेकिन प्रशांत किशोर की इस बात पर बीजेपी के बांदा के विधायक प्रकाश द्विवेदी अलग तर्क देते हैं. वो कहते हैं कि पुरानी सरकारों की तरह योजनाओं को किसी ख़ास नाम से नहीं चलाया जा रहा है.

प्रकाश द्विवेदी कहते हैं, "जैसे पीएम आवास योजना है तो उन्होंने मोदी आवास योजना या नरेंद्र आवास योजना नहीं रखा है ना. इससे पहले इंदिरा आवास योजना होती थी. जवाहर रोज़गार योजना होती थी. प्रधानमंत्री व्यक्ति नहीं है, पद है."

झारखंड के कांग्रेस के विधायक और कृषि मंत्री बादल पत्रलेख मानते है कि योजनाएं उनके पास भी थीं, लेकिन मोदी सरकार ने अलग नैरेटिव ही सेट किया.

बादल पत्रलेख कहते हैं, "पहले एक रुपया किलो मिलता था, अब आप उसे फ़्री दे रहे हैं. 30 रुपये किलो में आप एक ही रुपया ना मुफ़्त किए. 29 रुपये वाले का कोई नाम नहीं हो रहा है. और एक रुपये वाला मैदान मार के चला जा रहा है."

लोकसभा चुनाव 2024

कांग्रेस के विधायक जिस योजना का जिक्र कर रहे थे, वो है मोदी सरकार की सबसे चर्चित मुफ़्त राशन लाभार्थी योजना.

इस योजना को मोदी सरकार ने कोविड महामारी के समय जून 2020 में शुरू किया गया था जो अब दिसंबर 2028 तक चलेगी.

मोदी सरकार का दावा है कि अकेले मुफ्त राशन योजना का लाभ आने वाले पांच सालों में तकरीबन 80 करोड़ लोगों को मिलेगा.

पीएम आवास योजना (ग्रामीण) का मक़सद है ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीब लोगों को आवास दिलवाना.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, सरकार द्वारा कुल 2,94,77835 ( करीब तीन करोड़) घर स्वीकृत किए गए थे. उनमें से 2,59,58739 (करीब दो करोड़ साठ लाख ) पूरे हो चुके हैं.

लोकसभा चुनाव 2024

साल 2016 में शुरू हुई उज्ज्वला योजना के तहत ग्रामीण इलाकों में एलपीजी सिलिंडर देने की शुरुआत हुई, भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक अक्टूबर, 2023 तक 9.67 करोड़ एलपीजी सिलिंडर लोगों को दिए गए.

लोकसभा चुनाव 2024

पीएम किसान योजना के माध्यम से सरकार किसानों को प्रति वर्ष 6000 रुपये तक देती है.

साल 2018-2019 में जब यह योजना शुरू हुई तीन करोड़ से अधिक लोगों तक पहुँची और इसके बाद यह संख्या बढ़ती गई.

'जाति और वर्ग की लड़ाई हो गई है धुंधली'

लोकसभा चुनाव 2024

लाभार्थी योजनाओं की ज़मीनी हक़ीक़त को लेकर विपक्षी पार्टियां सवाल उठाती रही हैं.

विश्लेषकों की एक राय के मुताबिक, भारत की चुनावी राजनीति की एक सच्चाई ये भी है कि जाति और वर्ग की लड़ाई को इन योजनाओं ने धुंधला कर दिया है.

लेकिन इसके बाद भी पार्टी की उम्मीदवारों की सूची जाति और वर्ग के समीकरण से बाहर क्यों नहीं आ पा रही है.

सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) के संजय कुमार कहते हैं, "चुनाव में टिकट देने की जो सबसे अहम मापदंड है, वो है कि उम्मीदवार में चुनाव जीतने की क्षमता होनी चाहिए. जाति की इसमें अहम भूमिका होती है, इसमें पैसों और संसाधनों का भी अपना महत्व होता है."

लोकसभा चुनाव 2024
इमेज कैप्शन, संजय कुमार, सीएसडीएस

सवाल ये भी उठता है कि क्या योजनाओं के लाभार्थियों को मोदी सरकार वोट बैंक में तब्दील कर पा रही है. सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़ ने लोकसभा चुनाव से पहले एक सर्वे किया. इस सर्वे में दिलचस्प आंकड़े निकल कर सामने आए हैं.

संजय कुमार कहते हैं, "हमारे सर्वे से पता चलता है कि बीजेपी को इस बार 40 फीसदी वोट मिलने का अनुमान है और गरीब और निम्न वर्ग के बीच उनका सपोर्ट 39-39 फ़ीसदी है. 2019 की बात करें तो पहले अमीरों और मध्यम वर्ग में उनका जनाधार कहीं ज़्यादा था और गरीबों से अंतर बहुत ज़्यादा होता था. लाभार्थी क्लास ने ये अंतर पाट दिया है."

आख़िर में जब हमने फुदिया देवी, काजोरी और सुकुरतिन प्रजापति से पूछा कि वो क्या सोचकर वोट देंगी.

फुदिया और सुकुरतिन कहती हैं कि जिस सरकार ने उन्हें योजनाओं का लाभ दिया है वो वोट उसी को देंगी. वहीं काजोरी कहती हैं, "जब हमें घर मिलेगा, पेंशन मिलेगा तभी वोट दूंगी, नहीं तो नहीं दूंगी."

(झारखंड से स्थानीय पत्रकार प्रवीण तिवारी और उत्तर प्रदेश से स्थानीय पत्रकार पंकज द्विवेदी के इनपुट समेत)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)