क्या बीजेपी ने 'सोशल जस्टिस' वाली पार्टियों से पिछड़े-दलित वोटरों को छीन लिया है -ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लोकसभा चुनाव के लिए वोटिंग और प्रचार अभियानों के बीच प्रधानमंंत्री नरेंद्र मोदी के बयान लगातार सुर्खियां बटोर रहे हैं.
शुरुआती चुनावी रैलियों में प्रधानमंत्री अपनी सरकार के विकास के कामों के नाम पर वोट मांगते दिखे.
लेकिन जल्दी ही उनके भाषण ध्रुवीकरण की ओर मुड़ गए.
दूसरे दौर के चुनाव से पहले दिए जा रहे पीएम मोदी के भाषणों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश दिखी तो पहले दौर के भाषणों में उनका ज़ोर जातीय गोलबंदी पर था.
19 अप्रैल को पहले चरण की वोटिंग से पहले की हर दूसरी चुनावी रैली में वो बीजेपी को पिछड़ों और दलितों की सबसे बड़ी सरपरस्त पार्टी बता रहे थे.
इस साल फरवरी में नरेंद्र मोदी ने संसद में ख़ुद के ओबीसी होने पर बहुत ज़ोर दिया था.
बिहार में जाति सर्वे के नतीजे आने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जब बीजेपी सरकार में ओबीसी के प्रतिनिधित्व का सवाल उठाया था तो अमित शाह ने उनका जवाब दिया था.
उन्होंने कहा था कि बीजेपी और एनडीए सरकार में ओबीसी की नुमाइंदगी उन पार्टियों में ओबीसी नुमाइंदगी से कहीं ज्यादा है जो रात-दिन ओबीसी का राग अलापती रहती हैं.
शाह ने आंकड़े देकर ये दावा किया कि बीजेपी ने अपने यहां ओबीसी और दलित नेताओं को कितनी तवज्जो दी है.
राहुल गांधी को शाह का दिया गया ये जवाब सिर्फ एक बयान भर नहीं था.
विश्वसनीय समझे जाने वाले चुनावी सर्वेक्षणों के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस साल के दौरान हुए चुनावों में बीजेपी को ओबीसी और दलित वोटरों का भारी समर्थन मिला है.
बीजेपी को पिछड़े-दलितों का कितना समर्थन?

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आमतौर पर अगड़ी जातियों की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी ने पिछले दस सालों में ओबीसी जातियों और दलितों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए जो रणनीति अपनाई और जो ज़मीनी काम किए उसकी पड़ताल के लिए बीबीसी ने पिछले दिनों पहले उत्तर प्रदेश और फिर महाराष्ट्र की यात्रा की.
ये यात्रा 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी की भारी जीत में ओबीसी और दलित जातियों की भूमिका को समझने की कोशिश थी.
हमने उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र का चुनाव इसलिए किया क्योंकि ये लोकसभा सीटों के हिसाब से दो सबसे बड़े राज्य हैं. यूपी में लोकसभा की 80 सीटें हैं और महाराष्ट्र में 48.
हमारे सामने सवाल ये था कि क्या बीजेपी ने ‘सोशल जस्टिस’ की पार्टी कही जाने वाली समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड) और एनसीपी जैसी पार्टियों के सामाजिक आधार पर कब्ज़ा कर लिया है?
क्या इन पार्टियों की सबसे बड़ी समर्थक पिछड़ी जातियों ने अब बीजेपी का दामन थाम लिया है? अगर ऐसा हुआ है तो इसकी वजह क्या है?
क्या ये रणनीति बीजेपी को आगे भी ओबीसी-दलित वोटरों को उसके साथ जोड़े रखेगी?
आइए सबसे पहले उत्तर प्रदेश के ज़मीनी हालात का जायज़ा लेते हैं.

अमित शाह की रणनीति

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2014 के लोकसभा चुनाव से 11 महीने पहले बीजेपी ने अमित शाह को उत्तर प्रदेश में पार्टी को ज्यादा से ज्यादा सीटें जिताने का जिम्मा सौंपा.
अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरणों को नए सिरे से खंगाला और 2014 के लोकसभा चुनाव में 25 ओबीसी और 17 दलित उम्मीदवार लड़ाए.
ताकतवर किसान जाति कुर्मियों की पार्टी 'अपना दल' (सोनेलाल) को दो सीटें दीं.
इसके बाद बाकी इतिहास बन गया. सिर्फ दस सांसद वाली बीजेपी ने यूपी की 80 में से 73 सीटें जीत ली.
उत्तर प्रदेश में 2014 में बीजेपी की इस भारी जीत को ‘मोदी लहर’ का नतीजा बताया जाता है लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये पार्टी के गैर यादव ओबीसी जातियों वाली पार्टियों से गठबंधन का नतीजा थी.
उत्तर प्रदेश में इस गठबंधन का असर देखने के लिए जब हमने वाराणसी से अपना सफर शुरू किया तो रास्ते में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बड़े-बड़े होर्डिंग दिख रहे थे. इनमें उनकी सरकार की ओर से किए गए फैसलों का एलान था.
शहर में नई सड़कें और ओवरब्रिज दिखे. वाराणसी का बाहरी इलाका तो कम से कम साफ-सुथरा दिख रहा था. बाबतपुर एयरपोर्ट से लेकर मुख्य शहर को जोड़ने वाली सड़कों पर दीवारों पर कई जगह पेंटिंग बनाए गए थे.
शहर से जौनपुर और पूर्वांचल के दूसरे इलाकों के लिए जा रही सड़कें भी काफी चौड़ी थीं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकसभा सीट होने की वजह से पुलिस-प्रशासन चुस्त दिख रहा था.
ज्यादातर जगहों पर भगवा झंडे लहरा रहे थे. हालांकि ये झंडे बीजेपी के न होकर अलग-अलग हिंदू संगठनों के थे.
बीएसपी और समाजवादी पार्टी के पोस्टर और होर्डिंग भी थे लेकिन ये कम थे. हांं,कुछ दुकानों में बीएसपी के झंडे और बैनर बिकते जरूर दिखे.

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ये रास्ता हमें जौनपुर ले जाता है, जो वाराणसी मंडल का ही ज़िला है. डेढ़ सदी तक मुगलों के शासन में रहे जौनपुर में इस्लामी संस्कृति की झलक साफ दिखती है.
अपनी विशालकाय मूलियों और इमरती के लिए मशहूर जौनपुर में मुस्लिम, ठाकुरों और यादवों की बड़ी आबादी है.
यहां ठाकुर बिरादरी के नेता कृपाशंकर सिंह बीजेपी के उम्मीदवार हैं. जबकि समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार हैं बाबू सिंह कुशवाहा जो कभी मायावती के काफी करीबी माने जाते थे.
लेकिन बाहुबली नेता धनंजय सिंह की पत्नी श्रीकला रेड्डी को बीएसपी ने अपना उम्मीदवार बना कर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है.
इसी सफर के दौरान जौनपुर में हाईवे के किनारे एक ढाबे पर हमारी मुलाकात राम शिरोमणि प्रजापति से होती है.
अख़बार पढ़ रहे प्रजापति चुनाव की ख़बरों को गौर से देख रहे हैं.
प्रजापति इंटर कॉलेज में पढ़ाते थे और अब रिटायर हो चुके हैं.
पहले तो वो बात करने में हिचकिचाते रहे लेकिन जब हमने पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरणों की बात शुरू की तो वो खुलने लगे.
उन्होंने कहा कि यूपी में बीजेपी की जीत की बड़ी वजह है गैर यादव ओबीसी वोटरों की गोलबंदी.
अमित शाह ने ही ये स्ट्रेटजी बनाई कि गैर यादव ओबीसी नेताओं को जोड़ा जाए.
प्रजापति के मुताबिक़,अमित शाह ने ही अवध और पूर्वांचल के इलाके में गैर यादव ओबीसी नेताओं को यादव जाति के वर्चस्व वाली समाजवादी पार्टी और जाटवों, मुस्लिमों के वर्चस्व वाली बीएसपी से अपनी ओर खींचने की रणनीति बनाई.
प्रजापति के इस बात में दम नजर आता है क्योंकि बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में 2014 लोकसभा चुनाव में 25 और 2019 लोकसभा चुनाव में 24 गैर यादव ओबीसी उम्मीदवार उतारे थे.
गैर यादव ओबीसी जातियां और उनकी चुनावी अहमियत

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उत्तर प्रदेश के अवध और पूर्वांचल के इलाके में राजभर,कुर्मी, मौर्या, पासी, निषाद, चौहान और नोनिया जैसी गैर यादव ओबीसी जातियों के वोटरों की तादाद इतनी है कि वो किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन कर उसे निर्णायक जीत दिला सकते हैं.
गोरखपुर, देवरिया, बलिया, मऊ, गाज़ीपुर, चंदौली, मिर्जापुर, भदोही, कौशांबी, प्रयागराज और प्रतापगढ़ से लेकर बस्ती, सिद्धार्थनगर, आजमगढ़, जौनपुर, वाराणसी और मोहनलाल गंज तक पूरे अवध और पूर्वांचल इलाके की 171 सीटें यूपी की 403 सदस्यों वाली विधानसभा में सरकार बनाने में अहम भूमिका अदा करती हैं.
पिछले साल खुद बीजेपी ने माना था कि राजभर जाति के वर्चस्व वाली ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी उसे 12 लोकसभा सीटों पर जीतने में मदद कर सकती है.
वहीं सुहेलदेव भारतीय समाज ने अपने आंतरिक सर्वे का हवाला देते हुए कहा था कि वो 32 लोकसभा सीटों पर प्रभावी साबित हो सकती है.

उत्तर प्रदेश में राजभर मतदाताओं की संख्या लगभग चार फीसदी है. लेकिन ये पूर्वांचल की दस से बारह सीटों पर किसी पार्टी की जीत में निर्णायक भूमिका अदा कर सकती है.
बीजेपी इस तरह की गैर यादव ओबीसी पार्टियों से तालमेल कर 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में भी जबरदस्त जीत हासिल कर चुकी है.
यही वजह है कि वो अपने इस ‘विनिंग फॉर्मूले’ को बार-बार आजमा रही है.
सपा-बसपा की 'गलतियां' और बीजेपी का फ़ायदा

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इस बार के लोकसभा चुनाव में भी उसके साथ सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी,अपना दल (सोनेलाल) और निषाद पार्टी जैसी अहम गैर यादव ओबीसी पार्टियां हैं.
ये पार्टियां उसे गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलित वोटरों में पैठ बनाने में मदद करती हैं.
डॉ. अरविंद कुमार रॉयल हॉलोवे यूनिवर्सिटी लंदन में समाज शास्त्र पढ़ाते हैं और आजकल अंबेडकरनगर स्थित अपने घर आए हुए हैं.
इस सफर के दौरान हुई बातचीत में उन्होंने कहा,'' समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी पिछड़ों के साथ अति पिछड़ों, दलितों और मुस्लिम वोटरों के दम पर सत्ता में आई थी. लेकिन जब ये पार्टियां में सत्ता में थीं तो उनकी नीतियों का अति पिछड़ों और दलितों को कोई खास फायदा नहीं हो रहा था.''
वो समाजवादी पार्टी की सरकार में पुलिस भर्ती में मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल सिंह यादव की ‘लिस्ट’ का ज़िक्र करते हैं.
वो कहते हैं, ''उस दौर में गैर यादव पिछड़े वर्ग के युवा पुलिस भर्ती परीक्षा देने के बाद जब लौट कर आते थे तो कहते थे कि उनका प्रदर्शन ठीक था. लेकिन बीच में शिवपाल की ‘लिस्ट’ आ गई और उनका सेलेक्शन नहीं हो सका.''
अरविंद कुमार का कहना है इस तरह के मामलों से गैर यादव ओबीसी वर्ग के मतदाताओं का समाजवादी पार्टी से मोहभंग होना शुरू हुआ.
गैर यादव पिछड़ों और अति पिछड़ों को लगने लगा कि समाजवादी पार्टी अब सिर्फ एक जाति (यादवों) की पार्टी होकर रह गई है.
वो कहते हैं, ''इसी तरह जब बीएसपी प्रमुख मायावती 2007 में मुख्यमंत्री बनीं तो उन्हें लगा कि ये जीत उन्हें ऊंची जातियों ख़ास कर ब्राह्मण वोटरों की बदौलत मिली है. लेकिन उस समय महज 30 फीसदी ब्राह्मण वोट ही बीएसपी की ओर शिफ्ट हुए थे. इस गलतफहमी की वजह से पार्टी के कोर वोटरों में शामिल अति पिछड़ों की अनदेखी होने लगी.''

गैर यादव, गैर जाटव, मुस्लिम वोटर और बीजेपी

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राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक़ मौर्या, कुशवाहा, शाक्य, सैनी, निषाद जैसी गैर यादव ओबीसी जातियां बीएसपी की बड़ी समर्थक जातियां हुआ करती थीं.
लेकिन समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का क्रमश: यादवों और जाटवों की ओर ज्यादा झुकाव दूसरी पिछड़ी और दलित जातियों को निराश करने लगा था.
अपने समुदाय के हितों की अनदेखी से बीएसपी के कई कुशवाहा नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी.
यूपी में मुस्लिम वोटर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के साथ रहे हैं लेकिन अब ये पार्टियां उन्हें निराश कर रही हैं.
जौनपुर से आजमगढ़ की ओर जाते हुए हमें जाफ़राबाद गांव में मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग मिले.
नाम न छापने की शर्त पर उनमें से एक शख़्स ने कहा, ''बीजेपी के शासन में मुस्लिमों को लगातार हाशिये पर धकेला जा रहा है. लेकिन दुख की बात ये है समाजवादी पार्टी और बीएसपी को सपोर्ट करने वाले इन मुस्लिमों के समर्थन में ये पार्टियां भी खुल कर सामने नहीं आ रही हैं.''
ईद के दूसरे दिन इस गांव में पहुंचे हम लोगों को एक महिला ने सेवई खिलाते हुए कहा, ''मोदी सरकार तीन तलाक का कानून लाकर हमारे निजी मामलों में दखल दे रही है. ये ठीक नहीं है. लेकिन हमारे बिरादरी के कुछ लोग अब बीजेपी को भी सपोर्ट करने लगे हैं.''
इसका सुबूत हमें जल्दी ही मिला. जौनपुर की ही रहने वाली और अब लखनऊ में एक सरकारी अस्पताल में हेड नर्स के तौर पर काम करने वाली तंजीला परवीन ने हमसे कहा कि तीन तलाक का कानून लाने से मुस्लिम महिलाओं को बहुत फायदा हुआ है. उन्हें बहुत अधिक दबाया जा रहा था. उनका शोषण हो रहा था
इसी गांव के इमरान बोले,''जौनपुर में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है लेकिन यहां ज्यादातर ठाकुर या यादव कैंडिडेट ही जीतते आए हैं. यादवों को समर्थन देने का मुस्लिम बिरादरी को कोई खास फ़ायदा नहीं हो रहा है.''
वहीं सामने खड़े पासी जाति के ही एक युवक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि उनका सपा-बसपा से मोहभंग हो चुका है. उन्हें अब बीजेपी में उम्मीद नजर आती है.
बीजेपी की विरोधी पार्टियों की दलील

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समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी भी मानते हैं कि अति पिछड़ों और गैर जाटव दलित वोटरों का एक हिस्सा बीजेपी के साथ गया है. लेकिन उनका मानना है कि ये बीजेपी के झूठे प्रचार और प्रोपगंडा की वजह से हुआ है.
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, ''बीजेपी ने ये झूठा प्रचार किया कि समाजवादी पार्टी की सरकार में 86 में 56 यादव एसडीएम भर्ती हुए. बीजेपी ये अफवाह फैलाती रही है कि समाजवादी पार्टी सिर्फ यादवों के लिए काम करती है और मायावती की सरकार जाटवों के लिए.''
भाटी कहते हैं,''ये बीजेपी के दो समुदायों को आपस में लड़ाने की राजनीतिक शैली है. बीजेपी हर राज्य में दो समुदायों को लड़ा रही है. राजस्थान में गुर्जर और मीणा, हरियाणा में जाट बनाम अन्य और महाराष्ट्र में मराठा और ओबीसी और यहां तक कि मणिपुर में कुकी और मैतेई को लड़ा दिया.''
वो कहते हैं,''हालांकि अति पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक बीजेपी की इस चाल को समझ चुके हैं और अब इन समुदायों के वोटर सपा-बसपा की ओर लौट रहे हैं.''

रोहिणी कमीशन की भूमिका

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हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश में बीजेपी की ओर गैर यादव ओबीसी और अति पिछड़ों के रुझान में कुछ हद तक जस्टिस जी. रोहिणी आयोग की गठन की भी भूमिका रही है.
मोदी सरकार में इस आयोग का गठन ओबीसी जातियों के अंदर रिजर्वेशन के फायदे के ‘न्यायसंगत’ बंटवारे की संभावना तलाशने के लिए हुआ था.
रोहिणी कमीशन ने 2023 में अपनी रिपोर्ट पेश कर दी थी लेकिन इसकी सिफारिशों को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है.
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अरुण राजभर कहते हैं कि रोहिणी आयोग के गठन से भर और राजभर समुदाय में उम्मीद जगी कि अति पिछड़ी जातियों के साथ न्याय होगा.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि 2017 में जब इस आयोग का गठन हुआ था तो उस दौरान केंद्र और राज्य दोनों जगह बीजेपी का शासन था. ऐसे में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को लगा कि ये सही मौका है, जब वो अपने समुदाय के हितों के लिए बीजेपी का साथ पकड़ ले.
अरुण राजभर कहते हैं, ''बीजेपी के साथ आने के बाद हमारे समुदाय के लोगों पर होने वाले अत्याचारों पर सुनवाई होने लगी. हमारे समुदाय के ख़िलाफ़ अपराध करने वालों पर मुकदमे दर्ज होने लगे. अपराधी गिरफ़्तार होने लगे.''
वो कहते हैं,''समाजवादी पार्टी के शासन में यादव समुदाय के दबंगों का दबदबा काफी बढ़ गया था. हमारी जमीनों पर कब्जे होने लगे थे. लोगों को डराया-धमकाया जाने लगा था. इससे अति पिछड़े वर्ग के लोग डरने लगे. इस डर की वजह से भी इस वर्ग के लोग बीजेपी का साथ देने लगे.''

बीबीसी ने उत्तर प्रदेश के मछलीशहर लोकसभा सीट पर कुछ अति पिछड़ी जातियों के वोटरों से बात की.
इस बातचीत में उन लोगों ने कहा कि समाजवादी पार्टी के समय में यादव जाति के दबंगों को संरक्षण मिल रहा था. इस समुदाय के अपराध करने वाले लोगों पर पुलिस कार्रवाई करने में हिचकती थी.
यूपी में बीजेपी ने अति पिछड़ों और दलितों को साथ लाने के लिए मंत्रिमंडल में इस समुदाय के विधायकों को ज्यादा जगह देने का फॉर्मूला अपनाया है.
साल 2022 में जब योगी आदित्यनाथ कैबिनेट का पहली बार गठन किया गया तो इसके 52 मंत्रियों में 20 ओबीसी और नौ दलित समुदाय के थे.
इस साल मार्च में जब योगी कैबिनेट ने अपना विस्तार किया तो शामिल किए गए चार नए मंत्रियों में दो गैर यादव ओबीसी (ओमप्रकाश राजभर और दारा सिंह चौहान) और एक दलित (आरएलडी के अनिल कुमार) समुदाय के थे.
दलित-पिछड़ों समुदाय के नायकों की जयंती और मूर्तियां

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बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में अति पिछड़ों, पिछड़ों और दलित समुदाय के वोटरों को अपने पाले में लाने के लिए उनके नायकों और महापुरुषों की जयंती मनानी शुरू की. कई जगह उनकी मूर्तियां लगवाने का सिलसिला शुरू हुआ.
इन नायकों और महापुरुषों को हिंदुत्व के नायकों के तौर पर पेश करने की कोशिश की गई.
जैसे मोहम्मद गज़नवी के एक जनरल को युद्ध में कथित तौर पर हराने वाले राजभर राजा सुहेलदेव को हिंदुओं का रक्षक बताया गया. बीजेपी ने कई जगह उनकी जयंती आयोजित की और मूर्तियां लगवाईं.
पासी राजा बालदेव और डालदेव को राष्ट्रीय नायक बता कर उनकी जयंती आयोजित की गई. जबकि बीएसपी बाल देव और डालदेव को कथित ऊंची जातियों के शोषण के ख़िलाफ़ खड़े नायकों के तौर पर पेश करती आई थी.
इसी तरह जाटव समाज से आने वाले महर्षि वाल्मीकि और सुपच ऋषि की जयंती पर बीजेपी की ओर से आयोजन हुए.
मुसहर समुदाय में पूजे जाने वाले दो भाइयों दीना और भदरी और अहीर नायक लोरिक देव को राष्ट्र और हिंदू नायक बताया जाने लगा.
बीजेपी ने कुर्मी (पटेल) समुदाय के समर्थन के लिए अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल के जन्मदिन पर भी आयोजन करवाए.

कुर्मियों के बीच इस बात का भी प्रचार किया गया है कि नेहरू सरकार में सरदार बल्लभ भाई पटेल को उनके हक से वंचित किया गया.
अंबेडकरनगर में हमें परशुराम पटेल मिलते हैं. वो कहते हैं, ''पटेल नेहरू से ज्यादा काबिल थे. वो होते तो कश्मीर मामला इतना अधिक नहीं घिसटता. पटेल समुदाय के लोगों ने बीएसपी का साथ दिया. सोनेलाल पटेल बीएसपी के संस्थापकों में से एक थे. लेकिन उन्हें बीएसपी छोड़ कर अपनी पार्टी ‘अपना दल’ बनानी पड़ी.''
वो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से पटेलों (कुर्मियों की पार्टी) की दूरी के बारे में कहते हैं,'' बीजेपी अपना दल (सोनेलाल) की अनुप्रिया पटेल को अपने साथ रखी हुई है लेकिन समाजवादी पार्टी के लोग उनकी बहन और मां की पार्टी अपना दल (कमेरावादी) को संभाल नहीं पा रहे हैं.''

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गैर यादव ओबीसी पार्टियों को अपने साथ जोड़ने की बीजेपी की रणनीति पर वरिष्ठ पत्रकार सुनीता ऐरन कहती हैं,''बीजेपी गैर यादव और गैर जाटव वोटरों को अपने साथ लाने की कोशिश कर रही है और इसमें इस समुदाय के महापुरुषों और नायकों को साथ लाने की कोशिश उसे इस दिशा में फायदा पहुंचाती है. इस समुदाय को लोगों को लगता है कि बीजेपी इसके जरिये उन्हें पहचान और सम्मान दे रही है.''
लाभार्थी योजनाएं और अति पिछड़ों-दलितों की गोलबंदी

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राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यूपी में बीजेपी ने अपने हिंदुत्व,राम जन्मभूमि और ट्रिपल तलाक का मुद्दा नहीं छोड़ा. लेकिन उसने ये रणनीति भी बनाई कि कैसे जाति आधारित पार्टियों को अपने साथ जोड़ा जाए. चाहे वो राजभरों की पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी हो या मल्लाहों-निषादों की पार्टी निषाद पार्टी या फिर कुर्मियों की पार्टी अपना दल.
उनका कहना है कि बीजेपी ने इस रणनीति पर 2013 में काम शुरू किया था जब अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभार दिया गया था.
गोरखपुर विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र पढ़ाने वाले महेंद्र सिंह कहते हैं कि पार्टी ने 2017 में एक और रणनीति अपनाई.
बीबीसी से बातचीत में इसका ज़िक्र करते हुए वो कहते हैं,''बीजेपी ने यह सुनिश्चित किया कि लाभार्थी स्कीमों की सही और समान डिलीवरी हो. सरकार की ओर से इसमें कोई भेदभाव नहीं किया गया. गांवों में ऊंची जातियों, ओबीसी, अति पिछड़ों, दलितों और जनजातीय समुदाय के लोगों में लाभार्थी योजनाओं का समान बंटवारा हुआ.''
वो कहते हैं, ''मुफ़्त अनाज, गैस सिलेंडर, वृद्धावस्था पेंशन, लड़कियों के लिए प्रोत्साहन राशि जैसी योजनाओं का लाभ जब सभी वर्गों में पहुंचने लगा तो बीजेपी का समर्थन न करने वाले वोटरों में भी उसकी ओर रुझान बढ़ा.''

वाराणसी,जौनपुर और मछलीशहर की यात्रा के दौरान हमें कई लोगों ने लाभार्थी स्कीम की अच्छी डिलीवरी की बात कही.
जौनपुर में पांड़ेपुर की पटेल बस्ती में लोगों ने कहा कि उन्हें लाभार्थी स्कीमों की डिलीवरी अच्छे तरीके से हो रही है.
महिलाओं को इससे खासी सहूलियत हो रही हैं. हालांकि उन्होंने ये जरूर कहा कि महिलाओं के लिए रोजगार बढ़ाने में सरकार को तेजी से कदम उठाने चाहिए.
जौनपुर में एक टीवी चैनल के लिए काम करने वाले पत्रकार सुधाकर शुक्ला ने बताया कि लाभार्थी स्कीमों की अच्छी डिलीवरी की वजह से पिछड़े समुदाय के वोटरों में बीजेपी की साख बढ़ी है.
उन्होंने कहा,''अब ये सीधे बीजेपी से जुड़ रहे हैं. लिहाजा इन समुदाय के नेताओं की भी ये मजबूरी हो गई है कि वो बीजेपी में शामिल हो जाएं. हाल के दिनों में जौनपुर में पिछड़े समुदाय के कई नेता बीजेपी में शामिल हुए हैं.''

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हालांकि उत्तर प्रदेश में अपनी यात्रा के दौरान इस बीबीसी संवाददाता को लोगों ने बताया कि बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है. खास कर युवाओं के पास रोजगार की भारी कमी है.
युवाओं का कहना है कि 2024 में बीजेपी को राज्य में रोजगार बढ़ाने पर ध्यान देना होगा वरना गैर यादव पिछड़े और दलितों को साथ लेकर सत्ता हासिल करने की रणनीति फेल हो सकती है.
उनका कहना है कि गैर यादव पिछड़े ज्यादातर खेती और हुनर वालों काम पर निर्भर हैं. खेती से कुछ मिल नहीं रहा है और उद्योग-धंधे बढ़ नहीं रहे हैं, जिससे कि बढ़ई, राज मिस्त्री, पेंटर, वेल्डर और कारीगरी करने वालों को नौकरी मिल सके.
वाराणसी के एक होटल में काम करने वाले आजमगढ़ के अंकित यादव कहते हैं,''हमारे इलाके के युवा पहले फौज में जाते थे लेकिन अग्निवीर योजना में उनकी ज्यादा दिलचस्पी नहीं है. वो इसे ठेके की नौकरी मानते हैं.''
वो कहते हैं,'' यूपी में पढ़े-लिखे और कुशल युवकों को भी अच्छी नौकरी नहीं मिल रही है. मैंने होटल मैनेजमेंट करने में दो-ढाई लाख रुपये खर्च किए. कहने को तो फाइव स्टार होटल में काम करता हूं. लेकिन तनख्वाह पंद्रह हजार रुपये से ज्यादा नहीं बढ़ पा रही है.''
कारीगर जातियों की आर्थिक मदद की योजना

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बीजेपी ने यूपी में पिछले कुछ सालों से राज्य की हुनरमंद जातियों को अलग-अलग स्कीमों के जरिये जोड़ने की कोशिश की है. ये जातियां उत्पादन में लगी हैं और अपने सामानों की बिक्री के लिए बाजार पर निर्भर है.
2022 में विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने ऐसे काम में लगी जातियों के लोगों की सहूलियत के लिए मिट्टी कला बोर्ड, केश कला बोर्ड और विश्वकर्मा बोर्ड का गठन किया. इन जातियों के लोगों ऐसे बोर्डों का प्रमुख बनाया गया.
मार्च 2024 तक दो लाख से अधिक कारीगर और हुनर वाले पेशों में लगे लोग प्रधानमंत्री विश्वकर्मा स्कीम का लाभ ले चुके थे. उन्हें नए और आधुनिक टूलकिट खरीदने के लिए 15 हजार रुपये के ई-वाउचर दिए जा रहे हैं.
इस योजना के तहत दर्जी, लोहार, सुनार, जूतों की मरम्मत करने वालों, राज मिस्त्री, नाव बनाने वालों, हथौड़ा और टूल किट बनाने वालों, ताला बनाने वालों और पत्थर तराश जैसे हुनर वाले काम में लगी जातियों के लोगों को अपना काम शुरू करने के लिए पहले बगैर गारंटी के पहले एक लाख का लोन और फिर चुका देने पर दो लाख रुपये का लोन दिया जाता है.
यूपी में इन योजनाओं का फायदा लोग ले रहे हैं.
अंबेडकरनगर के संजय सोनी स्वर्णकार हैं और ज्वैलरी डिजाइन में लगे हैं.
वो विश्वकर्मा योजना के तहत लोन लेकर अब अपना काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि इस तरह की आर्थिक मदद से उन्हें बड़ी ज्वैलरी दुकानों की नौकरी पर निर्भर रहना नहीं पड़ेगा. अपना काम अपना काम होता है.
गैर जाटव दलितों का बीजेपी की ओर रुझान

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जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सुधा पई और उनके सहयोगी सज्जन कुमार ने अपनी किताब ‘माया,मोदी एंड आज़ाद’ में अपने फील्डवर्क और लोगों से बातचीत के आधार पर बताया है कि गैर जाटव दलितों के इतर दूसरी दलित जातियों ने यादवों के वर्चस्व से निजात पाने के लिए बीजेपी का साथ पकड़ा. वो अपने संरक्षण की तलाश में इधर गए.
नब्बे और 2000 के दशक में समाजवादी पार्टी का वर्चस्व इन दलितों के लिए मुश्किल पैदा कर रहा था. ग्रामीण इलाकों के सामाजिक जीवन में इन्हें दूसरी कथित अगड़ी जातियों के साथ यादवों के दबदबे का सामना करना पड़ रहा था.
दूसरी बड़ी वजह दलित वर्ग में समृद्धि की आकांक्षा रही. बीएसपी प्रमुख मायावती के सत्ता में न रहने की वजह से उन्हें अपनी भौतिक तरक्की के रास्ते बंद होते नजर आ रहे थे. इसने भी गैर जाटव दलितों को बीजेपी की ओर रुख करने को प्रेरित किया.
इस संबंध में जब मैंने अंबेडकरनगर से थोड़ा पहले पासी समुदाय के एक शख्स से बात की तो उन्होंने बताया कि 'बहन जी' (मायावती) के राजनीतिक तौर पर कमजोर पड़ने की वजह से उनके समुदाय के लोगों ने बीजेपी की ओर जाना सुरक्षित विकल्प समझा.
महाराष्ट्र : मराठों से ज्यादा ओबीसी और दलितों पर भरोसा

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उत्तर प्रदेश में गैर यादव ओबीसी जातियों और दलितों को जोड़ने की बीजेपी की रणनीति समझने के बाद हमने महाराष्ट्र की ओर रुख किया.
अप्रैल के दूसरे सप्ताह में हम नागपुर पहुंचे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ओबीसी, दलित और आदिवासियों की खासी आबादी वाले पूर्वी विदर्भ की दूसरी लोकसभा सीटों पर लगातार रैलियां कर रहे थे.
नागपुर बीजेपी के पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय है और इसे महाराष्ट्र की दूसरी राजधानी भी कहा जाता है.
नागपुर लोकसभा सीट से बीजेपी के अध्यक्ष रहे और मोदी सरकार में मंत्री नीतिन गडकरी सांसद हैं और यहां से तीसरी बार चुनाव लड़ रहे हैं.
बेहतरीन मेट्रो नेटवर्क,अच्छी सड़कें और ओवरब्रिज के निर्माण का श्रेय यहां गडकरी को देते हैं.
नागपुर के सीताबर्डी मेट्रो स्टेशन के सामने हमें मिले अभिषेक मेश्राम कहते हैं कि नागपुर में तेली जाति (ओबीसी), दलित और मुस्लिम वोटर ज्यादा हैं लेकिन गडकरी को लोग जाति से ऊपर उठ कर वोट देते हैं.
मेश्राम कहते हैं,''गडकरी जी ने यहां सड़कों, पुलों और मेट्रो का का बहुत काम कराया. लोग उनके काम से खुश हैं. व्यस्त रहने के बावजूद वो यहां के लोगों से खूब मिलते-जुलते हैं.''
लेकिन वहीं पास खड़े वैभव साकले कहते हैं कि नागपुर और पूरे विदर्भ में इस बार ओबीसी वोटर बीजेपी से नाराज हैं. नागपुर में भी गडकरी आसान से नहीं जीतेंगे.
वो कहते हैं कि जब से शिंदे सरकार ने मराठों को कुनबी का सर्टिफिकेट देकर आरक्षण देने का वादा किया है तब से ओबीसी नाराज हैं. उन्हें लग रहा है कि उनका आरक्षण घट जाएगा.

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अप्रैल के दूसरे सप्ताह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां एक के बाद एक तीन रैलियां चंद्रपुर, नागपुर से सटी रामटेक और फिर नागपुर की.
इन तीनों रैलियोंं में पीएम मोदी ने अपने भाषण का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी सरकार की ओर से ओबीसी और दलितों के लिए किए गए काम गिनाने में खर्च किया.
नागपुर से सटी चंद्रपुर, वर्धा, रामटेक, गोंदिया-भंडारा और गढ़-चिरौली जैसी लोकसभा सीटें ओबीसी और दलित बहुल हैं.
नागपुर में बेहतरीन इन्फ्रास्ट्रक्चर है लेकिन चंद्रपुर और वर्धा की ओर बढ़ते ही ये गायब होते नजर आते हैं.
वर्धा महात्मा गांधी की कर्मभूमि रही है लेकिन यहां सेवाग्राम के आस-पास भी सड़कों की स्थिति अच्छी नहीं है.
ये पूर्वी विदर्भ इलाका है और ये किसानों की आत्महत्याओं और नक्सली समस्या के लिए सुर्खियों में रहा है.
इलाके में कपास, सोयाबीन और संतरे की खेती होती है. देश में कुल संतरों का 30 फीसदी यहीं पैदा होता है.
खेती पर निर्भर इस पूरे इलाके में कुनबियों (खेती करने वाली पिछड़ी जाति) और तेली जाति के लोगों का वर्चस्व है.
कुनबी लोग बीजेपी से नाराज दिख रहे थे. उनके मुताबिक़ खेती में उन्हें कुछ नहीं मिल रहा है और ऊपर से मराठों को आरक्षण देने के वादे ने उनके नौकरियों के अवसर कम होने का ख़तरा बन गया है.
वर्धा जाने के रास्ते में हमें मिले जयेश उपासे ने कहा, ''मराठों को ओबीसी के हिस्से से आरक्षण देने की क्या जरूरत है. तेली समुदाय के लोगों की स्थिति कुनबियों से अच्छी है. उनके पास कारोबार और अच्छा पैसा भी. वो भी ओबीसी हैं. लेकिन आरक्षण घटने से उन्हें कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा. हमें पड़ेगा. हम बीजेपी को वोट नहीं देंगे."
'माधव फॉर्मूला'

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बीजेपी ने पिछले एक दशक के दौरान इस इलाके में पिछड़ों वोटरों को अपने पाले में करके यहां कांग्रेस के दबदबे को तोड़ा है. लेकिन उपासे जैसे वोटरों से बात करने से यहां पिछड़ी जातियों की बीजेपी के प्रति नाराजगी दिख जाती है.
बीजेपी ने 2019 के चुनाव में विदर्भ की दस में से पांच सीटें जीत ली थीं. यहां की 62 विधानसभा सीटों में से 29 बीजेपी के खाते में गई थीं.
ओबीसी वोटरों के नाराजगी की आशंका को देखते हुए ही बीजेपी ने तेली जाति (ओबीसी) के चंद्रशेखर बावनकुले को अपना प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है.
बावनकुले को अध्यक्ष बनाने से विदर्भ में उसकी पकड़ मजबूत होगी क्योंकि यहां तेली समेत दूसरे ओबीसी जाति के लोगों की खासी तादाद है.
महाराष्ट्र में जाति जनगणना नहीं हुई है लेकिन एक मोटे अनुमान के मुताबिक़ यहां मराठा जातियों की आबादी 32 और ओबीसी समुदाय के 39 फीसदी है.
यरवदा के डॉ. अंबेडकर आर्ट एंड कॉमर्स कॉलेज में प्रोफेसर रह चुके नीतिन बिरमल बताते हैं,'' शिवसेना ने 1980 के दशक में ओबीसी जातियों को नव हिंदूवाद के तहत ‘माधव’ यानी माली, धनगड़ और वंजारी (MADHAV) समीकरण के जरिये संगठित करना शुरू किया. इसका उसे फायदा मिला और वो बीजेपी के साथ मिलकर 1995 में महाराष्ट्र में पहली बार सरकार बनाने में कामयाब रही.
बीजेपी ने 1990 के दशक से अपने नेता वसंत राव भागवत की सलाह पर ‘माधव’ समीकरण पर पूरी मुस्तैदी से काम करना शुरू कर दिया.

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मंडल कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक़ माधव के तहत आने वाली जातियां महाराष्ट्र की सबसे बड़ी ओबीसी जातियां हैं.
बाद में बीजेपी ने अन्ना डांगे, पांडुरंग फंडकर जैसे नेताओं की मदद से अपने ओबीसी वोटर बैंक का और विस्तार किया. फिर एक दौर में बीजेपी ने यहां गोपीनाथ मुंडे, एकनाथ खडसे जैसे पिछड़ी जातियों को जोड़ कर ओबीसी वोट बैंक का विस्तार किया.
लोकमत मराठी के संपादक श्रीमंत माने कहते हैं कि महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक की राजनीति में मराठों का दबदबा रहा है .
वो बताते हैं कि पहले मुख्यमंत्री यशवंत राव चह्वाण से लेकर अब तक के ज्यादातर मुख्यमंत्री मराठे रहे हैं. इससे ओबीसी समुदाय में एक राजनीतिक असुरक्षा की भावना पैदा हुई. इसका फायदा उठा कर बीजेपी ने इन जातियों में अपनी पैठ बढ़ाई.
माने कहते हैं, ''पहले ओबीसी एकमुश्त बीजेपी का समर्थन करते थे. माधव फॉर्मूले के तहत माली, धनगड़ और वंजारी एक साथ बीजेपी को वोट देते थे. ओबीसी में भी धनगड़ और वंजारी समुदाय को अलग से आरक्षण है. इसका नतीजा ये हुआ कि ओबीसी मिलकर लड़ने के बजाय अलग-अलग लड़ने लगे. जैसे कि धनगड़ जाति अनसूचित जाति के दर्जे के लिए लड़ रही है.’’

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महाराष्ट्र में ओबीसी स्थानीय निकायों के चुनाव में रिजर्वेशन चाह रहे हैं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्टे लगा दिया है.
इससे भी बीजेपी के ओबीसी वोट बैंक पर असर पड़ा है. इस फैसले के बाद विदर्भ के कई कुनबी (खेती-बाड़ी करने वाली ओबीसी जाति) नेता बीजेपी से अलग हो गए थे. लेकिन अब बीजेपी इनको दोबारा अपने पास लाने की कोशिश में लग गई है.
माने कहते हैं, ''पिछले दस-पंद्रह साल से बीजेपी को ओबीसी का एकमुश्त वोट मिलता रहा. लेकिन अब ओबीसी में शामिल हर जाति अलग से अपनी-अपनी शर्तें रख रही है. लिहाजा बीजेपी के लिए हर ओबीसी जाति को साधना कठिन हो रहा है.''
''बीजेपी इसकी कोशिश कर रही है लेकिन ये इतना आसान नहीं रह गया है. खास कर तब जब मराठों को आरक्षण देने के लिए सरकार सहमत हो गई है.''
दलित वोटरों का सवाल

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हाल के कुछ वर्षों में महाराष्ट्र में दलित वोटर भी बीजेपी के साथ आए हैं. ये कितना सच है?
इस सवाल पर माने कहते हैं,'' महाराष्ट्र में दलितों में राजनीतिक विभाजन है. बौद्ध दलितों में अधिकतर महार हैं और वो बीजेपी के समर्थक नहीं हैं. लेकिन चांभर, मांग और मातंग जैसे हिंदू दलित बीजेपी के समर्थन में रहते हैं. गैर दलित हिंदू समुदाय भी बौद्ध दलितों को वोट नहीं देते. इसलिए विधानसभा और लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व कम है.''
माने बताते हैं,'' बीजेपी का साथ देने वाला गैर दलित हिंदू नेतृत्व भी चाहता है कि हिंदू दलित उसके साथ रहे. इस वजह से बीजेपी हिंदू दलितों में पैठ बिठाने में सफल रही है.''
नितिन बिरमल हिंदू दलितों के बीजेपी के साथ आने की एक और वजह बताते हैं.

उनका कहना है कि हिंदू दलित ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में और निम्न मध्यवर्ग से ताल्लुक रखता है. जबकि बौद्ध दलितों का एक मध्य वर्ग बन चुका है.
बिरमल कहते हैं, ''ग्रामीण इलाकों में रहने वाले हिंदू दलितों को मोदी सरकार की लाभार्थी योजनाओं का लाभ मिल रहा है. इसलिए भी वो बीजेपी का साथ दे रहे हैं.''
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