लोकसभा चुनाव 2024: लालू यादव की बेटी मीसा क्या इस बार रामकृपाल यादव को पीछे छोड़ पाएँगी?

- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- ........से, पाटलिपुत्र लोकसभा, बिहार से
लोकसभा चुनाव की सरगर्मी लगातार तेज़ हो रही है. शुक्रवार को पहले चरण के लिए देश के कई हिस्सों में मतदान भी हो रहा है.
बिहार में भी चुनावी तापमान लगातार बढ़ रहा है और इस बीच बीजेपी गठबंधन और आरजेडी गठबंधन के बीच बयानबाज़ी भी बढ़ गई है.
बिहार में कई सीटों पर रोचक मुक़ाबला है. इन्हीं में से एक सीट है पाटलिपुत्र सीट.
इस सीट पर एक बार फिर मीसा भारती का मुक़ाबला रामकृपाल यादव से है.
दोनों का आमना-सामना पिछले चुनावों में भी हो चुका है, जिसमें रामकृपाल यादव ने बाजी मारी थी.
रामकृपाल यादव किसी ज़माने में लालू प्रसाद यादव के क़रीबी माने जाते थे.
उस दौर में रामकृपाल यादव और मीसा भारती को 'चाचा-भतीजी' के तौर पर भी जाना जाता था.
साल 2014 में पहली बार चाचा-भतीजी की यह जोड़ी चुनाव मैदान में आमने सामने थी, उस वक़्त भी रामकृपाल यादव ने मीसा भारती को चुनावों में मात दी थी.
रामकृपाल यादव ने 2014 में ही राष्ट्रीय जनता दल को छोड़ दिया था.
बीजेपी के टिकट पर पाटलिपुत्र से लोकसभा पहुँचने के बाद रामकृपाल यादव को केंद्र सरकार में मंत्री भी बनाया गया था.
रामकृपाल यादव के लिए मुश्किलें

बिहार के सियासी गलियारों में कयास लगाए जा रहे थे कि इस बार बीजेपी रामकृपाल यादव का टिकट काट सकती है. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.
राजधानी पटना के शहरी इलाक़े के एक हिस्से के अलावा यह सीट छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाक़ों तक फैली हुई है.
हमने इस लोकसभा क्षेत्र के कई इलाक़ों में लोगों से बात की और जाना कि इन चुनावों में बड़े सियासी मुद्दे क्या हो सकते हैं.
इलाक़े में इस बात को लेकर ज़्यादातर लोग सहमत दिखे कि रामकृपाल यादव अपने लोकसभा क्षेत्र में आना-जाना लगा रहता है.
हालाँकि साल 2019 के मुक़ाबले साल 2014 के लोकसभा चुनावों में रामकृपाल यादव की जीत ज़्यादा बड़ी थी.
नौबतपुर बाज़ार के मिथिलेश कुमार कहते हैं, “यहाँ पूरा बीजेपी का माहौल है. चुनाव प्रचार भी सही चल रहा है. यहाँ कोई मुद्दा नहीं है. जातिवाद और आरक्षण की जो बात छेड़ी गई थी, हम उसके ख़िलाफ़ हैं.”
मोदी सरकार के 10 साल पूरे होने और एनडीए के सहयोगी नीतीश कुमार के क़रीब 20 साल से राज्य की सत्ता में होने से क्या रामकृपाल यादव को 'एंटी इनकंबेंसी' यानी सत्ता विरोधी रुझान का सामने करना पड़ सकता है?
रामकृपाल दावा करते हैं, “कोई एंटी इनकंबेंसी नहीं है. मोदी पर लोगों का भरोसा बरक़रार है. मोदी ने ईमानदारी से काम किया है. बिहार मुख्य धारा में नहीं था. राज्यों को आगे बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ज़्यादा पैसे भी दे रही है. पहले पैसों की लूट होती थी, अब काम होता है.”

ख़तरे की घंटी
रामकृपाल यादव साल 2019 में चुनाव जीतने के बाद मंत्री नहीं बनाए गए थे और इससे माना गया कि पार्टी में उनकी स्थिति कमज़ोर हुई है.
लेकिन इस साल पाटलिपुत्र लोकसभा सीट पर उनकी उम्मीदवारी को लेकर जो कयास लगाए जा रहे थे, उसकी एक बड़ी वजह बिहार में साल 2020 में हुए विधानसभा चुनाव में भी नज़र आती है.
इन्हीं नतीजों में रामकृपाल के लिए ख़तरे की एक आहट भी सुनाई पड़ती है.
पाटलिपुत्र लोकसभा में 6 विधानसभा सीट हैं, लेकिन बिहार के पिछले विधानसभा चुनावों में यहाँ की कोई भी सीट बीजेपी या जेडीयू नहीं जीत पाई थी और सारी सीटें विपक्ष में खाते में गई थीं.
साल 2020 के राज्य विधानसभा चुनावों में दानापुर, मनेर और मसौढ़ी सीट पर आरजेडी ने कब्ज़ा किया था. यहाँ की फुलवारी और पालीगंज सीट पर सीपीआईएमएल ने जीत दर्ज की थी; जबकि बिक्रम सीट कांग्रेस के हिस्से में आई थी.
पालीगंज इलाक़े के श्याम बाबू पासवान कहते हैं, “400 रुपए वृद्धावस्था पेंशन मिलता है, इससे क्या होता है. 5 किलो चावल मिलता है जो 10 दिन में ख़त्म हो जाता है. ग़रीब आदमी क्या करेगा. हम आगे कैसे बढ़ें ये दिमाग़ दीजिए. हमें भी पढ़ा दीजिए और बताइए कि आगे कैसे बढ़ेंगे.”

रामकृपाल यादव पाँच बार लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुँच चुके हैं.
उनका दावा है कि पहले के कार्यकाल में उनके पास गिनाने को कोई बड़ा काम नहीं है जबकि पिछले 10 सालों में उन्होंने इलाक़े में बहुत से काम कराए हैं.
इनमें सड़क, बिजली की सप्लाई, आयुष्मान कार्ड और वृद्धावस्था पेंशन भी शामिल है. उनको यह भरोसा है कि काम की वजह वो से इस बार के चुनावों में भी जीत हासिल कर लेंगे.
मीसा भारती के सामने चुनौती
दूसरी ओर आरजेडी उम्मीदवार मीसा भारती सवाल करती हैं, “यह पूछिए कि लोगों को पाँच किलो अनाज चाहिए या अपने बच्चों का भविष्य चाहिए. महंगाई इतनी है. चावल को किस चीज़ से खाएँगे. दाल 250 रुपए किलो है. पानी से अनाज खाएँगे? 5 किलो अनाज भी तो चार दिन में ख़त्म हो जाता है.”
मीसा भारती फ़्री के अनाज से ज़्यादा लोगों के लिए रोज़गार और युवाओं के लिए नौकरी की ज़रूरत पर ज़ोर देती हैं.
पाटलिपुत्र सीट के इतिहास की बात करें, तो यहाँ से मीसा के पिता लालू प्रसाद यादव भी ख़ुद चुनाव हार चुके हैं.
साल 2008 के परिसीमन के बाद पाटलिपुत्र सीट पर साल 2009 में पहली बार लोकसभा चुनाव हुआ था.
उस साल राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव इस सीट से जेडीयू के रंजन प्रसाद यादव से हार गए थे.
यानी पाटलिपुत्र लोकसभा इलाक़े में यादवों की बड़ी तादाद के बाद भी लालू प्रसाद यादव और उनका परिवार लगातार तीन चुनावों से इस सीट पर हार का सामना कर रहा है.
हालाँकि मीसा भारती का दावा है कि उनके सामने चुनौती कुछ भी नहीं है, बल्कि जनता के मुद्दे हैं और वो उन्हीं मुद्दों पर चुनाव लड़ रही हैं.
उनका आरोप है, “बिहार में सबसे बड़ी समस्या बेरोज़गारी की है. बीते 17 साल से राज्य में ‘डबल इंजन’ की सरकार है. प्रधानमंत्री जी आते हैं और दो करोड़ नौकरी का वादा करते हैं, राज्य को स्पेशल पैकेज, प्रत्येक व्यक्ति के खाते में 15 लाख और महंगाई कम करने की बात करते हैं.”

इमेज स्रोत, BBC
क्या कहते हैं लोग
पाटलिपुत्र सीट के अमरपुरा इलाक़े से चुनाव प्रचार के लिए गुज़र रहीं मीसा भारती को देखने के लिए बड़ी संख्या में आरजेडी और सीपीआईएम के समर्थक हमें नज़र आए, उनका दावा है कि इस बार मीसा भारती चुनाव जीतेंगी.
यहाँ मौजूद कैलाश देवी कहती हैं, “हम यहाँ मीसा भारती को देखने आए हैं, डॉक्टर (मीसा भारती) साहब को देखने. वो नेता हैं, चुनाव में खड़ी हैं. हमें घर द्वार चाहिए. घर टूटा हुआ है.”
पाटलिपुत्र लोकसभा सीट के नौबतपुर के ग्रामीण इलाक़े में रहने वाले बालेश्वर राम कहते हैं, “इस इलाक़े में मोदी का ही नाम है. ग़रीब को पाँच किलो राशन फ़्री में मिल रहा है. लेकिन महंगाई बहुत है.”
साल 2019 के चुनावी आँकड़ों के मुताबिक़ इस सीट पर क़रीब 20 लाख़ वोटर हैं.
यादवों के बाद इस सीट पर भूमिहार, ब्राह्मण, कुर्मी, मुस्लिम और दलित मतदाताओं का प्रभाव है.
नौबतपुर इलाक़े की अस्मीना बेगम कहती हैं, “सरकार से राशन मिल रहा है, लेकिन रोड की हालत आप देख रहे हैं. इस बार हम चाहते हैं कि मीसा भारती जीते क्योंकि वो गाँव की बेटी हैं. जीत जाएँगी तब हम अपनी मांग रखेंगे.”
रामकृपाल यादव पाटलिपुत्र सीट पर यादव वोटों में सेंध लगाने में सफल दिखते हैं. इसके अलावा अगड़ी जातियों और नीतीश कुमार के समर्थक माने जाने वाले कुर्मी वोटों का भी बड़ा हिस्सा उनके साथ माना जाता है.

लेकिन बिहार के कई पिछड़े और ग़रीब इलाक़ों की तरह ही इस लोकसभा सीट के कई ग्रामीण इलाक़ों में भी बिजली का मुद्दा अहम दिखता है.
अमरपुरा गाँव की श्यामकली देवी कहती हैं, “हमलोगों को बिजली फ़्री चाहिए. खाने-पीने का कुछ नहीं है. नेता लोग आते हैं और कहते हैं आज चलो पटना, आज चलो बिक्रम. हम लड़ाई लड़ रहे हैं, लड़ते हुए बाल पक (सफेद) गए हैं लेकिन कुछ नहीं होता है.”
इस सीट पर पिछले तीन लोकसभा चुनावों में हार जीत का अंतर बहुत बड़ा नहीं रहा है.
एक ख़ास बात यह भी है कि शहरी इलाक़े के क़रीब होने और आने-जाने सुविधा के बाद भी इस सीट पर पिछले लोकसभा चुनावों में भी महज़ 56 फ़ीसदी वोटिंग हुई थी.
पाटलिपुत्र सीट पर लोकसभा चुनावों के अंतिम चरण में एक जून को वोट डाले जाएँगे. तब तक देश भर में कई सीटों पर वोटिंग ख़त्म हो चुकी होगी और कई बड़े नेता यहाँ चुनाव प्रचार के लिए पहुँच सकते हैं.
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