योगी पर हमलावर रहने वाले उत्तर प्रदेश में मंत्री क्यों बनाए गए

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- Author, अनंत झणाणें
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
उत्तर प्रदेश में मंगलवार को योगी मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद मंत्रियों की संख्या बढ़ कर अब 56 हो गई है.
योगी सरकार के पहले कार्यकाल में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) छोड़ समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ गए और अब सपा का साथ छोड़ बीजेपी के साथ फिर से जुड़ने के बाद सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओम प्रकाश राजभर को पार्टी ने कैबिनेट मंत्री बनाया.
साथ ही 2022 चुनावों में बीजेपी छोड़ सपा से विधायक बने और अब फिर भाजपा में लौट कर घोसी से विधानसभा का उपचुनाव हारने के बाद दारा सिंह चौहान को भी पार्टी ने कैबिनेट मंत्री बनाया.
हाल ही में बीजेपी के साथ गठबंधन के बाद राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के अनिल कुमार को भी कैबिनेट मंत्री बनाया गया और भाजपा के साहिबाबाद से विधायक सुनील शर्मा को राज्य मंत्री बनाया गया.
यह सब लोकसभा के चुनाव की घोषणा से ठीक पहले उत्तर प्रदेश में हो रहा है, जहाँ पर बीजेपी 80 लोकसभा सीटों में से ज़्यादा से ज़्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य तय कर चुकी है.
हमने यह जानने और समझने की कोशिश की कि इस छोटे से मंत्रिमंडल विस्तार से भाजपा की जाति से जुड़ी राजनीतिक रणनीति की क्या झलक मिलती है और यह आने वाले लोकसभा चुनावों के नज़रिये से कितना महत्वपूर्ण है.

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मंत्रिमंडल विस्तार पर अमित शाह की छाप
जब ओम प्रकाश राजभर समाजवादी पार्टी के लिए 2022 में प्रचार करते थे तो उन्होंने एक बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बारे में बहुत तीखी बातें कही थीं. दारा सिंह चौहान भी बीजेपी छोड़ने के बाद योगी आदित्यनाथ पर हमलावर रहते थे. ओम प्रकाश राजभर ने तो यहाँ तक कहा था कि वो योगी को वापस मठ में चले जाना चाहिए.
लेकिन मंगलवार को उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने खड़े होकर मंत्री पद की शपथ ली.
उत्तर प्रदेश में जाति से जुड़ी राजनीति और अन्य पहलुओं पर लंबे समय से रिपोर्टिंग करते आ रहे वरिष्ठ पत्रकार उमर रशीद कहते हैं, "बीजेपी यह दिखाना चाहती है कि कोई उससे नाराज़ नहीं है. 2014 और 2017 में अमित शाह ख़ुद उत्तर प्रदेश की राजनीति में शामिल थे और उन्होंने जातियों के समीकरण को ख़ुद साधने की कोशिश की थी. अमित शाह की इजाज़त और उनके दखल के बगैर तो यह सब हो ही नहीं सकता है."
वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता कहती हैं कि जिन्हें मंत्री बनाया गया वे नेता स्टेट लीडरशिप को बाइपास कर सीधे केंद्रीय नेतृत्व से मिले और दिल्ली से अपना रास्ता बनाकर यूपी में आए. यह योगी जी के माध्यम से नहीं आए हैं."
वो कहती हैं, "ऐसा इसलिए किया है ताकि प्रदेश का नेतृत्व उनका कोई विरोध ना कर सके. अगर वो योगी के पास भी जाते तो वो भी उन्हें आलाकमान के पास लेकर जाते."
जातीय समीकरण पर उमर रशीद कहते हैं, "जो इन जातियों के नेता हैं, वो भले ही अपने बल बूते पर सीटें जिता नहीं सकते पर कुछ सीटों पर हरवा ज़रूर सकते हैं. ख़ास तौर से इस चुनावी माहौल में बीजेपी के ग़ैर-यादव ओबीसी जातियों और उनके नेताओं को महत्व देने के दावों को कमज़ोर कर सकते हैं."
"अमित शाह बीजेपी में सभी जातियों को शामिल करके सामंजस्य दिखाना चाहते हैं. योगी आदित्यनाथ जो गोरखपुर से आते हैं, ख़ुद इस बात को अच्छे से समझते हैं कि निषाद जैसी पिछड़ी जातियों का काफ़ी महत्व है. तो इन नेताओं के पुराने हमलों और उनके बीजेपी सरकारों को छोड़ कर सपा के साथ जाने के फ़ैसलों को कोई व्यक्तिगत रूप से नहीं लेता है."
ओम प्रकाश राजभर और दारा सिंह चौहान इन नेताओं ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पहले मंत्रिमंडल को छोड़ विरोधी पक्ष के साथ मिल कर 2022 चुनाव में उन्हें हराने की कोशिश की थी.
मंडल और कमंडल का समीकरण

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पत्रकार उमर रशीद बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी का अलग-अलग जातियों को जोड़ कर 'हिन्दू एकीकरण' से अपने राजनीतिक आधार को और मज़बूत बनाना पार्टी का पुराना तरीक़ा रहा है.
90 के दशक की भाजपा की राजनीति के पार्टी के दो प्रमुख चेहरों के बारे में बताते हुए वो कहते हैं, "पहले बीजेपी कल्याण सिंह और उमा भारती जैसे लोध समाज के कद्दावर नेताओं को बढ़ावा देकर अपने इस संकल्प को दर्शाने की कोशिश करती थी."
"अब बीजेपी को इस बात का अहसास है कि अगर वो इन जातियों को उनकी शर्तों पर जगह नहीं देंगे और ओबीसी राजनीति में ग़ैर-यादव राजनीति करने वाले नेताओं को जगह नहीं देंगे तो वो अपने चुनावी लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाएंगे."
"बीजेपी ओबीसी वोटर्स को दिखाना चाहती हैं कि वो उनके भरोसे के लायक हैं. तो भाजपा की राजनीतिक सफलता दोनों मंडल कमंडल साथ करने में है."
सुमन गुप्ता कहती हैं, "1990 से लेकर अब तब अगर बीजेपी यहाँ तक पहुँची है, तो उसमें बहुत बड़ा योगदान अयोध्या मुद्दे का है, वहीं एक दूसरा बड़ा योगदान पूर्ण बहुमत तक पहुंचाने में ओबीसी और दलितों का है."
2013 के मुज़फ्फरनगर दंगों के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीतिक हालत में बदलाव के बारे में वो कहती हैं, "मसलन मुज़फ्फरनगर दंगों के बाद जैसे पश्चिम उत्तर प्रदेश के जो मायावती को समर्पित जाटव वोटर थे वो एक हद तक हिन्दू के रूप में परिवर्तित होने लगे और उसका लाभ बीजेपी को मिला."
"तो एक मंडल आंबेडकरवादी शक्तियों के कमज़ोर होने की वजह से बीजेपी के क़रीब आया है और दूसरा मंडल बीजेपी के पास सबसे ज़्यादा उसकी योजनाओं के लाभार्थियों के रूप में आया है."
आरएलडी ने फिर बदला पश्चिम यूपी का समीकरण

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आरएलडी का सपा का साथ छोड़ बीजेपी के साथ चुनाव लड़ने के फ़ैसले के बाद मुज़फ्फरनगर के पुरकाज़ी से पार्टी का दलित चेहरा और विधायक अनिल कुमार को भी योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया.
आरएलडी की पश्चिम उत्तर प्रदेश में बदलती राजनीति पर पत्रकार उमर रशीद कहते हैं, "अखिलेश यादव के साथ 2022 में गठबंधन के बाद भी उनकी आठ सीटें ही आई थीं. अब सपा और आरएलडी में महज़ राजनीतिक लेन-देन का संबंध रह गया था. आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी को मालूम है कि वो अकेले में कुछ नहीं कर सकते हैं."
तो 2024 में भाजपा को आरएलडी की ज़रूरत ज़्यादा थी या आरएलडी को भाजपा की?
उमर कहते हैं, "बीजेपी बिना आरएलडी की मदद से पश्चिम उत्तर प्रदेश के जाटों का वोट ले रही थी. तो पश्चिम उत्तर प्रदेश में भी बीजेपी को आरएलडी के साथ गठबंधन करके गेम चेंजिंग फ़ायदा नहीं पहुँच रहा है. बस कैराना, मुज़फ्फरनगर और मेरठ और मथुरा जैसे इलाक़ों में मार्जिन बढ़ने की उम्मीद होगी."
"इस गठबंधन का शायद एक ही मक़सद है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में विपक्ष को राजनीतिक और चुनावी रूप बेअसर किया जाए. इसीलिए आरएलडी को एक मंत्री पद देकर भाजपा ने मुज़फ्फरनगर और बिजनौर में राजनीतिक सामंजस्य बिठाने की कोशिश की है."
यूपी मंत्रिमंडल का जातीय समीकरण

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पत्रकार सुमन गुप्ता कहती हैं कि बीजेपी पर विपक्ष हमेशा से सवर्णों की पार्टी होने के आरोप लगाता आया है.
वो कहती हैं, "बीजेपी को भी ओम प्रकाश राजभर जैसे लोगों की ज़रूरत होती है. यही ओम प्रकाश राजभर बीजेपी के साथ चुनाव लड़ते हैं और वही सपा के साथ भी चुनाव लड़ सकते हैं. राजभर बिरादरी उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल की राजनीति का एक हिस्सा है लेकिन किसी चुनाव में यह छोटी-छोटी जातियां अगर किसी दूसरे के साथ नहीं जातीं हैं तो यह अपने आप कोई निर्णायक भूमिका नहीं निभा सकती हैं.
"भाजपा को एक-एक वोट को जोड़ना है, बटोरना है और वो भी उनकी एक राजनीतिक मजबूरी है. दारा सिंह चौहान जैसे नेताओं का अपनी जाति का नेता बने रहने में ही सब कुछ है. इसमें कोई सिद्धांत नहीं है."
योगी सरकार की कैबिनेट के 52 मंत्रियों में से 21 सवर्ण बिरादरी के और 21 ओबीसी वर्ग से हैं और 9 मंत्री दलित समाज से हैं.
2017 से 2022 के शासनकाल में योगी सरकार में 27 सवर्ण मंत्री थे.
उमर कहते हैं, "2022 के विधानसभा चुनावों में अखिलेश यादव ने ग़ैर-यादव के बड़े ओबीसी नेताओं को सपा से जोड़ कर एक संयुक्त ओबीसी मोर्चे के साथ चुनाव लड़ा. इसके बाद बीजेपी को यह एहसास हुआ की उसे अपनी सरकार में ज़्यादा ओबीसी नेताओं को मंत्री बना कर प्रतिनिधित्व देना चाहिए. नतीजन योगी सरकार के मंत्रिमंडल में पहले से ज़्यादा ओबीसी चेहरे हैं."
भाजपा का पूर्वांचल प्लान

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2022 के विधानसभा चुनाव में पूर्वांचल क्षेत्र में बीजेपी का मऊ, ग़ाज़ीपुर, बलिया, आंबेडकर नगर और आजमगढ़ में कमज़ोर प्रदर्शन रहा था. जो भाजपा ने उत्तर प्रदेश के अधिकतर जगह क्लीन स्वीप कर रही थी वही भाजपा आजमगढ़ और आंबेडकरनगर में सभी विधानसभा सीटें हार गई.
पत्रकार उमर रशीद कहते हैं, "बीजेपी को यह एहसास है कि यहाँ का समीकरण उसके पक्ष में काम नहीं कर रहा है. वह उस समीकरण को सुधारना चाहती है. सपा छोड़ कर बीजेपी में शामिल हुए दारा सिंह चौहान को मंत्री बना कर बीजेपी यह दर्शाना चाहती है कि वो सपा को कमज़ोर करने वाले एक नेता को सम्मान दे रही है और उत्तर प्रदेश के छोटे से छोटे जातिगत आधारित राजनीति करने वाले नेता और पार्टी का वो सम्मान करती है."
तो आख़िरकार बीजेपी का 2024 का उत्तर प्रदेश मॉडल कैसा नज़र आ रहा है?
ओमर रशीद इसे भाजपा के त्रिशूल के रूप में देखते हैं जिसमें, "राम हैं, राशन है और रीप्रेजेंटेशन (प्रतिनिधित्व) है.
राम का मतलब हिंदुत्व, राशन मतलब कल्याणकारी योजनाएं और तीसरा सभी जातियों को राजनीतिक हिस्सेदारी देना.
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