सोनिया गांधी ने चुनाव लड़ने के बजाय राज्यसभा जाना क्यों पसंद किया- प्रेस रिव्यू

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कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष और भारत के सबसे पुराने राजनीतिक परिवार की प्रमुख सोनिया गांधी ने आगामी लोकसभा चुनावों से पहले अमेठी और अब रायबरेली सीटों से न लड़कर, राजस्थान से राज्यसभा में जाने का फ़ैसला किया है.
कोलकाता से प्रकाशित होने वाला अंग्रेज़ी द टेलिग्राफ़ में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, ये इतिहास का पहला बड़ा मौक़ा हो सकता है जब नेहरू-गांधी परिवार का कोई व्यक्ति परिवार का गढ़ मानी जाने वाली अमेठी और रायबरेली की सीटों का प्रतिनिधित्व लोकसभा में नहीं करेगा.
कयास लगाए जा रहे हैं कि इन दो लोकसभा सीटों में एक पर प्रियंका गांधी वाड्रा चुनाव लड़ सकती हैं. हालांकि अब तक इसकी पुष्टि नहीं की गई है.
उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने अख़बार से कहा, "हमें पहले ही पता था कि प्रियंका जी इस साल चुनाव लड़ेंगी, लेकिन वो किस सीट से मैदान में उतरेंगी इसे लेकर कन्फ्यूज़न था. ये तय है कि परिवार अमेठी और रायबरेली को ऐसे नहीं छोड़ सकता."
77 साल की सोनिया गांधी ने बुधवार को राजस्थान से राज्यसभा की सीट के लिए अपना नामांकन दाखिल किया है. माना जा रहा है कि यहाँ से राज्यसभा पहुँचना उनके लिए आसान हो सकता है.
चुनाव आयोग के अनुसार, उत्तर प्रदेश समेत 15 राज्यों में राज्यसभा की सीटों के लिए मतदान 27 फ़रवरी को होना है.
इसके लिए वोटिंग सवेरे 9 बजे से शाम के चार बजे तक होगी. नामांकन दाखिल करने की आख़िरी तारीख़ 15 फ़रवरी है.

27 साल लंबा राजनीति करियर
1999 से लेकर अब तक वो लगातार छह बार रायबरेली और अमेठी लोकसभा सीट से चुनाव जीतती रही हैं.
1999 में वो अमेठी से जीती थीं, जिसके बाद 2004 से वो लगातार रायबरेली सीट से जीतती आ रही हैं.
2004 से राहुल गांधी इस सीट से जीतते रहे हैं. हालांकि 2019 में अमेठी से बीजेपी की स्मृति इरानी ने उन्हें हरा दिया था.
2018 में सोनिया गांधी ने पार्टी अध्यक्ष के तौर पर इस्तीफ़ा दे दिया और पार्टी की कमान राहुल गांधी को दे दी. 2019 में पार्टी की हार के बाद राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया.
न तो सोनिया गांधी एक बार फिर पार्टी अध्यक्ष की कमान संभालना चाहती थीं और न ही उनका स्वास्थ्य इसकी इजाज़त दे रहा था, लेकिन फिर भी उन्होंने कुछ वक़्त पर पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष बने रहने तय किया. 2022 में मल्लिकार्जुन खड़गे को पार्टी अध्यक्ष चुना गया.
बीते कई सालों से कहा जा रहा है कि ख़राब स्वास्थ्य के कारण सोनिया गांधी सक्रिय राजनीति से "संन्यास" ले सकती हैं लेकिन राज्यसभा के लिए नामांकन भरने के उनके फ़ैसले ने ये स्पष्ट संकेत दे दिया है, ऐसे वक़्त में जब कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है वो राजनीति से बाहर नहीं जा रही हैं.
1999 में राजनीति में क़दम रखने के बाद सोनिया गांधी के कर्नाटक की बेल्लारी और उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट से चुनाव लड़ा. दोनों सीटों पर उन्हें जीत मिली. इसके बाद उन्होंने 2004 में ये सीट राहुल गांधी के लिए छोड़ दी और रायबरेली से चुनाव लड़ा.

मुश्किलें ख़त्म नहीं हुईं
द टेलिग्राफ़ लिखता है कि कुछ पार्टी नेता मानते हैं कि सोनिया गांधी को राजनीति में बने रहना चाहिए लेकिन उन्हें राज्यसभा के लिए नामांकन नहीं देना चाहिए.
उनका मानना है कि वो पार्टी के लिए मूल्यवान संपत्ति की तरह हैं, जिन्हें लोकसभा में होना चाहिए, भले ही विपक्ष में. उनका ये भी मानना है कि सोनिया गांधी के लिए आज भी चार-पांच राज्यों से चुनाव लड़कर जीतना मुश्किल नहीं होगा.
लेकिन अख़बार लिखता है कि उम्र के इस पड़ाव में सोनिया गांधी मौजूदा सियासी उथल-पुथल को देखते हुए सावधानी बरतना चाहती हैं. 2019 में राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार गए थे और फ़िलहाल केरल के वायनाड ने सांसद हैं.
इस बात की भी संभावना है कि वो एक बार फिर उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ें क्योंकि इस प्रदेश से चुनावों से उनकी दूरी वोटरों के बीच ग़लत संदेश दे सकती है. कुछ हलकों में इस तरह की चर्चा है कि उत्तर प्रदेश में मज़बूत पकड़ बनाने के लिए वरुण गांधी भी कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं.
सोनिया गांधी तेलंगाना और कर्नाटक से भी राज्यसभा में जा सकती थीं, इसके लिए दोनों राज्यों की कांग्रेस तैयार भी थी. लेकिन चुनावों से ठीक पहले पार्टी यह संदेश नहीं देना चाहती थी कि वो हिंदी भाषी क्षेत्रों से अपनी ज़मीन पूरी तरह छोड़ रही है.

कहां से कौन-कौन राज्यसभा के लिए नामांकित
कर्नाटक से राज्यसभा के लिए कांग्रेस की तरफ से सैयद नासिर हुसैन और जीसी चंद्रशेखर जैसे स्थानीय नेताओं के साथ-साथ कोषाध्यक्ष अजय माकन को नामांकित किया गया है.
अजय माकन को दिल्ली में कांग्रेस का मज़बूत नेता माना जाता है लेकिन कर्नाटक से राज्यसभा के लिए उनकी उम्मीदवारी इस बात की संकेत है कि दिल्ली में शायद पार्टी उनके लिए जीत की संभावना कम ही देख रही है.
माकन को दूसरे राज्य से राज्यसभा में भेजने के फ़ैसले ने ये साफ़ कर दिया है कि दिल्ली में कांग्रेस का खुद पर भरोसा कम हुआ है. दिल्ली की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वो न तो पंजाब में और न ही दिल्ली में कांग्रेस के साथ चुनाव से पहले गठबंधन में इच्छुक है.
माना जा रहा था कि पंजाब में दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ेगी लेकिन दिल्ली में सीट शेयरिंग को लेकर चर्चा जारी थी. लेकिन मंगलवार को आम आदमी पार्टी ने कहा दिल्ली में कांग्रेस के पास ताकत नहीं है उसके लिए एक सीट काफी होगी. ये साफ़ है कि कांग्रेस एक सीट के लिए सहमत नहीं होगी.
मध्य प्रदेश से वरिष्ठ नेता अशोक सिंह और बिहार से अखिलेश प्रसाद सिंह को फिर से उम्मीदवार बनाया गया है.
बंगाल से राज्यसभा में गए जाने माने वकील अभिषेक मनु सिंघवी को हिमाचल प्रदेश से नामांकित किया गया है जहां कांग्रेस फिलहाल सत्ता में है. ये राज्यसभा में सिंघवी का चौथा कार्यकाल होगा.
तेलंगाना से जहां रेणुका चौधरी और प्रदेश युवा कांग्रेस के अध्यक्ष अनिल कुमार यादव को उम्मीदवार बनाया गया है, वहीं महाराष्ट्र से चंद्रकांत हंडोरे राज्यसभा के लिए नामांकित हैं.
राज्यसभा के लिए बीजेपी की लिस्ट दो केंद्रीय मंत्री
बीजेपी ने बुधवार को दो केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव और एल मुरुगन को ओडिशा और मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए नामांकित किया.
हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक ख़बर के अनुसार ओडिशा की सत्ताधारी बीजेडी ने अश्विनी वैष्णव की उम्मीदवारी का समर्थन किया है. 2019 में उनके पहले राज्यसभा कार्यकाल के लिए भी बीजेडी ने उनका समर्थन किया था.
इस तरह के कयास लगाए जा रहा थे वैष्णव को ओडिशा के बालासोर से लोकसभा चुनावों में उतारा जा सकता है. 55 साल के वैष्णव बालासोर और कटक के कलेक्टर के रूप में काम कर चुके हैं.
अख़बार लिखता है कि अश्विनी वैष्णव बुधवार को भुवनेश्वर पहुंच गए हैं और गुरुवार को नामांकन दाखिल कर सकते हैं.
वहीं मुरुगन के बारे में कहा जा रहा था कि उन्हें तमिलनाडु से नीलगिरी से लोकसभा चुनावों में उतारा जा सकता है.
एक और रिपोर्ट में हिंदुस्तान टाइम्स लिखता है कि महाराष्ट्र से कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में गए अशोक चव्हाण और शिवसेना एकनाथ शिंदे गुट में शामिल हुए मिलिंद देवरा को नामांकित किया गया है.

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हाई कार्ट की ज़मीन पर पार्टी दफ्तर पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
दिल्ली के राउज़ एवेन्यू स्थित आम आदमी पार्टी के दफ्तर की ज़मीन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को नाराज़गी जताई है.
चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया डीवाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान इस बात पर हैरानी जताई की हाई कोर्ट की ज़मीन पर एक राजनीतिक पार्टी का दफ्तर चल रहा है.
अख़बार जनसत्ता में छपी एक ख़बर के अनुसार उन्होंने कहा कि ये ज़मीन हाई कोर्ट को लौटाई जाए ताकि वो आम नागरिकों के लिए इसका इस्तेमाल कर सके.
उन्होंने दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव, पीडब्ल्यूजी सचिव और वित्त सचिव से कहा है कि वो हाई कोर्ट के रजिस्ट्राल जनरल से मुलाक़ात करें और मामले का हल निकालें.
देश भर में न्यायिक बुनियादी ढांचे से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान ये मुद्दा सामने आया था.
जस्टिस के परमेश्वर ने बेंच से कहा था कि सरकार को एक पार्टी से कब्ज़ा लेना था और उन्हें देना था, लेकिन जब अधिकारी कब्ज़ा लेने गए तो उन्हें बताया गया कि ज़मीन पर अम आदमी पार्टी का कब्ज़ा है.
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