प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल न होने से कांग्रेस पर क्या असर?

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- Author, मानसी दाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कांग्रेस ने 22 जनवरी को अयोध्या में होने वाले राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने के न्योते को 'ससम्मान' अस्वाकीर कर दिया है.
कांग्रेस पार्टी के आला नेताओं को दो सप्ताह पहले कार्यक्रम में शामिल होने का न्योता मिला था. कांग्रेस ने इस पर काफी सोच विचार के बाद इसे लेकर कहा कि "एक अर्धनिर्मित मंदिर का उद्घाटन केवल चुनावी लाभ उठाने के लिए किया जा रहा है."
हालांकि बीजेपी ने इसे लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा है. बीजेपी कुछ नेताओं ने कहा है कि प्राण प्रतिष्ठा के न्योते को ठुकराना कांग्रेस की सनातन विरोधी मानसिकता को दिखाता है.
अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण बीजेपी के चुनावी मेनिफेस्टो का हिस्सा रहा है. ऐसे में आगामी लोकसभा चुनावों से पहले इसके उद्घाटन को लेकर विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी इसका चुनावी लाभ ले सकती है.
ऐसे में ये सवाल उठ रहे हैं कि क्या अगले चुनावों में बीजेपी को इसका फायदा मिल सकता है और क्या कांग्रेस ने इस कार्यक्रम में शामिल न होने का खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है?
कांग्रेस ने क्या कहा?

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10 जनवरी को कांग्रेस ने एक बयान जारी कर कहा है कि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में कांग्रेस चेयरपर्सन सोनिया गांधी, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और नेता अधीर रंजन चौधरी शिरकत नहीं करेंगे.
अपने बयान में पार्टी ने कहा कि बीते महीने उन्हें कार्यक्रम में शामिल होने का न्योता दिया गया था. कार्यक्रम में शामिल होने, न होने को लेकर पार्टी की बैठक भी हुई थी जिसके बाद ये फ़ैसला लिया गया है.
उनके इस फ़ैसले में पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस भी महाराष्ट्र की एनसीपी भी साथ खड़े दिखते हैं.
जहां एनसीपी ने कहा है कि किसी पार्टी का कार्यक्रम में शामिल होना उसका निजी फ़ैसला है वहीं टीएमसी ने कहा कि इस मुद्दे पर "बीजेपी राजनीति कर रही है."
कांग्रेस ने अपने बयान में कहा, "धर्म व्यक्ति का निजी मसला है. लेकिन बीजेपी और आरएसएस लंबे वक्त से इस मुद्दे को राजनीतिक प्रोजेक्ट बनाते रहे हैं. स्पष्ट है कि एक अर्धनिर्मित मंदिर का उद्घाटन केवल चुनावी लाभ उठाने के लिए किया जा रहा है."
"2019 के माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को स्वीकार करते हुए लोगों की आस्था के सम्मान में मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी और अधीर रंजन चौधरी, भाजपा और आरएसएस के इस आयोजन के निमंत्रण को ससम्मान अस्वीकार करते हैं."
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कांग्रेस नेता और कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैय्या ने इससे जुड़े एक सवाल पर मीडिया से कहा, "हम राम मंदिर के विरोध में नहीं है. हम हमारे गांवों में बने राम मंदिरों में जाते हैं. उन्होंने राम मंदिर बनाया इसमें कोई मुद्दा नहीं है, लेकिन वो इस मुद्दे का राजनीतिकरण कर रहे हैं. हम इस राजनीतिकरण का विरोध करते हैं."
वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने कहा, "लोगों को बांटने को सिवा इनके पास कोई काम नहीं है. पहले धर्म के नाम पर हिंदू मुसलमानों को बांटा, अब भगवान राम को बांटने की कोशिश कर रहे हैं. शंकराचार्य जी और रामानुज संप्रदाय के लोगों में आपस में खाई पैदा कर रहे हैं."
उन्होंने कहा, "कितने लोगों ने निमंत्रण स्वीकार किया है? किसी जानेमाने धार्मिक नेता ने निमंत्रण पत्र स्वीकार नहीं किया है. उन्होंने सवाल खड़े किए हैं."
"धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि जो मंदिर पूरा न बना हो, वहां मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा का काम नहीं किया जा सकता, इसे अशुभ माना जाता है. बाबरी मस्जिद ढांचे को गिराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली शिव सेना ने भी इसमें जाने से इनकार किया है. राम सभी के हैं. मंदिर का काम पूरा होने के बाद हम ज़रूर वहां जाएंगे."
कांग्रेस के कुछ हलकों में दिखी नाराज़गी
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लेकिन कांग्रेस पार्टी के इस फ़ैसले से कांग्रेस के कुछ लोग नाराज़ भी हैं.
कांग्रेस नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, "राम मंदिर और भगवान राम सबके हैं, राम मंदिर को बीजेपी, आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद या बजरंग दल का मान लेना दुर्भाग्य की बात है."
"मुझे पूरा भरोसा है कि कांग्रेस हिंदू विरोधी या राम विरोधी पार्टी नहीं है. यह कुछ लोग हैं जिन्होंने इस तरह का फै़सला कराने में भूमिका अदा की है. इस फै़सले से मेरा दिल टूट गया है, इस फ़ैसले से करोड़ों कार्यकर्ताओं का भी दिल टूटा है. उन कार्यकर्ताओं का जिनकी आस्था भगवान राम में है."
"कांग्रेस वो पार्टी है जिसके नेता राजीव गांधी ने ही राम मंदिर का शिलान्यास कराया और मंदिर के ताले तुड़वाने का काम किया था. लेकिन प्राण प्रतिष्ठा के निमंत्रण को स्वीकार न करना बहुत दुखद है."
गुजरात से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अर्जुन मोडवाडिया ने सोशल मीडिया पर इस फ़ैसल को लेकर अपनी नाराज़गी जताई.
उन्होंने लिखा, "यह देशवासियों की आस्था और विश्वास का विषय है. कांग्रेस नेतृत्व में ऐसा राजनीतिक निर्णय लेने से दूर रहना चाहिए था."
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शंकराचार्यों ने भी शामिल होने से किया इनकार
ज्योतिर्मठ शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा है कि देश के चारों शंकराचार्य 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा आयोजन में शामिल नहीं होंगे.
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के मुताबिक़, ये आयोजन शास्त्रों के अनुसार नहीं हो रहा है.
इस वीडियो में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद कहते दिखते हैं, "रामानंद संप्रदाय का अगर ये मंदिर है तो चंपत राय वहां क्या कर रहे हैं. ये लोग वहां से हटें. हटकर रामानंद संप्रदाय को प्रतिष्ठा से पहले सौंपें. हम एंटी मोदी नहीं हैं लेकिन हम एंटी धर्मशास्त्र भी नहीं होना चाहते."
उन्होंने कहा, "जिस शास्त्र से हमने राम को जाना, उसी शास्त्र से हम प्राण प्रतिष्ठा भी जानते हैं. इसीलिए कोई शंकराचार्य वहां नहीं जा रहा है."
श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने हाल ही में कहा था कि राम मंदिर रामानंद संप्रदाय का है.
वहीं गोवर्धन मठ के शंकराचार्य निश्चलानंद स्वामी ने एक चैनल से कहा, "अभी प्रतिष्ठा शास्त्रों के हिसाब से नहीं हो रही है, इसलिए मेरा उसमें जाना उचित नहीं है. "
वहीं पुरी की शारदापीठ के शंकराचार्य की ओर से भी इस बारे में सोशल मीडिया पर बयान साझा किया गया है जिसमें कहा गया है कि प्राण प्रतिष्ठा समारोह वेद, शास्त्र, धर्म की मर्यादा का पालन करते हुए हो.
हालांकि इस बयान में भी नहीं बताया गया है कि द्वारका मठ के शंकराचार्य ख़ुद प्राण प्रतिष्ठा में शामिल होंगे या नहीं.
कांग्रेस ने अपने कार्यक्रम में न जाने की जो वजह बताई है उसमें "अर्धनिर्मित मंदिर" का ज़िक्र किया गया है.
बीजेपी की क्या रही प्रतिक्रिया?

कांग्रेस के इस फ़ैसले को लेकर बीजेपी नेताओं ने उस पर निशाना साधा है. जहां कुछ नेताओं ने इसके लिए पार्टी को राम विरोधी बताया है कुछ ने इसे आगामी लोकसभा से जोड़ते हुए तंज कसा है.
वरिष्ठ बीजेपी नेता और क़ानून मंत्री रहे रविशंकर प्रसाद ने कहा कि अगले कांग्रेस में को बुरी हार मिलेगी.
उन्होंने कहा, "कांग्रेस पार्टी ने देश में राज किया था लेकिन आज सिमट कर कहां रह गई है. आगे चुनाव होगा तो इनका सूपड़ा साफ होगा. कांग्रेस क्या समझती है, क्या ये कोई कोई संघ का कार्यक्रम है? यह तो राष्ट्र का कार्यक्रम है, पूरी दुनिया इसकी प्रतीक्षा कर रही थी."
केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा कि इस फ़ैसले के बाद लोग आगामी चुनावों में उनका बहिष्कार करेंगे.
उन्होंने कहा, "कांग्रेस अगर राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का बहिष्कार करने का फै़सला किया है, तो भारत के लोग भी आगामी (लोकसभा) चुनावों में उनका बहिष्कार करेंगे."
वहीं बीजेपी नेता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि ये नेहरू की कांग्रेस नहीं है, ये गांधी की कांग्रेस नहीं है.
बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कांग्रेस को मौक़ापरस्त कहा और कहा कि वोटिंग का मामला आता है तो ये सॉफ्ट हिंदू बनने की कोशिश करते हैं.
उन्होंने कहा, "ये लोग सीज़नल हिंदू हैं, जब उन्हें लगता है कि उन्हें वोट लेना है तो वे सॉफ्ट हिंदू बनने की कोशिश करते हैं. कांग्रेस में जवाहरलाल नेहरू से लेकर अब तक कोई अयोध्या नहीं गया है."
अहम क्यों है फ़ैसला?

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राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं कि ये फ़ैसला चुनौतीपूर्ण था क्योंकि कांग्रेस में कोई इसे लेकर एकमत नहीं था, और सोनिया गांधी ने भी फ़ैसला पार्टी पर छोड़ दिया था.
वो कहते हैं, "दक्षिण के नेताओं की ये राय थी कि कांग्रेस की अधिकांश सीटें दक्षिणी राज्यों से आनेवाली हैं, कांग्रेस को वहां अपना जनाधार ख़त्म नहीं करना चाहिए. दूसरी तरफ उत्तर भारत में कांग्रेस को 2014 और 2019 में अधिक सीटें नहीं मिली हैं. इसलिए पार्टी ने गुणाभाग कर के फ़ैसला लिया है."
"दूसरी तरफ राहुल गांधी के खेमे से भी ये बात आई थी कि पार्टी के लिए अपनी वैचारिक ज़मीन के बारे में बात रखने का ये अच्छा वक्त है. हालांकि कांग्रेस के उत्तर भारत के नेता इस कार्यक्रम में शिरकत करना चाहते थे."
वो कहते हैं, "समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और वाम दल पहले ही इस कार्यक्रम में शामिल होने इनकार कर चुके हैं. कांग्रेस भी इंडिया गठबंधन में शामिल दूसरी पार्टियों का साथ देना चाहती है. ये वहां पर एकजुटता दिखाने की कोशिश भी है."
राजनीतिक विश्लेषक विनोद शर्मा कहते हैं कि "कांग्रेस ने काफी समय लगाकर गठबंधन के अपने सहयोगियों से चर्चा करने के बाद ये फ़ैसला लिया है."
वो कहते हैं कि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के साथ कई सवाल जुड़े हुए हैं जैसे सभी मुख्यमंत्रियों को (कुछ को छोड़कर) इसमें नहीं बुलाया गया है, इसका अब तक जवाब नहीं मिला है.
उन्होंने शंकराचार्यों के इस मामले में टिप्पणी का ज़िक्र किया और कहा कि ये मानना ग़लत है कि प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में न जाने का अर्थ भगवान राम में आस्था न होना है.
वो कहते हैं, "चारों शंकराचार्य, जो हिंदू धर्म से जुड़े प्रमुख चेहरे हैं, वो खुद मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा में जा नहीं रहे हैं. तो क्या आप ये कहेंगे कि उनकी आस्था कम है?"
क्या चुनावों पर पड़ सकता है असर?

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कुछ बीजेपी नेताओं ने जब कांग्रेस ने कार्यक्रम में शामिल न होने को लेकर टिप्पणी की तो उन्होंने भी एक तरह से ये भी कह दिया कि बीजेपी इस मुद्दे को चुनाव में ज़रूर लाएगी. बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने साफ किया कि इसका असर आगामी चुनावों में दिख सकता है.
रशीद किदवई कहते हैं, "1980 में भाजपा के उदय के वक्त से और 2014 के बाद से जब मोदी ने पार्टी की कमान संभाली, उन्होंने धर्म, आस्था और राजनीति को खुलेआम मिलाने की कोशिश को लेकर जो संकोट होता था उसके मिटा दिया है. अटल बिहारी वाजपेयी के वक्त और मौजूदा वक्त में ये बड़ा फर्क है."
"पार्टी बहुसंख्यावाद की बात करती हैं, हिंदु हित और चुनावों की बात करते हैं तो कांग्रेस के लिए दुविधा की स्थिति पैदा हो जाती है क्योंकि वो बहुसंख्यावाद के हक में नहीं है. लेकिन कांग्रेस इसकी काट ढूंढ नहीं पा रही है."
"इस तरह का भावनात्मक मुद्दा आता है तो कांग्रेस अपनी बात रख नहीं पाती क्योंकि उसके भीतर मत बंटा हुआ होता है. लेकिन भाजपा में इसे लेकर पहले दिन से स्पष्टता है.
साल 2014 में बीजेपी ने अपने चुनावी मेनिफेस्टो में कहा था कि 'वो संविधान के तहत अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की सभी संभावनाएं तलाशेगी.' साल 2019 में बीजेपी ने अपना यही वादा एक बार फिर दोहराया.
अब 2024 मई में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले बीजेपी ये कहते हुए लोगों के पास जाएगी कि उसने अपना चुनावी वादा पूरा कर दिया है और कांग्रेस के लिए मुश्किलें आना स्वाभाविक ही हैं.

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विनोद शर्मा कहते हैं, "बीजेपी मुद्दे का राजनीतिकरण कर रही है इसमें शक नहीं है लेकिन ये एक संवेदनशील मुद्दा है और कांग्रेस को बस एक बयान जारी कर चुप नहीं रहना चाहिए."
वे कहते हैं कि कांग्रेस को अब जनता के पास जाना चाहिए और इस मुद्दे को समझाना चाहिए.
विनोद वर्मा कहते हैं, "सत्तारूढ़ दल ने इस मामले को काफी उलझा दिया है और कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की अब ये ज़िम्मेदारी है कि इस मामले की तहें खोले और लोगों के सामने इसे पेश करे. इसमें ये मुद्दा नहीं है कि चुनाव कौन जीतेगा और कौन नहीं. "
कांग्रेस, राम मंदिर और धर्म

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रशीद किदवई कहते हैं, कि धर्म के मामले में कांग्रेस में वैचारिक रूप से दो मत थे और ये शुरूआती दौर से ही था.
महात्मा गांधी ने कहा था कि दुनिया के अस्तित्व में धर्म का बड़ा योगदान और धर्म को राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता. उनका कहना था कि धर्म को मानने वाला कभी कुछ बुरा नहीं करेगा.
वहीं जवाहरलाल नेहरू का नज़रिया अलग था. वो कहते थे कि धर्म को राजनीति से अलग रखना चाहिए.
वो कहते थे कि अगर आप राजनीति में धर्म को खींच कर लाएंगे तो उससे बहुसंख्यवाद फैलेगा और लोकतंत्र के लिए ये ख़तरनाक होगा क्योंकि आस्था के हिसाब से सरकारें चुनी जानें लगीं तो लोकतंत्र नहीं चल पाएगा.
6 दिसंबर 1992 में जब बाबरी मस्जिद गिराई गई, उस वक्त पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे.
बाद में उन्होंने अपनी किताब में इसके लिए बीजेपी और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह पर आरोप लगाया लेकिन कांग्रेस पर भी आरोप लगाया. उन्होंने लिखा कि "उन्होंने पहले ही सोचा था कि इसके लिए किसी एक व्यक्ति को ज़िम्मेदार ठहराया जाए, उन्होंने मुझे आगे कर दिया. मैं समझता हूं."
1985 में जब राम मंदिर का ताला जब खुला था उस वक्त राजीव गांधी की सरकार थी.
पार्टी नेता कमल नाथ पहले भी कहते रहे हैं कि सबसे पहले रामजन्म भूमि का ताला राजीव गांधी ने ही खोला था, इसके लिए किसी और को क्रेडिट नहीं दिया जाना चाहिए.

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1989 में राजीव गांधी ने सरयू किनारे एक सभा में अपना चुनावी घोषणापत्र जारी किया था जिसमें उन्होंने 'राम राज्य' की बात की थी.
उस वक्त उनके भाषण से कांग्रेस में खलबली मच गई थी. एक रिपोर्ट में जानेमाने पत्रकार और नेता र विजय दर्दा ने लिखा, "वो चाहते थे कि लोग भगवान राम को सही मायनों में समझ सकें. उन्होंने इसका राजनीतिक फायदा उठाना नहीं चाहते थे. उन्होंने ही 1989 में विश्व हिंदू परिषद को प्रस्तावित मंदिर में शिला रखने की अनुमति दी थी."
1999 में कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने हिंदुत्व को देश में धर्मनिरपेक्षता का सबसे प्रभावी गारंटर कहा था. सोनिया गांधी का कहना था कि हिंदुत्व भारत को धर्मनिरपेक्ष बनाता है, लेकिन संघ परिवार इसके संदेश को तोड़मरोड़ कर पेश किया जा रहा है.
हाल के दिनों में मध्यप्रदेश चुनावों में कलमनाथ खुद को हनुमान भक्त कहते सुने गए थे, वहीं प्रियंका गांधी वाड्रा मंदिरों में जा कर पूजा करती दिखी थीं.
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