भारत की तमाम कोशिशों के बावजूद क्यों अधर में अटका है यह लक्ष्य

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    • Author, आदर्श राठौर
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

अब तक अमेरिकी डॉलर में कच्चा तेल ख़रीदते रहे भारत ने पहली बार संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) को तेल के बदले में रुपये में भुगतान किया था.

लंबे समय से रुपये को वैश्विक मुद्रा बनाने की कोशिश में जुटे भारत के लिए इसे मील का पत्थर माना जा रहा था.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी साल जुलाई में जब संयुक्त अरब अमीरात गए थे, तब दोनों देशों के बीच अपनी-अपनी मुद्रा में कारोबार करने का समझौता हुआ था.

इसके बाद भारतीय तेल कंपनी इंडियन ऑयल ने अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी एडनॉक से 10 लाख बैरल कच्चा तेल लेने के लिए भारतीय रुपये में पेमेंट की थी.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, भारतीय अधिकारियों का कहना है कि तेल के दूसरे आपूर्तिकर्ता से भी रुपये में ही तेल ख़रीदने को लेकर सौदा करने की कोशिश हो रही है.

लेकिन ये कोशिशें बहुत सफल होती नहीं दिख रही हैं.

ऊर्जा की सबसे ज़्यादा खपत करने के मामले में भारत दुनिया में तीसरे नंबर पर है, मगर वह अपनी ज़रूरत का सिर्फ़ 15 फ़ीसदी ही ख़ुद पैदा कर पाता है.

ऐसे में उसे कच्चे तेल पर निर्भर रहना पड़ता है, जिसे भारत में बनी रिफ़ाइनरियों में पेट्रोल और डीज़ल जैसे ईंधनों में बदला जाता है.

कच्चा तेल

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इमेज कैप्शन, भारत अपनी ज़रूरत का 85 फ़ीसदी कच्चा तेल आयात करता है और इसके लिए उसे डॉलर और अन्य विदेशी मुद्राओं में भुगतान करना पड़ता है.
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अभी भारत जिन भी देशों से कच्चा तेल ख़रीदता है, उन्हें वह अमेरिकी डॉलर में पेमेंट करता है.

लेकिन आरबीआई ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारतीय मुद्रा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए 11 जुलाई 2022 को आयातक और निर्यातक के बीच रुपये में भुगतान करने की मंज़ूरी दी थी.

हालांकि, इस तरह की कोशिशों का कोई ख़ास असर देखने को नहीं मिला है.

हाल ही में भारत के तेल मंत्रालय ने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस विभाग से संबंधित संसदीय कमिटी को बताया कि वित्त वर्ष 2022-23 के दौरान कच्चे तेल के आयात के लिए भारतीय कंपनियों ने रुपये में भुगतान नहीं किया.

तेल मंत्रालय का कहना है कि कच्चे तेल के सप्लायर, जिनमें संयुक्त अरब अमीरात की कंपनी अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (एडनॉक) भी शामिल है, अब भी तेल के बदले मिलने वाले रुपये को अपनी पसंद की मुद्रा में बदलवाने और इस प्रक्रिया में आने वाली लागत को लेकर चिंतित हैं.

पिछले हफ़्ते संसदीय कमिटी की इस रिपोर्ट को संसद में पेश किया गया, जिसमें तेल मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी का ज़िक्र किया गया है.

इसमें कहा गया है कि अभी रिलायंस इडस्ट्रीज़ लिमिटेड और सरकारी तेल कंपनियों ने कच्चा तेल सप्लाई करने वाली कंपनियों के साथ भारतीय रुपये में तेल ख़रीदने का कोई समझौता नहीं किया है.

क्यों वैश्विक मुद्रा नहीं बन पा रहा रुपया

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भारत लंबे समय से रुपये को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने की कोशिश कर रहा है.

इस साल जून में दक्षिण अफ़्रीका के केपटाउन में हुई ब्रिक्स समूह देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद एक साझा बयान जारी किया गया था.

इसमें कहा गया था कि “मंत्रियों ने ब्रिक्स देशों और कारोबारी सहयोगियों के साथ अंतरराष्ट्रीय कारोबार और वित्तीय लेन-देन में स्थायीन मुद्राओं को बढ़ावा देने के महत्व पर भी ज़ोर दिया.”

इसके बाद 5 जुलाई, 2023 को रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के एक अंतर-विभागीय समूह ने भारतीय मुद्रा के अंतराष्ट्रीयकरण के लिए एक रोडमैप बनाया.

लेकिन इस तरह की योजनाओं को बड़ी कामयाबी मिलती नहीं दिख रही है.

जाने-माने ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा इसके लिए रुपये के ‘फ़ुली कन्वर्टिबल’ न होने को ज़िम्मेदार मानते हैं.

कन्वर्टिबल करंसी को परिवर्तनीय मुद्रा भी कहा जाता है.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) के अनुसार, कोई भी मुद्रा तभी फ़ुली कन्वर्टिबल कहलाएगी, जब इसे रखने वाला कोई भी शख़्स या संस्थान इसे एक निश्चित या फिर लचीली दरों पर किसी अंतरराष्ट्रीय रिज़र्व मुद्रा में बदलवा सके.

रिज़र्व करंसी उस मुद्रा को कहा जाता है, जिसे बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय कारोबार में इस्तेमाल किया जाता है और जिसे देशों के संघीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में रख सकें.

नरेंद्र तनेजा कहते हैं, “फुली कन्वर्टिबल न होने के कारण होता यह है कि आप अगर रुपया लेकर विदेश जाएं और वहां की मुद्रा में उसे बदलना चाहें तो ऐसा नहीं होगा. वहीं, अगर आपके पास डॉलर, पाउंड, यूरो या येन है तो विदेशी मुद्रा में विनिमय करने वाला कोई भी बैंक इसे बदल देगा.”

अमेरिकी डॉलर

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इमेज कैप्शन, ज़्यादातर तेल कंपनियां अमेरिकी डॉलर में भुगतान चाहती हैं

ऊर्जा विशेषज्ञ तनेजा कहते हैं कि तेल की ख़रीद के मामले में भी ऐसा ही हो रहा है.

वह कहते हैं, “ज़्यादातर तेल सप्लायर डॉलर में पेंमेंट चाहते हैं. अगर वे रुपये में पेमेंट लेंगे तो उन्हें यह रक़म भारत में ही इस्तेमाल करनी पड़ेगी."

"वे भारत से चीज़ें ख़रीदकर आयात कर सकते हैं, यहां निवेश कर सकते हैं या ट्रेडिंग कर सकते हैं. लेकिन तेल निर्यात करने वाली कंपनियां कहती हैं कि हम सिर्फ़ तेल बेचते हैं, हमें ये सब नहीं करना. इसलिए हमें अंतरराष्ट्रीय तौर पर स्वीकार की जाने वाली मुद्रा में ही भुगतान चाहिए.”

वहीं, अगर अगर ये कंपनियों 'रुपये' को किसी अन्य मुद्रा में बदलवाना चाहेंगी, तो भी उन्हें इसके लिए एक शुल्क देना होगा.

संसद में पेश रिपोर्ट में तेल मंत्रालय के हवाले से कहा गया है कि 'इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने बताया है कि उसे तेल ख़रीदने में ज़्यादा रक़म देनी पड़ रही है क्योंकि कच्चा तेल सप्लाई करने वाली कंपनियां लेन-लेन की प्रक्रिया की लागत का खर्च भी उससे वसूलती हैं.'

इसमें कहा गया है कि पिछले साल आरबीआई ने भारत के कारोबारी सहयोगी देशों में रुपी वोस्ट्रो अकाउंट खोलने की इजाज़त दी थी.

उस खाते को वोस्ट्रो खाता कहा जाता है, जिसमें भारतीय बैंक विदेशी बैंकों के लिए रुपया रखते हैं.

इस व्यवस्था के तहत, भारतीय आयातक रुपये में पेमेंट कर सकते हैं, जिन्हें संबंधित देश के बैंक के ख़ास वोस्ट्रो अकाउंट में जमा किया जाएगा.

मंत्रालय ने कहा है, “कच्चे तेल की ख़रीद का भुगतान भारतीय रुपये में किया जा सकता है, लेकिन यह बात सप्लायर पर निर्भर करती है कि वह इस संबंध में बनाए गए नियमों का पालन करता है या नहीं.”

तनेजा कहते हैं कि रुपया अच्छी और स्थिर मुद्रा है, लेकिन जब तक इसे फ़ुली कन्वर्टिबल नहीं किया जाता, तब तक यह समस्या बनी रहेगी.

फिर चीनी मुद्रा युआन में कारोबार क्यों बढ़ा?

युआन

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चीन की मुद्रा युआन फ़ुली कन्वर्टिबल करंसी नहीं है, फिर भी यह बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होती है. चीन न सिर्फ़ इसी मुद्रा में तेल ख़रीदता है, बल्कि कई देशों के साथ इसी में कारोबार भी करता है.

ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा का कहना है कि कुछ मौक़ों पर तो भारतीय आयातकों ने भी रूस से तेल ख़रीदने क लिए दुबई के बैंकों के माध्यम से युआन में भुगतान किया है.

इसकी वजह बताते हुए तनेजा कहते हैं कि कई देशों को चीन के साथ किसी भी चीज़ का कारोबार युआन में करने मे कोई दिक्कत नहीं होती, क्योंकि उनका द्विपक्षीय कारोबार बहुत ज़्यादा है.

जाने-माने अर्थशास्त्री और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर रहे अरुण कुमार कहते हैं, “चीन बड़े पैमाने पर सस्ते सामान का उत्पादन करता है और कई देशों को निर्यात करता है. भारत की भी बहुत सारी ज़रूरत की चीज़ें चीन से आयात की जाती हैं. जैसे कि मोबाइल के पुर्ज़े, दवाओं का कच्चा माल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण वगैरह."

ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा कहते हैं, "ऐसा कोई देश नहीं है, जिसके साथ आज चीन का व्यापार नहीं चल रहा. अगर वे तेल या किसी चीज़ के बदले चीन से युआन में पेमेंट लेते हैं तो बदले में उसी से चीन से कुछ ख़रीदकर आयात भी कर सकते हैं.”

ऐसे में युआन ऐसी मुद्रा बन गई है, जो फ़ुली कन्वर्टिबल न होने के बावजूद कई देशों में स्वीकार्य है.

रूस पर क्यों 'बोझ' बना रुपया

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वाणिज्य राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल ने इस साल अगस्त में बताया था कि भारत ने अपने पड़ोसी देशों- नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, भूटान, ईरान और सहयोगी देश रूस के साथ रुपये में कारोबार शुरू कर दिया है.

हालांकि, इससे पहले रूस ने भारत के साथ रुपये में कारोबार करने की बातचीत रोक दी थी.

रूस के विदेश मंत्री सरगेई लावरोफ़ जब इस साल मई में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए गोवा आए थे, तब उन्होंने कहा था कि 'भारतीय बैंकों में रूस के अरबों रुपये पड़े हैं, लेकिन वो इसका इस्तेमाल नहीं कर सकता.'

तनेजा कहते हैं, “रूस के ये रुपये भारतीय बैंकों में हैं. अब उसके पास विकल्प है कि वो या तो भारत में ही किसी कंपनी या बैंक में निवेश कर ले. लेकिन रूस का कहना है कि यह रुपया इतना ज़्यादा है कि आख़िर इसका क्या करे.”

नरेंद्र तनेजा

भारत के राजदूत पवन कपूर ने रूस-इंडिया बिज़नेस डायलॉग फोरम में कहा था कि भारत-रूस के बीच 2022 में कारोबार 27 अरब डॉलर पहुंच गया था, लेकिन उसमें भारत का निर्यात महज़ दो अरब डॉलर का था.

पवन कपूर ने कहा था कि आयात और निर्यात में संतुलन होना चाहिए.

अभी स्थिति यह कि रूस भारत से आयात की तुलना में उसे 14 गुना ज़्यादा निर्यात करता है.

अगर भारत और रूस का आपसी कारोबार अच्छा और क़रीब-क़रीब बराबरी का भी होता, तो दिक्कत नहीं होती. यूएई से रुपये में तेल ख़रीदना इसी का एक उदाहरण है.

नरेंद्र तनेजा कहते हैं, “संयुक्त अरब अमीरात में काम करने वाले भारतीय वहां से डॉलर में रक़म भेजते हैं. यूएई के साथ भारत के काफ़ी गहरे कारोबारी रिश्ते हैं. कई देशों के साथ हमारा व्यापार और बिलिंग यूएई के ज़रिये होती है."

"उदाहरण के लिए भारत का पाकिस्तान के सीधा कारोबार ज़्यादा नहीं है, लेकिन फिर भी पांच अरब डॉलर का भारतीय सामान यूएई होते हुए पाकिस्तान पहुंचता है. ऐसे में अगर हम यूएई को रुपया देते हैं तो उन्हें इसे कन्वर्ट करने में कोई दिक्क़त नहीं होगी.”

'निर्यात को मज़बूत करना ज़रूरी'

जहाज़

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रुपये की स्वीकार्यता दुनिया भर में बढ़े, इसके लिए क्या किया जाना चाहिए?

इस सवाल पर अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार कहते हैं कि जब तक भारत का निर्यात मज़बूत नहीं होगा, तब तक हम कन्वर्टिबिलिटी की ओर नहीं बढ़ा सकते.

वह कहते हैं, “अभी तक हमारा व्यापार घाटा बहुत ज़्यादा है. फिर हमारे पास क़रीब 600 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, लेकिन यह वास्तव में उधार का है. ये एफ़डीआई, पोर्टफ़ोलियो इन्वेस्टमेंट या भारतीय कंपनियों की ओर से लिए गए उधार के रूप में आया है. ये कमाया नहीं है."

अरुण कुमार

चीन का उदाहरण देते हुए प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं कि भारत के विपरीत, चीन ने 30 खरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार कमाया हुआ है और उसे ये रक़म किसी को लौटानी नहीं है.

वह कहते हैं, "जबकि हमारा जितना ऋण है, अगर हम उसे विदेशी मुद्रा से चुकाएंगे तो गिरावट आने लगेगी. रुपये की स्वीकार्यता हम तभी बढ़ा पाएंगे, जब हम वस्तुओं और सेवाओं के आयात-निर्यात पर महारत हासिल कर पाएंगे."

वह कहते हैं, "हम सिर्फ़ कच्चा माल निर्यात करते हैं. जब हमारे पास सरप्लस निर्यात होगा, तभी हम रुपये को कन्वर्टिबल बना पाएंगे. मगर इसके लिए टेक्नॉलजी के शोध और विकास पर काम करना बहुत ज़रूरी है."

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