पहली दलित लेखिका मुक्ता साल्वे, 167 साल पहले जिन्होंने 14 साल की उम्र में लिखा था निबंध

फुले स्मारक

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    • Author, विद्या कुलकर्णी
    • पदनाम, बीबीसी मराठी

मुक्ता साल्वे को महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि देश की पहली दलित महिला लेखिका माना जाता है. उनकी यह पहचान एक निबंध के आधार पर बनी, जिन्हें मुक्ता साल्वे ने महज 14 साल की उम्र में लिखा था.

ये घटना करीब 167 साल पहले 1855 में घटी थी. दरअसल पुणे में जब ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले ने स्कूल शुरू किया तो मुक्ता उनके स्कूल की छात्रा थीं.

घर परिवार और समाज में मुक्ता को जिन पीड़ाओं का सामना करना पड़ा था, उसको लेकर पढ़ाई के दौरान उनकी एक समझ बनी और उन्होंने दलितों की मुश्किलों को लेकर एक निबंध लिखा.

यह लघु निबंध 'मांग महाराचेया दुखविसाई' या फिर 'ऑन द सफ़रिंग ऑफ़ मांग एंड महार' के नाम से चर्चित है. इसमें मुक्ता न केवल मांग और महारों की पीड़ाओं को प्रस्तुत करती हैं बल्कि इसके सामाजिक कारणों की चर्चा करते हुए समाजिक असमानता पर तीखा प्रहार करती हैं.

उस दौर में भी मुक्ता के इस लेख को खूब प्रशंसा मिली थी और आज भी मुक्ता का निबंध 'दलित स्त्री साहित्य की दिशा में पहले क़दम के तौर पर देखा जाता है.

मुक्ता साल्वे का जन्म 1840 में पुणे में ही हुआ था. यह वह दौर था जब समाज में जातियों के नाम असमानता चरम पर थी और उच्च जातियों का वर्चस्व था. मुक्ता का जन्म उस दौर में अछूत मानी जाने वाली जाति 'मांग' में हुआ था.

सावित्रीबाई फुले और फ़ातिमा शेख़

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उस समय प्रचलित धार्मिक शिक्षा केवल ब्राह्मण पुरुषों तक ही सीमित थी. न तो महिलाओं को पढ़ने की इजाज़त थी और न ही 'अछूतों' को.

हालांकि क्रिश्चियन मिशनरियों की ओर कुछ स्कूल हिंदू लड़कियों के लिए खुल चुके थे. लेकिन समाज के जिन लोगों को अब तक जानबूझकर शिक्षा से दूर रखा गया था, उनकी इन स्कूलों तक पहुंच नहीं थी. बहरहाल, मुक्ता 11 साल की उम्र में स्कूल पहुंची थीं.

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दरअसल पुणे में ज्योतिबा और सावित्रीबाई ने लड़कियों के लिए स्कूल शुरू किया. फुले दंपति लड़कियों के लिए अलग स्कूल खोलने वाले पहले भारतीय थे.

इस स्कूल में सभी समुदायों की लड़कियों को प्रवेश मिल रहा था. उन्होंने 1848 में पुणे के भिडे वाडा में पहला स्कूल खोला और तमाम सामाजिक विरोधों के बाद भी इसे जारी रखा. लेकिन फुले दंपति को अहसास हुआ कि एक ही स्कूल काफी नहीं था. शिक्षा से वंचित लोगों को स्कूल तक पहुंचाने के लिए अनेक स्कूलों की ज़रूरत थी.

यही वजह थी कि फुले दम्पति ने पुणे में विभिन्न स्थानों पर स्कूल खोले. 1851-52 में चिपलूनकर वाडा में एक और स्कूल शुरू हुआ. उसी वर्ष वेताल में एक तीसरा स्कूल शुरू किया गया.

ज्योतिबा-सावित्रीबाई के शिक्षा प्रसार के काम का समर्थन करने वाले लोगों ने विभिन्न स्थानों पर स्कूल स्थापित करने में उनकी मदद की. उनमें से एक थे लाहुजी साल्वे. क्रांतिगुरु उस्ताद के नाम से मशहूर लाहुजी साल्वे वेताल में एक मार्शल आर्ट प्रशिक्षण केंद्र चलाते थे.

लाहुजी साल्वे की पोती थीं मुक्ता साल्वे जो फुले दंपति के तीसरे स्कूल की छात्रा बनीं. महार और मांग समुदायों से स्कूल जाने वाली पहली लड़की थीं मुक्ता. 11 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पढ़ाई शुरू की थी.

'महार और मांग समुदाय की पीड़ाएँ' के मुद्दे पर उनका वो चर्चित निबंध 1855 में छपा था. वह केवल तीन साल तक स्कूल में रही थीं. चौदह वर्ष की उम्र में लिखे इस निबंध से उनका नाम इतिहास में अमर हो गया. यह न केवल एक दलित महिला द्वारा लिखी गई पहली पुस्तक के रूप में महत्वपूर्ण है, बल्कि इसकी सामग्री आज भी विचारोत्तेज़क है.

मुक्ता के समय में अछूत मानी जाने वाली जातियों की सामाजिक स्थिति के बारे में उनके निबंध के हर एक शब्द से पता चलता है.

इस निबंध में वह भगवान को संबोधित करते हुए 'महारों और मांगों और पीड़ाओं' के बारे में बात करती हैं. दरअसल वह ईश्वर से शिकायत करती हैं कि इन समुदायों को धार्मिक व्यवस्था से बाहर क्यों माना जाता है.

धार्मिक व्यवस्था की बागडोर संभालने वाले ब्राह्मण समुदाय को वह पाखंडी मानते हुए कहती हैं, “ब्राह्मण कहते हैं कि वेद हमारे हैं और हमें उनका पालन करना चाहिए. तो इससे स्पष्ट है कि हमारे पास कोई धार्मिक पुस्तक नहीं है."

"यदि वेद ब्राह्मणों के लिए हैं तो वेदों के अनुसार आचरण करना ब्राह्मणों का धर्म है. यदि हम धार्मिक पुस्तकों को देखने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं, तो यह स्पष्ट है कि हम धर्महीन हैं, है ना?”

इसके अलावा वह ईश्वर से अपने धर्म के बारे में भी सवाल पूछती हैं.

वह लेख में लिखती हैं, “हे भगवान, हमें बताएं कि आप किस धर्म के हैं, आपने कौन सा धर्म चुना है, ताकि हम सभी इसे समान रूप से अनुभव करें. लेकिन जिस धर्म का अनुभव केवल एक समुदाय ही करे तो इसे और इस जैसे अन्य धर्म को पृथ्वी से नष्ट हो जाना चाहिए. हमारे मन में ऐसे धर्म पर गर्व करने का विचार भी न आने पाए.”

निबंध की तीखी भाषा

ज्ञानोदय

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जन्म के आधार पर विशेष सामाजिक दर्जा पाने वालों की आलोचना करते हुए मुक्ता ने अपने निबंध में लिखा है कि धर्म का काम मानवता और समानता को कायम रखने के लिए होना चाहिए.

पेशवा युग के समय की सामाजिक स्थिति को बताते समय मुक्ता की कलम और मुखर हो जाती है.

पेशवा काल के अन्याय और ब्राह्मणों द्वारा अछूतों के प्रति किए जाने वाले अमानवीय व्यवहार और जानवरों से हीन व्यवहार पर रोशनी डालते हुए मुक्ता ने लिखा है, 'ब्राह्मणों ने हम इंसानों को गाय-भैंस से भी नीचे माना है. सुनो, बाजीराव के राज में हमारे साथ गधों जैसा सलूक होता था. वे लोग ये तो कहते थे कि लंगड़े गधे को मत मारो, लेकिन मांगों या फिर महारों को मत मारो, ऐसा कहने वाला कोई नहीं था.'

पेशवाकाल की आलोचना

ज्ञानोदय में मुक्ता साल्वे का निबंध

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उस दौर में शिक्षा को ब्राह्मणों का विशेषाधिकार माना जाता था. ऐसे में निचले पायदान पर समझी जाने वाली जातियां किस प्रकार ज्ञान सीखने से वंचित रह गये, यह भाव मुक्ता की रचनाओं में व्यक्त होता है.

वह लिखती हैं, "यदि अछूतों का राजा के द्वार से गुजरना वर्जित है तो विद्या सीखने की स्वतंत्रता कहाँ से मिलेगी? अगर कोई अछूत पढ़ पाता और बाजीराव को इसके बारे में पता चलता, तो वह कहता कि यह एक महार और मांग है और यह पढ़ रहा है? इसे काम कौन देगा और यह कहकर उसे वह दंड देता."

मुक्ता अपने निबंध में सवाल उठाती हैं कि पढ़ाई से प्रतिबंधित होने पर, अछूत होने का तिरस्कार झेलने पर और रोजगार से वंचित होने वाले दलितों की स्थिति कैसे सुधरेगी. अफ़सोस की बात है कि देश के कई हिस्सों समाज की यह हक़ीक़त आज भी पूरी तरह नहीं बदली है.

ब्राह्मण समाज सुधारकों की प्रशंसा

सावित्रीबाई फुले स्मारक

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मुक्ता ने अपने निबंध में लिखा है कि दलित समाज की महिलाओं को ग़रीबी के साथ जातिगत असमानता और लैंगिक असमानता की दोहरी-तिहरी मार झेलनी पड़ती है.

उन्होंने लिखा है, "जिस समय हमारी महिलाएँ बच्चे को जन्म देती हैं, उनके घरों में छत तक नहीं होती, तो गर्मी, बारिश और हवा की के कारण वे कितनी दुखी होती होंगी. महामारी के समय उन पर क्या बीतती होगी, इस पर अपने अनुभव से विचार करें. यदि किसी दिन उन्हें कोई रोग हो जाए तो वह दवा और डॉक्टर के लिए पैसे कहां से लाएगी? आपमें से कौन सा संभावित चिकित्सक है जो मुफ़्त दवा देगा."

पेशवाओं के दौर में होने वाले जातीय उत्पीड़न से लेकर वह ब्रिटिश काल में हुए बदलाव तक को रेखांकित करती हैं. मुक्ता साल्वे ने अपने निबंध में लिखा है कि अंग्रेजों के कारण समाज में जाति व्यवस्था का दंश कम हो गया था.

वह अपने निबंध में समाज सुधारक ब्राह्मणों के कामों की प्रशंसा भी करती हैं. उन्होंने लिखा है, "मुझे यह लिखते हुए बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि अब एक चमत्कारी बात हुई है कि निष्पक्ष और दयालु अंग्रेज सरकार शासन करने आ गयी है. जो ब्राह्मण हमें कष्ट दे रहे थे, अब मेरे प्यारे वही देशवासी, हमें कष्ट से बाहर निकालने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं. लेकिन सभी ब्राह्मण ऐसे नहीं हैं. जिनके विचार शैतानों की तरह हैं वे हमसे पहले की तरह ही नफ़रत करते हैं."

मुक्ता अपने लेख में दलितों से शिक्षित होने की अपील भी करती हैं, वह लिखती हैं कि 'अज्ञानता दूर करो, पुरानी मान्यताओं से चिपके मत रहो और अन्याय मत सहो.'

मुक्ता साल्वे का ये लेखन बार-बार पढ़ने लायक है.

किसी को आश्चर्य हो सकता है कि महज तीन साल की शिक्षा प्राप्त 14 साल की लड़की इतनी स्पष्टता और वाकपटुता से कैसे लिख सकती है. उनके लिखे में मार्मिकता के साथ विवरण का पुट भी शामिल है. इसका जितना श्रेय फुले दंपति की शिक्षा को दिया जाता है उतना ही मुक्ता की चतुराई और प्रतिभा को भी. फुले दंपति ने उन्हें ना केवल शिा दी बल्कि उनमें सत्य की खोज करने की प्रवृति भी विकसित की.

सावित्रीबाई फुले

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जब निबंध सार्वजनिक रूप से पढ़ा गया

फुले दंपति ने मुक्ता को आत्म-जागरूकता और स्थिति के प्रति सजगता सिखाई और धार्मिक व्यवस्था पर सवाल उठाना भी सिखाया. यह वास्तविक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मानी जा सकती है.

मुक्ता का यह निबंध 1855 में 'ज्ञानोदय' में दो भागों में प्रकाशित हुआ और कई पाठकों तक पहुँचा. पहला भाग 15 फरवरी (पहला भाग) और दूसरा भाग 1 मार्च (दूसरा भाग) को प्रकाशित हुआ. बाद में इस निबंध के जवाब में दो पत्र भी छपे.

तब ज्ञानोदय क्रिश्चियन मिशनरी की ओर से सप्ताहिक पत्र था. उसी साल यह निबंध ब्रिटिश सरकार की ओर से बॉम्बे स्टेट एजुकेशनल रिपोर्ट में प्रकाशित किया गया था.

मुक्ता को इस निबंध को भारी भीड़ के सामने पढ़ने का मौका भी मिला.

ज्योतिबा का सम्मान समारोह पूना कॉलेज के प्राचार्य, सरकारी जेलखाने के प्रमुख और फुले के शैक्षिक कार्यों के शुभचिंतक मेजर कैंडी की अध्यक्षता में विश्रामबाग वाडा में आयोजित किया गया था.

वहां मुक्ता ने करीब तीन हज़ार लोगों की मौजूदगी में अपना निबंध पढ़ा. यह सुनकर मेजर कैंडी बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने उसकी तारीफ़ की और मुक्ता को चॉकलेट भेंट की.

तब मुक्ता ने कहा, "सर, हमें चॉकलेट नहीं चाहिए, हमें एक लाइब्रेरी चाहिए."

उस समय एक दलित लड़की के लिए किताबों और लाइब्रेरी की मांग करना कितना असाधारण और क्रांतिकारी रहा होगा, इसकी आप कल्पना कर सकते हैं.

पहली महिला दलित लेखिका

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मुक्ता साल्वे ने निबंध में जिन मुद्दों को उठाया वह सामाजिक जागरुकता के लिहाज से बेहद अहम माने गए.

बहुजनों की जागरुकता के लिए काम करने वाले महात्मा फुले, बाबा पद्मजी और रेवरेंड मरे मिशेल ने मुक्ता साल्वे के निबंध का जिक्र कई जगहों पर किया. वहीं एनवी जोशी ने 1868 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'पुणे वर्णन' में मुक्ता के निबंध का एक भाग छापा था. मूल रूप से मराठी में लिखे इस निबंध का अंग्रेजी अनुवाद सूसी थारू और के. के. ललिता ने किया और अनुवाद 1991 में प्रकाशित 'वुमन राइटिंग इन इंडिया: 600 बीसी टू प्रेजेंट' में भी प्रकाशित हुआ है.

आज भी मुक्ता साल्वे का मूल निबंध अंग्रेजी और हिंदी अनुवाद के साथ इंटरनेट पर उपलब्ध है.

'मांग और महारों की पीड़ा' निबंध लिखने वाली चौदह वर्षीय मुक्ता साल्वे की पहचान भले पहली दलित महिला लेखिका की हो लेकिन उन्होंने इस निबंध के बाद आगे क्या लिखा, या फिर उनका जीवन किस तरह का रहा, इसके बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है.

ऐसा माना जाता है कि उन पर मराठी इतिहासकारों की नज़र भी नहीं गई होगी क्योंकि उस दौर के अधिकांश इतिहासकार उच्च जातियों के थे. दलित साहित्य को लेकर जानकारी एकत्रित करने का सिलसिला 1950 के दौर में शुरू होता है, यानी मुक्ता साल्वे के निबंध के छपने के क़रीब सौ साल बाद. एसजी माली और हरि नाराके जैसे विद्धानों का मानना है कि मुक्ता साल्वे के काम को इतिहास में शामिल नहीं किया गया होगा क्योंकि महिलाओं या फिर दलितों की कामों की उपेक्षा व्यवस्थित तौर पर हुई है.

यह दावा भी किया जाता है कि अंग्रेजों की वजह से मुक्ता साल्वे का पहला और एकमात्र लेखन बचा हुआ है. इस निबंध को आज भी पढ़ना चुनौतीपूर्ण और प्रेरक है. यही वजह है कि मुक्ता साल्वे के बारे में बहुत जानकारी नहीं होने के बावजूद उनके पहली दलित महिला लेखिका होने पर कोई विवाद नहीं है.

(लेखिका फोटोग्राफर, फिल्म निर्माता और महिला मुद्दों की विद्वान हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखिका के निजी विचार हैं.)

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