कर्नाटक के बेलगावी में अलग-अलग धार्मिक चिह्न पहने रिश्तेदार जोड़े पर हमला

हिंसा

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए

कर्नाटक के बेलगावी में एक झील के किनारे बैठे एक अंतरधार्मिक जोड़े के साथ हिंसा का मामला सामने आया है. दोनों पीड़ित आपस में रिश्तेदार भी हैं और मारपीट के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

दोनों की आयु 21-24 साल के आसपास है जो कोट झील के किनारे बैठे बात कर रहे थे. उसी समय उनके पास कुछ लोग आए और उनको खाली पड़े शेड में लेकर गए और उनके साथ मारपीट की.

ये जोड़ा कर्नाटक वन सुविधा केंद्र पर युवा निधि के लिए रजिस्ट्रेशन कराने गया था. ये बेरोज़गारों के लिए कर्नाटक सरकार की एक योजना है, लेकिन सर्वर डाउन होने की वजह से वो फ़ोर्ट लेकसाइड पर इंतज़ार करने लगे.

उसी समय तक़रीबन नौ युवक उनके पास आए और उन्हें शेड में लेकर गए.

पहले युवकों ने उनसे सवाल किया कि वो दोनों साथ क्यों हैं. दरअसल पीड़ित युवक ने माथे पर तिलक लगाया हुआ था और उसके साथ मौजूद युवती ने अपना सिर ढका हुआ था.

महिला

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पीड़ित के सफ़ाई देने के बाद उनके साथ मारपीट की गई.

बेलगावी पुलिस कमिश्नर सिद्दारामप्पा ने बीबीसी हिंदी से कहा, “उनके (पीड़ित) रिश्तेदार रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स में काम करते हैं और उन्होंने पुलिस पेट्रोल को सूचित किया जिसके बाद हमें इस घटना के बारे में पता चला है. उनके रिश्तेदार उन्हें अस्पताल लेकर गए थे.”

पुलिस के अनुसार, पीड़ित युवक और युवती दो बहनों के बच्चे हैं और लम्बानी समुदाय से संबंध रखते हैं. पीड़ित युवती की मां ने मुस्लिम व्यक्ति से शादी की है और कुछ सालों पहले युवती के पिता की मृत्यु हो गई थी.

इस घटना के बाद कई सामाजिक कार्यकर्ता सवाल कर रहे हैं कि आस्था का कोई चिह्न आम लोगों की बातचीत और आने जाने के बीच आड़े कैसे आ गया.

धारवाड़ के जागृति महिला उक्कूटा संगठन की शारदा गोपाल कहती हैं, “क्या ये ग़लत है कि कोई पुरुष या महिला अपनी आस्था के आधार पर कुछ पहनता है या कहीं जाता है? एक समाज के रूप में हम कहां आ गए हैं.”

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पीड़ित युवक (21 साल) की पीठ पर चोट के निशान हैं जबकि महिला (24 वर्षीय) के दांत में दर्द है क्योंकि उनके चेहरे पर थप्पड़ मारा गया था.

हमला करने वाले सभी युवकों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार) अधिनियम की धारा 10 के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया है. सभी अभियुक्त मुसलमान हैं.

पुलिस ने सभी हमलावरों की गिरफ़्तारी की पुष्टि की है.

इस जोड़े के साथ हुई घटना अक्तूबर 2021 से मिलती जुलती घटना जैसी है जब एक ऑटोरिक्शा में एक तिलकधारी पुरुष और बुर्क़े में महिला जा रही थीं. दोनों महिला-पुरुष क़र्ज़ के सिलसिले में बात कर रहे थे. महिला ग्रामीण पृष्ठभूमि से थी और पुरुष से क़र्ज़ चाह रही थी.

ऑटोरिक्शा में दोनों के बीच हुई बातचीत के बाद उन पर एक पुरुषों के समूह ने हमला किया. इस मामले में जिन लोगों को गिरफ़्तार किया गया वो सभी मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखते थे.

बीते कुछ दशकों में मंगलुरू के आस-पास के तटीय शहरों से मोरल पुलिसिंग की कई घटनाएं सामने आई हैं. इन ज़्यादातर मामलों में आरोपी हिंदू पुरूष थे.

ये लोग हिंदू लड़की या लड़के को प्राइवेट बस में सीट शेयर करने से लेकर एक समूह में आइसक्रीम या चिड़ियाघर जाने तक पर आपत्ति जताते रहे हैं.

बेलगावी अलग कैसे?

नदी

रानी चेन्नमा यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र पढ़ाने वाली प्रोफ़ेसर कामाक्षी तदापद कहती हैं, “जहां तक तटीय इलाक़ों से तुलना की बात की जाए तो बेलगावी हमेशा अलग रहा है. वहां हिंदुओं और मुसलमानों में रिश्ते अच्छे रहे हैं. कर्नाटक का तटीय इलाक़ा अधिक राजनीतिक है.”

अशोक चंद्रागी बेलगावी में एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वे कहते हैं, “1992 और 2002 की कुछ घटनाओं को छोड़ दें तो दोनों समुदाय यहां शांति से रहते रहे हैं. लेकिन दोनों ही समुदायों में एक छोटा सेक्शन है जो हालात का फ़ायदा उठाकर माहौल को बिगाड़ना चाहता है. लेकिन हाल के वर्षों में हालात बेलगाम होते जा रहे हैं. ये समाज के लिए अच्छी बात नहीं है.”

प्रोफ़ेसर कामाक्षी बताती हैं कि छोटी-मोटी घटनाओं को भी अब ग़लत रंग दिया जा रहा है क्योंकि लोग धार्मिक सीख के बजाय ऐसे तत्वों से प्रभावित होते दिख रहे हैं.

सोशल एक्टिविस्ट बृंदा अडिगे ने बीबीसी हिंदी को बताया, “किसी धर्म का चिह्न धारण करना एक व्यक्तिगत फ़ैसला है. बस उसका अपमान नहीं होना चाहिए. अगर किसी व्यक्ति और व्यक्तियों के समूह को ऐसा लगता है कि उनके पास किसी पर हाथ उठाने का अधिकार है तो कानून लागू करने वाली संस्थाओं को उनके ख़िलाफ़ सख़्त क़दम उठाने चाहिए.”

बृंदा कहती हैं कि राजनीतिक और धार्मिक नेताओं की शह के कारण धर्मांध तत्वों की उद्दंडता लगातार बढ़ती जा रही है और क़ानून कायम रखने वाले हिंसा के मामलों और संविधान की गारंटियों के उल्लंघन का संज्ञान नहीं ले रहे हैं.

शारदा गोपाल कहती हैं कि कुछ लोगों को लगता है कि उनके क़दम से धर्म की रक्षा होगी. जो लोग ऐसे हमलों में शामिल रहते हैं उन्हें बेरोज़गारी जैसे विषयों की अधिक चिंता करनी चाहिए.

उन्होंने बीबीसी को बताया, “कुछ सप्ताह पहले एक महिला को नग्न करके पीटा गया था. उसका कसूर सिर्फ़ इतना था कि वो उस शख़्स के साथ थी जिसे वो प्यार करती थी. लोगों को सज़ा देने वाले ये लोग कौन होते हैं? ऐसी करतूतों से धर्म की रक्षा नहीं होती.”

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