महात्मा गांधी और पंडित मदनमोहन मालवीय के बीच किन बातों को लेकर थे मतभेद?

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
महामना मदनमोहन मालवीय के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने आधुनिक भारतीय राष्ट्रीयता की नींव रखी थी. वैचारिक रूप से दूरी होते भी महात्मा गांधी के मन में मालवीय के लिए बहुत सम्मान था.
विश्वनाथ पांडे अपनी क़िताब ‘ पंडित मदनमोहन मालवीय एंड द फ़ॉरमेटिव इयर्स ऑफ़ इंडियन नेशनालिज़्म’ में लिखते हैं कि गांधी ने यंग इंडिया के एक अंक में उनके बारे में लिखा था.
गांधी ने लिखा था, "तिलक मुझे हिमालय की तरह लगते थे. जब मुझे लगा कि मेरे लिए इतना ऊंचा चढ़ पाना संभव नहीं होगा तो मैं गोखले के पास गया. वो मुझे एक गहरे समुद्र की तरह लगे. मुझे लगा कि मेरे लिए इतना गहरे उतर पाना संभव नहीं है. अंत में मैं मालवीय जी के पास गया. वो मुझे एक साफ़ धारा की तरह लगे और मैंने तय किया कि मैं उस पवित्र धारा में डुबकी लगा लूं."
पंडित महामना मदनमोहन मालवीय का राजनीतिक करियर 1886 में कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में शुरू हुआ था. इसके बाद उन्हें चार बार 1909, 1918, 1930 और 1932 में कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया.
मदनमोहन मालवीय के जीवन के कई आयाम थे. शिक्षा, राजनीति, पत्रकारिता. समाज सेवा और स्वतंत्रता संग्राम वो इन सभी पहलुओं से शिद्दत से जुड़े थे.

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कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भाषण
अपने कॉलेज के दिनों में मदनमोहन मालवीय न केवल अपने सहपाठियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय थे बल्कि अपने अध्यापकों के भी चहेते बन गए थे.
यही वजह थी कि 1886 में कांग्रेस के कलकत्ता के दूसरे अधिवेशन में उनके गुरू और संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान आदित्यराम उन्हें अपने साथ लेकर गए थे.
उस सम्मेलन की अध्यक्षता दादा भाई नौरोजी कर रहे थे.
धनंजय चोपड़ा मालवीय की जीवनी‘पत्रकारिता के युग निर्माता मदनमोहन मालवीय’ में लिखते हैं कि आदित्यराम ने मालवीय को अधिवेशन में बोलने के लिए प्रेरित किया.
वो लिखते हैं, "विचारों की स्पष्टता और दृढता का ही असर था कि 25 वर्षीय मालवीय अपने भाषण के कारण देश के बड़े-बड़े नेताओं के दिलो-दिमाग़ में बस गए. जब उन्होंने अपने भाषण में कहा, 'बिना प्रतिनिधित्व के कर नहीं लग सकता, यह अंग्रेज़ों की राजनीतिक बाइबल का प्रथम आदेश है', तो वहां मौजूद लोगों ने खड़े होकर तालियां बजाईं."

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माघ मेले में धार्मिक उपदेश
मालवीय के इस भाषण से ही प्रभावित होकर अवध के एक ताुकलदार राजा रामपाल सिंह ने उन्हें अपने हिंदी अख़बार ‘हिंदुस्तान’ का संपादक बना दिया.
बाद में मालवीय 20 सालों तक हिंदुस्तान टाइम्स के अध्यक्ष रहे और उन्होंने इसका हिंदी संस्करण निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
मालवीय को बचपन से ही भाषण देने का शौक़ था. उनके बारे में उनके एक स्कूल अध्यापक रायसाहब साँवल दास ने 1932 में प्रकाशित अपने एक संस्मरण में लिखा था, "मालवीय छात्र जीवन से ही अच्छे वक्ता थे. इलाहाबाद में माघ मेले में उन्हें लोगों को धर्मोपदेश देने का अच्छा अवसर मिलता था. लोगों के कानों तक उनके शब्द पहुंच सकें इसके लिए वो अपने साथ एक कनस्तर रखते थे. वो जब भी भीड़ देखते झट से कनस्तर को पीट कर लोगों को अपनी ओर आकृष्ट कर लेते और उसी कनस्तर पर खड़े हो कर अपना धार्मिक उपदेश देने लगते थे."

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अदालत में देवनागरी का चलन शुरू करवाया
मालवीय भाषा के प्रति बहुत जागरूक रहने वाले व्यक्ति के तौर पर जाने जाते थे. चाहे संस्कृत हो या हिंदी या अंग्रेज़ी, शब्दों के उच्चारण और वाक्य विन्यास में वो बहुत सजग रहते थे. वो संवाद शैली में लिखते थे और बात करने में कहीं भी व्याकरण की चूक नहीं होने देते थे.
भाषा में शुद्धता का उन्हें एक तरह से जुनून था. ऐसा वो सिर्फ़ हिंदी के मामले में ही नहीं करते थे. उनका आग्रह था कि अंग्रेज़ी में अगर कोई शब्द लातिन या ग्रीक से आया है तो उसका उसी तरह इस्तेमाल किया जाना चाहिए बोलचाल में भी और लेखन में भी.
1880 के दशक तक फ़ारसी लिपि में लिखी गई उर्दू भारतीय अदालतों की भाषा हुआ करती थी. उन्होंने पंडित श्रीकृष्ण जोशी के साथ मिलकर एक पुस्तक लिखी, ‘कोर्ट कैरेक्टर एंड प्राइमरी एजुकेशन इन नॉर्थ वेस्ट प्रोविंस.’
उन्होंने उत्तर प्रदेश के गवर्नर को इस संबंध में एक ज्ञापन भी दिया जिसका नतीजा ये निकला कि 18 अप्रैल, 1900 में एक आदेश पारित किया गया जिसके अनुसार उत्तरी राज्यों की कचहरियों में फ़ारसी के साथ-साथ देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी के इस्तेमाल की भी अनुमति मिल गई.

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संस्कृत , हिंदी और अंग्रेज़ी पर समान अधिकार
मदनमोहन मालवीय संस्कृत और हिंदी में धाराप्रवाह व्याख्यान करने में प्रवीण तो थे ही, अंग्रेज़ी पर भी उनका ऐसा अधिकार था कि कांग्रेस कार्यसमिति और उस समय के ख्यातिप्राप्त अंग्रेज़ी भाषा के जानकार भी अगर ब्रिटिश हुकूमत को कोई ज्ञापन भेजना चाहते थे तो वो उस आलेख को मालवीय के पास भेजते थे ताकि वो इसकी भाषा में कोई संशोधन करना चाहें तो कर लें.
मंजु ‘मन’ ने मालवीय की जीवनी में लिखा है, "गोलमेज़ सम्मेलन में भाग लेने जब मदनमोहन, गांधी के साथ लंदन गए तो वहां के अंग्रेज़ नेता ये मानने को तैयार नहीं थे कि मालवीय ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय से नहीं पढ़े हैं. उन्हें लगता था कि मदनमोहन जिस तरह की विशुद्ध अंग्रेज़ी बोलते थे, वैसी अंग्रेज़ी सिर्फ़ ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय में पढ़े लोग ही बोल पाते थे."
छात्र जीवन से ही मालवीय की एक अलग छवि बन गई थी. वो तब से चूड़ीदार पाजामा, अचकन, सिर पर ख़ास ढ़ंग से बांधी गई पगड़ी और गले में करीने से लगाया गया दुपट्टा पहनते थे. ये सब सफ़ेद रंग का हुआ करता था.

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बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना
पंडित मदनमोहन मालवीय ने वर्ष 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की. उन्होंने वर्ष 1912 से ही विश्वविद्यालय के लिए धन संग्रह का व्यापक अभियान चला रखा था. इसमें बहुत से राजाओं, नेताओं, विद्वानों और जानेमान लोगों ने भाग लिया.
मंजू ‘मन’ मालवीय की जीवनी में लिखते हैं, "मालवीय और महाराजा दरभंगा ने विश्वविद्यालय के लिए चंदे की अपील की तो लाखों रुपए देखते-देखते ही इकट्ठा हो गए. एक अप्रैल, 1913 तक कुल 21 लाख रुपए नकद राशि के तौर पर इकट्ठा हुआ और 80 लाख रुपए के दान का आश्वासन भी मिला."
"साल 1915 के प्रारंभ तक 50 लाख रुपए जमा हो गए थे जिसमें महाराजा बीकानेर, महाराजा जोधपुर और महाराजा कश्मीर ने दिल खोलकर दान दिया था."

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‘परफ़ेक्शन’ में यकीन
उन्हीं दिनों का ज़िक्र करते हुए आचार्य कृपलानी लिखते हैं, "मालवीय का अधिकतर समय बनारस में व्यतीत होता था. वहां वो गंगा के किनारे बाबू शिवप्रसाद गुप्ता के आलीशान बंगले में रहा करते थे. वहां रहना सुविधाजनक था क्योंकि वो घर बारस हिंदू विश्वविद्यालय के पास था जहां उस समय निर्माण कार्य चल रहा था."
वो लिखते हैं, "हर सुबह मालवीय निर्माण कार्य देखने चले जाते थे और मैं भी उनके साथ जाया करता था. मालवीय पूरे ‘परफ़ेक्शनिस्ट’ थे. जब भी मैं उनकी तरफ़ से लिखे जाने वाले पत्र का मसौदा उनके सामने पेश करता था, वो उनकी कसौटी पर खरा नहीं उतरता था. नतीजा होता था कि वो मेरे लिखे पत्र को दरकिनार कर पत्र का खुद जवाब देते थे. कभी-कभी वो अपने ही लिखे पत्र से भी संतुष्ट नहीं होते थे और उसे दोबारा लिखते थे.

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संगम में स्नान पर लगी रोक तोड़ी
हिंदू धर्म के लिए मालवीय ने कई लड़ाइयां लड़ीं. साल 1924 में अर्धकुंभ के समय अंग्रेज़ सरकार ने लोगों से संगम पर स्नान न करने देने का फ़ैसला लिया.
मंजू ‘मन’ मालवीय की जीवनी में लिखते हैं कि मालवीय ने सरकार को सूचित किया कि उनका फ़ैसला ग़लत है, इसे वापस लिया जाना चाहिए वरना सत्याग्रह होगा.
वो लिखते हैं, "लेकिन सरकार ने उनकी बात नहीं मानी. मालवीय दो सौ लोगों के साथ संगम पहुंच गए. उन लोगों में जवाहरलाल नेहरू भी थे. मेला अफ़सरों ने जनता को रोकने के लिए लकड़ी की बाड़ लगा रखी थी ताकि लोग संगम तक न पहुंच सकें."
"मालवीय वहीं रेत पर बैठ गए. धूप का तीखापन उनके हौसले को डिगा नहीं पाया. तभी नेहरू हाथ में कांग्रेस का झंडा लेकर दौड़ते हुए आए और बाड़ के उस पार कूद गए. मालवीय भी पुलिस घुड़सवारों को हड़काते हुए बाड़ के उस पार चले गए. इसके बाद तो पूरी भीड़ मालवीय के पीछे-पीछे उस इलाक़े में घुस गई."
जवाहरलाल नेहरू ने इस घटना का ज़िक्र करते हुए अपनी आत्मकथा में लिखा है, "मालवीय ने उस समय जिस कौशल का प्रदर्शन किया वो अद्भुत था. इस उम्र में ऐसी तेज़ी और स्फूर्ति वास्तव में आश्चर्यजनक थी."

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चौरीचौरा और काकोरी कांड के अभियुक्तों का बचाव
हालांकि मदनमोहन मालवीय ने राजनीति में आने के बाद वकालत छोड़ दी थी लेकिन सन 1922 में उन्होंने चौरीचौरा कांड में शामिल लोगों को बचाने के लिए फिर वकील का कोट पहना और 172 लोगों में से 153 लोगों को बरी करवा पाने में सफल हो गए.
काकोरी कांड के बाद पंडित राम प्रसाद बिस्मिल गिरफ़्तार हो गए थे. देश के कई बड़े नेताओं जैसे गोविंदवल्लभ पंत, चंद्रभानु गुप्ता और मोहनलाल सक्सेना ने बिस्मिल की अदालत में पैरवी करने के लिए अभियान शुरू किया. उसी समय मशहूर वकील जगतनारायण मुल्ला ने क्रांतिकारियों की पैरवी करने से मना कर दिया और वो सरकारी वकील बन गए. राम प्रसाद बिस्मिल ने 9 सिंतंबर, 1927 को मदनमोहन मालवीय को एक पत्र लिखा था.
मंजु ‘मन’ मालवीय की जीवनी में लिखते हैं, "मालवीय ने काकोरी कांड में शामिल लोगों की रिहाई के लिए एक प्रतिवेदन तैयार करके भारत के वायसराय को भिजवाया. इस पर 78 लोगों ने हस्ताक्षर किए थे जिसमें मोहम्मद अली जिन्ना भी शामिल थे. आज भी इसकी प्रति लखनऊ अभिलेखागार में रखी हुई है. वायसराय ने इस प्रतिवेदन को अस्वीकार कर दिया था."

महात्मा गांधी से वैचारिक मतभेद
1942 में मदनमोहन मालवीय उन गिने-चुने राजनेताओं में शामिल थे जिन्होंने गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था. हिंदू महासभा ने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग न लेने का फ़ैसला किया था. सांप्रदायिक आधार पर चुनाव कराने के ब्रितानी हुकूमत के फ़ैसले पर कांग्रेस के रवैये से नाराज़ होकर उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफ़ा दे दिया था और एमएस अणे के साथ मिलकर कांग्रेस राष्ट्रीय दल की स्थापना की थी. हालांकि गांधीजी मालवीय को बहुत मानते थे लेकिन कई मुद्दों पर उनके मतभेद हुआ करते थे. ऐसी ही एक घटना का ज़िक्र करते हुए आचार्य कृपलानी लिखते हैं, "जब गांधीजी बनारस आए तो मालवीय और मैंने उन्हें मुगलसराय में ही ट्रेन से उतार लिया ताकि बनारस स्टेशन पर पहुंची भीड़ उन्हें न तंग कर सके."
"गांधीजी ने हिंदू कालेज हॉल में छात्रों को संबोधित किया. वहां उन्होंने छात्रों से कहा कि वो अपनी पढ़ाई छोड़ कर आज़ादी की लड़ाई में कूद पड़ें. जब मालवीय के बोलने की बारी आई तो उन्होंने कहा ये विश्वविद्यालय आपका अपना है, इसका सरकार से कोई लेनादेना नहीं है इसलिए गांधीजी चाहे जो कुछ कहें आपको पढ़ाई छोड़ने की ज़रूरत नहीं है."

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कांग्रेस में मालवीय की आलोचना
कांग्रेस में सालों बिताने के बावजूद उनकी पार्टी के कई लोग उनकी पुरातनपंथी कह कर आलोचना करते थे.
भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर ने लिखा था "ऊपरी तौर पर तो मालवीय समाज में समानता के पक्षधर थे लेकिन निजी जीवन में वो ब्राह्मण के अलावा किसी और जाति के व्यक्ति से भोजन ग्रहण नहीं करते थे."

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हिंदू ‘पहचान’ से हमेशा जुड़े रहे
मालवीय ने हिंदुओं के पुनर्धर्मातरण की संकल्पना की शुरूआत की थी. चार बार कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद भी उन्होंने साल 1906 में हिंदू महासभा की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी.
जब महात्मा गांधी ने खिलाफ़त आंदोलन शुरू किया तो मदनमोहन मालवीय ने उसका विरोध किया. साल 1932 में हिंदू महासभा के सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा था, "22 करोड़ की आबादी होते हुए भी हिंदुओं के साथ इतना बुरा सुलूक हो रहा है. अगर हम हिंदुओं के धर्मान्तरण की इस दर को जारी रहने देंगे तो भविष्य में हमारी क्या हालत होगी इसकी कल्पना आप कर सकते हैं. इस वजह से धर्म परिवर्तन कर चुके हिंदुओं को दोबारा अपने धर्म में वापस लाना ज़रूरी है." मालवीय ने एक मज़बूत हिंदू पहचान से हमेशा अपने-आप को जोड़े रखा. इलाबाहाद में मालवीय परिवार ने हमेशा वार्षिक दशहरा समारोह का आयोजन किया. इस दौरान मस्जिदों के सामने संगीत बजाने से कई बार सांप्रदायिक तनाव बढ़ा.

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जब सरकार ने विजयादशमी के आयोजकों से मस्जिदों के सामने संगीत बजाने को मना किया तो मालवीय ने इसे ये कहकर मानने से इनकार कर दिया कि तब तो ये राम जुलूस की जगह ‘शोक जुलूस’ हो जाएगा.
नतीजा ये हुआ कि अंग्रेज़ सरकार ने विजयादशमी जुलूस पर पाबंदी लगा दी. साल 1937 में जब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी तब जाकर इस जुलूस से प्रतिबंध हटाया गया.
धनंजय चोपड़ा लिखते हैं, "मालवीय हिंदू संस्कृति की सार्वभौमिकता को तलाशते और तराशते रहते थे. उनका कहना था कि सामाजिक कुरीतियों का सामना करने के लिए ज़रूरी है कि हम संस्कृति के रास्ते लोगों के दिल-दिमाग़ तक पहुंचें." भारतीय जनता पार्टी सरकार ने उन्हें वर्ष 2015 में भारत रत्न से सम्मानित किया.
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