जब भारत में होता था धार्मिक आधार पर बनी क्रिकेट टीमों का टूर्नामेंट

1878 में पारसी क्रिकेट

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    • Author, जसपाल सिंह
    • पदनाम, बीबीसी पंजाबी

भारत में क्रिकेट को लेकर लोगों में काफ़ी उत्साह देखने को मिलता है. भारतीय टीम कहीं भी खेल रही होती है, उसे लाखों खेल प्रशंसक देख रहे होते हैं.

भारत का राष्ट्रीय खेल हॉकी रहा है, लेकिन आज भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता हॉकी से भी ज़्यादा हो चुकी है.

इस खेल का इतिहास भी कई दिलचस्प पड़ावों से होकर गुज़रा है.

भारतीय क्रिकेट के इतिहास का एक पहलू यह भी है कि भारत में ऐसी क्रिकेट प्रतियोगिताएँ भी होती थीं, जिनमें टीमों का गठन राज्यों या क्षेत्रों के आधार पर नहीं, बल्कि धर्मों के आधार पर किया जाता था.

आज इस पर यक़ीन करना भले मुश्किल हो, लेकिन एक समय ऐसा था जब हिंदू टीम का मुक़ाबला मुस्लिम टीम से होता था, मुस्लिम टीम का मुक़ाबला पारसियों की टीम से होता था. जबकि पारसी टीम का मुक़ाबला हिंदू टीम से होता था.

ये प्रतियोगिताएँ कई वर्षों तक चलती रहीं. इसे देखने के लिए दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ती थी.

उस समय इन प्रतियोगिताओं के बारे में ख़बरों को समाचार पत्र प्रमुखता से जगह देते थे.

इस आलेख में हम आपको 'द बॉम्बे पेंटांगुलर' नाम से मशहूर टूर्नामेंट के बारे में बता रहे हैं.

इस टूर्नामेंट की शुरुआत कैसे हुई, इससे जुड़े विवाद क्या थे और फिर कैसे यह टूर्नामेंट बंद हुआ, इसकी कहानी बेहद दिलचस्प है.

महाराष्ट्र में 1882 में ब्रिटिश क्रिकेट टीम

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भारत में क्रिकेट की शुरुआत

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भारत में क्रिकेट का सबसे पहला उल्लेख 18वीं शताब्दी के तीसरे दशक की शुरुआत में मिलता है.

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक़, उस दौर में एक ब्रिटिश जहाज़ ने वर्तमान गुजरात के कच्छ में लंगर डाला था.

उस समय के नाविकों के बारे में बताए गए उल्लेखों से पता चलता है कि वे अन्य कामों के साथ-साथ समय बिताने के लिए क्रिकेट भी खेलते थे.

इसके बाद धीरे-धीरे भारत में क्रिकेट खेल की शुरुआत हुई. कलकत्ता क्रिकेट क्लब की शुरुआत वर्ष 1792 में हुई थी.

यह क्लब लंदन के एमसीसी क्लब के बाद दुनिया का सबसे पुराना क्रिकेट क्लब है.

उस समय भारत में पारसी समुदाय ने ही सबसे पहले क्रिकेट को अपनाया था.

साल 1848 में पारसी समुदाय ने ओरिएंटल क्रिकेट क्लब की शुरुआत की. इसके बाद पारसी समुदाय ने कई अन्य क्रिकेट क्लब भी खोले.

उस दौर में पारसी समुदाय के पास संसाधनों की कमी नहीं थी, यही वजह है कि उन्होंने अपनी टीम को ब्रिटेन भेजने की अनुमति दी.

साल 1889-90 में इंग्लैंड के जीएफ वर्नोन की कप्तानी में भारत दौरे पर आई एक टीम को पारसी समुदाय की एक टीम ने चार विकेट से हरा दिया था.

यह किसी भी भारतीय क्रिकेट टीम के लिए बहुत बड़ी जीत थी.

वरिष्ठ खेल पत्रकार, इतिहासकार और सचिन तेंदुलकर की आत्मकथा, प्लेइंग इट माई वे के सह-लेखक बोरिया मजूमदार ने द बॉम्बे पेंटैंगुलर के बारे में लिखा है.

इसे 'द इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ द हिस्ट्री ऑफ़ स्पोर्ट्स' ने प्रकाशित किया है.

बोरिया मजूमदार अपने लेख में लिखते हैं, "पारसियों ने कई क्रिकेट क्लब बनाए थे. बंबई की व्यापारिक दुनिया में हिंदू समुदाय तब पारसी समुदाय से प्रतिस्पर्धा करता था. यह भी एक वजह थी कि पारसी समुदाय के बाद हिंदुओं ने भी क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया."

"पहला हिंदू क्रिकेट क्लब 1866 में 'बॉम्बे यूनियन' नाम से स्थापित किया गया था. पारसी समुदाय के क्लब जहाँ क्षेत्रों के नाम पर बने थे, वहीं दूसरी ओर हिंदुओं के क्लब जाति और धर्म के नाम पर बने थे."

भारत में क्रिकेट

1890 के दशक में 'द बॉम्बे पेंटैंगुलर' की शुरुआत से पहले भारत में यूरोपीय क्लब और पारसी समुदायों के बीच सालाना आयोजन में मैच खेले जाते थे.

1907 में ये मैच त्रिकोणीय हो गए और हिंदू समुदाय की टीम भी इसमें शामिल हो गई.

1912 में मुस्लिम समुदाय की टीम भी शामिल हो गई और 1937 में 'रेस्ट' के नाम से एक टीम बनाई गई, जिसमें एंग्लो-इंडियन और ईसाई समुदाय के खिलाड़ी थे.

इसका नाम भले पेंटैंगुलर टूर्नामेंट रहा हो, लेकिन इसमें चार ही टीमें हिस्सा लेती थीं.

कौशिक बंधोपाध्याय ने 'महात्मा ऑन पिच' नाम की किताब लिखी है, जिसमें उन्होंने 'द बॉम्बे पेंटैंगुलर' टूर्नामेंट के बारे में विस्तार से लिखा है.

कौशिक लिखते हैं कि 1912 तक इस टूर्नामेंट के कारण किसी भी तरह की कोई बड़ी सांप्रदायिक घटना नहीं हुई थी.

ऐसे टूर्नामेंट देश के अन्य हिस्सों जैसे सिंध, लाहौर, दिल्ली और मध्य प्रांत में आयोजित किए जा रहे थे.

कौशिक लिखते हैं कि उस समय भारत में विभिन्न समुदायों की प्रतिस्पर्धात्मक भावना के कारण क्रिकेट की लोकप्रियता तेज़ी से बढ़ रही थी.

कौशिक का कहना है कि मैच देखने आए लोगों में यह देखा गया कि वे अपने-अपने समुदाय के लिए मैदान में आए थे.

1930 के दशक की शुरुआत तक इस टूर्नामेंट में खेल भावना बरक़रार देखी जाती थी.

कौशिक लिखते हैं, "जब मुस्लिम टीम ने 1924 में टूर्नामेंट जीता, तो हिंदू उनकी जीत का जश्न मनाने में शामिल हो गए. मोहम्मद अली जिन्ना ने भी इस अच्छी खेल भावना की प्रशंसा की थी."

समुदायों के बीच प्रतिस्पर्धा सांप्रदायिक कैसे हो गई?

1911 में ऑल इंडिया क्रिकेट टीम

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कौशिक ने प्रसिद्ध इतिहासकार ज्ञानेंद्र पांडे को उद्धृत करते हुए लिखा है कि 1920 के दशक से पहले भारत को विभिन्न समुदायों के समूह के रूप में देखा जाता था, जिसके ढाँचे में 'द बॉम्बे पेंटैंगुलर' जैसे टूर्नामेंट एकदम फ़िट बैठ रहे थे.

1920 के दशक में भारत के प्रति इस नज़रिए में बदलाव आना शुरू हुआ.

कौशिक लिखते हैं, "टूर्नामेंट ने एक राष्ट्र के रूप में उभरते भारत में धर्म-आधारित टीम प्रतियोगिताओं की आवश्यकता के बारे में बहस छेड़ दी. बहस में दो गुट थे, जिनमें से एक ने कहा कि प्रतियोगिता क्रिकेट के माध्यम से समुदायों को एक साथ लाने का एक प्रयास था जबकि दूसरा गुट कहता था कि ऐसे टूर्नामेंट ख़राब प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा कर रहे हैं, समुदायों को एक-दूसरे से दूर कर रहे हैं."

कौशिक के मुताबिक़ 1928 में बीसीसीआई की स्थापना के बाद इन प्रतियोगिताओं के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठीं, लेकिन कई लोग ऐसे टूर्नामेंट के पक्ष में भी थे.

वे बताते हैं, "1936 के बॉम्बे क्वाड्रैंगुलर से पहले हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए थे. उस समय 'द बॉम्बे क्रॉनिकल' ने कहा था कि समय आ गया है कि इस प्रतियोगिता को रोका जाए, अन्यथा इससे समुदायों के बीच कड़वाहट ही बढ़ेगी. 1937 में, जब 'बाक़ी पक्ष' को टूर्नामेंट में शामिल किया जा रहा था, तो जेसी मित्रा और जेएम गांगुली जैसी बड़ी हस्तियों ने सुझाव दिया कि देश के हित में टूर्नामेंट को बंद कर देना चाहिए."

गांधी का बयान

एक धड़े ने गांधी के बयान की तारीफ़ की.

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इमेज कैप्शन, महाराष्ट्र में एक टूर्नामेंट में सांप्रदायिक तनाव पैदा होने पर गांधी ने बयान दिया था.

दिसंबर 1940 तक टूर्नामेंट को लेकर बहस काफ़ी बढ़ गई थी.

उस समय, हिंदू जिमखाना का एक प्रतिनिधिमंडल गांधीजी से सलाह लेने आया था.

उनके विचार 'द कलेक्टिव वर्क्स ऑफ़ महात्मा गांधी' के 79वें खंड में छपे हैं.

यूरोप में चल रहे द्वितीय विश्व युद्ध और भारत में कई नेताओं के कारावास के कारण गांधीजी ने इन मैचों को रोकने का आह्वान किया.

उन्होंने इस टूर्नामेंट के सांप्रदायिक स्वरूप पर भी अपने विचार व्यक्त किए.

उन्होंने कहा, "मैं बॉम्बे के लोगों से कहना चाहता हूँ कि उन्हें अपने खेलने के तरीक़े को बदलना चाहिए और इन सांप्रदायिक मैचों को बंद करना चाहिए. मैं कॉलेजों के बीच मैच खेलना तो समझता हूँ, लेकिन मुझे समझ नहीं आता कि हिंदू, मुस्लिम और पारसियों के बीच मैच क्यों होते हैं?"

गांधीजी के बयान के बाद भी यह टूर्नामेंट 1941 में खेला गया. 1942 को छोड़कर, 1946 तक एक टूर्नामेंट जारी रहा. लेकिन इस टूर्नामेंट के ख़िलाफ़ आवाज़ें बहुत तेज़ हो रही थीं.

कौशिक बंधोपाध्याय लिखते हैं, ''पटियाला, नवानगर और विजयनगरम जैसी रियासतों ने टूर्नामेंट के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी शुरू कर दी. नवानगर के जाम साहब ने अपनी रियासत के सभी खिलाड़ियों को इस टूर्नामेंट में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया था. इस क़दम का पटियाला रियासत ने भी स्वागत किया था. पटियाला के महाराजा ने यह भी घोषणा की कि उनका कोई भी खिलाड़ी सांप्रदायिक आधार पर खेले जाने वाले मैचों में भाग नहीं लेगा."

1910 में क्रिकेट देखतीं पारसी महिलाएं

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यह टूर्नामेंट कैसे ख़त्म हुआ?

1943 से 1945 तक यह टूर्नामेंट अपने पूरे तौर तरीक़ों से खेला गया.

कौशिक के मुताबिक़ उस वक़्त की मीडिया कवरेज से पता चलता है कि लोगों में इस टूर्नामेंट के प्रति कितना उत्साह था.

कौशिक के मुताबिक़, ''आख़िरी पेंटैंगुलर टूर्नामेंट फरवरी 1946 में खेला गया था. उस साल भारत में कई जगहों पर बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई थी. ऐसी परिस्थितियों में क्रिकेट खेलना असंभव लग रहा था. यहाँ तक ​​कि इस टूर्नामेंट के प्रमुख समर्थक भी विभिन्न समुदायों के बीच बढ़ते तनाव के कारण इसे रद्द करने की वकालत कर रहे थे. तत्कालीन बीसीसीआई अध्यक्ष एंथनी डी मेलो ने उस समय कहा था कि टूर्नामेंट से देश की शांति भंग हो सकती है."

बाद में इसे दोबारा शुरू करने की कोशिशें की गईं, लेकिन सफलता नहीं मिली.

बोरिया मजूमदार का कहना है कि इस पेंटैंगुलर टूर्नामेंट के शुरुआत से लेकर समाप्त होने तक राजनीतिक और आर्थिक तस्वीर के नज़रिए से भी देखा जाना चाहिए.

वे कहते हैं, "अगर हम इस टूर्नामेंट का अध्ययन करें तो हमें समझ आता है कि इस टूर्नामेंट को बंद करने के लिए धर्मनिरपेक्षता की जो छवि बनाई गई है, उसके पीछे राजनीतिक और आर्थिक कारक भी काम कर रहे थे. पेंटैंगुलर टूर्नामेंट के खचाखच भरे स्टेडियमों की तुलना में, बीसीसीआई की रणजी ट्रॉफ़ी में स्टैंड ख़ाली हुआ करते थे. इससे बोर्ड और पंचकोणीय का विरोध करने वालों को नुक़सान हुआ."

हालाँकि 1946 में पेंटैंगुलर टूर्नामेंट ख़त्म होने के बाद भी लोगों में रणजी ट्रॉफ़ी के लिए कोई ख़ास उत्साह नहीं देखा गया था.

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