भारत का विभाजन न हुआ होता तो आज वो कहां होता, जयशंकर ने बताया

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भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि उरी और बालाकोट जैसे कदमों ने ज़रूरी संदेश दिया है और ये बताया है कि भारत किसी के दबाव में नहीं आएगा.
उन्होंने कहा कि भारत के लिए उसकी सुरक्षा का मुद्दा बेहद अहम है और आतंकवाद की परेशानी झेल चुके भारत ने उरी और बालाकोट के ज़रिए ज़रूरी संदेश दिया है.
उन्होंने चीन के साथ सीमा तनाव को लेकर भी बात की और कहा कि विभाजन से भारत को नुक़सान पहुंचा था. इसने उसे उन इलाक़ों से दूर कर दिया जहां उसे सम्मान मिलता था.
विदेश मंत्री ने क्या-क्या कहा?
चेन्नई में तुगलक पत्रिका द्वारा आयोजित 53वीं वर्षगांठ समारोह के अवसर पर जयशंकर ने कहा कि उन्होंने चार कारणों से इस आयोजन में शामिल होने का फ़ैसला किया.
उन्होंने कहा कि मोदी सरकार का मानना है कि केवल दिल्ली में बैठे लोगों को ही विदेश नीति पर चर्चा नहीं करनी चाहिए बल्कि वैश्वीकरण के इस दौर में बाहरी दुनिया में दिलचस्पी रखने वाले हर व्यक्ति को इसमें हिस्सा लेना चाहिए.
उन्होंने कहा, "दुनिया को लेकर एक राष्ट्रीय नज़रिया है जो प्राथमिकता है और पूरे देश को हमारे राष्ट्रीय हितों और आकांक्षाओं के बारे में जानकारी होनी चाहिए. तीसरा, ये हमारे लिए ऐसा मौक़ा है जब हम दुनिया के लोगों को और क़रीब ला सकते हैं."
उन्होंने कहा कि भारत जी20 देशों की अध्यक्षता कर रहा है और इसके तहत पूरे देश में पचास से अधिक जगहों में कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. मुझे उम्मीद है कि देश में इसे लेकर जागरूकता बढ़ेगी.
इस सम्मेलन में उन्होंने 'विश्व के लिए भारत क्यों ज़रूरी है', मुद्दे पर बात की और कहा कि एक बड़े भूखंड और बड़ी आबादी, लंबा इतिहास और अलग संस्कृति होने के कारण भारत विश्व के सामने हमेशा महत्वपूर्ण रहा है.
उन्होंने कहा कि उपनिवेशवादी ताकतों के दौर में भारत की पहचान केवल एक बाज़ार, संघर्ष की ज़मीन और दूसरों के लिए एक रिसोर्स की तरह रही थी. लेकिन भारत को उसके विचारों और कदमों की वजह से और सफल गणतंत्र होने के कारण भी पहचाना जा सकता है और आने वाले वक्त में हमारी यही आकांक्षा है.
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व्यापार के मार्ग खोजे जाने के बाद भारत को अपना गढ़ बना कर यूरोप ने एशिया में अपना प्रभुत्व बनाया था. यहां तक कि 90 के दशक में चीन का नसीब भी भारत से प्रभावित रहा था.
लेकिन देखा जाए तो भारत ही वो कड़ी बना जिसके बाद से एक के बाक देश उपनिवेशवादी ताकतों के चंगुल से निकलने लगे और आज वो एक वर्ल्ड ऑर्डर का हिस्सा हैं. इसके दशकों बाद वैश्विक स्तर पर भारत के आर्थिक विकास ने ये सुनिश्चित किया है कि विश्व में पुनर्संतुलन हो और बहुध्रुवीय बना रहे, ये अभी भी चल रहा है.
उन्होंने कहा कि दुनिया की एक छठवें हिस्सा भारत में रहता है अगर विभाजन न हुआ होता तो भारत दुनिया का सबसे बड़ा देश होता, न की चीन और ये दुनिया की आबादी का पांचवा हिस्सा होता.
हालांकि उन्होंने कहा कि आकार और संख्याबल ही केवल वो कारण नहीं जो भारत को विश्वपटल पर प्रमुख देश बनाते हैं, बल्कि पुनर्संतुलन के केंद्र में भारत, चीन और दूसरे देश हैं जिन्होंने राष्ट्रीय पुनरुद्धार के ज़रिए अपना महत्व दर्ज करा रहे हैं.
उन्होंने कहा ग्लोबल साउथ में भारत को आज एक उदाहरण की तरह देखा जाता है. दुनिया के कई देशों में भारतीय अपनी छाप छोड़ रहे हैं. देश के बाहर रहने वालों से जुड़े रहने उनकी सुरक्षा और तरक्की सुनिश्चित करना भी भारत का काम है, जो वो कर रहा है.
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उन्होंने कहा कि देश के लिए उसक सुरक्षा बेहद अहम मुद्दा है. लंबे वक्त से भारत आंतकवाद के दंश को झेलता रहा है जिससे इसे सामान्य मान लेने का ये ख़तरा पैदा हो गया था. इसलिए उरी और बालाकोट के ज़रिए दिया गया संदेश बेहद ज़रूरी था.
"आपसी समझौतों की अवमानना करते हुए सीमा पर बड़ी संख्या में फौज जमा करके चीन ने सीमा पर यथास्थिति को बदलने की कोशिश की. ये 2020 मई को हुआ था. कोविड महामारी के बावजूद भी इसके लिए हमारा जवाब मज़बूत और कड़ा रहा. हमारी सेना विपरीत परिस्थियों में सीमाओं पर डटी रहती है. पूरे विश्व को पता है कि भारत वो देश नहीं जो किसी के दबाव के सामने झुक जाएगा, वो अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को सुनिश्चित करने की हर कोशिश करेगा."
विभाजन पर क्या कहा
1947 के विभाजन के बारे में उन्होंने कहा कि 'इसने भारत को बड़ा नुक़सान पहुंचाया था. इसने ने केवल उसका कद कम कर दिया बल्कि जिन इलाकों में उसे बेहद सम्मान से देखा जाता था और उसका प्रभुत्व था उससे दूर कर दिया. भारत लुक ईस्ट के बाद अब ऐक्ट ईस्ट पर अमल कर रहा है और मुल्कों के साथ अपने रिश्ते मज़बूत कर रहा है. हम मध्य पूर्व के मुल्कों के साथ भी अपने रिश्ते मज़बूत कर रहे हैं.'
"बीते साल ऊर्जा, खाद और अनाज संकट को लेकर बड़ी चर्चा हुई. इसमें भारत एक मज़बूत आवाज़ बनकर उभरा जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता."
"हमारे भीतर ऐसे लोग हमेशा रहेंगे जो ये मानते हैं कि भारत बड़ा सोचने की हिम्मत नहीं कर सकता, ऐसे हितस्वार्थ भी होंगे जो इसके विरोध में दिखेंगे, लेकिन दिन के आख़िर में आपको ये समझना होगा कि राष्ट्रीय एकता पर काफी कुछ निर्भर करेगा."
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'ग्लोबल साउथ और भारत का साझा भविष्य है'
वहीं शनिवार को ही ग्लोबल साउथ सम्मेलन में शिरकत करते हुए जयशंकर ने कहा ग्लोबल साउथ और भारत का न केवल साझा भविष्य है बल्कि इनका साझा इतिहास भी रहा है. भारत और ये देश बीते वक्त में उपनिवेशवादी ताकतों के अधीन रहे हैं और मौजूदा वर्ल्ड ऑर्डर में असमानता का सामना कर रहे हैं.
ग्लोबल साउथ सम्मेलन में विदेश मंत्रियों की ऑनलाइन बैठक में उन्होंने अनसस्टेनेबल ऋण, अमल में न लाए जाने वाले प्रोजेक्ट्स, व्यापार में बाधाएं और जलवायु परिवर्तन के कारण दबाव पहले ही था, जो कोविड महामारी और यूक्रेन युद्ध के कारण कई गुना बढ़ गया है.
जयशंकर ने कहा कि जी20 देशों के अध्यक्ष के तौर पर भारत का एजेंडा असुरक्षित लोगों और विकेंद्रीकरण को ध्यान में रखते हुए वैश्वीकरण के नए आयामों को महत्व देना होगा. वो विश्व में सभी को बराबर मौक़े मिलने की बात पर भी ज़ोर देगा.
उन्होंने कहा कि उपनिवेशवाद के पंजे से बाहर निकलने से लेकर नए गठबंधन बनाने के मामले तक ग्लोबल साउथ के देशों ने हमेशा बीच का रास्ता अपनाया है जिसमें बातचीत, कूटनीति और सहयोग को अधिक प्राथमिकता दी जाती है, न कि प्रतिद्वंदिता, संघर्ष और मतभेद को.
उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा है ये यु्द्ध का दौर नहीं है और हमें 'वो और हम' की सोच से बाहर निकलना होगा, ताकि हम एक मानव परिवार की तरह मिलकर काम कर सकें और साथ में आगे बढ़ सकें."
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