पाकिस्तान में ग्वादर का बवाल उड़ा रहा चीन की नींद

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- Author, इक़बाल अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तान में बलूचिस्तान प्रांत के ग्वादर इलाक़े में स्थिति धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही है. कम से कम प्रांत के गृहमंत्री मीर ज़िया उल्लाह लांगो तो ऐसा ही दावा कर रहे हैं.
उन्होंने अपने दावे के पक्ष में अपने ट्विटर हैंडल से कई वीडियो शेयर किए हैं.
लेकिन अभी भी 'हक़ दो तहरीक' के क़रीब डेढ़ दर्जन लोग गिरफ़्तार कर जेल भेजे जा चुके हैं और आंदोलन के मुखिया मौलाना हिदायत उर रहमान फ़िलहाल अंडरग्राउंड हैं.
हक़ दो तहरीक के तहत धरने पर बैठे लोगों के ख़िलाफ़ सुरक्षाकर्मियों ने 25 दिसंबर को एक ऑपरेशन किया था और कई लोगों को गिरफ़्तार कर लिया था.
बलूचिस्तान के लोग मौलाना हिदायत उर रहमान के नेतृत्व में पिछले साल 27 अक्तूबर से अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे थे. इनमें एक बड़ी तादाद महिलाओं की थी.
बीबीसी संवाददाता मोहम्मद काज़िम इस पूरे आंदोलन को शुरू से कवर कर रहे हैं. उनके अनुसार प्रदर्शनकारियों की कई मांगों में से तीन-चार अहम हैं.
उनकी सबसे पहली मांग है कि बलूचिस्तान में ग़ैर-क़ानूनी ढंग से मछली पकड़ने को रोका जाए.
उनकी दूसरी मांग है कि ईरान से उनके व्यापार पर लगी पाबंदी हटा दी जाए. उनकी तीसरी मांग है कि पूरे बलूचिस्तान में जगह-जगह लगे चेकपोस्ट को कम किया जाए.
मोहम्मद काज़िम के अनुसार उन्होंने अपनी मांगों में लापता लोगों के मामले को भी जोड़ दिया है.

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साल 2021 के नवंबर में भी बलूचिस्तान में स्थानीय लोगों ने मौलाना हिदायत उर रहमान के नेतृत्व में अपनी मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था.
32 दिनों तक चले प्रदर्शन के बाद सरकार और प्रदर्शनकारियों में समझौता हुआ था. इसका नाम उन्होंने 'हक़ दो तहरीक' रखा था.
मौलाना हिदायत उर रहमान का कहना है कि सरकार ने 2021 में किए गए वादे पूरे नहीं किए, जिसके कारण उन्हें अक्तूबर 2022 में दोबारा सड़कों पर उतरना पड़ा.
हालाँकि बलूचिस्तान सरकार का कहना है कि उन्होंने अपने वादे पूरे कर दिए हैं.
प्रांत के गृह मंत्री मीर ज़िया उल्लाह लांगों ने एक वीडियो बयान जारी कर कहा कि कई मांगें ऐसी हैं, जिनका संबंध सिंध की प्रांतीय सरकार और केंद्र सरकार से है जो उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है.

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विवाद की जड़ क्या है?
पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार और इस आंदोलन को बहुत नज़दीक से देखने वाले शहज़ादा ज़ुल्फ़िक़ार का कहना है कि यह आंदोलन पूरी तरह से स्थानीय लोगों की आवाज़ है क्योंकि यह उनकी रोज़ी रोटी का मसला है.
उनके अनुसार मछली पालन इस इलाक़े के लोगों की आमदनी का एकमात्र ज़रिया है और सीपेक (चीन पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर) के कारण समुद्र तक उनकी पहुँच मुश्किल होती जा रही है.
इसके अलावा कराची के बड़े-बडे ट्रॉलर के मालिक ग्वादर में आकर ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से मछली पकड़ते हैं जिससे स्थानीय लोगों की आमदनी कम होती जा रही है.
स्थानीय लोगों के पास ना तो आधुनिक मशीनें हैं न आधुनिक तकनीक, ऐसे में बड़े-बड़े ट्रॉलर के सामने उनका कारोबार पूरी तरह ठप पड़ गया है.
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पुलिस ने बलपूर्वक प्रदर्शन ख़त्म क्यों किया?
प्रदर्शनकारी 27 अक्तूबर से धरने पर बैठे थे लेकिन सुरक्षाबलों ने 25 दिसंबर को रात के दो-तीन बजे कार्रवाई की.
24 दिसंबर तक सरकार कह रही थी कि प्रदर्शनकारियों से बातचीत जारी है लेकिन अगले कुछ ही घंटों में धरने के ख़िलाफ़ बल का प्रयोग क्यों किया गया?
शहज़ादा ज़ुल्फ़िक़ार के अनुसार हालात यहाँ तक पहुँचने के लिए दोनों पक्ष बराबर के ज़िम्मेदार हैं.
उनके अनुसार सरकार ने लगभग एक साल तक उन वादों को पूरा नहीं किया, जो उन्होंने पिछले धरने के ख़त्म होने के दौरान किए थे.
इस बार भी जब तक वो शांति से बैठे थे तो प्रशासन ने उनकी कोई सुध नहीं ली, लेकिन जैसे ही उन्होंने ग्वादर बंदरगाह के क़रीब धरना देना शुरू किया और एक्सप्रेस वे को जाम कर दिया, सरकार तुरंत एक्शन में आ गई.
लेकिन यही तर्क सरकार भी देती है.
गृह मंत्री मीर ज़िया उल्लाह लांगो भी कहते हैं कि जब तक वो लोग शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे थे, प्रशासन ने उन्हें कोई परेशानी नहीं दी, लेकिन जैसे ही वो ग्वादर बंदरगाह के क़रीब बैठ गए तो सरकार को मजबूरन हस्तक्षेप करना पड़ा क्योंकि चीनी नागरिकों की सुरक्षा सरकार की ज़िम्मेदारी है.

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शहज़ादा ज़ुल्फ़िक़ार भी कहते हैं कि बंदरगाह पर काम कर रहे चीनी लोगों का रसद भी ख़त्म हो गया था, क्योंकि हाईवे बंद था.
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कौन हैं मौलाना हिदायत उर रहमान?

मोहम्मद रिज़वान के अनुसार उन्होंने आज तक बलूचिस्तान में इस तरह का कोई विरोध प्रदर्शन नहीं देखा है.
तो आख़िर कौन हैं मौलाना हिदायत उर रहमान जिनके एक कॉल पर हज़ारों की तादाद में बलूचिस्तान के लोग सड़कों पर उतर जाते हैं.
शहज़ादा ज़ुल्फ़िक़ार के अनुसार मौलाना हिदायत एक ग़रीब मछुआरे परिवार से आते हैं.
वो धार्मिक संगठन जमात-ए-इस्लामी से जुड़े हुए हैं और उन्होंने उन्हीं के मदरसे से अपनी शिक्षा हासिल की है.
42 साल के मौलाना हिदायत उर रहमान फ़िलहाल जमात-ए-इस्लामी के बलूचिस्तान प्रांत के महासचिव हैं.
शहज़ादा ज़ुल्फ़िक़ार के अनुसार जमात का कोई ख़ास प्रभाव ना तो बलूचिस्तान में है और ना ही ग्वादर इलाक़े में लेकिन फिर भी लोग उनके बैनर पर भारी तादाद में जमा हो जाते हैं.
पाकिस्तान के जाने माने मरीन एक्सपर्ट और फ़िलहाल डब्लूडब्लूएफ़ (वर्ल्ड वाइड फ़ंड फ़ॉर नेचर) के तकनीकी सलाहकार मोहम्मद मोअज़्ज़म ख़ान के अनुसार यह पूरा मामला पूरी तरह आर्थिक है और इसलिए ग्वादर के तमाम लोग राजनीति से ऊपर उठकर मौलाना हिदायत उर रहमान के बैनर तले एक साथ हो गए हैं.
मौलाना हिदायत उर रहमान को सेना का समर्थन हासिल है?

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बलूचिस्तान नेशनलिस्ट संगठनों का आरोप है कि मौलाना का आंदोलन पूरी तरह राजनीतिक है और वो लोगों का इस्तेमाल अपने राजनीतिक लाभ के लिए कर रहे हैं.
मौलाना पर एक और आरोप है कि उन्हें पाकिस्तानी इस्टैबलिश्मेंट (सेना) का समर्थन हासिल है जो बलूचिस्तान नेशनलिस्ट संगंठन के प्रभाव को कम करने के लिए मौलाना का इस्तेमाल कर रहा है.
शहज़ादा ज़ुल्फ़िक़ार के अनुसार यह आंदोलन पूरी तरह से एक जनआंदोलन है और कुछ लोग कहते ज़रूर हैं लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मौलाना को इस्टैबलिश्मेंट का समर्थन हासिल है.
उनके अनुसार बड़ी से बड़ी राजनीतिक पार्टी की रैली में गिनती की कुछ महिलाएँ शामिल होती हैं लेकिन इस प्रदर्शन में दो से तीन हज़ार महिलाएँ सड़क पर प्रदर्शन कर रहीं थीं, किसी आंदोलन के जन आंदोलन होने का इससे बड़ा सबूत क्या हो सकता है.
हाल में हुए निकाय चुनाव में मौलाना के समर्थकों ने लगभग 80 फ़ीसदी सीट जीती थीं और उम्मीद है कि इसी साल होने वाले प्रांतीय और आम चुनाव में मौलाना के समर्थक चुनाव में हिस्सा लेंगे.

चीन और सीपेक से इसका संबंध
कुछ लोगों का कहना है कि चीनी जहाज़ भी मछली पकड़ने में शामिल हो गए हैं और इस वजह से ग्वादर के मछुआरों की रोज़ी-रोटी ख़तरे में पड़ गई है.
लेकिन डॉक्टर मोअज़्ज़म ख़ान इसे पूरी तरह ख़ारिज करते हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि 1986 के क़ानून के अनुसार बलूचिस्तान में मछली पकड़ने के लिए ट्रॉलिंग के इस्तेमाल पर पूरी तरह पाबंदी है और 2005 के बाद से चीन का एक भी जहाज़ बलूचिस्तान में दाख़िल नहीं हुआ है.
उनके अनुसार अक्तूबर 2020 में चीन के दर्जन भर ट्रॉलर पाकिस्तानी झंडे का इस्तेमाल करते हुए अंदर आए थे लेकिन उन्हें इजाज़त नहीं मिली.
डॉक्टर मोअज़्ज़म के अनुसार सीपेके के कारण स्थानीय मछुआरे काफ़ी ख़ुश हैं क्योंकि उन्हें अपनी मछलियों की ज़्यादा क़ीमत मिलेगी.
स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन के अनुसार साल 2030 तक चीन को एक करोड़ 80 लाख टन अतिरिक्त सीफ़ूड की ज़रूरत होगी और चीन अपनी ज़रूरत पूरी करने के लिए दूर-दराज़ के इलाक़ों में मछली व्यापार को और विस्तार देगा.
चीन ग्वादर बंदरगाह को विकसित कर रहा है और उसने अरबों डॉलर का निवेश किया है, ऐसे में क्या इन घटनाओं का असर चीन पर नहीं पड़ेगा?
शहज़ाद ज़ुल्फ़िक़ार के अनुसार उन्होंने चार-पाँच दिनों पहले मौलाना हिदायत उर रहमान से मुलाक़ात की थी और उनसे पूछा था कि चीन के मामले में आपकी क्या राय है.
शहज़ाद ज़ुल्फ़िक़ार का कहना है कि मौलाना का साफ़ कहना था कि उनका आंदोलन ना तो चीन के ख़िलाफ़ है और ना ही चीन की परियोजनाओं से उन्हें कोई तकलीफ़ है.
मौलाना भी चाहते हैं कि चीनी परियोजना से ग्वादर और बलूचिस्तान के लोगों की ज़िंदगी बेहतर हो.
लेकिन दिक़्क़त यह है कि उस परियोजना से अभी तक आम लोगों को कोई ख़ास लाभ होता हुआ दिख नहीं रहा है.
शहज़ाद ज़ुल्फ़िक़ार कहते हैं कि मंगलवार को ही चीन ने वहाँ एक वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर खोला है, जहाँ स्थानीय नौजवानों को प्रशिक्षण दिया जाएगा और फिर चीन भेजकर उच्च ट्रेनिंग दी जाएगी.
डॉन अख़बार की एक रिपोर्ट के अनुसार चीन के वाणिज्य दूत चाओ लीजियान ने विरोध प्रदर्शनों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि मौलाना हिदायत उर रहमान और उनके सहयोगियों ने चीन के अधिकारियों से कराची और इस्लामाबाद में मुलाक़ात की है.
चीनी प्रवक्ता ने कहा, "हमें आश्वस्त किया गया है कि ग्वादर के आंदोलन का सीपेक से कोई लेना देना नहीं है, लेकिन बहुत गहन अध्ययन करने से पता चलता है कि इन प्रदर्शनों का सीपेक से संबंध है."
सीपेक क्या है?

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सीपेक पश्चिमी चीन के काशगर से पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक क़रीब तीन हज़ार किलोमीटर लंबा एक आर्थिक गलियारा है.
यह हिमालय के कई इलाक़ों, पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर, मैदान और रेगिस्तान से होता हुआ ग्वादर के प्राचीन बंदरगाह तक पहुँचता है.
इस रास्ते पर चीन अरबों रुपए ख़र्च करके सड़क और रेल नेटवर्क, पावर प्लांट समेत कई परियोजनाओं को बना रहा है.
इस पर क़रीब 62 अरब डॉलर ख़र्च किया जा रहा है. सीपेक चीन के ओबीओआर (वन बेल्ट बन रोड) परियोजना का एक हिस्सा है जो चीन को एशिया और यूरोप से जोड़ता है.
ग्वादर बंदरगाह की देख रेख चीन 40 साल तक करेगा.
ग्वादर बंदरगाह सामरिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण जगह पर है जो अरब और फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ़ हॉरमूज़ के क़रीब है जहाँ से दुनिया का 40 फ़ीसद तेल गुज़रता है.
चीन के लिए ग्वादर का बंदरगाह तेल के संसाधानों से भरपूर मध्य-पूर्व, सेंट्रल और दक्षिण एशिया का दरवाज़ा है.

आगे क्या हो सकता है?
बीबीसी संवाददाता मोहम्मद काज़िम कहते हैं कि अगर मौलाना अपनी मांगों पर अड़े रहे और सरकार से समझौता नहीं किया तो उनके आंदोलन को और बल मिलेगा लेकिन अगर उन्होंने समझौता कर लिया तो फ़िलहाल संगठन में दूसरे नंबर की हैसियत रखने वाले हुसैन वाडेला इस आंदोलन के मुखिया बन सकते हैं और वो इसको आगे बढ़ाएँगे.
शहज़ाद ज़ुल्फ़िक़ार का कहना है कि अगर सरकार ने थोड़ी समझदारी से काम लिया और स्थानीय लोगों की जायज़ मांग पूरी कर दी, तो मौलाना हिदायत उर रहमान ख़ुद ही अप्रासंगिक हो जाएँगे और उनका आंदोलन कमज़ोर हो जाएगा.
मोहम्मद काज़िम के अनुसार अगर आंदोलन जारी रहता है और आगे चलकर हिंसक हो जाता है तो निश्चित तौर पर इससे सीपेक पर भी असर पड़ेगा.

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शहज़ाद ज़ुल्फ़िक़ार भी इस बात को मानते हैं कि अगर क़ानून-व्यवस्था बिगड़ती है तो ज़ाहिर है चीन को इस पर ज़रूर चिंता होगी क्योंकि उसने अरबों रुपए निवेश किए हैं.
उनके अनुसार अगर सरकार ने बातचीत के ज़रिए इस मसले को हल नहीं किया तो बलूचिस्तान में हथियार बंद आंदोलन कर रहे लोगों को यह कहने का मौक़ा मिल जाएगा कि यह सरकार शांति से विरोध प्रदर्शन करने वालों की बात नहीं सुनती है और इसलिए सरकार से अपनी बात मनवाने के लिए बंदूक़ उठाना ही एकमात्र विकल्प है.
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