चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर में बलूचिस्तान कितना बड़ा रोड़ा

चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

चीन-पाकिस्तान की दोस्ती पुरानी है. और इसी पुरानी दोस्ती को और पक्का करने के लिए दोनों दोस्त, व्यापार के क्षेत्र में भी साथ आए और घोषणा की चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर की.

2015 में इस कॉरिडोर के एलान के साथ ही इस परियोजना को देशों ने अपने रिश्तों का गेम चेंजर बताया है. हालाँकि इस परियोजना की बुनियाद 2008 में ही रख दी गई थी. 

कई जानकार इस परियोजना को चीन द्वारा पाकिस्तान में अपने हित साधने की एक कोशिश के तौर पर देखते हैं तो पाकिस्तान में कई जानकारों को लगता है कि इससे केवल पंजाब को फ़ायदा पहुँचेगा.

लेकिन सच तो ये भी है कि आज भी इस परियोजना का काफ़ी हिस्सा बन गया है और काफ़ी पर अब भी बातचीत चल ही रही है. कभी आर्थिक तंगी इसके आड़े आई तो कभी पाकिस्तान की ज़रूरतें. एक बड़ा रोड़ा चीन के ख़िलाफ़ बलूचिस्तान का होना बताया जाता है. दरअसल इस परियोजना का बड़ा हिस्सा बलूचिस्तान में है. 

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 ग्वादर बंदरगाह

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सीपेक क्या है ?

चाइना-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर या सीपेक चीन के महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत बनाए जा रहे व्यापारिक नेटवर्क का हिस्सा है.

सीपेक के तहत पाकिस्तान में इंफ़्रास्ट्रक्चर से जुड़े कई प्रोजेक्ट चल रहे हैं, जिनमें चीन का 62 अरब डॉलर का निवेश है. चीन अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव की सभी परियोजनाओं में सीपेक को सबसे महत्वपूर्ण मानता है. इसकी सफलता उसके लिए बहुत ज़रूरी है. 

जेएनयू में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडी के प्रोफेसर स्वर्ण सिंह कि मुताबिक़ चीन को मध्य एशिया से बहुत ज़्यादा ऊर्जा के स्रोत की ज़रूरत होती है. उसकी चिंता थी कि सिंगापुर के पास मलक्का जल संधि के पास से भविष्य में ऊर्जा के स्रोत को लाने में परेशानी हो सकती है. इसलिए चीन अलग-अलग रास्तों की तलाश में रहा और उसी में से एक रास्ता उसने ग्वादर बंदरगाह का चुना. 90 के दशक में इसकी शुरुआत हो चुकी थी. चीन ने शुरुआत में तेल आयात के लिए इसकी उपयोगिता समझी थी, बाद में इसका दायरा बढ़ाया गया और आगे चल कर दूसरे एनर्जी और पॉवर प्रोजेक्ट जोड़े गए. और इस पूरी परियोजना को नाम दिया सीपेक का. 

स्वर्ण सिंह का कहना है कि पिछले तीन दशकों से काम चलने के बाद भी अभी तक इस परियोजना का काम पूरा नहीं हुआ है. इस बंदरगाह में जहाज़ के आने जाने का काम शुरू नहीं हुआ है. स्वर्ण सिंह इसके पीछे की वजह बलूचिस्तान के लोगों की बग़ावत को मानते हैं. 

सांकेतिक तस्वीर

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बलूचिस्तान के लोगों को दिक्कत क्या है?

बलूचिस्तान में चीन के निवेश पर मूलभूत आपत्ति ये है कि पाकिस्तान ने बलूचिस्तान और ख़ासतौर पर ग्वादर के भविष्य का फ़ैसला करते हुए बलूचिस्तान प्रांत के नेतृत्व को विश्वास में लेना तो दूर की बात, सूचना तक नहीं दी.

स्वर्ण सिंह बताते हैं कि बलूच अलगावादियों की तरफ़ से बार-बार ये दलील दी जाती है कि सीपीईसी में भी ऐसा ही होगा कि बलूचिस्तान के संसाधनों पर पाकिस्तान की संघीय सरकार या फिर दूसरे समृद्ध प्रांत जैसे पंजाब को फ़ायदा मिलेगा. स्थानीय लोगों की सोच है कि चीन क़ब्ज़ा करेगा और बलूचिस्तान वासियों को अपने प्राकृतिक और अन्य संसाधनों को इस्तेमाल करने का मौक़ी नहीं मिलेगा. 

इस वजह से वहाँ के लोग सीपेक का विरोध करते आए हैं. ये लड़ाई सिर्फ़ बलूच की आज़ादी की लड़ाई का हिस्सा नहीं है.

हालाँकि गवादर की तस्वीर तेज़ी से बदल रही है. बंदरगाह में नई मशीनरी लग रही है. सड़कों, नई इमारतों और कॉलोनियों का निर्माण हो रहा है लेकिन ग्वादर के रहने वाले पीने के पानी की बूँद-बूँद को तरस रहे है. ग्वादर शहर को साफ़ पानी उपलब्ध कराने वाले इकलौते भंडार आकड़ डैम से साल में कुछ हफ़्ते ही पानी मिल पता है. बाक़ी दिन ग्वादर के लोग हक़ीक़त में पानी की बूँद-बूँद को तरसते हैं.

स्वर्ण सिंह के मुताबिक़ बलूचिस्तान के रहने वालों को लगता है कि वहाँ पैदा होने वाले रोज़गार के अवसर में स्थानीय लोगों को नौकरियों और अन्य आर्थिक अवसरों में बराबर का हिस्सा नहीं मिलेगा. लेकिन पाकिस्तान के कई जानकार इससे इनकार करते हैं. 

सीपेक

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पाकिस्तान का इनकार

डॉ. मरिया सुलतान साउथ एशियन स्ट्रैटेजिक स्टेबिलिटी इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी की महानिदेशक हैं. दोनों देशों के रिश्तों और इस प्रोजेक्ट पर वे नज़र रखती हैं.

उनके मुताबिक़ बलूचिस्तान की तरफ़ से इस परियोजना में चीन को कोई दिक्कत नहीं आ रही. बल्कि वो इस परियोजना में काफ़ी मददगार साबित हो रहे हैं. वो कहती हैं कि जब हम ये कहते हैं कि बलूचिस्तान सीपेक के रास्ते का रोड़ा है तो हमें ये भी देखना होगा की आख़िर कितने फ़ीसदी बलूचिस्तान के लोग इसके विरोध में है.

उनका मानना है कि बहुत कम बलूच हैं, जो चरमपंथी संगठन से जुड़े हैं और इसके विरोध में हैं. ज़्यादातर बलूच लोग इस परियोजना को पूरा होते हुए देखना चाहते हैं ताकि वहाँ आर्थिक विकास को इससे मदद मिल सके. 

इस परियोजना के तीन हिस्से हैं- पश्चिमी रूट, सेंट्रल रूट और पूर्वी रूट. इन तीनों पर ज़्यादातर काम पूरा हो गया है. उसके बाद बारी आती है एनर्जी कॉरिडोर की, उसमें भी कई प्लांट लगाने का काम पूरा हो चुका है.

वो कहतीं है कि ये एक ग़लत धारणा है कि सीपेक एक महज़ एक सड़क है. इसमें बहुत सी दूसरी चीज़े हैं, रेल लिंक भी है. पाइप लाइन भी है. जिसमें पहले पाँच साल पूरे कर लिए गए हैं. कई सड़कें एक साथ कई इलाक़ों से गुज़रती हैं. कुछ लोगों का ख़्याल था कि पंजाब वाले इलाक़े में पहले बनेंगी और बलूचिस्तान में बाद में बनेंगी लेकिन ऐसा नहीं है.

पाकिस्तान से बात करते हुए डॉ. मरिया ने बीबीसी को बताया कि चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर का इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ा 90 फ़ीसदी काम पूरा हो चुका है. कहीं कहीं कुछ रोड के हिस्से जुड़ना बाक़ी हैं, लेकिन उसका काम भी तेज़ी से चल रहा है. ये पहले चरण का काम था, जो पहले पाँच साल में पूरा करने की बात कही गई थी. इसमें ज़्यादातर हिस्सा रोड कनेक्शन से जुड़ा था. अब अगले चरण का जो काम शुरू होना है, उनमें से ज़्यादातर हिस्सा एनर्जी प्रोजेक्ट का है, जिसमें पाकिस्तान को ये तय करना है कि कौन सी परियोजना उनके लिए ज़्यादा मुफ़ीद होंगी और किस ढ़ंग से उसको आगे ले जाना है. 

चीन के वाणिज्य दूतावास पर 2018 में हुए हमलों को वो इस परियोजना से जोड़ कर नहीं देखती. उनके मुताबिक़ बलूच अलगावादी संगठन बलूच लिबरेशन आर्मी पाकिस्तान से नहीं बल्कि ज़्यादातर यूरोप में बैठ कर ऑपरेट करते हैं. और पाकिस्तान भी इन्हें चरमपंथी ही मानता है. 

नवंबर 2018 को कराची के क्लिफ़्टन इलाके में स्थित चीन के वाणिज्य दूतावास पर हमले की तस्वीर

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चीन पर बलूच लिबरेशन आर्मी के हमले

नवंबर 2018 को कराची के क्लिफ़्टन इलाक़े में स्थित चीन के वाणिज्य दूतावास पर हमला हुआ. इसकी ज़िम्मेदारी बलूच अलगाववादी संगठन बलूच लिबरेशन आर्मी ने ली. इसमें 7 लोगों की मौत हो गई थी. ये पहला मौक़ा नहीं था जब बलूच अलगावादियों ने चीन को निशाना बनाया हो.

इससे पहले भी बीएलए की तरफ़ से अगस्त 2018 में सबसे पहले जिस आत्मघाती हमले की ज़िम्मेदारी क़बूल की गई, वो ख़ुद असलम बलोच के बेटे ने ज़िला चाग़ी के हेडक्वॉर्टर दालबंदीन के क़रीब किया था. 

दरअसल एक सच्चाई ये भी है कि इस परियोजना की हिफ़ाज़त के लिए चीन ने पाकिस्तान को अलग से एक फ़ौज़ तैयार करने की बात भी कही थी. इस बारे में स्वर्ण सिंह कहते हैं कि ये अपने आप में पहला ऐसा वाक़या है, जब किसी दूसरे देश में निवेश के लिए किसी देश ने आर्मी बनाने की बात की हो.

चीन के इस प्रस्ताव को पाकिस्तान ने स्वीकार भी किया. यह सेना, जिसे स्पेशल सेक्योरिटी डिविज़न कहा जाता है, आज भी चीनी लोगों को, चीनी सामान को और परियोजनाओं के हिफ़ाज़त के लिए वहाँ तैयार रहती है. इन हमलों को भी बलूच अलगाववादियों की चीनी सरकार से नाराज़गी से जोड़ कर ही देखा जाता रहा है. 

ऑक्सफ़ोर्ड रिसर्च फाउंडेशन के सुशांत सरीन मानते हैं कि ये सही है कि बलूच अलगाववादियों की तरफ़ से शुरुआत में थोड़ी दिक़्क़तें सीपेक में आई थी. लेकिन वो ऐसी नहीं थी जिससे परियोजना ही रुक गई हो. वो मानते हैं कि इलाक़े में बलूच उपद्रवी भी एक वजह हैं, लेकिन कई और वजहें भी हैं जिसकी वजह से कुछ परियोजनाओं में देरी हो रही है.

उनके मुताबिक़ आर्थिक तंगी भी एक वजह है और दूसरी वजह है पाकिस्तान अपनी ज़रूरतों के हिसाब से चीन से दोबारा से कुछ परियोजना में कुछ चीज़े घटाना चाहता है और कुछ जोड़ना चाहता है. उसकी वजह से दिक़्क़्तें आ रही हैं. इसके लिए दोनों देशों के बीच रज़ामंदी पूरी तरह से नहीं बन पाई है.

सुशांत बताते हैं कि इस परियोजना की शुरुआत में ही इस बात का अंदाज़ा दोनों देशों को था कि बलूच लोगों की बग़ावत से कैसे निपटा जाएगा, इसलिए अलग से सेना की भी बात की गई थी. 

सीपेक

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बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी का इतिहास

बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी पहली बार 1970 के दशक की शुरुआत में वजूद में आई थी. ये वो दौर था जब पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो के पहले शासन में बलूचिस्तान में पाकिस्तान की हुकूमत के ख़िलाफ़ सशस्त्र बग़ावत शुरू की गई थी.

हालांकि सैन्य तानाशाह ज़ियाउल हक़ की सत्ता पर क़ब्ज़े के बाद बलूच क़ौम परस्त लीडरों से बातचीत हुई. और इसका नतीजा ये निकला कि सशस्त्र बग़ावत के ख़ात्मे के बाद बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी भी पृष्ठभूमि में चली गई.

फिर पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के शासन में बलूचिस्तान हाई कोर्ट के जज जस्टिस नवाज मिरी के क़त्ल के आरोप में क़ौम परस्त लीडर नवाब खैर बख़्श मिरी की गिरफ़्तारी के बाद साल 2000 से बलूचिस्तान के विभिन्न इलाक़ों में सरकारी प्रतिष्ठानों और सुरक्षा बलों पर हमलों का सिलसिला शुरू हुआ. 

वक़्त गुज़रने के साथ-साथ हमलों में न सिर्फ़ इज़ाफ़ा हुआ बल्कि इनका दायरा बलूचिस्तान के विभिन्न इलाक़ों में फैल गया.

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