चीन के कारण पाकिस्तानी सेना मज़बूत हुई या कमज़ोर?

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फाइनैंशल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान सैन्य तकनीक के मामले में अमरीका से अपनी निर्भरता लगातार कम कर रहा है.
इस रिपोर्ट के अनुसार अब चीन पाकिस्तान की सैन्य ज़रूरतों को पूरा कर रहा है. रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इस बदलाव से इलाक़े के भूराजनीतिक परिप्रेक्ष्य में एक किस्म की प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है. फाइनैंशल टाइम्स की रिपोर्ट पाकिस्तानी मीडिया में प्रमुखता से छपी है.
इस रिपोर्ट में बताया गया है पाकिस्तान की अमरीका से चीन में शिफ्टिंग की शुरुआत ओबामा प्रशासन के आख़िर के कुछ महीनों में ही हो गई थी जब अमरीकी कांग्रेस ने एफ़-16 लड़ाकू विमान पाकिस्तान को बेचने पर रोक लगा दी थी.
रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान को इसके बाद लगा कि सैन्य ताक़त को लेकर अमरीका पर लंबे समय तक निर्भर नहीं रहा जा सकता है.
फाइनैंशल टाइम्स के अनुसार पाकिस्तान ने इसके बाद एफ-16 फाइटर जेट से ध्यान हटाकर चीन के साथ मिलकर जेएफ-17 फाइटर जेट विकसित करने पर काम शुरू किया.

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अमरीकी कांग्रेस ने एफ-16 को लेकर पाकिस्तान के साथ कड़ा रुख़ अपनाया तो पाकिस्तान ने सैन्य साजो सामान की तलाश दूसरे पार्टनर में शुरू कर दी. अमरीका की जगह चीन ने ली या पाकिस्तान ने चीन की मदद से घर में ही हथियार विकसित करने की कोशिश शुरू की.
इस रिपोर्ट में स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के आंकड़ों का भी इस्तेमाल किया गया है. अमरीका और पाकिस्तान के बीच 2010 से लेकर अब तक के हथियार सौदों के आंकड़े दिए गए हैं.
रिपोर्ट में बताया गया है कि अमरीका और पाकिस्तान के बीच का हथियार सौदा एक अरब डॉलर से फिसलकर पिछले साल 2.1 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया है. हालांकि इस दौरान चीन और पाकिस्तान के बीच भी हथियारों के सौदे के आकार में गिरावट आई लेकिन इसकी रफ़्तार काफ़ी धीमी है.
चीन के साथ पाकिस्तान का हथियार सौदा 74.7 करोड़ डॉलर से 51.4 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया. इसके साथ ही पाकिस्तान को हथियार बेचने के मामले में चीन पहले नंबर पर रहा.

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रिपोर्ट का कहना है कि ऐसी शिफ्टिंग तब हो रही है जब पाकिस्तान को लग रहा है कि भारत और अमरीका क़रीब आ रहे हैं.
हालांकि रिपोर्ट के अनुसार इसकी शुरुआत 2011 में पाकिस्तानी ज़मीन पर अल क़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद से ही हो गई थी. इस वाक़ये के बाद दोनों देशों के संबंध ऐतिहासिक रूप से ख़राब हो हुए थे.
इसी साल जनवरी में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अपने एक फ़ैसले से पाकिस्तान को मिलने वाली दो अरब डॉलर की सैन्य मदद रद्द कर दी थी.
इसके बाद दोनों देशों के संबंध और ख़राब हुए. फाइनैंशल टाइम्स के अनुसार इसका तत्काल असर यह हुआ कि पाकिस्तान भी अमरीका को सामन्य से कम तवज्जो देने लगा.
ख़ास करके अफ़ग़ानिस्तान के मसले पर पाकिस्तान ने अमरीका को अनसुना करना शुरू कर दिया.
फाइनैंशल टाइम्स से यूनिवर्सिटी ऑफ टेनसी में हॉवर्ड एच बेकर जूनियर सेंटर फोर पब्लिक पॉलिसी के रिसर्चर हैरिसन अकिन्स ने कहा, ''ट्रंप की नीति से पाकिस्तान की हथियारों के मामले में निर्भरता चीन पर बढ़ेगी. मतलब अब तक अमरीका सैन्य आपूर्ति करता था और अब चीन करेगा.''

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इस रिपोर्ट का कहना है लंबी अवधि में इस प्रगति का गहरा असर होगा. रिपोर्ट के अनुसार हथियारों की बिक्री व्यवस्था में तब्दीली आएगी. फाइनैंशल टाइम्स का कहना है कि पाकिस्तान चीन से हथियार दशकों से ख़रीदता आया है.
पाकिस्तान को अमरीका से हथियार ख़रीद में दिक़्क़त भारत के साथ 1965 में युद्ध के बाद शुरू हुई. इस युद्ध के बाद पाकिस्तान की अमरीका के साथ राजनयिक दिक़्क़तें बढ़ने लगीं और चीन क़रीब आया.
इस रिपोर्ट का कहना है कि 1980 और 1990 के दशक में चीन ने पाकिस्तान को परमाणु हथियार विकसित करने की तकनीक मुहैया कराई. 1990 के दशक की शुरुआत तक अमरीका के लिए यह हैरान करने वाला था कि चीन पाकिस्तान को परमाणु हथियारों को ले जाने में सक्षम 30 एम-11 मिसाइल बेच चुका था.
इस रिपोर्ट का कहना है कि पिछले दशक में पाकिस्तान और चीन के बीच सैन्य संबंध बदले हैं. चीन अब पाकिस्तान से हाई-एन्ड सिस्टम बेच रहा है जिसके बारे में अमरीका ने पाकिस्तानी सेना के लिए कभी सोचा था.

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डिफेंस रिसर्च कंपनी आईएचएस मार्किट के एनलिस्ट जोन ग्रेवॉट ने फाइनैंशल टाइम्स से कहा, ''पाकिस्तान और चीन के बीच संबंध और सहयोग बहुत आगे बढ़ चुका है. 2010 से चीन पाकिस्तान को ए-100 रॉकेट लॉन्चर और एचक्यू-16 एयर डिफेंस मिसाइल मुहैया करा रहा है जबकि वीटी-4 टैंक्स का परीक्षण पाकिस्तान करने वाला है.
इस रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान ने 2007 में पहली बार दो जेएफ़-17 उड़ाया था जिसकी क़ीमत एफ-16 की एक तिहाई थी. इसके बाद चीन ने पाकिस्तान से इसकी डिजाइन को भी साझा किया ताकि पाकिस्तान की सेना इसका निर्माण ख़ुद ही कर सके. 2015 में पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान की सीमा पर ड्रोन हमला बोला और ड्रोन पूरी तरह चीनी डिजाइन में दिख रहा था.
अक्टूबर 2016 में जब अमरीका एफ-16 कम क़ीमत में देने को तैयार नहीं हुआ तो एक महीने के भीतर ही चीन 5 अरब डॉलर में आठ युद्धपोत पाकिस्तान को देने के लिए सहमत हो गया. पाकिस्तान के लिए चीन का यह सबसे बड़ा सौदा था. रिपोर्ट का कहना है कि यह सब कुछ तब हो रहा है जब पाकिस्तान को लग रहा है कि अमरीका भारत के क़रीब आ रहा है.
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