पाकिस्तान के खुले बाज़ार में डॉलर की क़ीमत इतनी ज़्यादा क्यों

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- Author, आज़म ख़ान और उमेर सलीमी
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, इस्लामाबाद से,
पाकिस्तान इन दिनों आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रहा है. डॉलर की कमी से ज़रूरी सामानों का आयात भी प्रभावित हो रहा है.
लेकिन देश में एक और मुश्किल खड़ी हो गई है, ये दिक्कत है डॉलर की क़ीमत को लेकर. ज़रूरमंदों को डॉलर नहीं मिल रहा और अगर मिल रहा है तो आधिकारिक दर से कहीं अधिक.
पाकिस्तान में आधिकारिक दर 227 रुपये है, लेकिन खुले बाज़ार में डॉलर की क़ीमत इससे 35-40 रुपये अधिक है.
बैंकिंग भाषा में, डॉलर की क़ीमत इस बात से तय होती है कि आप डॉलर खरीदना चाहते हैं या बेचना चाहते हैं. इसके अलावा ये ख़रीद बिक्री बैंकिंग व्यवस्था से करते हैं या खुले बाज़ार में.
आम तौर पर बैंकों के डॉलर में भुगतान पर आधिकारिक (इंटरबैंक) दर लागू होती है, लेकिन कई पाकिस्तानी बैंक विदेशी भुगतान के लिए 'खुले बाज़ार' के आधार पर डॉलर की दर का सहारा ले रहे हैं.
यानी अगर आप अपने बैंक खाते से एयरलाइन टिकट खरीदते हैं, जिसमें पाकिस्तानी रुपये हैं, तो आपको हर डॉलर के लिए अधिक रुपये चुकाने होंगे.

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क़ीमत में इतना क्यों है अंतर?
अर्थशास्त्री असद सईद का कहना है कि सरकार ने कृत्रिम रूप से डॉलर की क़ीमत तय की है, "लेकिन खुले बाज़ार में आपूर्ति और मांग के आधार पर दरें तय करती हैं."
वो कहते हैं, "कुछ हद तक मुद्रा विनिमय द्वारा खुले बाज़ार दर को सरकार ने नियंत्रित करने की कोशिश की है. लेकिन एक तीसरा बाज़ार भी है."
असद सईद का दावा है कि वित्त मंत्री इशाक डार को भ्रम है कि वह इन तरीकों से डॉलर के मूल्य को नियंत्रित कर सकते हैं.
अर्थशास्त्री अशफ़ाक हसन कहते हैं कि खुले बाज़ार और डॉलर के इंटरबैंक रेट में 35 से 40 रुपये का अंतर हो गया है. इसका मतलब है कि एक व्यक्ति विदेश यात्रा पर जाता है या विदेश से कुछ खरीदता है तो उसे आधिकारिक दर की बजाय क़रीब 260 रुपये में डॉलर ख़रीदना होगा.
नतीजतन, दूसरे देशों में रहने वाले पाकिस्तानी बैंकों की बजाय खुले बाज़ार के माध्यम से डॉलर भेजना बंद कर देंगे. इससे विदेशी मुद्रा आना कम होगी और निर्यातक अपना मुनाफ़ा देश में धीरे-धीरे वापस लाएंगे.
पिछले साल वित्त मंत्री का पद संभालने पर इशाक डार ने दावा किया था कि डॉलर का वास्तविक मूल्य 200 रुपये से कम है और यह भी संकेत दिया था कि डॉलर का मूल्य इससे भी कम हो जाएगा.

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'227 रुपये में उपलब्ध नहीं डॉलर'
अशफ़ाक हसन ने कहा कि डॉलर की आधिकारिक दर रखने का कारण यह है कि बैंकों के माध्यम से वैश्विक व्यापार का तरीक़ा बंद है और डॉलर की मांग भी कम रखी गई है.
वो कहते हैं, "डॉलर को रस्सी से नहीं बांधा गया है, लेकिन इसकी मांग कम कर दी गई है. खुले बाज़ार में सट्टेबाज अपनी भूमिका निभा रहे हैं, जिससे दरों में बढ़ोत्तरी हो रही है."
हालांकि, असद सईद ने कहा कि आधिकारिक स्तर पर डॉलर का मूल्य 227 पाकिस्तानी रुपये है, लेकिन इस क़ीमत पर, "आपको कहीं से भी एक डॉलर नहीं मिलेगा."
वरिष्ठ पत्रकार अंजुम इब्राहिम का कहना है कि स्टेट बैंक की आज़ादी को उलट दिया गया है. इशाक डार सही कह रहे हैं कि देश के बाहर डॉलर की तस्करी की जा रही है, लेकिन मुझे लगता है कि इस (तस्करी) के आंकड़ों को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है.
उन्होंने कहा कि 'जो डॉलर ख़रीदना चाहते हैं वे महंगे दाम पर मजबूरन ख़रीद रहे हैं.'
असद सईद ने कहा, " विदेशों से आने वाला पैसा आधिकारिक दर पर नहीं बल्कि खुले बाज़ार के रेट पर आ रहा है जो 260 रुपये है. ऐसे में निर्यातक अपना पैसा बाहर रखता है या 260 रुपये के भाव पर अपना डॉलर हासिल करता है.'
उन्होंने कहा, "लोग देश में पैसा तभी वापस लाएंगे जब इंटरबैंक रेट बाज़ार दर के बराबर हो जाए."

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'हुंडी के जरिए भेज रहे हैं पैसा'
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि पहले भी डॉलर की कीमत कृत्रिम रूप से तय करने की कोशिश की जा चुकी है, लेकिन इस बार स्थिति पहले से भी बदतर है.
असद सईद कहते हैं कि पहले ऐसा होता था कि 'जब घरेलू भंडार अच्छा होता था तो डॉलर बाजार में फेंक देते थे और उसका रेट तय कर देते थे. लेकिन अबकी बार उन्होंने बैंकों और स्टेट बैंक पर दबाव बनाकर रेट कम रखा है.'
वहीं अशफाक हसन का कहना है, 'ऐसा पहले भी हो चुका है जब पाकिस्तान ने मई 1998 में परमाणु विस्फोट किए थे, पाकिस्तान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए थे, तब विदेशों से होने वाले सभी धन हस्तांतरण पर रोक लगा दी गई थी. लेकिन हम अपना कर्ज समय पर चुकाते रहे. इसके कारण नवंबर 1998 में हमारा भंडार 400 मिलियन डॉलर से नीचे चला गया. तब से हमने डॉलर का कृत्रिम मूल्य तय करने का फैसला किया.'
अंजुम इब्राहिम का कहना है कि जब इशाक डार 2013 से 2017 तक वित्त मंत्री थे, तब भी उन्होंने रुपये का 'ओवर वैल्यूएशन' किया था.
उनके अनुसार, अतीत में भी यह 'एक विनाशकारी नीति' थी, लेकिन इस बार महामारी के बाद के प्रभाव, रूस, यूक्रेन में युद्ध और स्थानीय अर्थव्यवस्था में गिरावट जैसे अन्य कारकों के कारण स्थिति और बिगड़ रही है. .
अंजुम इब्राहिम ने कहा कि विदेशों में पाकिस्तानी हुंडी के ज़रिए पैसा भेजने को मजबूर हैं, जिसमें डॉलर नहीं आते, लेकिन लोग यहां रुपये में भुगतान पाते हैं.
उनका कहना है कि डॉलर में बहुत कम भुगतान आधिकारिक दर पर किए जाते हैं जबकि अधिकांश भुगतान खुले बाज़ार दर पर किए जा रहे हैं. इससे महंगाई बढ़ रही है.
डॉलर खत्म होने के कारण खाना पकाने के तेल की कमी हो रही है. ये बहुत मुश्किल हालात हैं.'
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