ग्राउंड रिपोर्ट: बांग्लादेश का नोआखाली-जिसे महात्मा गांधी ने कभी श्मशान कहा था

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- Author, अभिषेक रंजन सिंह
- पदनाम, नोआखाली से लौटकर, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
"नोआखाली में जो कुछ हुआ था अब उसे कोई याद नहीं करना चाहता है."
अतीत से नाता छुड़ाने की नोआखाली की चाहत, यहां रहने वाले प्रमोद दास भुइयां के लफ़्जों से बयां हो जाती है.
"नोआखाली में पहले भी मुसलमानों की संख्या अधिक थी लेकिन बंटवारे के समय हिंदुओं की एक बड़ी आबादी असम, बंगाल और त्रिपुरा में बस गई."
भारत और पाकिस्तान के बंटवारे की कहानी नोआखाली के ज़िक्र के बिना अधूरी मानी जाती है.
मौजूदा बांग्लादेश के चटगांव डिवीज़न के इस ज़िले के लिए मेरा सफ़र कॉक्स बाज़ार से शुरू हुआ.
वही कॉक्स बाज़ार जो आजकल रोहिंग्या शरणार्थियों की वजह से दुनिया भर में चर्चा में है.

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गांधी और नोआखाली
बस पहले फेनी सदर में रुकी. वहां से एक मिनी बस से चौमुहानी स्टेशन.
चंद ज़रूरी बदलावों को छोड़ ये स्टेशन कमोबेश आज भी वैसा है, जैसा पुरानी तस्वीरों में आपने शायद देखा हो.
चौमुहानी से नोआखाली जाने वाली पैसेंजर ट्रेन आने में करीब एक घंटे का समय था.
सांप्रदायिकता की आग में जब नोआखाली झुलस रहा था तब महात्मा गांधी 7 नवंबर 1946 को यहां आए थे.
सात दशक पहले जब दिल्ली में सत्ता हस्तांतरण की कवायद जारी थी.
उस वक्त महात्मा गांधी दिल्ली से पंद्रह सौ किलोमीटर दूर सांप्रदायिकता की आग में जल रहे पूर्वी और पश्चिमी बंगाल में अमन बहाली की कोशिशों में जुटे थे.
चौमुहानी स्टेशन के बाहर गांधी जी ने एक जनसभा में मुसलमानों और हिंदुओं से आपसी भाईचारे बनाए रखने की अपील की थी.

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नोआखाली के लोग
हालांकि महात्मा गांधी से जुड़े होने के बावजूद उनकी कोई निशानी स्टेशन परिसर में नहीं दिखी.
यहां न उनकी कोई प्रतिमा है न ही शिलापटों पर गांधी के बारे में कुछ लिखा है.
लेकिन पढ़े-लिखे नौजवान और बुज़ुर्गों को पता है कि गांधी जी कभी नोआखाली आए थे.
प्लेटफार्म की बेंच पर साथ बैठे शेख नज़रूल अहमद और प्रमोद दास भुइयां एक ही गांव कमलपुर के रहने वाले हैं.
नज़रूल बताते हैं, "महात्मा गांधी कमलपुर आए थे. उन दिनों मज़हबी हिंसा में गांव के कई लोग मारे गए थे."

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प्रमोद दास भुइयां को भी ये कहानी मालूम है, "गांधी जी के आने से कमलपुर के रहने वालों को काफी हिम्मत मिली."
"वे दो दिनों तक यहां रहे, उनकी बातों का असर हुआ और हिंसा में कमी आई. नतीजतन हमारा परिवार गांव छोड़कर नहीं गया."
प्रशांतो मजूमदार इसी चौमुहानी रेलवे स्टेशन पर असिस्टेंट बुकिंग क्लर्क की हैसियत से काम कर रहे हैं.
उन्होंने बताया, "नोआखाली की नई पीढ़ी को पुरानी बातों से कोई सरोकार नहीं है. उनका ध्यान अपनी रोज़ी-रोज़गार को लेकर अधिक है."
"इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़ दिया जाए तो यहां हिंदुओं को कोई दिक्कत नहीं है."

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नोआखाली का गांधी आश्रम
साढ़े आठ बजे ट्रेन में सवार हुआ और नौ बजे ट्रेन सोनाईमुरी रेलवे स्टेशन पहुंच गई. जायग बाज़ार स्थित गांधी आश्रम ट्रस्ट की दूरी यहां से बीस किलोमीटर है.
क़रीब आधे घंटे बाद गांधी आश्रम ट्रस्ट पहुंचने पर हमारी मुलाक़ात शंकर विकास पॉल से हुई जो गांधी आश्रम ट्रस्ट के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी हैं.
पॉल बताते हैं, "ये गांधी आश्रम 1946 से पहले घोष विला के नाम से जाना जाता था. नोआखाली सांप्रदायिक हिंसा के बाद महात्मा गांधी ने चार महीनों तक नोआखाली के हिंसा प्रभावित गांवों का भ्रमण कर शांति समितियां गठित की थी."
"7 नवंबर को गांधी जी सबसे पहले बेगमगंज थाना स्थित रामगंज गए, जहां हिंदुओं के ख़िलाफ़ अधिक हिंसा हुई थी. 29 जनवरी 1947 को वह यहां आए थे.

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बैरिस्टर जिसने दान कर दी अपनी संपत्ति
आज जहां गांधी आश्रम ट्रस्ट है, वह संपत्ति कभी नोआखाली के पहले बैरिस्टर हेमंत कुमार घोष की थी.
गांधी आश्रम ट्रस्ट के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी शंकर विकास पॉल बताते हैं, "मैट्रिक करने के बाद घोष बाबू कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज ग्रैजुएशन करने चले गए. जतिंद्र मोहन सेनगुप्ता और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद उनके अच्छे मित्र थे."
"साल 1910 में लंदन से वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह पूरी तरह स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए. इस दौरान कई वर्षों तक उन्हें जेल में रहना पड़ा और काला-पानी की सज़ा झेलनी पड़ी.
"जिस समय नोआखाली में सांप्रदायिक हिंसा भड़की, उस समय उनका परिवार लखनऊ में था. वहां वे स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों के मुक़दमे मुफ़्त में लड़ते थे. वे महात्मा गांधी के विचारों से काफ़ी प्रभावित थे."
"नोआखाली में शांति स्थापना को लेकर गांधी जी प्रयासों से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी तमाम संपत्ति 2,671 एकड़ ज़मीन महात्मा गांधी के नाम कर दी. गांधी जी ने यहां अंबिका कलिंग चेरिटेबल ट्रस्ट बनाकर हिंसा प्रभावित गांवों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू करवाईं."

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कहानी गांधी जी के ट्रस्ट की
5 जून 1947 को महात्मा गांधी ने चारू चौधरी के नाम एक मुख्तारनामा (पॉवर ऑफ़ अटार्नी) बनाकर सारी संपत्ति उनके नाम कर दी. चारू चौधरी एक समर्पित गांधीवादी थे. नोआखाली के दंगा पीड़ितों के लिए उन्होंने काफ़ी काम किया था यहां तक कि गांधी के शांति अभियान का सारा ज़िम्मा उन्हीं पर था.
साल 1947 में पाकिस्तान बनने पर उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा. तत्कालीन पाकिस्तान सरकार उन्हें भारत का एजेंट समझती थी.
बांग्लादेश के अस्तित्व में आने के बाद 9 अक्तूबर 1975 को विधि मंत्रालय ने अंबिका कलिंग चेरिटेबल ट्रस्ट का नाम बदलकर गांधी आश्रम ट्रस्ट कर दिया.
ज़मींदारी प्रथा ख़त्म होने के बाद 25 एकड़ ज़मीन आश्रम के नाम रही और शेष ज़मीन को सरकार ने भूमिहीन रैयतों के बीच वितरित कर दिया.
स्वदेश राय नोआखाली से प्रकाशित दैनिक गणतंत्र के संपादक हैं और गांधी आश्रम ट्रस्ट के अध्यक्ष भी.
वे बताते हैं, "तत्कालीन पाकिस्तानी सरकार में आश्रम की ज़मीन क़ब्ज़ाने की कई कोशिशें हुईं. ज़िला अदालतों से लेकर हाईकोर्ट तक में कई मुक़दमे चले. सभी फैसले गांधी आश्रम ट्रस्ट के पक्ष में आए. सिलहट के रहने वाले चारू चौधरी की मृत्यु 13 जून 1999 को हुई. उन्होंने इस आश्रम के माध्यम से जीवनपर्यन्त स्थानीय लोगों की मदद की."

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1946 की सांप्रदायिक हिंसा
झरना धारा चौधरी गांधी आश्रम ट्रस्ट की सचिव हैं. वह बताती हैं, "1946 के सांप्रदायिक हिंसा में उनके गांव लक्ष्मीपुर में भीषण क़त्लेआम हुआ था. उनके परिवार के कई लोग मारे गए. गांव में कई महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया."
"विवाहित महिलाओं का जबरन निकाह कराया गया. हिंदू मंदिरों को क्षति पहुंचाई गई. फ़ौज में बड़े ओहदे पर उनके जीजा ढाका में तैनात थे. सेना के जवानों के साथ वह लक्ष्मीपुर आए और उनके बचे हुए परिवार को असम के करीमगंज ले गए."
"गांधी जी के प्रयासों से दंगा शांत हुआ और उनका परिवार दोबारा नोआखाली आ गया."
वो बताती हैं कि जब महात्मा गांधी लक्ष्मीपुर आए थे उस वक्त उनकी उम्र नौ साल थी, "गांधी जी यहां आए थे, बस इतना याद है. उनके साथ निर्मल कुमार बसु, सरोजनी नायडू, सुशीला नायर भी थे."
"चार महीनों तक गांधी जी नोआखाली के गांवों का दौरा दिया. जेबी कृपलानी, सुचेता कृपलानी, डॉक्टर राममनोहर लोहिया और सरोजनी नायडू ने भी हिंसा प्रभावित गांवों में शांति बहाली की कोशिश की."
गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता झरना चौधरी को उनके उल्लेखनीय कार्य के लिए वर्ष 2013 में भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था.

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सात दशकों से मंदिर में पूजा नहीं
गांधी आश्रम ट्रस्ट के बाहर शिव और काली के दो पुराने मंदिर हैं. सवा सौ साल पुराने इस मंदिर का निर्माण घोष परिवार ने कराया था. नोआखाली दंगे में मंदिर को काफ़ी नुक़सान पहुंचा. उसके बाद यहां होने वाली पूजा-अर्चना बंद हो गई.
आज जायग बाज़ार मुस्लिम बहुल है लेकिन 1946 से पहले यहां हिंदुओं की संख्या अच्छी ख़ासी थी. सरकारी दस्तावेज़ों में मंदिर की छह कट्ठा ज़मीन थी. लेकिन आधी ज़मीन अतिक्रमण की शिकार हो गई.
प्रमोद दास यहां के स्थानीय निवासी हैं. वह बताते हैं, "सत्तर वर्षों से मंदिर में पूजा पाठ नहीं होता है. मंदिर में लगा चौखट-किवाड़ को उखाड़ लिया गया. शिवरात्रि और दुर्गा पूजा के मौक़े पर तिरपाल लगाकर पूजा की जाती है."
"कुछ समय पहले प्रशासन की एक टीम यहां सर्वे करने आई थी. मंदिर की मरम्मत के लिए उन्होंने सरकार ने बारह लाख टका देने की अनुशंसा की थी. लेकिन अभी तक काम शुरू नहीं हुआ है."

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क्यों जला था नोआखाली
मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान बनाने की आख़िरी हद तक पहुंच गए थे. दिल्ली में इस बाबत मसौदे तैयार किए जा रहे थे. 16 अगस्त 1946 को जिन्ना ने 'डायरेक्ट एक्शन' की घोषणा की.
दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर दिवाकर कुमार सिंह बताते हैं, "उनके इस फ़रमान के बाद संयुक्त बंगाल में दंगे शुरू हो गए. मुस्लिम बहुल नोआखाली ज़िले में हिंदुओं का क़त्लेआम होने लगा."
"दस-पंद्रह दिनों तक दुनिया को इस नरसंहार की ख़बर नहीं मिली. नृशंसता के इस उत्सव की कहानी बाद में चारों तरफ़ फैली. नतीजतन कलकत्ता और बिहार में भी व्यापक दंगे शुरू हो गए."
"अख़बारों में जहां एक तरफ़ जलते नोआखाली की तस्वीरें थी तो दूसरी तरफ़ बिहार में मारे गए लोगों की कहानी. मुस्लिम लीग की तरफ़ से ये नारा उछला, 'लीग ज़िंदाबाद, पाकिस्तान ज़िंदाबाद, लड़ के लेंगे पाकिस्तान, मार के लेंगे पाकिस्तान'."
इस तरह लक्ष्मीपूजा के दिन नोआखाली में भयानक दंगे शुरू हो गए. एक महीने के भीतर बड़े पैमाने पर लोग मारे गए. बेगमगंज से भड़की ये हिंसा नोआखाली के दूसरे गांव में भी फैल गई.

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ये एक सुनियोजित दंगा था...
गांधी मेमोरियल इंस्टीट्यूट के प्रिंसिपल देवाशीष चौधरी बताते हैं, "शाहगंज बाज़ार में हमलावरों ने स्थानीय हिंदू नेता और ज़मींदार सुरेंद्र कुमार बोस की निर्मम हत्या की."
"जब निहत्थे-लाचार हिंदू मारे जा रहे थे, तब करपाड़ा गांव में नोआखाली ज़िला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और यहां के ज़मींदार राजेंद्र लाल रॉय ने अपने बेटों और भाइयों के साथ मिलकर स्थानीय हिंदुओं को एकजुट करना शुरू किया."
"उनके द्वारा स्थापित रक्षा दल के लोगों ने हिंदुओं को भारत भेजना शुरू किया. एक सप्ताह के भीतर उन्होंने हज़ारों हिंदुओं को सुरक्षित पहुंचाया. लेकिन 23 अक्तूबर 1946 को हथियारबंद लोगों ने उनकी हत्या कर दी."
देवाशीष चौधरी के मुताबिक़ नई पीढ़ी के ज्यादातर लोगों को नोआखाली हिंसा के बारे में जानकारी नहीं है. गांधी आश्रम ट्रस्ट से जुड़ीं गौरी मजूमदार नोआखाली के खिलपाड़ा गांव की रहने वाली हैं.
वह बताती हैं, "नोआखाली मुस्लिम बहुल ज़रूर था, लेकिन ज़मींदारों में हिंदुओं की संख्या अधिक थी. ये एक सुनियोजित दंगा था, जिसका मक़सद था हिंदुओं को भगाकर उनकी संपत्तियों पर क़ब्ज़ा करना."
"यही वजह थी कि नोआखाली में ज़मींदारों पर अधिक हमले हुए. दंगे के वक्त एनजी रे नोआखाली के ज़िला कलेक्टर थे. संभवतः उन्हें दंगे की आहट महसूस हो चुकी थी. इसलिए तीन दिन पहले वे परिवार सहित नोआखाली से ढाका चले गए थे."

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गांधी की नोआखाली यात्रा
7 नवंबर 1946 को महात्मा गांधी नोआखाली पहुंचे. हिंसा के शिकार लोगों के सामने कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था. कभी साथ मिलकर रहने वाले एक-दूसरे को शक की निगाह से देखने लगे थे.
नोआखाली आने के बाद महात्मा गांधी हिंसा प्रभावित गांवों की पदयात्रा शुरू की. चार महीनों की अपनी यात्रा के दौरान वे नंगे पांव रहे. उनका मानना था कि नोआखाली एक श्मशान भूमि है, जहां हज़ारों बेक़सूर लोगों की समाधियां हैं.
ऐसी जगहों पर चप्पल पहनना मृत आत्माओं के प्रति अपमान है.
गांधी आश्रम ट्रस्ट के लाइब्रेरियन असीम बख्शी बताते हैं, "महात्मा गांधी सबसे अधिक छह दिन चांदपुर थाना के गावों में रहे. वे जिन गांवों में जाते वहां किसी मुस्लिम परिवार के यहां ठहरते थे."
"गांवों का दौरा करते समय वे स्थानीय मुसलमानों को साथ लेकर चलते थे. बाद में मुसलमान अपनी स्वेच्छा से गांधी जी की पदयात्रा में शामिल होते गए. हिंसा में बेघर हुए लोगों के पुनर्वास में स्थानीय मुसलमानों ने सहयोग करना शुरू कर दिया."
"महात्मा गांधी के चार महीनों के प्रवास का असर नोआखाली और आस-पास के ज़िलों में दिखने लगा. हिंदुओं के जिन मंदिरों को तहस-नहस किया गया, बाद में उन्हीं मंदिरों का पुनर्निर्माण मुसलमानों के सहयोग से शुरू हुआ."
"गांधी जी के अलावा कृपलानी दंपत्ति और राममनोहर लोहिया जैसे नेताओं ने नोआखाली के गांवों की यात्राएं कर मुसलमानों और हिंदुओं के बीच शांति स्थापित की."

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आज़ादी की पहली सुबह
दिल्ली में भारत की आज़ादी का जश्न मनाया जा रहा था. तमाम बड़े नेता इस जलसे में शरीक थे. लेकिन उनमें एक नाम नहीं था महात्मा गांधी का.
नोआखाली में उनके प्रयासों की वजह से हिंसा थम गई थी, लेकिन कलकत्ता के कई जगहों पर तनाव क़ायम था.
पंद्रह अगस्त के दिन वे हिंसा प्रभावित इलाक़ों में हिंदू और मुसलमानों के बीच आपसी भाईचारे पर ज़ोर देते रहे.
गांधी जी के भरोसे के बाद पीड़ितों की आस बंधी. गांधी जी दिन भर लोगों से मिले, अपने पुराने मित्रों को पत्र लिखा और ग़ैर कांग्रेसी नेताओं से मुलाक़ात की. शायद ये उनकी आख़िरी कलकत्ता यात्रा भी थी.
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